
नभाटा की आज की यह प्रस्तुति, छोटे मियां तो छोटे मियां, बड़े मियां सुभान अल्लाह की याद दिलाता है।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों ने यह नहीं बताया है कि प्रधानमंत्री सर्वदलीय सभा में नहीं गये और बिहार की रैली रद्द नहीं हुई। यही नहीं, बिहार की मिट्टी से उन्होंने अंग्रेजी में संदेश दिया है ताकि ‘पूरी दुनिया’ सुन सके। ऐसे में उनका 2019 का एक वीडियो वायरल है जिसमें उन्होंने कहा था, ‘सातवें पाताल में भी होंगे तो मैं उनको छोड़ने वाला नहीं हूं’। जाहिर है तब यह बात उन्होंने हिन्दी में कही थी (या प्रचारित हुई थी) उसका अपेक्षित असर नहीं हुआ और आतंकियों ने फिर बड़ी वारदात की है तो प्रधानमंत्री ने वही किया है जो वे करते रहे हैं और इस बार अंग्रेजी में किया है। उसी राज्य से जहां चुनाव है। अखबारों ने यह सब बताने की बजाय यह बताया है कि सर्वदलीय सभा में रक्षा मंत्री ने कहा, आतंक के सामने नहीं झुकेगा भारत, माकूल जवाब देंगे। अमर उजाला का यह उपशीर्षक जिस खबर का है उसका मुख्य शीर्षक है, “देश एकजुट :सभी दल एक सुर में बोले आतंकवाद के आका को सिखाएं सबक”। उपशीर्षक का पहला हिस्सा है, सर्वदलीय बैठक में दी गई मौन श्रद्धांजलि। कहने की जरूरत नहीं है कि सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री की चर्चा नहीं है मतलब उसमें नहीं थे। फिर भी भाजपा नेता (या रक्षा मंत्री) का बयान है। उनका नहीं जो कश्मीर में आतंकवाद खत्म कर दिये जाने का दावा करते थे। या उसकी कोई चर्चा नहीं है जब बालाकोट हमले में तीन सौ आतंकियों को मार डालने का दावा किया गया था।
तब टेलीग्राफ ने लिखा था कि हमले में एक कौव्वा मरा था और कुछ पेड़ गिर गये थे। तब भी पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराया गया था लेकिन कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं और 2019 के पुलवामा मामले में पाकिस्तान के शामिल होने का कोई सबूत भारत सरकार ने अधिकृत तौर पर छह साल बाद भी सार्वजनिक नहीं किया है (या मुझे पता नहीं है)। ऐसे में बिहार के मधुबनी से खबर है और वहां प्रधानमंत्री ने कहा है, पहलगाम के गुनहगारों को देंगे कल्पना से भी कड़ी सजा। प्रधानमंत्री अब ऐसी बातें कर रहे हैं और तथ्य है कि पुलवामा के गुनाहगारों का अभी तक पता नहीं है। अगर छह साल में पुलवामा के गुनाहगारों का पता नहीं चला तो पहलगाम वालों को कब चलेगा या जल्दी क्यों चलेगा इसका कोई कारण ना प्रधानमंत्री ने बताया है ना अखबारों ने पूछा है ना हमें अपनी ऐसी कोई आशंका (या सवाल) के बारे में बताया है। प्रधानमंत्री के चुनावी बयान का प्रचार सरकार विज्ञापनों के बदले या उनके सत्ता में होने के डर के मारे जरूर लीड बना दिया गया है। यह भी अमर उजाला की लीड है। इसके साथ कार्रवाई शुरू और भारत में पाकिस्तान सरकार का एक्स हैंडल बंद किये जाने जैसी कार्रवाई की भी ‘सूचना’ है। इंडियन एक्सप्रेस में भी लीड ऐसी ही है। हालांकि, यहां एक खबर है, विपक्ष ने आतंक के खिलाफ सरकार के कदम का समर्थन किया, पहलगाम में सुरक्षा चूक पर सवाल उठाये। यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है यहां सरकारी खबरें ही हैं जैसे, भारत की सख्ती से बौखलाये पाकिस्तान ने शिमला समझौता किया निंलबित।
द टेलीग्राफ ने सरकार के संदेश को लीड बनाया है और यह संदेश है, पहचानिये, पता लगाइये, सजा दीजिये। पर यह कब होगा या होगा भी कि नहीं या इस बार क्यों होगा, पहले क्यों नहीं हुआ – जैसा कुछ नहीं है। ना सवाल, ना विचार और ना सूचना। चर्चा तो है ही नहीं। कुल मिलाकर मीडिया के जरिये कहानी गढ़ी गई कि आतंकवाद खत्म कर दिया गया है और वारदात हो गई तो अब सख्ती दिखाने का वही पुराना तरीका है। कहने की जरूरत नहीं है कि किसी वारदात के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने के लिये सबूत होना चाहिये और जब पुलवामा के सबूत अभी तक सार्वजनिक नहीं हैं तो इस बार फिर वही सब किया जाना राजनीति हो सकती है पर खबर भी वैसी ही है। इस लिहाज से पाकिस्तान का पक्ष भी पर्याप्त महत्वपूर्ण है और टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ ने आज छापा है कि पाकिस्तान के अनुसार पानी रोकने की कोई भी कार्रवाई युद्ध जैसी कार्रवाई होगी और उसने पहलगाम हमले में सीमा पार से संबंध होने या इसमें शामिल होने से इनकार किया है।
