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आज के अखबार : नभाटा के कल के शीर्षक की भरपाई में सरकारी ‘प्रयास’ के पुरजोर प्रचार के लक्षण दिख रहे हैं

संजय कुमार सिंह

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बारहवें दिन सबसे प्रमुखता से छपी खबर है, कि भारत में आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू कर दिया गया है। कल नवभारत टाइम्स की लीड का शीर्षक था, खाड़ी की आंच आपकी रसोई तक। आज कई अखबारों की लीड का शीर्षक सरकारी कार्रवाई बताने वाला है। कहने की जरूरत नहीं है कि 10 दिन में अगर यह स्थिति हो गई है तो आगे काफी कुछ हो सकता है। अखबारों में उसके बारे में बताने की बजाय सरकारी प्रचार और कार्रवाई को महत्व दिया गया है। कायदे से आज अखबारों को यह बताना चाहिए था कि रसोई के अलावा और क्या कुछ प्रभावित हो सकता है। उदाहरण के लिए आज अमर उजाला में एक खबर का शीर्षक है, हवाई सफर भी महंगा, एअर इंडिया ने ईंधन अधिभार 399 रुपए बढ़ाया। यह वृद्धि कल से घरेलू उड़ानों पर लागू हो जाएगी। पश्चिम एशिया की उड़ानों के लिए यह वृद्धि 10 डॉलर होगी। वृद्धि सार्क देशों में भी लागू होगी। जाहिर है, यह आम जनता को प्रभावित करने वाली खबर है। कल नभाटा में छपी खबर के अनुसार पुणे महानगर पालिका ने गैस आधारित शवदाह गृहों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। मुंबई के चंदनवाडी श्मशान भूमि में भी पीएनजी की सप्लाई में दिक्कत की खबर है। ऐसे में सरकार ने अगर आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए) लागू किया है तो यह समाधान नहीं है, तात्कालिक जरूरत है। इससे बहुत फायदा नहीं होने वाला है, ना ही लंबे समय तक काम चलेगा। सरकार ने यह आश्वासन भी दिया है कि घरेलू उपभोक्ताओं व वाहनों को निर्बाध आपूर्ति की जाएगी। यह सरकारी प्रचार है और कई अखबारों में लीड है। इस खबर को प्रचार देने की कोशिश में कम महत्व पाने वाली आज की खबरों में एक खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में है। इसके अनुसार, इंडिगो संकट के तीन महीने बाद सीईओ पीटर एलबर्स ने इस्तीफा दिया। इंडिगो संकट जबरदस्त रहा, सरकार ने जुर्माना लगाया, समय दिया और जनता ने परेशानी झेली। अब सीईओ गए। ऐसा फिर न हो इसके लिए क्या किया गया कोई नहीं जानता और वह मुद्दा ही नहीं है।

अमर उजाला में सरकारी प्रचार लीड है लेकिन नवोदय टाइम्स में प्रचार लीड नहीं है। यहां यह टॉप पर है लेकिन शीर्षक यह बताने की कोशिश करता है कि प्रधानमंत्री (जरूरी) काम कर रहे हैं। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने मंत्रियों से मिलकर काम करने का निर्देश दिया …. ताकि न हो तेल गैस की दिक्कत। सरकारी विज्ञप्ति जैसी इस ‘खबर’ में बताया गया है देश में गैस की खपत कितनी है, कितना विदेश से आता है और गैस की कितनी आपूर्ति प्रभावित है। इससे हम आप कुछ अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। ऐसे समय में यह बताया जाना चाहिए कि कितने दिन का स्टॉक है, कितना आयात होता है, कितना हो पा रहा है या पूरी तरह बंद है और नहीं हो पाएगा तो स्टॉक कितने दिन का है। अगर किसी भी वस्तु का आधा उत्पादन देश में होता है, आधे का आयात किया जाता है और आयात बंद है तो अपील की जानी चाहिए कि संकट टलने तक उपयोग कम कीजिए। उपयोग कम हो उसकी व्यवस्था हो और अगर उपयोग आधा हो जाए तो काम चलता रह सकता है। सरकार का काम यह होता है लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाली सरकार ऐसे काम करती तो हेडलाइन मैनेजमेंट की जरूरत ही क्यों पड़ती। गौर कीजिए कि अभी भी खबत कम करने की अपील नहीं है, उपाय करने की तो बात भी नहीं है। अगर पीएनजी का संकट है तो सरकार को कहना चाहिए कि बिजली के उपकरणों पर खाना बनाएं, गैस वाली कार कम चलाएं, पेट्रोल का स्टॉक है तो पेट्रोल पर चलाएं आदि। लोग कार कम चलाएं इसके लिए महानगरों में ऑफिस के समय बसों की विशेष व्यवस्था की जा सकती है और इससे काम चलता रह सकता है पर युद्ध के प्रभाव को स्वीकारना ही नहीं हो तो खबर नहीं छपेगी और खबर नहीं छपेगी तो उपाय कैसे करें या जरूरत ही कहां है।

