छतरी की तरह नीली बाल्टी हो गई है भारतीय राजनीति की दीर्घ कहानी

इस नीली बाल्टी के साथ महत्वपूर्ण बात यह है कि वास्तु के नियमों के अनुसार बाथरूम में नीली बाल्टी होनी चाहिये। संसद भवन के वास्तु से संबंधित भी कुछ कहानियां हैं। आप को जानना चाहिये। पता कीजिये।
संजय कुमार सिंह
नीली छतरी रस्किन बांड के लघु उपन्यास, ‘द ब्लू अंब्रेला’ का हिन्दी अनुवाद है। नीली बाल्टी बाहर पेपर लीक, अंदर छत लीक; सेंट्रल विस्ता, लेंटर रिसता जैसी दीर्घकालिक राजनीति का क्लाईमेक्स है। आप जानते हैं, शुरुआत, ‘मेरा कोई नहीं है’ से हुई थी और नाम लिखे सूट से भ्रष्टाचार के शिखर तक गई। फिसलना इलेक्टोरल बांड से शुरू हुआ है। पर अभी वह मुद्दा नहीं है। लेकिन दिल्ली के रजिन्दर नगर जैसे मोहल्ले में पानी भरने और उससे कोचिंग इंस्टीट्यूट के तीन छात्रों की मौत को कोचिंग सेंटर की लापरवाही बना देने और फिर कार चालक को जिम्मेदार ठहराने जैसे मामले हैं। आज खबर है कि कार चालक को जमानत देते हुए अदालत ने नोट किया कि आरोप अति उत्साह में लगाये गये थे। देश में जो चल रहा है उसका एक उदाहरण वायनाड में जो हुआ उसपर राजनीति भी है।
आप जानते हैं कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दावा किया था कि केरल सरकार को एक सप्ताह पहले चेतावनी दी गई थी पर उसने कुछ नहीं किया। आज खबर है कि मरने वालों की संख्या 290 हो चुकी है। कई अभी लापता हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की जल्दबाजी आप देख चुके हैं। उन्होंने एक ऐसा वीडियो देखने की सिफारिश की है जिसे संसद की कार्यवाही से निकाल दिये जाने का आश्वासन संसद में ही दिया गया था। नहीं निकाला गया या आगे-पीछे क्या हुआ वह अलग राजनीति है। लेकिन जहां तक पूर्व चेतावनी पर कार्रवाई की बात है, आज के अखबारों में छपा है, द हिन्दू का शीर्षक है, मौसम विभाग ने अगस्त, सितंबर में सामान्य से ऊपर बारिश की भविष्यवाणी की है। क्या केंद्र सरकार समय रहते तैयारी करेगी? दिल्ली समेत सभी राज्यों को सतर्क करेगी और हादसे नहीं होना सुनिश्चित करेगी?
मैं नहीं जानता भविष्य में क्या होगा। सरकार क्या सब करेगी और वह कितना प्रभावी होगा। लेकिन आज ही खबर है, दिल्ली के गाजीपुर इलाके में मां-बेटे की मौत हो गई। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार 23 साल की महिला तीन साल के अपने बेटे के साथ पानी से भरे नाले में गिर गई। पूर्वी दिल्ली में इस नाले की देख-रेख का जिम्मा डीडीए का है। इस मामले में न सिर्फ दो जानें गईं, पुलिस ने सीमा विवाद को भी मुद्दा बनाया और यह देश की राजधानी की स्थिति है, अच्छे दिन और अमृत काल में। आप जानते हैं कि पूर्वी दिल्ली में गाजीपुर उत्तर प्रदेश की सीमा से लगता है जहां डबल इंजन की सरकार है। लेकिन पुलिस के लिए सीमा का मामला अभी भी था और इस चक्कर में तलाशी का काम दो घंटे देर से हुआ। आज के अखबारों में एनसीआऱ में बारिश से मौत के कई मामले हैं और जाहिर है इनसे बचाव के लिए कोई चेतावनी नहीं रही होगी। लेकिन उसके बिना क्या मौतें जायज हैं या सामान्य है जैसा रेल मंत्री कल संसद में रेल दुर्घटनाओं और 20 मौतों के बारे में कह रहे थे।
अगर केरल सरकार द्वारा चेतावनी पर कार्रवाई नहीं करना ही मुद्दा है तो आज हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में बादल फटने से तबाही की खबर है। अमर उजाला की खबर के अनुसार यहां 22 लोगों की मौत और 54 लोगों के लापता होने की खबर है। खबर के अनुसार एक दो नहीं, 445 सड़कें ठप हैं। अमर उजाला ने अपनी इसी खबर में हर तरफ बारिश का कहर शीर्षक के तहत बताया है कि दिल्ली से लेकर बिहार, झारखंड और राजस्थान में भी मौतें हुई हैं। नवोदय टाइम्स के अनुसार गुड़गांव में बारिश से चार लोगों को मौत हो गई। यहां करंट लगने से तीन लोगों की मृत्यु हुई है जबकि एक की जान बरसाती नाले में गिरने से गई है। खबर है कि फुटपाथ पर पेड़ के साथ बिजली की तार पर टूट कर जमीन पर आ गई। इसके संपर्क में आने से तीन कंपनी कर्मियों की मौत हो गई।
