संजय कुमार सिंह
आज मेरे दो अखबारों, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में अरविन्द केजरीवाल के रिक्यूजल अपील में एक औऱ शपथपत्र दिए जाने की खबर है। खबर में यह मुख्य बात तो है कि देश के सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता दिल्ली हाईकोर्ट की जज के दो बच्चों को काम (यानी पैसे) देते हैं। तुषार मेहता ही सरकारी एजेंसी सीबीआई की ओर से इस मामले में भी पेश हो रहे हैं और सीबीआई के केस की पैरवी वही कर रहे हैं। केजरीवाल ने इसे हितों के टकराव का मामला कहा है और जो कहा है उसका मतलब यही है कि जो बच्चों को काम और पैसे देता है उसकी दलीलों को नहीं मानना अदालत के लिए मुश्किल नहीं भी हो तो आसान नहीं होगा। सामान्य तो बिल्कुल नहीं है। आप जानते हैं कि सीबीआई को सरकारी तोता कहा जाता रहा है और नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पूर्व में कोर्ट से कहा है कि, सीबीआई एक स्वतंत्र संस्था है, इस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। पूर्व में सरकार ने तृणमूल कांग्रेस की याचिका का विरोध किया है जिसमें एजेंसी पर पश्चिम बंगाल की सहमति के बिना कई मामलों में जांच शुरू करने का आरोप लगाया गया था। केजरीवाल के मामले में यह मान भी लिया जाए कि वह स्वतंत्र एजेंसी है तो यह साफ है कि सरकार के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति उपराज्यपाल ने दी है और उपराज्यपाल स्पष्ट तौर पर केंद्र सरकार के प्रतिनिधि हैं। सीबीआई के वकील की ओर से पैरवी कर रहे सॉलिसीटर जनरल भी केंद्र सरकार के चुने हुए हैं और यह मानना मुश्किल है कि एक स्वतंत्र एजेंसी किसी विपक्षी सरकार के खिलाफ ऐसा मामला बनाएगी जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया और संबंधित अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई करने का आदेश दिया।
इसमें केजरीवाल के जो आरोप हैं वे ऐसे-वैसे नहीं हो सकते हैं, जिनके ऊपर हैं उन्हीं की अदालत में लगाए गए हैं इसलिए फैसला चाहे जो हो, आरोपों को कमजोर नहीं कहा जा सकता है। वैसे भी, किसी सामान्य और बहुत छोटे मामले में लोग स्वयं रिक्यूज कर जाते हैं यहां क्यों नहीं हुआ, खुली अदालत में आरोप लगाने का मौका क्यों दिया गया और जब सीधा प्रसारण हो रहा था तो उसकी रिकार्डिंग को वायरल होना ही था और सब हो चुका है। कारण एक-दो नहीं दस हैं और बाद में दायर शपथ पत्र में केजरीवाल ने कहा है, इस तथ्य का खुलासा सॉलीसिटर जनरल को खुद करना चाहिए था और कानून की पत्रकारिता करने वालों तथा संबंधित पक्षों के खुलासे के लिए नहीं छोड़ना चाहिए था। इसलिए मामला जज का ही नहीं, सीबीआई के वकील यानी देश के सॉलिसीटर जनरल से भी जुड़ा है जो स्पष्ट रूप से सरकार के नियंत्रण में काम करते हैं और उन्हीं के चुने हुए हैं। इसलिए मामला पर्याप्त गंभीर है। बाद के शपथपत्र में केजरीवाल ने जो आरोप लगाए हैं उससे लगता है कि उन्हें, घेरने, परेशान करने और फंसाने की कोशिशें जारी हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका नहीं देने और उनका पक्ष सुने बिना फैसला देने या कार्रवाई करने का आरोप भी है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बारे में मैं कुछ नहीं कहता लेकिन न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के