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आज के अखबार : नहीं बताते कि बिहार में ‘घुसपैठियों’ की पहचान केंचुआ अब करेगा, यही उसका कर्तव्य!

संजय कुमार सिंह

आज तीन बड़ी खबरें हैं जो आम तौर पर अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं हैं। उनके पास कारण होगा, उनके पैमाने से पहले पन्ने लायक नहीं होंगी या पहले पन्ने पर जो खबरें हैं उनसे ज्यादा महत्वपूर्ण होंगी और तकनीकी ही नहीं, संपादकीय दृष्टि से भी वे सही हो सकते हैं पर तथ्य यह है कि सरकार (असल में चुनाव आयोग) की मनमानी, संविधान की प्रस्तावना पर आरएसएस के दत्तात्रेय हसबोले और उसपर कांग्रेस की प्रतिक्रिया तथा हिन्दी के खिलाफ राज व उद्धव ठाकरे के एकजुट होने की खबरों को महत्व नहीं दिया गया है। इनकी जगह कोलकाता में टीएमसी के नेता को सामूहिक बलात्कार के मामले में गिरफ्तार किये जाने को प्रमुखता मिली है। कोलकाता के अखबार, द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है और कोलकाता के लिए बड़ी खबर भी है लेकिन हिन्दी पट्टी में भाजपा नेताओं और उनके लाड़लों की खबरों को महत्व नहीं देने वालों ने कोलकाता की इस खबर को आज पूरा महत्व दिया है। मामला साफ है कि भाजपा के खिलाफ खबर हो तो उसे दबा देना है और उसकी खबर हो तो पूरी प्रमुखता देनी है। इसी तरह भाजपा के विरोधियों के खिलाफ खबरों को पूरी प्रमुखता देनी है और विरोधी भाजपा के खिलाफ कुछ करें तो उसे नजरअंदाज करना है। मोटे तौर पर आज ज्यादातर अखबारों का यही सिद्धांत नजर आ रहा है और अपवाद वही हैं जो आम तौर पर होते हैं। मेरा मकसद किसी को सरकार समर्थक या विरोधी बताना नहीं है। मेरा मानना है कि अमूमन ज्यादातर अखबार सरकार के खिलाफ खबरें नहीं छापते हैं और जो छापते हैं वही छापते हैं भले सरकारके समर्थन में भी वही छापते हों। पर सरकार के खिलाफ खबरें छापना सबके बूते का नहीं है। ठीक है कि बेशर्म प्रचार सब नहीं करते हैं पर जो करते हैं उन्हें शर्म नहीं है।

इस विशेष किस्म की अघोषित इमरजेंसी वाली पत्रकारिता में बिहार चुनाव के करीब आने और ऑपरेशन सिन्दूर की मियाद निकल जाने पर चीन से सीमा विवाद से संबंधित लंबित मुद्दों की याद और उन्हें हल करने पर जोर तो राजनीति या मजबूरी हो सकती है। लेकिन इससे सरकार को मिल सकने वाले प्रचार के लिए लीड बना दिया जाना संपादकीय विवेक का मामला है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “सीमा विवाद समेत लंबित मुद्दों को हल करे चीन, जटिलता न बढ़ाये : राजनाथ”। रक्षा मंत्री को इस मुद्दे की याद कब आई या अब तक क्यों नहीं आई से अलग, यह शाश्वत सत्य है कि बोलेंगे तो दो टूक ही। वरना चुप तो थे ही। फिर भी वह उपशीर्षक है, “रक्षा मंत्री की दो टूक : चीनी समकक्ष (यह अंग्रेजी के काउंटरपार्ट का मशीनी अनुवाद ही होगा) से कहा – दोनों देशों के हित में रिश्तों में सकारात्मक गति बनाये रखना।” नवोदय टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, “सुव्यवस्थित तरीके से जटिल मुद्दों को सुलझायें भारत चीन : राजनाथ”। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम की है। जाहिर है, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह एससीओ की बैठक में गये हुए हैं और चुनाव के लिहाज से कोई विशेष अभियान नहीं छेड़ा है। पर अमर उजाला ने इस खबर को ऐसे प्रचार के रूप में पेश किया है जैसे सीमा पर चीन की मनमानी की खबर मिली और राजनाथ सिंह भागे हुए चीनी रक्षा मंत्री के पास पहुंचे और उन्हें चेतावनी दी। अब यह खबर तो है ही, छापने से राजनाथ सिंह की पार्टी का प्रचार होगा तो क्या इसके लिए खबर दो कॉलम की बना दी जाये? सच यही है कि दूसरे अखबारों ने इसे दो कॉलम में ही छापा है।

