कभी-कभी सोचता हूं क्या इसीलिए लोन लेकर जर्नालिज़्म की पढ़ाई की थी!

मैं ‘भड़ास 4 मीडिया’ का बेहद शुक्रगुज़ार हूं कि वह मीडिया जगत की हर छोटी-बड़ी ख़बर से हमें रु-ब-रु कराता है. हमें अपनी बात कहने का मौका देता है. साथ ही हमारे दुख-दर्द को बांटने का काम करता है. यूं तो मैंने पहले भी अपनी उलझन को सुल्झाने के लिए B4M का सहारा लिया है लेकिन आज फिर से इसकी ज़रूरत आन पड़ी है. उम्मीद है इस बार भी ‘भड़ास 4 मीडिया’ मुझे उम्मीद की किरण दिखाएगा. मेरे करियर की डूबती नैय्या को पार लगाएगा.

मैं 8 महीने पहले तक मीडिया से जुड़ा था, जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी (नई दिल्ली-25) से मॉस मीडिया व मॉस कॉम करने के बाद एक रीजनल चैनल से इंटर्नशिप करके एक प्रतिष्ठित चैनल में काम करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. वहां मैंने पूरे 12 महीने काम किए. ख़ूब मेहनत की, बहुत कुछ सीखा. अपने काम (Assistant Producer) में बहुत हद तक माहिर हो गया, लेकिन अचानक से चैनल की आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब हो गई जिसके चलते मजबूरन हमें नौकरी छोड़नी पड़ गई.

नई नौकरी की तलाश में कई जगह भटके लेकिन हर जगह से ना उम्मीदी हाथ लगी. कहीं सैलरी (8,000 – 9,000) रास नहीं आई तो कहीं रिफरेंस न होने की वजह से बैरंग लौटना पड़ा. अब दिल्ली जैसे शहर में गुज़र बसर करने के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा, सो आजकल मीडिया से हटकर कुछ और कर रहा हूं…जो मन के खिलाफ है, क्या करें पेट का भी तो सवाल है.. कभी-कभी सोचता हूं क्या इसीलिए लोन लेकर जर्नालिज़्म की थी. ‘भड़ास 4 मीडिया’ में जब पढ़ता हूं कि फलां की फलां जगह जॉब लग गई तो खुद पर गुस्सा आता है और सिलेक्टरों पर हंसी, क्योंकि कई ऐसे मूर्ख हैं जो बड़े चैनलों में विराजमान हैं और सलाहियतमंद लोग आज भी हाथ में डिग्री लिए चप्पलें घिस रहे हैं.

बहरहाल, ‘भड़ास 4 मीडिया’ के माध्यम से मैं इंडिया टीवी, ज़ी न्यूज, इंडिया न्यूज़, न्यूज़-24, न्यूज़ नेशन, फोकस न्यूज़ और समाचार प्लस आदि से गुज़ारिश करता हूं कि प्लीज़ आप मुझे अपनी संस्था में बतौर Assistant Producer काम करने का मौका दें. मैं वादा करता हूं कि मेरी मेहनत और क़ाबलियत से आप (चैनल) फैज़याब होंगे. मेरे पास जैक नहीं है, लेकिन जज़्बा है, जोश है…कठिन परिस्थितियों में जमे रहने का माद्दा है..यही मेरी पूंजी है.

एम.एन.खान
मोबाइल : 8882939159
mohd786nehal@gmail.com



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Comments on “कभी-कभी सोचता हूं क्या इसीलिए लोन लेकर जर्नालिज़्म की पढ़ाई की थी!

  • mr khaan if you want doing in the job in this sector , you want atlesat chaatukaar . aur is proffesion main you need the god father and the god mother, there is not requirement of the education and human values and the ethics, so kahin kisi netaa ke pair choo lo to kaam ban jaayega anytha medis se aise gayab ho jaaoge jaise gadhe ke sar se seeng. its the real scenerio of todays medias

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  • विनोद सावंत says:

    जिन्दगी में जो कुछ नही कर पाता वह मीडिया जैसी दल्लागिरी में काम करता है …अगर आप किसी की चाटुकारिता कर सकते है तो यह मीडिया का धंधा आपका स्वागत करता है..कुछ और कर लो …नही तो इस दल्लागिरी से कभी खुश नही रह पायोगे….ना पैसा …ना पत्रकारिता ..यह मात्रा दल्लागिरी है ….

