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आज के अखबार : नहीं कह पाये कि ऑपरेशन सिन्दूर को युद्ध क्षेत्र से चुनाव मैदान में पहुंचाने की कोशिश है

संजय कुमार सिंह

युद्ध के दौरान अखबारों ने जो खबरें दीं वह देशभक्ति के लिए होंगी लेकिन युद्ध की जरूरत और जब छिड़ गया तो उसे अचानक खत्म करना और वह भी अमेरिका की मध्यस्थता पर, कई सवालों को जन्म देता है। इनमें कई अनुत्तरित सवालों के बीच आज मीडिया का काम था वह निष्पक्ष होकर युद्ध की जरूरत और उसके नतीजों पर टिप्पणी करता। आज के अखबारों में वह सब तो नहीं ही है, सरकार का भरपूर प्रचार है और इसमें यह नहीं बताया गया है (पहले पन्ने पर) कि भाजपा ऑपरेशन सिन्दूर तिरंगा यात्रा निकाल रही है या उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने एलान किया है कि ऑपरेशन सिन्दूर की सफलता का जश्न मनेगा और योगी सरकार तिरंगा यात्रा निकालेगी। ये खबरें कल ही आ गई थीं और मैंने लिखा था, ऑपरेशन सिन्दूर भारतीय सेना का अभियान था, मोदी सरकार का मकसद चुनावी लाभ लेना नहीं था तो इसकी जरूरत क्या थी? और जब लाभ लिया जा रहा है तो क्यों नहीं माना जाये कि मकसद यही था? ऑपरेशन बालाकोट के बाद अब यह सेना के अभियान के खुले उपयोग का दूसरा उदाहरण है। आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा, आतंकियों के लिए पाकिस्तान भी महफूज नहीं, हम घर में घुसकर मारेंगे। यह 2019 के चुनाव प्रचार का हिस्सा है और प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार में सबसे कामयाब कहा जा सकता है। अब 2025 में इसका उपयोग किया जा रहा है तो इसका कारण है और अखबार-मीडिया नहीं बतायेगा तो जनता फिर उससे प्रभावित होगी।

यह सब तब है जब आज द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, (ऑपरेशन) सिन्दूर पाकिस्तान पर हमले से चुनाव के मैदान तक। ऊपर मैंने जिस खबर की चर्चा की है उसके उल्लेख के साथ अखबार का उपशीर्षक है, (पूरे मामले या चुनाव को) रीसेट करने की प्रधानमंत्री की कोशिश सुदृढ़ स्टैंड, प्रतीकात्मकता, यात्रा के साथ। स्पष्ट है, प्रधानमंत्री हमेशा की तरह चुनाव मोड में हैं। युद्ध से पहले, युद्ध के दौरान और युद्ध के बाद भी। अमेरका ने खेल खराब करने में जो भूमिका निभाई उसका महत्व कम किया जा रहा है। आज के ज्यादातर अखबारों की खबरें ऐसी ही हैं।  जेपी यादव की ऑनलाइन खबर के अनुसार, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पंजाब के एयर बेस पर मोदी का दौरा, भाजपा द्वारा 10 दिवसीय तिरंगा यात्रा शुरू करने के साथ हुआ। चार दिवसीय संघर्ष के दौरान परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी पाकिस्तान को असफल रूप से निशाना बनाया गया था। आतंकवाद के खिलाफ भारत के सख्त रुख पर जोर देते हुए, प्रधानमंत्री मंगलवार को यात्रा के लिए माहौल बनाते दिखे। इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बार-बार के दावे पर उठाये गये विपक्ष के सवालों के बीच सरकारी कहानी (नैरेटिव या कथानक) पर हावी होने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। आप जानते हैं कि पहलगाम की आतंकी घटना को पाकिस्तान की साजिश बताकर प्रधानमंत्री ने जब युद्ध छेड़ दिया तो पूरा देश उनके साथ था फिर भी अचानक युद्ध विराम की घोषणा हुई और इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपनी भूमिका होने का दावा किया। इसके लिए सरकार की आलोचना हुई और अब सरकार ऑपरेशन सिन्दूर का लाभ उठाती नजर आ रही है। खबर के साथ छपी फोटो का कैप्शन है, पाकिस्तान द्वारा एस-400 वायु रक्षा प्रणाली को नष्ट करने का दावा किए जाने की पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को आदमपुर एयर बेस पर सैनिकों को संबोधित किया।

