ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है, मेरी पार्टी के दस्तावेज उठवा रहे हैं अमित शाह। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, आई-पीएसी प्रशांत किशोर की कंपनी है और तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से संबंधित काम करती है। इस लिहाज से छापा आई-पीएसी पर नहीं, तृणमूल के घर और कार्यालय में था। एक दूसरी खबर से अखबार ने यह भी बताया है कि आईपीएसी का दूसरा बड़ा क्लाइंट डीएमके है और तमिलनाडु में भी चुनाव होने हैं।
संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों की लीड एक ही खबर है – ईडी ने ममता पर और ममता ने ईडी पर छापा मारा। कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ का शीर्षक है, ईडी रेड्स, सीएम रेड्स। मतलब ईडी ने छापा मारा, मुख्यमंत्री ने (भी) छापा मारा। इससे पहले, फ्लैग शीर्षक है, चुनाव से पहले आई-पीएसी पर झपट्टे (स्वूप) ने ममता को फाइलों के लिए टक्कर लेने को मजबूर किया। मैं नहीं जानता यह सच्चाई है या नहीं लेकिन जो हुआ उससे यही लगता है। वरना चुनाव से पहले आई-पीएसी पर ईडी के छापे का कोई मतलब नहीं है। अमर उजाला ने शीर्षक में आई-पीएसी नहीं लिखकर उसे अच्छी तरह समझाया है, तृणमूल आईटी सेल प्रमुख के दफ्तर व घर में ईडी के छापे, फाइल उठा ले गई ममता। मुझे लगता है कि इस शीर्षक से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी छापे से अपना मतलब साधने में कामयाब नहीं हो पाएगी। यह अलग बात है कि अमर उजाला को बंगाल के कितने वोटर पढ़ेंगे और बंगाल के अखबारों में क्या छपा है। लेकिन इतने सारे अखबारों की खबरों से हम यह अनुमान तो लगा ही सकते हैं कि आखिर क्या हो रहा है।
अमर उजाला ने शीर्षक के बीच में कोयला घोटाला प्रमुखता से लिखकर यह जताने की कोशिश की है कि छापा चुनावी दस्तावेज झपटने के लिए नहीं था, और ममता बनर्जी दो परिसरों से दस्तावेज जबरन उठा ले गई हैं। पाठक इसका चाहे जो मतलब लगाएं, कोई भी समझता है कि चुनाव से पहले आईटी सेल प्रमुख के घर और दफ्तर पर छापे का मकसद क्या हो सकता है। उपशीर्षक है, सीएम का आरोप – एजेंसी ने जब्त किए पार्टी के आंतरिक दस्तावेज… आज निकालेंगी विरोध मार्च। अमर उजाला का दूसरा शीर्षक है, एजेंसी हाईकोर्ट पहुंची, कहा – सीएम ममता दो परिसरों से जबरन उठा ले गईं दस्तावेज। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है – सीएम बोलीं डराने धमकाने की कोशिश। दूसरी खबर का शीर्षक है, तथ्यों पर कार्रवाई… अहम सबूत ले गईं सीएम : ईडी। यहां मुद्दा यह है कि जब सीएम सबूत नहीं ले जाते रहे हैं, गिरफ्तार भी कर लिया है तब ईडी ने क्या कर लिया? जहां मामला सीएम का नहीं था वहां भी पीएमएलए के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है। ऐमटेक चेयरमैन अरविन्द धाम के मामले में अदालत ने नोट किया कि निकट भविष्य में ट्रायल पूर्ण होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि इस मामले में 210 गवाहों से जिरह की जानी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्य के पास अगर द्रुत ट्रायल सुनिश्चित करने की व्यवस्था नहीं है तो वह जमानत का विरोध न करे।
जाहिर है ईडी ‘अपनी मर्जी से’ छापे मारता है, आगे की कार्रवाई भी मनमाने ढंग से चलती रहती है। अरविन्द धाम भी 16 महीने जेल में रहे। उनके अपराध का पता नहीं है और जाहिर है इतने समय में व्यवसाय किया होता तो काफी कुछ कर पाते। इससे उनका और उनके लोगों का तो भला होता ही, देश को टैक्स भी मिलता। सब छोड़कर उनके जेल में रहने या 16 महीने पहले कार्रवाई करने से देश को क्या मिला? इसलिए इस छापे से भी नहीं मिलने वाला है। जैसा ममता बनर्जी ने कहा, मकसद डराना है। इसका फायदा हुआ तो भाजपा को होगा, देश