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  • Kauashalendra says:

    आदरणीय एमएन खान जी
    आपने तो एकदम सच पोस्ट किया। पत्रकारिता में कई ऐसे लोग बड़े पदों पर काम कर रहे हैं जिन्हे पत्रकारिता और मार्केटिंग का ज्ञान तक नहीं है। लेकिन उनके गाडफादर है सो सब जायज। आपकी तरह मैं भी पत्रकारिता से किनारा कर लिया हूं। मैं बड़े विश्वास के साथ कह रहा हूं कि यदि मुझे मीडिया क्षेत्र में विज्ञापन मार्केटिंग का काम मिले तो आसानी से लक्ष्य के साथ पूरा करने का दम रखता हूं। लेकिन कोई गाडफादर नहीं सो सब बेकार
    kaushalendrarai20@gmail.com

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  • पत्रकारिता एक अजीब से दौर से गुजर रही है। पूरे देश और दुनिया में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की हालत बंधुआ मजदूरों से भी बुरी है। तथा कथित चौथे स्तंभ के मालिक (Corporate Media Owners Like Patrika News Dainik Bhaskar Dainik Jagran Amar Ujala etc.) खुद को मिस्र के उन फैरो राजाओं की तरह समझते हैं जिन्होंने शोषण के बल पर बडे-बडे पिरामिड बनवाए और खुद की लाशों को इस उम्मीद में वहां दफनाया कि फिर से कभी अपनी अकूद दौलत का विलास भोगेंगे।
    शायद आप में से ज्यादातर लोगों काे यकीन नहीं होगा लेकिन हकीकत यही है कि पत्रकारों की हालत दिहाडी मजदूरों जैसी है जिनके सीने पर मालिक हंटर लिए खडे रहते हैं।
    पूरी दुनिया को शोषण के खिलाफ आवाज उठाने का भौंपू थमाने वाले पत्रकार अपने संस्थानों से मजीठीया वेज बोर्ड की अनुशंसाओं के मुताबिक वेतन मांगने में डरते हैं और जो मांगने की कोशिश करते हैं उन्हें मालिक यह कह कर नौकरी से बाहर निकाल देते हैं कि जाओ अब जिंदा रह कर दिखाओ।
    हालात यह है कि सरकार पत्र-पत्रिकाओं के मालिकों की गुलाम है। सुप्रीम कोर्ट इनके जूते की नौंक पर रहता है इसीलिए तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद भी किसी भी संस्थान ने मजीठिया के मुताबिक वेतन वृद्धि नहीं की है।
    कुछ पत्रकार ऐसे हैं जो मालिकों के साथ मिलकर सुपारी जर्नलिज्म और प्रेश्याओं वाला काम कर रातों-रात अरबपति हो जाते हैं और सरकार उन पर हमेशा मेहरबान होती है और उन्हें तरह-तरह के तमगे और सम्मान देती है।
    टीवी न्यूज चैनलों में निचले स्तर पर काम करने वालों का तो और बुरा हाल है। 10-12 हजार में 14-14 घंटे की सिफ्ट और गालियां मुफ्त।
    सबसे बडी पीडा यह है कि पत्रकार अपनी लडाई केंकडों की तरह लड रहे हैं। हालात ठीक वैसे ही हैं जब जनरल डायर ने भारत के सैनिकों से ही भारतीयों को गोलियों से भुनवा दिया था। यहां कोई मालिक के दुराचार के खिलाफ खडे होने की कोशिश करता है तो दूसरे कुत्ते स्वरूपी पत्रकार उसके उपर भौंक कर उसे भी मालिक के तलवे चाटने के लिए दबोचने की कोशिश करते हैं।

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