नई दिल्ली। दो दशकों से अधिक समय तक सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद वरिष्ठ पत्रकार Narendra Nath Mishra ने अब मुख्यधारा मीडिया से अलग होकर एक स्वतंत्र सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणीकार के रूप में नई पारी शुरू की है।
Narendra Nath Mishra का आखिरी कार्यकाल Navbharat Times में पॉलिटिकल एडिटर और ब्यूरो चीफ के रूप में रहा, जहां उन्होंने देश की राजनीति और सत्ता केंद्रों से रिपोर्टिंग की। इससे पहले वे Hindustan, Dainik Jagran और Amar Ujala जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं।
जमीनी रिपोर्टिंग से बनाई पहचान
मिश्रा उन चुनिंदा पत्रकारों में रहे हैं जिन्होंने जमीनी स्तर पर जाकर रिपोर्टिंग की। 2014 के आम चुनाव के दौरान उन्होंने 30 दिनों तक लगातार ट्रेन के सेकेंड क्लास डिब्बे में सफर कर करीब 25,000 किलोमीटर की यात्रा की और देशभर में जनमत को समझने की अनोखी पहल की। इस प्रयोग को University of Mumbai में शोध का विषय भी बनाया गया।
उन्होंने बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों, सामाजिक तनाव और नरसंहार जैसे जटिल मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की, जिन्हें अक्सर राष्ट्रीय मीडिया नजरअंदाज करता रहा।
रिपोर्टिंग का असर: कोर्ट तक पहुंची खबरें
उनकी कई रिपोर्ट्स पर अदालतों ने स्वतः संज्ञान लिया। 2005 में बिहार के एक गांव से उन्होंने एड्स पीड़ित परिवार के सामाजिक बहिष्कार की खबर उजागर की, जिसके बाद राज्य के एड्स जागरूकता कार्यक्रम में इस पहलू को शामिल किया गया।
इसी साल उन्होंने उत्तर बिहार में भूख से हो रही मौतों और किडनी बेचने को मजबूर लोगों की दर्दनाक स्थिति को सामने लाकर बड़े रैकेट का खुलासा किया।
देश से विदेश तक रिपोर्टिंग
मधुबनी से लेकर वॉशिंगटन डीसी तक रिपोर्टिंग कर चुके मिश्रा ने पंचायत चुनावों से लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव तक को कवर किया है। उन्होंने भारत दौरे पर आए अमेरिकी राष्ट्रपतियों Barack Obama और Donald Trump से भी संवाद किया।
अंतरराष्ट्रीय पहचान और सम्मान
उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रायोजित Chevening South Asian Journalism Programme (SAJP) फेलोशिप मिल चुकी है। वहीं 2024 में वे अमेरिकी विदेश विभाग के फेलो के रूप में अमेरिका भी गए, जहां उन्होंने चुनाव कवरेज किया।
किताब और सोशल मीडिया पर सक्रियता
हाल ही में उनकी किताब “India on the Move: When Jai Shree Ram Met Bharat Mata Ki Jai” चर्चाओं में रही, जिसमें भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी वे एक संतुलित और प्रभावशाली आवाज के रूप में पहचाने जाते हैं। 2024 के आम चुनाव में उन्होंने एकमात्र ऐसे भारतीय पत्रकार के रूप में Narendra Modi और गांधी परिवार दोनों का इंटरव्यू किया।
अन्य भूमिकाएं
पत्रकारिता के अलावा मिश्रा कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन में भी सक्रिय रहे हैं और टाटा जैसे बड़े समूहों के साथ काम कर चुके हैं। वे समय-समय पर पत्रकारिता के छात्रों को भी पढ़ाते हैं।
अपने बेबाक और जमीनी दृष्टिकोण के लिए पहचाने जाने वाले Narendra Nath Mishra अब स्वतंत्र मंच से आम लोगों के मुद्दों को उठाने पर फोकस कर रहे हैं।
पढ़िए नरेंद्र नाथ मिश्रा की एफबी पोस्ट-
पर्सनल अपडेट- लगभग दो दशक से भी अधिक समय के बाद आज मैं मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग हो रहा हूँ! आज से अभी से आज़ाद हूँ! अब अपने दम पर, अपनी पसंद का कुछ करने निकल रहा हूँ। मेरे लिए बहुत शानदार सफर रहा और बीच में अचानक चल रहे कम्फर्ट जोन के सफर को रोकना और फिर कुछ नया करने का फैसला कठिन है!
क्या करूँगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तय है कि यह रास्ता आसान नहीं होगा… और असंभव भी नहीं। इस सफर में मुझे आपके सहयोग, समर्थन और मार्गदर्शन की ज़रूरत होगी।
मैं बहुत कुछ करना चाहता हूँ, अपने तरीके से, अपनी शर्तों पर, बिना किसी बंधन के। इन बीस वर्षों में पत्रकारिता के कई रंग देखे हैं। बिहार के सुदूर गाँवों में मुखिया चुनाव से लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव तक, दोनों को कवर करने का मौका मिला। यह रेंज शायद ही किसी के पास हो। क्योंकि जो लोग मुखिया चुनाव को कवर करते हैं, उन्हें अक्सर दिल्ली तक में जगह बनाना मुश्किल होता है… और जो अमेरिका की राजनीति को कवर करते हैं, वे शायद ही कभी किसी पंचायत चुनाव तक पहुँचते हैं।
दुनिया के तीन देशों से फेलोशिप मिली। एक किताब लिखी, और ऐसे समय में लिखी जब राजनीति सबसे ज़्यादा ध्रुवीकृत थी। फिर भी, उसे लेफ्ट, राइट और सेंटर, तीनों ने सराहा।
पटना, मुजफ्फरपुर, मेरठ, रांची, गोरखपुर, कानपुर, नोएडा होते हुए दिल्ली तक के सफर में अनगिनत लोगों का साथ मिला, उन सभी का दिल से शुक्रिया।
आज भी याद है, 2014 का वह सफर, जब देश को करीब से देखने निकला था। दिल्ली से लखनऊ, पटना, गुवाहाटी, कोहिमा, कोलकाता, भुवनेश्वर, हैदराबाद, चेन्नई, कन्याकुमारी, त्रिवेंद्रम, बेंगलुरु, मुंबई, अहमदाबाद, भोपाल, रायपुर, अमृतसर, जम्मू, श्रीनगर, जयपुर… और फिर दिल्ली। 29 दिनों की वह यात्रा, सेकंड क्लास स्लीपर में, अब भी यादों में ताज़ा है। इन सालों में देश समाज राजनीति को नजदीक से समझा जाना और इसके विविद रंगों को महसूस किया! कहते हैं क़ि रिपोर्टिंग में आप ग्राउंड पर होते हैं तो हर एक किलोमीटर पर एक कहानी मिलती ह। मैंने तो लाखों किलोमीटर नापे! अब फिर उन कहानिओं के बीच जाने का समय है! स्वरुप क्या होगा पता नहीं!
उम्मीद है, आगे जो भी करूँगा, आप साथ देंगे। आज सिर्फ आभार व्यक्त करने का दिन है। उम्मीद है, आगे जो भी करूँगा, आप साथ देंगे। धन्यवाद।