को नहीं। अब ऐसा भी नहीं रहा कि दूसरी पार्टियां बेईमान है और भाजपा किसी से कम है। इसलिए छापे का मकसद घोटाले की जांच हो भी तो ईडी की सफलता की दर बता रही है कि उसकी कार्रवाई किसके मतलब की होती है। इस मामले में मतलब की खबर इंडियन एक्सप्रेस में है। खबर के अनुसार, आई-पैक एक इलेक्शन मैनेजमेंट कंपनी है और छापा इसके 10 ठिकानों पर पड़ा था। इनमें इसके निदेशक प्रतीक जैन का घर शामिल है। आईपैक की स्थापना चुनावी रणनीतिकार से राजनीतिज्ञ बने प्रशांत किशोर ने की है। तृणमूल कांग्रेस के चुनाव अभियान का प्रबंध यही कंपनी कर रही है।
कोयले की कथित तस्करी और मनी लांड्रिंग के मामले में इस छापे की खबर फैली तो कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर, मनोज वर्मा करीब पौने बारह बजे प्रतीक जैन के घर पहुंचे। दोपहर तक ममता बनर्जी वहां पहुंची और कार से उतर कर सड़क पर चलते हुए बांग्ला में पूछा, प्रतीक का घर कहां है? थोड़ी देर बाद वे घर से बाहर आईं उनके पास हरे रंग का प्लास्टिक का एक फोल्डर और लैप टॉप था। 12.40 पर वे वहां से चली गईं (टेलीग्राफ ने लिखा है कि वे करीब चार घंटे वहां रहीं और 4.22 पर गईं)। प्रतीक जैन के घर के बाहर उन्होंने कहा, यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि ईडी ने हमारी आईटी शाखा और उसके प्रमुख के घर पर छापा मारा। वे सूचना एकत्र करने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने प्रतीक को फोन किया वे मेरी पार्टी की आईटी शाखा के इंचार्ज हैं। मैंने पार्टी की फाइल ले ली है। ईडी हमारी पार्टी की गतिविधियों, रणनीतियों और योजनाओं का विवरण हासिल करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने पूछा, क्या यह अमित शाह का काम है। हरी फाईल और हार्ड ड्राइव दिखाते हुए उन्होंने कहा, देखिये, मुझे मिला। और पूछा अगर मैं भाजपा के पार्टी कार्यालय में छापा मारूं तो क्या होगा? मुझे ममता की बातों में दम लगता है और मुझे लगता है कि खबर यही है। ईडी के छापे तो अब पुराने हो चले। लेकिन आज यह खबर आमतौर पर नहीं है।
यह मीडिया का स्तर है तो ईडी की साख का सवाल भी। मुझे नहीं लगता कि डिजिटल इंडिया में चुनाव से ठीक पहले, एसआईआर के समय या उसके बाद किसी पार्टी की आईटी सेल के मुखिया के यहां सरकारी छापा पड़ना चाहिए। ईडी तो वैसे भी अब पार्टी की शाखा की तरह काम करती है इसलिए ममता बनर्जी वहां से फाइल ले गईं। मामला कोर्ट में है लेकिन चुनाव लड़ने और रिटायरमेंट के बाद के जुगाड़ में लगे जज क्या फैसला देंगे और उनकी क्या सोचेंगे जो नौकरी तो नहीं ही पाते हैं पेंशन का सपना भी नहीं देखते। देश में ऐसे लोग होंगे तो भाजपा जैसी पार्टी रहेगी। हालांकि यह अलग मुद्दा है। मुझे लगता है कि आईपैक पर छापेमारी की खबर के साथ उसके बारे में बताना जरूरी है। लेकिन नवोदय टाइम्स की खबर में पहले पन्ने पर यह तो बताया गया है कि ममता बनर्जी फाइल ले गईं लेकिन यह नहीं बताया गया है कि आई-पैक क्या है या क्यों ले गईं। मामला बंगाल में ईडी के छापे के खिलाफ मुख्यमंत्री की कार्रवाई का नहीं है। मामला चुनावी स्वतंत्रता और निष्पक्षता का है। दिल्ली में जो हुआ उसके मद्दनजर ममता बनर्जी के लिए यह जरूरी था कि वे अपनी पार्टी के लिए ऐसा करतीं। नवोदय टाइम्स ने मुख्य खबर के साथ बराबर में दो खबरें छापी हैं। एक ममता बनर्जी की और दूसरी ईडी की है। ईडी भाजपा सरकार की शाखा की तरह काम कर रही है इसे बताने की जरूरत नहीं है और संभव है बताना, गैर जरूरी या गलत भी हो। लेकिन आई-पैक पर छापे से ममता बनर्जी का संबंध बताया जाना जरूरी है। वह बाद में है और सीधे भी नहीं है। कोई भी जानना चाहेगा कि आईपैक पर छापे से मुख्यमंत्री को परेशान होने की क्या जरूरत थी। कारण जानते ही मुख्यमंत्री की कार्रवाई ठीक ही नहीं, जरूरी लगने लगती है। दि एशियन एज ने इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक में लिखा है, … दीदी जबरन घुस आईं, जांच रोक दी, शाह की आलोचना की। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पूरी तरह सरकारी या भाजपाई शीर्षक है। गनीमत सिर्फ यह है कि ममता बनर्जी ने जो कहा वह हाईलाइट किया हुआ है। इसमें यह भी लिखा है, ….उनकी कोई ताकत नहीं है इसीलिए वे चुनाव से संबंधित मेरी पार्टी की सारी जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं।
टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, ममता बनर्जी ने कहा, यह (ईडी का छापा) एक अपराध है। हमारे चुनावी कार्य चल रहे हैं। जनता की मदद के लिए एसआईआर से संबंधित काम जारी हैं। वे अपने साथ फोरेंसिक टीम लेकर आए थे और सब कुछ ट्रांसफर कर लिया है। देशबन्धु का शीर्षक भी है, मेरी पार्टी के दस्तावेज उठवा रहे हैं अमित शाह। पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेन्दु अधिकारी ने कहा और देशबन्धु ने इसे भी छापा है, ममता ने अनैतिक कदम उठाया। लेकिन ममता बनर्जी के आरोप दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, कोलकाता में छापे का ड्रामा क्यूंकि आई-पीएसी का पीछा करती ईडी के पीछे दीदी पहुंची, कहा दुश्मनी निकाल रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, ईडी के छापे से चुनावी राज्य पश्चिम बंगाल में तृणमूल-भाजपा में हंगामी भिड़ंत। कंसलटेंसी फर्म की तलाशी पर ममता, ईडी भिड़े।
आज जिन खबरों को कम महत्व मिला
1) ट्रम्प ने रूसी तेल खरीदने वालों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले बिल को पास किया। (द हिन्दू)। हमारे प्रधानमंत्री ने न सिर्फ ट्रम्प को अपना मित्र बताया था, अब की बार ट्रम्प सरकार का नारा भी दिया था। अब रिलायंस को कहना पड़ रहा है कि वह रूस से तेल नहीं खरीद रहा है और बता रहा है कि इस इनकार के बावजूद अगर कोई कहे के उसने रूस से तेल खरीदा है तो उसकी छवि खराब होती है। यह अमृतकाल की राजनीति का विकास है। 2) अमेरिका प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग हुआ। इससे जलवायु से संबंधित वैश्विक प्रयास प्रभावित हुए। 3) राज्य सभा के अधिकारी ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के विपक्ष के प्रस्ताव में कई दोष हैं। (हिन्दुस्तान टाइम्स) 3) सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक तौर पर पूछा है कि क्या न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के प्रस्ताव को राज्यसभा के नए अध्यक्ष, उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन के समक्ष रखा जा सकता है। यह मौखिक सवाल है इसलिए भले महत्वपूर्ण नहीं हो लेकिन इससे प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और जो व्यवस्था है उसमें तो पूर्व उपराष्ट्रपति भी क्यों मना करते और अगर अचानक इस्तीफे से उनकी राय नहीं ली गई तो नए राष्ट्रपति की राय कौन नहीं जानता है। अब तो नए प्रस्ताव पर भी वही होना है। इसलिए मेरी गैरकानूनी समझ कहती है कि उसे पास नहीं माना जा सकता है। पर….(द हिन्दू)। 4) इंदौर में नया विवाद – कलेक्टर और मेयर आरएसएस कार्यालय में हुई बैठक में शामिल हुए (इंडियन एक्सप्रेस) खबर यह भी है कि छह और मरीज अस्पताल में दाखिल हुए। 5) आरएसएस के सात लोगों को माकपा मजदूर की हत्या के लिए उम्रकैद (टाइम्स ऑफ इंडिया) 6) गोवा में कांग्रेस सांसद को एसआईआर नोटिस, पहचान साबित करने के लिए बुलाया गया है (देशबन्धु)। 7) सुप्रीम कोर्ट का एक और स्पष्टीकरण – हर कुत्ते को सड़क से हटाने का आदेश नहीं दिया (अमर उजाला)।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