आज की दूसरी बड़ी खबर है, ट्रम्प ने कहा : भारत से बहुत बड़ा व्यापार समझौता होने वाला है। कहने की जरूरत नहीं है कि ट्रम्प का रवैया पिछले कुछ समय से अजीब रहा है। पहले टैरिफ का मामला, फिर व्यापार के नाम पर युद्धविराम का दावा और अब यह पूर्व घोषणा। बीच में एपल से यह कहना कि भारत में आईफोन मत बनाओ:ऐसा किया तो 25% टैरिफ लगाएंगे; जो फोन अमेरिका में बेचे जाएंगे, वे यहीं बनेंगे – भी चर्चित हुआ था। इन सब मामलों के स्पष्ट हुए बिना समझौता होने वाला है की पूर्वघोषणा न तो गंभीर हो सकती है, ना विश्वसनीय है और ना किसी देशभक्त की उम्मीद। फिर भी नवोदय टाइम्स की लीड है। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से पता चलता है कि दिल्ली की टीम के अमेरिका पहुंचने पर ट्रम्प ने ये बातें कही हैं और कुछ दिन पहले भारत के प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि वे ट्रम्प के बुलाने पर भी नहीं गये। अब यह टीम क्या करने गई है और अगर कुछ होना ही है तो होने का इंतजार क्यों नहीं और ट्रम्प की घोषणा को क्यों महत्व देना। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक का एक हिस्सा है, व्यापार सौदे पर ट्रम्प ने कहा हम खुलने वाले हैं। द हिन्दू का शीर्षक है, भारत आठ जुलाई की अंतिम तिथि तक अमेरिका से व्यापार समझौते की कोशिश कर रहा है। इस शीर्षक से साफ है कि अभी कुछ तय नहीं है और 10 दिन लग सकते हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, ट्रम्प ने भारत से ‘बहुत बड़ा’ व्यापार सौदा कहकर हलचल मचाई। जाहिर है, खबर वह नहीं है जो नवोदय टाइम्स ने दी है। यह सौदा होने से पहले की स्थिति है और अभी वही खबर है। जो छपा है उससे लग रहा है ट्रम्प के साथ भारत का मामला सुलझ गया और अबकी बार ट्रम्प सरकार के बाद बस बल्ले-बल्ले ही करना है।

कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसी खबरों और हेडलाइन मैनेजमेंट वाले शीर्षक से भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली गुडी-गुडी लगती है जबकि ऐसा है नहीं। यह जरूरी है कि नरेन्द्र मोदी इसे ठीक करें और कुछ ठोस काम करें। वरना अखबारों का काम है कि वह पाठकों को वास्तविकता बताये लेकिन स्थिति यह है चुनाव के समय नरेन्द्र मोदी अपनी व्यवस्था कर लेते हैं और ज्यादातर अखबार दुम हिलाते लगते हैं। सरकार और उसका काम ठीक नहीं है, बदले में अमेरिका और कई दूसरे देश हमें महत्व नहीं दे रहे हैं और अखबार इसे बताने, इसपर चिन्तित होने की बजाय सब चंगा सी का माहौल बनाने में लगे हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी की राजनीति ऐसी है कि महाराष्ट्र में पिछली बार कांग्रेस शिवसेना एक हो गई थी। नरेन्द्र मोदी की सरकार भले उद्धव ठाकर की सरकार गिराने में कामयाब रही लेकिन उसकी पोल भी खुल गई। उद्धव ठाकरे ने विधानसभा में बहुमत परीक्षण का सामना करने की बजाय इस्तीफा देकर जो लकीर खींची वह इतनी बड़ी है कि भाजपा उसका नाम भी नहीं लेना चाहती है और उसके बाद का विधानसभा चुनाव भले जीत गई, जीत पर शक किसे नहीं है? इसके बावजूद आज खबर है कि दो शिवसैनिक भाई अपना मतभेद भुलाकर एक होने वाले हैं। राजनीतिक दृष्टि से और भाजपा की फूट डालो, राज करो नीति के मुकाबले यह बड़ी खबर है लेकिन सबसे बड़ी टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी है। सैनिक बंधुओं को समझ में आ गया है  

हेडलाइन मैनेजमेंट के इस दौर में मुंबई के शिव सैनिक बंधुओं को समझ में आ गया है कि उनकी लड़ाई का फायदा कोई और उठा रहा है। उनके एकजुट होने का कारण बताना जरूरी नहीं है। फिर भी, अखबारों ने जनहित और देश समाज की खबरों को प्राथमिकता देने की बजाय पहले पन्ने पर यह भी छापा है 1) भाजपा ने बंगाल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड में चुनाव अधिकारी नियु्क्त किये। 2) चुनाव योजनाओं की समीक्षा के लिए बिहार भाजपा की प्रमुख बैठक दो जुलाई को, राजनाथ शामिल होंगे। (दि एशियन एज) 3) जल्द हो सकता है भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव  और 4) अब तक 14 राज्यों में चुनावी प्रक्रिया हुई पूर्ण (देशबन्धु)। देशबन्धु ने तीसरे और चौथे नंबर की खबर छापी है तो इसकी लीड का शीर्षक है, मतदाता सूची पर मचा घमासान (बिहार में) चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण के निर्देश पर भड़का विपक्ष। इस खबर के साथ ममता बनर्जी का एक कोट हाईलाइट किया गया है जो इस तरह है, चुनाव आयोग नई मतदाता सूची सत्यापन प्रक्रिया की आड़ में बंगाल के युवाओं को निशाना बना रहा है। यह बहुत चिन्ताजनक है। साथ ही उनका उन राज्यों जहां अगले साल चुनाव होने हैं, असली टारगेट है। यह खबर आज पहले पन्ने पर कहीं दिखी क्या? देशबन्धु में ऐसी ही एक और खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, संविधान पर राजनीतिक सरगर्मी फिर बढ़ी। उपशीर्षक है, समाजवादी-धर्म निरपेक्ष शब्द की समीक्षा को लेकर विपक्ष ने आरएसएस को घेरा। इस खबर के साथ एक और खबर शिवराज सिंह चौहान की फोटो के साथ है। इसका शीर्षक है, धर्मनिरपेक्ष हमारी संस्कृति का मूल नहीं, इसपर हो विचार : शिवराज। मुख्य खबर के साथ राहुल गांधी का कोट भी फोटो के साथ है। उन्होंने कहा है, आरएसएस-भाजपा को संविधान नहीं, मनुस्मृति चाहिये यह बहुजनों व गरीबों से उनके अधिकार छीनकर दोबारा गुलाम बनाना चाहते हैं। पर मुद्दा यह है कि खबर क्यों नहीं छपी है। खबर के बिना विचार और चर्चा कैसे होगी और इसके बिना क्या भाजपा वालों के विचार थोप दिये जायेंगे और थोप दिये जायेंगे तो क्या इस समय चुप रहना ही देशभक्ति है? 

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