पाठ से मुख्य न्यायाधीश का परेशान होना और की गई कार्रवाई बहुत कुछ कहती है। इसलिए अदालतों में क्या हो रहा है उसपर नजर रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है। मीडिया का काम है कि वह लोगों को इस बारे में बताए। जब प्रधानमंत्री पर कंप्रोमाइज्ड होने और सीआईए का प्लांट होने का आरोप है, राहुल गांधी आरोप लगा चुके हैं कि हर जगह खास विचारधारा के लोगों को प्लांट किया जा चुका है, निष्पक्ष मीडिया संगठनों के साथ जो किया जा चुका है उसमें हर नागरिक का काम है कि वह लोगों को बताए कि आम आदमी पार्टी के साथ क्या हो रहा है। आम आदमी पार्टी या अरविन्द केजरीवाल आपको नापंसद हो सकते हैं, नरेन्द्र मोदी और भाजपा से कोई शिकायत नहीं हो – यह भी संभव है लेकिन उनके शासन में जो हो रहा है उसे तो जानना-बताना चाहिए। वे क्या कर रहे हैं उसे भी छोड़ना चाहें तो छोड़ दीजिए। केजरीवाल ने जो कहा वह भले अपने लिए कहा लेकिन उनके साथ यह सब हो सकता है तो आम नागरिक या कम संसाधन वाले समूहों का क्या होगा? अगर मीडिया सच नहीं बता सकता है तो यही बताए कि वह अपना काम नहीं कर पा रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया कह चुका है (काफी पहले) कि वह खबरों के नहीं विज्ञापनों के धंधे में है। बाकी को भी कह देना चाहिए। लेकिन सरकारी मीडिया का क्या होगा?
मेरा शुरू से मानना है कि निर्वाचित सरकार नीति बनाने के लिए रिश्वत ले यह भले गलत है लेकिन इसके लिए कार्रवाई पुख्ता सबूत के आधार पर ही होनी चाहिए। इसीलिए अधिकारियों और लोकसेवकों के मामले में अनुमति लेने का नियम है। यहां अनुमति ली गई है और फिर भी अदालत ने कह दिया कि मामले में दम नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि अनुमति गलत दी गई है। यह काम तो सरकार और उसके प्रतिनिधि ने किया है। अगर सरकार अपने वकील (सॉलिसीटर जनरल और उनके जरिए सीबीआई) से यह काम करवाने की कोशिश कर रही है तो जज को पार्टी नहीं होना चाहिए और यहां लग रहा है कि जाने-अनजाने जज को पार्टी बना लिया गया है। इसमें विचारधारा का मामला तो है ही। एक यू-ट्यूब चैनल के अनुसार, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के मामले में बुरे फंसे केजरीवाल सीबीआई ने खोली पोल आरएसएस सेमिनार में शामिल होना पक्षपात नहीं। सीबीआई की तरफदारी और केजरीवाल का विरोध भी मुद्दा है। हालांकि वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है फिर भी सोशल मीडिया पर एक थम्ब नेल है, हाई कोर्ट की विडियों शेयर करने पर फंसा केजरीवाल होगी एफआईआर (यह शीर्षक कॉपी पेस्ट है)। मुझे लगता है वीडियो या लिंक शेयर करना अपराध नहीं है और कई लोगों ने शेयर किए हैं। एक घंटे से ज्यादा का वीडियो कई जगह है फिर भी यह सब चल रहा है जो अलग मुद्दा है। लेकिन इससे अरविन्द केजरीवाल के आरोपों की गंभीरता बढ़ जाती है। दस में से दो आरोप इस प्रकार हैं : (1) जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ चल रही कार्रवाई को भी हाईकोर्ट ने रोक दिया। ट्रायल कोर्ट ने जो बातें लिखी थीं, वो CBI के खिलाफ नहीं, बल्कि IO के खिलाफ थीं। IO ने हाईकोर्ट में कोई राहत नहीं मांगी थी और वह वहां मौजूद भी नहीं था। फिर भी सिर्फ CBI के कहने पर उसके खिलाफ कार्रवाई रोक दी गई। इससे मेरे मन में शंका पैदा होती है। (2) कानून के मुताबिक डिस्चार्ज आदेश को बहुत कम मामलों में ही रोका जाता है, लेकिन हमें सुने बिना ही आदेश का एक हिस्सा रोक दिया गया और बाकी हिस्सा भी बदल दिया गया। ऐसा लग रहा है कि इस एकतरफा आदेश से ट्रायल कोर्ट का ज्यादातर फैसला खत्म कर दिया गया। मुझे CBI की याचिका की कॉपी भी नहीं दी गई थी।