खबरों से यही समझ में आ रहा है और नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है – जल्द खत्म होगा युद्ध, ट्रम्प के ऐलान से गिरे तेल के भाव। मानने को यह माना जा सकता है कि ट्रम्प ने युद्ध शुरू किया था तो वही खत्म करेंगे पर इरान मान जाएगा और आपूर्ति सामान्य हो जाएगी वह भी जल्द यह आशावाद है और अच्छी चीज है। इसलिए सरकार काम न करे, उम्मीद करके कि संकट आएगा ही नहीं तो वह भी संभव है। समझदार लोग कहते हैं कि रेत में सिर छिपाने से तूफान नहीं टलता पर … अखबारों का काम तो जनता को जागरूक करना है उसके मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना है पर वह ऐसी खबरें देता है कि आपके मन में कोई सवाल उठे ही नहीं। जब तमाम संवैधानिक संस्थाओं की साख खराब हुई है और कइयों की साख खराब करने का आरोप विपक्ष पर भी है तो अखबारों की साख जैसी होगी वैसा यकीन किया जाता होगा और किया जाएगा। वैसे युद्ध जल्द खत्म होगा, बड़ी खबर है पर किसी और अखबार में लीड नहीं है। देशबन्धु में मदुरै हवाई अड्डा अंतरराष्ट्रीय बनेगा पहले पन्ने की खबर है। मुंबई में गैस संकट से 20 फीसदी होटल रेस्टोरेंट बंद भी लीड नहीं है। यही नहीं, ईरान ने कहा है, एक लीटर तेल भी बाहर नहीं जाने देंगे – चार कॉलम की खबर है। ऐसे में तेल संकट से निपटने के लिए कोई कार्रवाई नहीं होना या होने पर भी उसकी खबर पहले पन्ने पर नहीं होना मायने रखती है। देश में जो हो रहा है और जिस राजनीति के कारण हो रहा है वह भी इतना ही महत्वपूर्ण लेकिन ऐसी एक खबर देशबन्धु में लीड है। शीर्षक है, ओम बिरला ने पक्षपात किया। खबर के अनुसार,  कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा है कि ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लोकतंत्र बचाने के लिए है और इसे प्रस्तुत करते हुए खुशी नहीं हो रही है।

सरकारी प्रचार में अमर उजाला भी पीछे नहीं है। लीड के बराबर में तीन कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, एफडीआई के नियमों में ढील चीन से निवेश की राह आसान। मुझे नहीं लगता कि अभी इस खबर का इतना महत्व है कि पहले पन्ने पर इस प्रमुखता से छपे और जो खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं वो इतनी कम महत्वपूर्ण हैं कि पहले पन्ने पर जगह न पाएं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है – एलएनजी का आयात प्रभावित, आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू, गैस आवंटन की प्राथमिकता तय। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक अलग है। इसके अनुसार – परेशानी में, सरकार ने कहा घरेलू पीएनजी, सीएनजी, एलपीजी उत्पादन प्राथमिकता। द हिन्दू का शीर्षक हैअधिकारियों ने कहा, नए स्रोत की गैस कमी खत्म करेगी। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है – सरकार ने एस्मा लागू किया; घरों, कार के लिए गैस सर्वोच्च प्राथमिकता। दि एशियन एज में भी लीड गैस की कमी के कारण व्यवस्था में सुधार किए जाने की खबर है। शीर्षक है, रसोई गैस सर्वोच्च प्राथमिकता : केंद्र (सरकार) ने गैस आवंटन को पुनर्व्यवस्थित किया। स्पष्ट है कि ज्यादातर अखबारों ने वास्तविकता बताने की बजाए सरकारी काम या घोषणा भर को महत्व दिया है और अगर लोग अभी ही गैस आपूर्ति की कमी महसूस कर रहे हैं। रेस्त्रां बंद रहे, शवदाहगृह बंद करने पड़े हैं तो सरकार के इस काम या प्राथमिकता से क्या फर्क पड़ा या परेशानी तो है ही।