मेरे ज्यादातर अखबारों ने प्रधानमंत्री की इस कोशिश का उल्लेख किये बिना सरकार का प्रचार किया है और उसकी सफलता का ढोल पीट रहे हैं। पाकिस्तान के दावों पर कहा जा चुका है कि युद्ध में नुकसान तो होता ही है लेकिन उसके बारे में बताया नहीं गया। दूसरी ओर पाकिस्तान के परमाणु केंद्र पर हमला और उसके क्षतिग्रस्त होने से रिसाव की अपुष्ट खबरें हैं। सरकार ने ना इसका खंडन किया ना पुष्टि। आज हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर से लगता है कि परमाणु केंद्र पर हमला नहीं हुआ है। पर यह आश्वासन अभी भी नहीं है कि हमले (लों) के कारण रिसाव की खबरें गलत हैं या सही और उससे भारत में लोग सुरक्षित हैं कि नहीं। दूसरी ओर, अपुष्ट खबर को खूब फॉर्वार्ड किया जा रहा है। हर ग्रुप में भेजने का निवेदन है। सोशल मीडिया पर इन्हें भारत की कामयाबी के रूप में प्रसारित किया जा रहा है। कल प्रधानमंत्री का कहा छपा भी था, परमाणु ब्लैकमेलिंग नहीं सहेंगे, आतंक की जड़ों पर करेंगे सटीक और निर्णायक प्रहार। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में हुए आतंकी हमले के आरोपी को भाजपा सासंद बना चुकी है, 2008 के मामले में फैसला नहीं आया है। समझौता ब्लास्ट के आरोपी छूट गये और जज ने जांच ठीक न होने की बीत की थी लेकिन मामला खत्म हो गया लगता है। पुलवामा तो छोड़िये, पहलगाम के हमलावर भी पकड़े नहीं गये हैं और मुंबई हमले में जो पकड़ा गया था उसके खिलाफ कार्रवाई चल रही थी तो प्रचारित किया गया कि उसे बिरयानी खिलाई जा रही है और जिस सरकारी वकील ने ऐसा करना प्रचारित किया उसे भाजपा ने चुनाव लड़ने का टिकट दिया। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि मुंबई हमले के बाद प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई का परोक्ष-अपरोक्ष विरोध किया गया, सरकार की आलोचना की गई, तब नरेन्द्र मोदी बाकायदा मुंबई पहुंच गये थे और अब जब गैर जरूरी युद्ध के बावजूद पूरा देश उनके साथ था तो अचानक युद्ध विराम और अब चुनावी लाभ लेने की कोशिश पर अखबारों की अनदेखी रेखांकित करने लायक है।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री के तेवर और अखबारों में उनकी प्रस्तुति देश को युद्ध में झोंकने वाली है। यह स्पष्ट होने के बावजूद कि एक बार शुरू हो जाये तो मामला नियंत्रण में नहीं रहता है। प्रधानमंत्री को नोटबंदी का नुकसान नहीं मालूम था उन्होंने कर दी, अपनी बहादुरी बताई, राजनीतिक लाभ या बचाव के लिये मां को लाइन में लगवाया और अब कह चुके हैं कि परमाणु ब्लैकमेलिंग नहीं सहेंगे। इसलिए उनका पद पर रहना, देश दुनिया के लिए कितना खतरनाक है यह सोचने वाला मुद्दा है। घर में घुस कर मारेंगे फिर कहना कि हमने सिर्फ आतंकी ठिकाने ही तबाह किये हैं और पाकिस्तान नहीं मान रहा है या हमारे हवाई बेस पर हमला कर रहा है इसलिये हमें भी युद्ध करना पड़ रहा है – जैसी दलीलों से छवि बनाई या बचाई जा सकती है, चुनाव जीता जा सकता है लेकिन युद्ध हो गया तो जो होगा उसकी कल्पना भी करना चाहिये और संपादकों, प्रचारकों को भी सोचना चाहिये। स्थिति यह है कि आदमपुर एयरबेस व एस400 को नष्ट करने के दावों के बीच प्रधानमंत्री वहां जाकर सच दिखा रहे हैं। अमर उजाला में लाल रिवर्स की हेडिंग है, पाकिस्तान के झूठ की पोल खुली। दूसरी ओर, प्रेस कांफ्रेंस में जब यह स्वीकार किया जा चुका है कि नुकसान तो होता ही है तो नुकसान को बताया क्यों नहीं जा रहा है? नुकसान देश का है इसलिये देश को जानने का हक है कि क्या नुकसान हुआ है। नहीं बताने का एक ही मकसद हो सकता है कि जो छिपाये जायेंगे उनकी पोल खुल जायेगी और देश को गलत जानकारी देना साबित हो जायेगा। लेकिन सामरिक गोपनीयता के कारण रफाल की कीमत बढ़ने के कारण नहीं बताये गये थे अब उनके नाकाम होने की खबर है तो स्पष्ट बताया जाना चाहिये और यह भी कि रफाल के संबंध में आगे की योजना क्या है। बोफर्स सौदे में भले रिस्वतखोरी हुई होगी पर काम उसका ठीक रहा। राफेल का सौदा बेदाग होगा लेकिन जरूरत या उम्मीद के अनुसार नहीं था तो बताया जाना चाहिये। प्रदर्शन शानदार रहा तो बताने में कोई दिक्कत होने का मतलब नहीं है। 

