पंजाब में आप पड़ रहा भारी, नवोदय ने दून से बोरिया-बिस्तर समेटा
पत्रकारों की नौ साल की मेहनत पर नौ मिनट में पानी फिरा
गुणानंद जखमोला-
लो, उत्तराखंड के 30 पत्रकार आ गये सड़क पर…
आखिरकार जिसका डर था वही हो गया। सहारा के बाद नवोदय टाइम्स ने भी देहरादून से अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया। इस कारण यहां काम कर रहे लगभग 30 पत्रकार सड़क पर आ गये। इनमें डेस्क, रिपोर्टिंग और अप-कंट्री में तैनात पत्रकार शामिल हैं। अब इसका प्रकाशन दिल्ली से होगा। ब्यूरो के नाम पर यहां दो-तीन स्ट्रिंगर टाइप पत्रकारों को जिम्मेदारी सौंप दी गयी है। नवोदय ग्रुप को पता है कि देहरादून से उन्हें हर माह आठ से 10 लाख रुपये का सरकारी विज्ञापन तो मिलेगा ही, इसलिए महंगे पत्रकार क्यों रखने?
दिल्ली से संपादक अक्कू श्रीवास्तव देहरादून आए। सूत्रों के अनुसार नौ साल में अक्कू पहली बार देहरादून आए। उन्होंने पहले तो पत्रकारों की मिटिंग ली और नवोदय में छपी खबरों में गलतियां गिनाईं। इसके बाद मुद्दे पर आए कि सबको नौकरी से तुरंत प्रभाव से हटाया जा रहा है।
यह बता देता हूं कि नवोदय टाइम्स देहरादून को प्रख्यात संपादक निशीथ जोशी बेहतरीन तरीके से चला रहे थे ओर इस अखबार ने उत्तराखंड में अच्छी-खासी जगह बना ली थी। रेवन्यू भी अच्छा आने लगा था। सूत्रों के अनुसार पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ग्रुप की जीएसटी समेत कई खामियों को पकड़ लिया तो कॉस्ट कटिंग के नाम पर गाज देहरादून एडिशन पर गिरी ओर प्रेस को नोएडा ले जाया गया। यहां कार्यरत पत्रकारों के मुताबिक ग्रुप जानता है कि रेवन्यू तो मिलेगा ही, ऐसे में महंगे पत्रकारों का क्या करना? पत्रकारों के नौ साल की मेहनत को नौ मिनट में निपटा दिया गया। सबसे अहम बात कि नवोदय के पत्रकारों का न तो पीएफ कटता है और संभवतः न ही उनको ग्रेच्एटी की सुविधा मिलेगी।
नवोदय बंद होने से 30 पत्रकारों के सामने रोजगार का संकट हो गया है। जब मैं नवभारत टाइम्स दिल्ली में कार्यरत था तो हमारे तत्कालीन संपादक मधुसूदन आनंद कहते थे कि प्रिंट मीडिया का भविष्य 2040 तक ही है। लेकिन अब हालात देखकर लगता है कि मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया की जल्द मौत हो जाएगी। प्रिंट मीडिया में कार्य करने वाले पत्रकारों को अब सावधान हो जाना चाहिएं।