बेशक यह खबर है, पहले पन्ने पर भी छापने लायक मानी जा सकती है लेकिन इस खबर के चक्कर में जो दूसरी खबर अंदर चली गई या नहीं छपी  वही यह सरकार चाहती है, सरकार के हित में है। मीडिया खुलकर सरकार का साथ निभा रहा है वरना ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ऐतिहासिक घटना है। इसकी खबर कहीं पहले पन्ने से गायब हैं कहीं सिंगल कॉलम में है। नवोदय टाइम्स में इससे ज्यादा प्रमुखता से छपी खबर का शीर्षक है, जल जीवन विस्तार को मिले 8.7 लाख करोड़। खबर के अनुसार, केंद्रीय मंत्री (इतना ही लिखा है) अश्विनी वैष्णव ने बताया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बताया कि मंत्रिमंडल ने जल जीवन मिशन को दिसम्बर 2028 तक बढ़ाने की मंजूरी दे दी है, जिसके लिए लगभग 8.7 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त आवंटन किया जाएगा (गौर कीजिए, किया जाएगा, अभी सिर्फ मंजूरी है)। खबर के अनुसार, इस परियोजना की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में की थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण भारत के सभी घरों में नल के माध्यम से साफ और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद या शहरी योजना नहीं होने के कारण इंदौर में हाल में गंदा पानी पीने से कई लोगों की मौत हुई ऐसे में अभी मंत्रिमंडल की योजना इतनी बड़ी खबर है तो आप समझ सकेते हैं कि इंदौर के लिए कुछ होगा तो कितनी बड़ी खबर होगी, कितना विज्ञापन और प्रचार होगा। सरकार के इस प्रचार के आगे यह खबर (पहले पन्ने से) रह गई या सिर्फ कोलकाता के द टेलीग्राफ में लीड है।

खबर एसआईआर से संबंधित है, सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और इसमें खास बात यह है कि एसआईआर का काम चुनाव आयोग करवा रहा था, अपना अधिकार बता रहा था उसमें वह यह सुनिश्चित करना चाह रहा था कि विदेशी नागरिक वोटर न बन जाएं। विदेशी नागरिकों की पहचान (और संबंधित कार्रवाई) सरकार का काम है। पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना भी काम माना, कम समय में करवाने का जिम्मा लिया और फिर जैसे तैसे करता रहा। बंगाल में शिकायत हुई, मनमानी का विरोध हुआ तो खबरें छपीं और सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाकि अधिकारियों को भी इस काम में लगाया। राज्य के न्यायिक अधिकारियों से काम नहीं चला तो पड़ोसी राज्यों के न्यायिक अधिकारियों की भी सेवा लेने के आदेश दिए। विदेशियों की पहचान करते-करते मामला घुसपैठियों से डिजिटल डिसक्रिपेंसी का हो गया और इसे निपटाने के फेर में लाखों मतदाता छूट गए हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि वोटर लिस्ट से बाहर किए गए लोगों की अपील पर सुनवाई के लिए हाईकोर्ट के पूर्व जजों का ट्रिब्यूनल बनाया जाए। इस तरह चुनाव आयोग का काम हाईकोर्ट के पूर्व जज करेंगे और इस तरह वे जो काम करेंगे उसकी शुरुआत मोटे तौर पर घुसपैठियों की पहचान या जरूरत के लिए ही बताई गई है। संयोग से यह सब भाजपा के दो बार हारने के बाद हो रहा है। इसलिए यह बड़ी खबर है लेकिन इसे प्रमुखता नहीं मिली है। ज्यादातर अखबारों की आज की सबसे महत्वपूर्ण खबर सरकारी कार्रवाई ही है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से संबंधित देशबन्धु की खबर इस प्रकार है, इस संबंध में देशबन्धु की खबर है – शीर्ष अदालत ने कहा, न्यायिक अधिकारियों पर सवाल बर्दाश्त नहीं होंगे। उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान ‘तार्किक विसंगतियों’ और ‘अनमैप्ड’ श्रेणी में आए करीब 50 लाख नामों से संबंधित दावों और आपत्तियों के निपटारे में लगे न्यायिक अधिकारियों पर उठाए जा रहे सवालों पर कड़ा रुख अपनाते हुए मंगलवार को कहा कि न्यायालय ऐसे आरोपों को बर्दाश्त नहीं करेगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने न्यायिक अधिकारियों के समक्ष लंबित दावों को लेकर दाखिल याचिकाओं पर नाराजगी जताते हुए निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार को इस प्रक्रिया के संचालन के लिए परिवहन में पूर्ण सहयोग करने और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था नहीं होने की चिंता को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि लिए गए फैसलों के खिलाफ विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अपील सुनने के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीशों या न्यायाधीशों का एक अपीलीय अधिकरण गठित किया जाए।   

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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