छह अप्रैल को खुद पहली बार कोर्ट में पेश होने के बाद दाखिल इस शपथपत्र में जज के बच्चों को सीबीआई के वकील या भारत के सॉलिसीटर जनरल द्वारा काम दिए जाने की जानकारी दिए जाने के साथ यह भी कहा गया है कि सीबीआई की ओर से इस मामले में पेश हो रहे वकील यानी सॉलिसीटर जनरल को भी यह जानकारी पहले ही सार्वजनिक करनी चाहिए थी। यही नहीं, शपथ पत्र में कहा गया है (बिन्दु 20) …. इस माननीय न्यायालय द्वारा कार्यवाही शाम 7:00 बजे के बाद भी जारी रखी गई और उसी दिन समाप्त कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप मुझे जवाबी तर्क तैयार करने और प्रस्तुत करने का कोई भी उचित और तर्कसंगत अवसर प्रभावी रूप से नहीं मिल पाया। मैं माननीय न्यायालय से अनुरोध करता हूँ कि मुझे मौखिक सुनवाई में वर्तमान तथ्यों को प्रस्तुत करने के लिए समय प्रदान किया जाए। किसी भी स्थिति में, मैं माननीय न्यायालय से अनुरोध करता हूँ कि इन तथ्यों को रिकॉर्ड पर लिया जाए और इन पर विचार किया जाए, क्योंकि मेरे विनम्र निवेदन के अनुसार, ये तथ्य अपने आप में ‘हितों के सीधे टकराव’ और न्यायाधीश के सुनवाई से हटने का आधार बनते हैं। आगे बिन्दु 22 में कहा गया है …. जबकि सुनवाई से हटने का आवेदन स्वयं अभी भी विचाराधीन था, इस माननीय न्यायालय ने मुख्य मामले में प्रभावी आदेश पारित करना शुरू कर दिया; इन आदेशों में यह निर्देश भी शामिल था कि यदि प्रतिवादियों द्वारा एक सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो जवाब दाखिल करने का उनका अधिकार समाप्त मान लिया जाएगा। मैं विनम्रतापूर्वक निवेदन करता हूँ कि न्यायिक औचित्य की यह माँग थी कि, जब तक सुनवाई से हटने का मुद्दा अभी भी निर्णय की प्रतीक्षा में था, तब तक मुख्य पुनरीक्षण याचिका में पक्षों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले ऐसे कोई भी प्रभावी या बाध्यकारी प्रक्रियात्मक आदेश पारित नहीं किए जाने चाहिए थे। सुनवाई से हटने के आवेदन के विचाराधीन होने के दौरान ही, बार-बार ऐसे आदेश पारित किए जाने से मेरे मन में एक और आशंका उत्पन्न हो गई है कि—इससे पहले कि सुनवाई से हटने के मुद्दे पर अंतिम निर्णय हो सके—कार्यवाही को इस आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है कि यह मामला उसी पीठ के समक्ष जारी रहेगा, मानो यह एक पूर्व-निर्धारित और निश्चित परिणाम हो। इस धारणा ने, वर्तमान मामले में निष्पक्षता की प्रतीति के संबंध में मेरी आशंका को काफी हद तक और बढ़ा दिया है। जाहिर है, अरविन्द केजरीवाल की अवधारणाएं अपनी जगह मजबूती से हैं फिर भी मीडिया में इन्हें महत्व नहीं दिया जाना मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को संदिग्ध बनाता है।