फिर भी खबरों का आलम यह है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की आवाज बने विदेश सचिव विक्रम मिसरी को बुरी तरह ट्रोल किया (गया) जा रहा है? भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ही नहीं, सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ भाजपा के लोग बोल रहे हैं। यह अलग बात है कि मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह के बयान के बाद डैमेज कंट्रोल में भाजपा नेता कर्नल कुरैशी के घर गये, देश की बेटी बताया लेकिन इससे जो डर फैलना था वह तो फैलेगा ही और अगर कभी किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी और प्रधानमंत्री माफ नहीं कर पाउंगा कहकर भूल जायेंगे तो आप समझ सकते हैं कि चल क्या रहा है और लोग कैसे हैं। जिसे राजधर्म सीखने की जरूरत बताई गई थी उसे चौकीदार से राजा बना दिया गया है। विरोध करने पर जो सब होता रहा है वह सबको पता है। इसी क्रम में आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर है, विदेश मंत्रालय के आग्रह पर दिल्ली पुलिस विदेश मंत्री की सुरक्षा बढ़ायेगी। यहां यह बताना जरूरी है कि विदेश मंत्री को संघ या भाजपा की राजनीति का अनुभव नहीं है और वे विदेश सेवा की नौकरी के बाद सीधे केंद्रीय मंत्री बना दिये गये। वह भी तब जब सुषमा स्वराज विदेश मंत्री थीं तो उनके जूनियर एमजे अकबर राजनीति में एस जयशंकर से अनुभवी तो हैं ही सीनियर भी हैं। जयशंकर 1977 बैच के अधिकारी हैं, 2017 में उन्हें एक साल का एक्सटेंशन मिला और 2019 में वे केंद्रीय मंत्री बन गये। जाहिर है, भाजपा की सरकार में मंत्री भाजपा या संघ के लोग नहीं है। वाशिंग मशीन पार्टी की कहानी छोड़ भी दूं तो कांग्रेस के समय के नौकरशाहों को मंत्री बनाने के लिए भाजपा को तो नहीं ही चुना गया होगा। उदाहरण इतने हैं जो बताते हैं कि संघ या पार्टी को इसकी परवाह ही नहीं है। अगर नहीं है तो क्यों और उसे समझना मुश्किल नहीं है। आश्चर्य है कि भिन्न राजनीतिक दलों और चुनावी लोकतंत्र वाला हमारा देश हर तरह से बर्बाद हो रहा है पर चिन्ता उस अनुपात में नहीं है। किसी विरोधी के खिलाफ एफआईआर हो जाये, वह जमानत की कोशिश करे तो उससे कहा जाये कि आप कानून से बच रहे हैं और वह कहे कि लगााओ हथकड़ी तो सन्नाटा छा जाये। ऐसे लोग और उनके समर्थक सरकार के विरोध को देश विरोध और द्रेशद्रोह कहते हैं। प्रधानमंत्री ने देश के इकलौते पूर्व तड़ी पार को सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालय दे रखा है। जो आतंकवाद खत्म करने का दावा तो करता है पर वारदातें हो जाती हैं और नक्सलियों की अंधाधुंध हत्या के बाद भी नक्सल समस्या पर नियंत्रण का दावा नहीं है।