सरकार इसे नहीं मानने के लिए स्वतंत्र है पर उसकी बात मानी जाये इसके लिए सबूत चाहिये और बिना सबूत यह खबर है जो उमर उजाला जैसे अखबारों में नहीं है। नवोदय टाइम्स की लीड है, वायुसेना का आक्रमण अभ्यास। यह गौर तलब है कि हर चुनाव से पहले ऐसी स्थितियां बन जाती हैं और ऐसी खबरें छपने लगती हैं। एक बार तो यह संयोग हो सकतता है लेकिन बार-बार क्यों हो रहा है। मुझे लगता है कि पुलवामा के छह साल बाद कल्पना से भी बड़ी सजा मिलेगी जैसी घोषणाएं चुनाव प्रचार ही है। वरना पुलवामा के वक्त भी यही सब या ऐसी ही बातें कही गई थीं। फिर भी आज हिन्दुस्तान का सात कॉलम का शीर्षक है, “मोदी की चेतावनी : मिट्टी में मिला देंगे”। मुझे नहीं लगता कि इस तरह की चेतावनी से पाकिस्तान डर जायेगा। उसे पता है कि मिट्टी में 1971 में मिल गया होता और 2019 में भी मिला दिया जाना चाहिये था। जाहिर है, यह सब पिचकते 56 ईंची को फिर से वैसा ही बनाने की उनकी अपनी कोशिश हो सकती है। हालांकि, प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है और यह संपादकीय सहमति का मामला है।
हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, पाकिस्तान ने शिमला समझौते को रद्द करने की चेतावनी दी है। यह खबर चार कॉलम क है लेकिन आज ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है जबकि इससे पता चल रहा है कि पाकिस्तान भारत की घोषणाओं (या कार्रवाइयों को) सिर झुकाकर कुबूल नहीं कर रहा है और जवाबी कार्रवाई कर रहा है। संभव है, इस तरह पक रही खिचड़ी 2029 के समय सरकार के काम आये और यह याद किया जाये कि (अगर हुआ तो इतिहास में दर्ज हो जायेगा) कि 2014 के शपथग्रहण में नवाज शरीफ को बुलाने वाले अलग चाल चरित्र व चेहरे वाले प्रधानमंत्री ने 2029 का चुनाव पाकिस्तान से युद्ध के साये में लड़ा या जीता। हिन्दुस्तान टाइम्स में ही आ ज खबर है कि पहलगाम का मुख्य साजिशकर्ता संभवतः पहले के तीन हमलों में भी शामिल था। कहने की जरूरत नहीं है कि पहली ही बार पता लगा लिया जाता और पाकिस्तान ने कार्रवाई नहीं की होती तो उसके खिलाफ एक अच्छा मामला बनता। पकड़ लिया जाता तो कोई बात ही नहीं थी। बाद की दो वारदातें नहीं होतीं सो अलग बात है।
आज एक और शीर्षक है, …. दोषियों को ऐसी सजा देंगे जिसकी कल्पना भी न की हो। ऐसी सजा दोषियों को पहचान के बाद ही दी जायेगी और आम तौर पर हत्या या फांसी सजा हो सकती है। कल्पना से परे सजा का मतलब यातना या अंग भंग करके छोड़ देना है। यह तकनीकी तौर पर संभव नहीं है और घोषणा करके किया जा सकेगा इसमें संदेह है। अकेले द हिन्दू ने इस खबर को लीड नहीं बनाया है लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भी वही है जो बोला गया है और साफ है कि यह हेडलाइन मैननेजमेंट और उसकी कामयाबी है। द हिन्दू की लीड पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई है। शीर्षक है, पाकिस्तान ने हवाई क्षेत्र बंद किया, भारत से व्यापारिक संबंध तोड़े। दि एशियन एज का शीर्षक इससे आगे का है, पाकिस्तान ने भात की उड़ानों के लिए अपना वायु क्षेत्र बंद किया तो दिल्ली ने सभी पाकिस्तानी वीजा रद्द किये। अगर मेरी याद्दाश्त सही है तो वीजा रद्द करने की घोषणा भारत ने की थी और जवाब में पाकिस्तान ने वायु क्षेत्र बंद किये हैं तो यह भारतीय (और पाकिस्तानी) विमान यात्रियों को महंगा पड़ेगा जबकि अभी हमलावरों की पहचान नहीं हुई है (पकड़े नहीं गये हैं)। खबरों के अनुसार तीन पाकिस्तानी थे और दो घाटी के। साफ है कि सरकार जो कर रही है उससे पाकिस्तान का नुकसान हो या नहीं, भारत के हवाई यात्रियों का तो होगा ही और वह भी तब जब हमलावरों को गिरफ्तार नहीं किया जा सका है और जब गिरफ्तार किया गया था तो बिरयानी खिलाने की कहानी बनाई गई और जिसने बनाया उसे भाजपा ने टिकट दिया। कुल मिलाकर अखबारों के लिए मुश्किल समय चल रहा है। घोषित इमरजेंसी भी नहीं है कि तबके इंडियन एक्सप्रेस की तरह जगह खाली छोड़ दें। 50 साल में इंडियन एक्सप्रेस का यह विकास भी गौर तलब है।


