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नवभारत टाइम्स पटना संस्करण की बंदी का मामला : हाईकोर्ट के फैसले के एक साल बाद भी पत्रकारों को न्याय नहीं मिला

पटना | बीते वर्ष यानी 25 मई 2024 में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दो पत्रकारों को पटना हाईकोर्ट से न्याय मिला, जिन्हें सेवा से हटाया गया था। पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अभिषेक रेड्डी ने एक अहम फैसले में कहा कि नवभारत टाइम्स को बंद करने का फैसला अवैध था क्योंकि इसके लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

लेकिन इस कानूनी लड़ाई और जीत के एक साल बीत जाने के बाद भी नवभारत टाइम्स के पत्रकारों को न्याय नहीं मिल सका है। बीसीसीएल (BCCL) ने पत्रकारों को अब तक किसी तरह का कोई मुआवजा नहीं दिया है। जो एक तरह से कोर्ट के आदेश की अवहेलना है।

पूरा मामला क्या है यहां समझें…

बता दें कि पटना संस्करण के नवभारत टाइम्स को 1995 में बंद कर दिया गया था, जिससे वहाँ कार्यरत पत्रकारों की नौकरियां चली गईं। उनमें से दो पत्रकार — शरद रंजन कुमार और हरेंद्र प्रताप सिंह — ने इस निर्णय को चुनौती दी और श्रम न्यायालय से अपने पक्ष में आदेश भी प्राप्त किया।

इसके बाद टाइम्स ऑफ इंडिया की मालिक कंपनी एस. बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (BCCL) ने इस आदेश को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन 16 साल बाद कोर्ट ने कहा कि अखबार का बंद किया जाना गैरकानूनी था।

कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

पटना हाईकोर्ट ने कंपनी को आदेश दिया था कि इन पत्रकारों को फिर से सेवा में लिया जाए और उनके बकाया वेतन व अन्य लाभ दिए जाएं, मानो वे सेवानिवृत्त होने तक सेवा में ही रहे हों। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वे अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, तो उन्हें उस अवधि का आर्थिक लाभ दिया जाए।

बिहार वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन ने दी थी ये प्रतिक्रिया

BWJU ने कोर्ट के इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह उन पत्रकारों की जीत है जिन्हें अन्यायपूर्वक सेवा से हटाया गया था। यूनियन के महासचिव कमलकांत सहाय ने कहा कि यह फैसला मीडिया प्रबंधन के लिए एक सीख है और पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए यूनियन संघर्ष करता रहेगा।

देखें अदालत ने क्या दिया था निर्णय….

मूल खबर…

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1 Comment

1 Comment

  1. शरद रंजन शरद

    April 12, 2025 at 1:29 pm

    ऐसी ख़बरों का प्रकाशन हमेशा होना चाहिए ताकि सच सामने आये और पत्रकार एवं शब्दकर्मी अन्याय के विरुद्ध एकजुट होते रहें । संघर्ष कई बार अनेक विपरीत परिस्थितियों की वजह से बहुत लम्बा हो जाता है । हम दोनों,यानी शरद रंजन शरद और हरेन्द्र प्रताप सिंह ने तीस वर्षों से अधिक समय तक न्याय के लिए कठिन संघर्ष किया है । लेकिन हिम्मत है और यक़ीन भी कि ऐसे संघर्षों की लौ कभी बुझती नहीं !

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