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नभाटा का प्रयोग : शब्द उर्दू का लगे और उसमें कहीं ‘ज’ दिखाई दे जाए तो आँख मूँदकर नुक़्ता लगा दो!

संत समीर-

उम्मीद करता हूँ कि अख़बार के सम्पादक जी नाराज़ नहीं होंगे। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है, क्योंकि मेरी इस तरह की पोस्टों की वजह से एक अख़बार ने मुझे लगभग ब्लैक लिस्ट ही कर रखा है। यों, अँधेरे में उम्मीद भी दिखती है कि ‘दैनिक भास्कर’ जैसे अख़बार की ग़लतियों पर मैंने कई बार लिखा है, पर वहाँ के लोगों ने कभी मुझसे नाराज़गी नहीं जताई या ब्लैक लिस्ट जैसा कुछ नहीं किया, उलटे उन्होंने एक-दो दफ़ा मेरी बात छापी ही है। उम्मीद करता हूँ कि ‘नवभारत टाइम्स’ वाले भी अपनी ग़लती को बस ग़लती की तरह ही मानेंगे और दिल पर कोई बोझ न लेंगे।

बात बस इतनी है कि नभाटा इधर अपने शीर्षकों में न जाने किस पिनक में नुक़्तेबाज़ी का शौक़ आज़मा रहा है, लेकिन आए दिन अराजकता इतनी देख रहा हूँ कि मेरा भी अब टोकने का मन कर रहा है। आज का ही अख़बार पलट लीजिए। गड़बड़ी पहले पृष्ठ से ही दिखने लगी थी, पर अभी हाल मेरी निगाह चौथे पृष्ठ पर है। आख़िर किस गणित से नुक़्ते के साथ ‘वज़ूद’ लिखा गया है? यह अरबी का शब्द ‘वुजूद’ है, जिसे ‘वजूद’ लिखा जाना चाहिए था। यहाँ नुक़्ते की कोई तुक नहीं बैठती।

ऐसा लगता है कि उपसम्पादक को किसी ने मन्त्र दे दिया है कि शब्द उर्दू का लगे और उसमें कहीं ‘ज’ दिखाई दे जाए तो आँख मूँदकर नुक़्ता लगा दो; लेकिन, चूक यहाँ भी हो गई है, क्योंकि ‘इन्तज़ाम’ को बिना नुक़्ते के लिखा गया है ‘इंतजाम’। इसी पृष्ठ पर ऊपर के सबसे बोल्ड शीर्षक में ‘तकलीफ़’ के ‘फ़’ से नुक़्ता ग़ायब है। अलबत्ता, अन्य शीर्षकों पर निगाह पड़ी तो ‘गुलज़ार’ ठीक ढङ्ग से गुलज़ार मिला, पर ‘ख़र्च’ में से नुक़्ते का बिस्तर गोल कर दिया गया है। ग़नीमत है कि ‘बाज़ार’, ‘वजह’ जैसे शब्द अपनी मान बचाए हुए हैं।

सवाल इतना-सा है कि अगर नुक़्ते का गुणा-गणित ठीक से पता नहीं है, तो इसके चक्कर में पड़कर मग़ज़मारी करने की आख़िर ज़रूरत क्या है। हिन्दी के स्वभाव में वैसे भी नुक़्तेबाज़ी कहाँ है? हाँ, टीवी चैनलों की तरह अख़बारों के दिलों में भी उर्दूप्रेम ज़्यादा उमड़ रहा हो तो उनके मालिकों को चाहिए कि ‘इनक्रीमेण्ट’ के मौसमी तनाव में घुले जा रहे हमारे पत्रकार साथियों की तनख़्वाहें कुछ और ठीक करें और उन्हें नुक़्तेबाज़ी के मामले में ठीक से प्रशिक्षण देने का इन्तज़ाम करें, तो वे कुछ और मेहनत से काम करेंगे। भाषा तो भाषा है, उर्दू भी सही लिखी जाए, हिन्दी भी सही लिखी जाए, अँग्रेज़ी भी सही लिखी जाए… इससे हम सबका भला ही होगा।

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