हेडलाइन मैनेजमेंट वाली इन खबरों में नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, सवा लाख से एक लड़ाऊं….अधर्म के नाश को उठाया शस्त्र। मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे और ऐसे दावे करते थे तो लोगों को उनके बारे में और उनका व्यक्तित्व या उनकी हस्ती बताने के लिए इन खबरों की जरूरत थी। अब प्रधानमंत्री को हर कोई जानता है, वे नेहरू जी से बराबरी कर रहे हैं। ऐसे शीर्षक की उन्हें जरूरत नहीं है, समाज का भला नहीं होना है। इसके मुकाबले पंजाब में जहरीली शराब से 21 की मौत बड़ी खबर है। अखबार के पाठक क्षेत्र की खबर है। इसलिये इसे लीड होना चाहिये था। इसी तरह युद्ध या भारतीय हमले में पाकिस्तान ने सिर्फ 11 जवानों की मौत स्वीकार की है। भारत सरकार का दावा 100 का था। मुझे लगता है कि इस मामले में रिकार्ड ठीक किया जाना जरूरी है। भारत ने किस आधार पर 100 कहा है और पाकिस्तान क्यों 11 स्वीकार कर रहा है के बारे में बताते हुए खबर स्पष्ट होनी चाहिये। न कि दोनों पक्षों के दावे युद्ध विराम के बाद भी छपते रहने चाहिये। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, अमेरिकी दावों के बाद भारत ने कश्मीर पर अपने स्टैंड पर फिर जोर दिया। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री के आत्मप्रचार या पार्टी प्रचार के मुकाबले यह बेहतर खबर है भले वैसी ही है। दि एशियन एज का शीर्षक है, “पाकिस्तान को हरा दिया, आतंकियों का ठिकाना नष्ट हो गया : मोदी ने सेना की प्रशंसा की”।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह पाकिस्तान और आतंकवादियों – दोनों को चुनौती है और अपनी (देश या सेना की नहीं) बहादुरी दिखाने के लिए प्रधानमंत्री ने यह तरीका चुना है। पुलवमा के बाद भी यही हुआ था और मुझे लगता है कि देशवासियों के हित में ऐसी चुनौती प्रधानमंत्री को नहीं देनी चाहिये। वह भी तब जब आतंकवाद के दोनों मामले सुरक्षा में चूक के तो हैं ही। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी प्रधानमंत्री की चुनौती है जो उन्होंने सेना के दम पर देशवासियों की कीमत पर दी है। ऑपरेशन सिन्दूर नाम देकर देशवासियों का समर्थन हासिल किया जा सकता है पर देशवासियों (या पर्यटकों) की जान जोखिम में डालने का कोई मतलब नहीं है। वह भी तब जब सत्तारूढ़ दल के नेता को निजी पार्टी के लिए पर्याप्त सुरक्षा मिलती है और आम आदमी के लिए कुछ नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भीड़ के साथ प्रधानमंत्री की फोटो छापी है और बताया है कि पाकिस्तान ने जिस एयरबेस को डैमेज करने का दावा किया वहां मोदी। मुझे नहीं लगता है कि यह काम प्रधानमंत्री का है और किसी मीडिया संस्थान को इसे प्रचार देने की जरूरत है। वैसे भी एयरबेस क्षतिग्रस्त करने का मतलब होता है हवाई पट्टी को नुकसान पहुंचाना या इमारत गिरा देना। भीड़ तो इसके बावजूद इकट्ठा हो सकती है। क्रिकेट स्टेडियम को नुकसान पहुंचाने के लिए पूरी पिच नहीं, उसका भी कुछ हिस्सा ही खोदा गया था।

हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, शक्ति प्रदर्शन में प्रधानमंत्री ने आतंक के जवाब को रेखांकित किया। हालांकि, पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, मुद्रास्फीति सातवें महीने कम होकर 3.2 प्रतिशत पर पहुंची। यह जुलाई 2019 के बाद सबसे कम है। जाहिर है, नोटबंदी के कोई तीन साल बाद जो,स्थिति थी, हम अभी उससे भी पीछे हैं। सुनने में अच्छा लग सकता है और संभव है यही प्रचार किया जाये कि मुद्रास्फीति कम हुई यानी महंगाई नहीं बढ़ी या कम हुई यह तो अच्छी बात है। पर असल में ऐसा नहीं है। मुद्रास्फीति में सामान्य वृद्धि नहीं होने का मतलब है कि उत्पादन-बाजार-अर्थव्यवस्था सब सामान्य नहीं है। दूसरे शब्दों में खराब हो रही है। आपने सुना होगा और संभव है याद भी हो, पहले सावधि खाते में पैसा पांच साल में दूना हो जाता था जो अब आठ वर्ष हो चुका है। पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का भी संबंध इसी से है। अगर मुद्रा स्फीति में वृद्धि सामान्य नहीं हो तो ब्याजदर कम होगा, बचत कम समय में दूना होगा, महंगाई भले कम बढ़े पर इसका कारण अर्थनीति नहीं है कि खुश हुआ जाये। इसका कारण खराब अर्थव्यवस्था है जिससे लोगों की कमाई कम है, बेरोजगारी ज्यादा है। सरकार अर्थव्यवस्था को संभाल नहीं पा रही है पाकिस्तान के जरिये आतंकवाद को संभालने की कोशिश में है जो करवाया नहीं गया हो तो भी पांच साल बाद हुआ था।  

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