दिल्ली हाईकोर्ट में अपनी बात खुद रखकर आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल जब चर्चा में हैं तब अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर खबर है, ईडी ने उसके राज्यसभा सदस्य, अशोक मित्तल के छापा मारा है। यहां आज अखबारों में संसद के विशेष सत्र, महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर बात होनी थी और यही सब है। मेरा मानना है कि अभी न परिसीमन की जरूरत है ना महिला आरक्षण की। पांच राज्यों में चुनाव के बीच विशेष सत्र में यह सब करने का मतलब ही है विवाद पैदा करना ताकि उन मुद्दों पर बात न हो जो खबर है। उदाहरण के लिए बिहार में नीतिश कुमार का किस्तों में इस्तीफा और नई सरकार बनना, बेमौसम की बारिश है। सम्राट चौधरी जिन परिस्थितियों में जिस तरह मुख्यमंत्री बने हैं उसमें खबर क्या है, मेरे लिए समझना मुश्किल है लेकिन आज देशबन्धु में टॉप पर यही है। परिसीमन के विरोध में उतरा विपक्ष शीर्षक से खबर लीड है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, विपक्ष आरक्षण के साथ, परिसीमन के खिलाफ। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक ट्रम्प के हवाले से है, ईरान से युद्ध खत्म होने के करीब। मुख्य शीर्षक है, सरकार आज लोकसभा से कहेगी, सभी राज्यों में 50 प्रतिशत सीटें बढ़ जाएंगी। मुद्दा यह है कि सरकार ऐसा क्यों कर रही है, इतनी जल्दबाजी क्यों है और किसी की मांग ही नहीं है तो सरकारी खर्च बढ़ाने वाले ऐसे काम क्यों किए जा रहे हैं। इस संबंध में मधु किश्वर ने एक्स पर लिखा है, जब यूपीए ने पहली बार महिला आरक्षण बिल का प्रस्ताव रखा था, तब मैंने उसका ज़ोरदार विरोध किया था। और संसद में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक बेहतर योजना भी पेश की थी। चुनाव आयोग ने उस वैकल्पिक प्रस्ताव को अपना लिया था, जिसे ‘मानुषी’ ने सुझाया था। लेकिन अब मैं किसी भी तरह के विशेष उपायों के सख्त खिलाफ हूँ। पहले मैं ‘बीवी-बेटी ब्रिगेड’ की आलोचना किया करती थी। इन्हें पंचायतों और नगर निकायों में हमेशा आरक्षित सीटों का फ़ायदा मिल जाता था। अब मुझे एहसास हो रहा है कि इस घातक आरक्षण योजना के चलते, हमें संसद में ‘गर्लफ़्रेंड/मिस्ट्रेस ब्रिगेड’ के रूप में एक भयानक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है! 543 सदस्य ही काफ़ी थे! अब तो इस व्यवस्था पर 850 परजीवियों का बोझ और आ गया है! इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक ही सरकारी योजना है। सरकार अपनी योजना इतनी जल्दी क्यों लागू करना चाहती है। अधपन्ने पर हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, भारतीय टीम 20 अप्रैल से व्यापार वार्ता के लिए अमेरिका जाएगी। मुख्य अखबार की लीड ट्रम्प पर है जबकि सेकेंड लीड लोकसभा में सीटें बढ़ाने की योजना का विरोध है। द हिन्दू में भी लोसकभा में सीटें बढ़ाने की सरकार की योजना है। इससे किसी भी राजनीतिक गिरोह को सरकारी खर्च पर ज्यादा शिष्य पालने या मुरीद बनाने का मौका मिलेगा। भाजपा ने राजनीति और राजनीतिज्ञों का स्तर जितना खराब किया है उससे इन खाली जगहों को भरने के लिए आगे आने वाली भीड़ का अनुमान लगाया जा सकता है। बंगाल चुनाव की खबर अकेले कलकत्ता के अखबार, द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज की लीड महिला आरक्षण और परिसीमन पर विपक्ष और सरकार के भिड़ंत की संभावना पर है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