कंपनी कर्मी से ध्यान आया कि मेरे पिताजी टाटा की एक कंपनी में काम करते थे और मैं बचपन में कंपनी की टेल्को कॉलोनी में रहता था। 1965 के आस-पास बनी उस कॉलोनी में बिजली की तारें भूमिगत हैं और दिल्ली के मुकाबले बहुत ज्यादा बारिश होती है पर जब तक मैं वहां रहा कभी नहीं देखा कि बारिश के बाद कहीं पानी जमा हो। नालियां ऐसी कि हमलोग उनमें खेलते थे और यह आज से 50 साल पहले की स्थिति है जब तकनीक, मशीन, मोटर और पैसा इतना नहीं हुआ करता था। दूसरी ओर, हाल में दिल्ली की डिफेंस कॉलोनी में एक गेट के बाहर कार के दरवाजे पर खड़ा था तो ऊपर से कबूतर ने काम कर दिया। पता चला कि डिफेंस कॉलोनी में पिछले साल तक भूमिगत तारें नहीं थी और कबूतर तार पर बैठा था जिसकी मैंने उस घर के गेट पर कल्पना ही नहीं की थी।
हमारे प्रधानमंत्री कहते रहे हैं कि 70 साल कुछ नहीं हुआ पर 10 साल में डिफेंस कॉलोनी में भी बिजली की तारें भूमिगत नहीं हैं। गुड़गांव तो नया बसा देश की राजधानी का विस्तारित इलाका है। डबल इंजन वाला भी है और यहां यह हादसा हुआ। ठीक है किसी ने सतर्क नहीं किया था पर अभी भी इसकी जरूरत है? नवोदय टाइम्स में ही एक और डबल इंजन वाली राजधानी के बेसमेंट में पानी भरने से तीन लोगों की मौत हो गई। खबर के अनुसार, जयपुर में यह दिल्ली जैसा हादसा है और पुलिस तीन घंटे बाद पहुंची। तब तक बचाव का काम रुका रहा। बदले में सरकार ने परिवार को पांच लाख रुपये देने की घोषणा की है। लखनऊ में पानी भरी सड़क पर क्या हुआ वह आपने देखा ही होगा। इसकी खबर आज सिर्फ नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर है। यहां खबर और फोटो के साथ यह भी बताया गया है कि पुलिस उपायुक्त समेत तीन अफसरों को पद से हटा दिया गया है, चार निलंबित किये गये हैं। ठीक है कि मामला अपराध का है और पुलिस के खिलाफ कार्रवाई हुई है पर कोई भी कहेगा कि यह समस्या समाज की है और समाज अगर ऐसा हो जाये या करने लगे तो पुलिस रोक नहीं पायेगी। इस समस्या की जड़ कहीं और है और उसपर ध्यान देने की जरूरत है।
खबर है कि झारखंड में 18 विधायकों को अशोभनीय आचरण के लिए मार्शल की मदद से सदन से निकाल दिया गया। आप समझ सकते हैं कि पिछली लोकसभा में विपक्ष के सदस्यों को निलंबित कर कानून पास करवा लिये गये थे और झारखंड में भाजपा के विधायकों को मार्शल से निकलवाना पड़ रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने अपने जिस सहयोगी का वीडियो देखने की सिफारिश की है वे पहले मंच से गोली मारने का नारा लगवा चुके हैं। और अब कहा जा सकता है कि 10 साल में वाशिंग मशीन पार्टी के किसी सदस्य के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वैसे, आज के अखबारों की लीड आरक्षण से संबंधित सुप्रीम कोर्ट की खबर है। वायनाड का मामला है ही।
आरक्षण से संबंधित आज की खबर यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल पुराना अपना ही फैसला पलट दिया है। अमर उजाला की खबर के अनुसार अब राज्य यानी सरकार ज्यादा पिछड़ी जातियों की पहचान कर उन्हें आरक्षण में तरजीह दे सकेंगे। नवोदय टाइम्स लिखा है, राज्यों के पास है एससी, एसटी में उपवर्गीकरण की शक्तियां। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, मंडल के बाद यह एक नया मुकाम है। पत्रकार मित्र जितेन्द्र कुमार ने स्टीवेन लेविटस्की और डैनयल जिबलैट की किताब हाऊ डेमक्रेसीज डाई (लोकतंत्र कैसे मरते हैं) के हवाले से लिखा है, सुप्रीम कोर्ट ने कल एसससी / एसटी के आरक्षण में भी अंततः क्रिमीलेयर लगा ही दिया। अब एससी / एसटी भी सरकारी दफ्तर में दिखने बंद हो जाएंगे। इस किताब में लेखक ने लिखा है कि जब सरकार खुद मुश्किल फैसले नहीं ले पाती है उसे कोर्ट से दिला देती है। यह सरकारी फैसला है न कि कोर्ट का फैसला है!
