एनडीटीवी, प्रणय रॉय और मनी लांड्रिंग

एनडीटीवी चैनल और उसके मालिकानों पर मनी लांड्रिग का केस कगार पर है। प्रवर्तन निदेशालय की जांच निर्णायक मोड पर है। मामला एनडीटीवी लि. कंपनी का ब्रिटेन में वहां बनाई सबसिडरी कंपनी एनएनपीएलसी को पब्लिक इश्यू से फंड जुटाने और उसे ग्रुप कंपनी को जस का तस भेजने की एफआईपीबी की अनुमति से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि जो अनुमति पब्लिक आफरिंग की थी उसके बजाय कंपनी ने विदेशी कर्ज, बांड्स जैसे अलग तरीके से फंड जुटाया। यह एफआईपीबी की मंजूरी की शर्त और फेमा कानून की धारा का उल्लंघन था।

मार्च 2007 से अक्टूबर 2010 के बीच विदेश में कोई 170 मिलियन डालर सबसिडरी कंपनी एनएनपीएलसी से एनडीटीवी ने जुटाए। इसमें से कोई 725 करोड़ रु भारत की ग्रुप कंपनियों को ट्रांसफर हुआ। रिजर्व बैंक ने इसे सही नहीं पाया। इसे फेमा की धाराओं का उल्लंघन माना गया। इसके अलावा एनडीटीवी लि. की भारतीय कंपनियों में 83 करोड़ 90 लाख 9 हजार 977 व 21,972 डालर की रकम एनडीटीवी की मारिशस कंपनियों से एफडीआई के नाम पर आई।

रिजर्व बैक ने पाया कि विदेशी सबसिडरी से ऐसे पैसा आना गड़बड़ है। फेमा कानून की धाराओं का उल्लंघन है। मतलब कुल कोई 1113 करोड़ रु फेमा उल्लंघन से आए हुए माने जा रहे हैं। ऐसे ही एनडीटीवी लि. ने एनएनपीएलसी को जो कॉरपोरेट गारंटी दी, जो कर्ज लिया वह बिना रिजर्व बैंक को सूचित किए, मंजूरी के था और यह भी फेमा की धाराओं का उल्लंघन बनता है। एनडीटीवी स्टूडियो लि. का अमेरिकी कर्ज के संदर्भ में 200 करोड़ रु की बैंक डिपाजिट भी फेमा उल्लंघन का मामला माना गया। एनडीटीवी लि. ने ग्रुप कंपनीज का ट्रांसफर हुए शेयरों को कोई 296 करोड़ रु की कीमत पर एनएनपीएलसी से लेना भी फेमा की धाराओं का उल्लंघन माना जा रहा है।

इस तरह आरोप है कि अलग-अलग मामलों में फेमा कानून उल्लंघन के मद्देनजर एनडीटीवी का कुल मामला कोई 2030 करोड़ रु का है। ध्यान रहे फेमा मामले की जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय याकि ईडी है। सितंबर में जांच की भनक मिली थी। अब एनडीटीवी लि. और कंपनी के कर्ता-धर्ता प्रणय रॉय, उनकी पत्नी राधिका राय, केवीएल नारायण राव को ईडी से यह नोटिस सर्व हो चुका है कि क्यों फेमा उल्लंघन की एडजूडिकेशन प्रोसिडिंग शुरू न की जाए?

एनडीटीवी लि. का स्टेंड है कि उसको मिली कानूनी सलाह में कोई फेमा उल्लंघन नहीं है। मतलब आरोपों में दम नहीं है। कंपनी जवाब देगी। सामना करेगी। इसलिए देखना होगा कि ईडी के कारण बताओ नोटिस या आगे की कार्रवाई में कितने विस्तार से खुलासे, फेमा कानून के नियमों, धाराओं का क्या कैसा उल्लंघन बताया जाता है। यह जान लिया जाए कि मामला बहुत पुराना है। मनमोहन सरकार के वक्त भी इसकी चर्चाएं थीं। एक वेब ठिकाने http://pcwedsndtv.blogspot.in ने तो और भी कई तरह के आरोप लगाए हुए हैं। पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कैसे जांच नहीं होने दी, इसका भी सिलसिलेवार आरोप है। मोदी सरकार के आने के बाद भी एक लॉबी प्रयासरत रही कि बात आगे न बढ़े। मामला न खुले। सो बहुत जल्द भारत की मीडिया कंपनियों में से एक की सर्वाधिक गंभीर सनसनियां बनने का वक्त आता लगता है।

लेखक हरिशंकर व्यास वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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