राज्यपालों का सम्मेलन
इंडियन एक्सप्रेस में आज राज्यपालों के सम्मेलन पर एक अच्छी खबर है जो और किसी अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। इस खबर के अनुसार दिल्ली यानी केंद्र सरकार चाहती है कि जब राज्य व केंद्र में मतभेद हो तो राज भवन सक्रियता से काम करें। इस कांफ्रेंस की अध्यक्षता राष्ट्रपति करेंगी। कांप्रेंस के समक्ष केंद्र के जो सुझाव हैं उनमें से एक यह भी है। कहा जा सकता है कि कंग्रेस जब सत्ता में थी तो वह भी ऐसा करती थी पर मुद्दा यह है कि भाजपा उससे अलग या बेहतर कैसे है। अखबारों में इसका जाब नहीं मिलता है। राज्यपालों के जरिये शासन करने का मामला सिर्फ दिल्ली में नहीं है और यह इतना ज्यादा या बेशर्म है कि राज्यपालों ने कुर्सी तक छोड़ दी है। पंजाब के राज्यपाल का हाल का मामला आप जानते हैं जब इस्तीफे की खबर आई, नये राज्यपाल के नाम की घोषणा हो गई और फिर सब रुक गया। राज्यपाल महीनों पद पर बने रहे। जिन्हें राज्यपाल बनाने की घोषणा हुई थी उनकी ओर से कुछ सुनने में नहीं आया (संभावना है कि उन्होंने इनकार कर दिया होगा) और अब जब कई राज्यपालों के नामों की घोषणा हुई तो उनमें उनके इस्तीफे की खबर भी थी।
जहां तक राज्यपाल बनाने की बात है, झारखंड के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप थे, चुनाव हार गये उसके बाद भी उन्हें राज्यपाल बना दिया गया। बाद में खबर आई कि उनके बेटे ने राजभवन के कर्मचारी के साथ मार-पीट की पर फिर मामला शांत हो गया। राज्यपाल का पद संवैधानिक है और उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई नहीं कर सकती है। यह मामला तो सुप्रीम कोर्ट में है ही, पश्चिम बंगाल राजभवन की एक कर्मचारी ने इस संबंध में राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी है। और भी मामले हैं। आगे की खबर का इंतजार है। फिलहाल पीएमएलए के तहत दिल्ली के राज्यपाल के जरिये भाजपा दिल्ली पर राज कर रही है। आप जानते हैं कि देश में कानून की मूल भावना जब तक कोई व्यक्ति दोषी साबित न हो तब तक उसे निर्दोष मानने की है। इसलिए जमानत नियम है और हिरासत में रखना अपवाद। हालांकि इस नियम के अपवाद भी है। प्रमुख व्यक्तियों और वीआईपी को यूं ही जेल में नहीं रखा जा सकता है और इसलिए जो लोग लंबे समय तक जेल में हैं उनके मामले में मान लिया जाता है कि, ‘कुछ तो है’। पर ऐसा है नहीं। विरोधियों को बिना अपराध लंबे समय तक जेल में रखने के लिए उनपर मनी लांड्रिंग का मामला चलाया जाता है। इसमें कानून के इस बुनियादी नियम को उलट दिया गया है। पीएमएलए में निर्दोष साबित होने तक आरोपी को दोषी माना जाता है और इसलिए जमानत नहीं होती है। कानून यही है, ऐसा ही है।
पीएमएलए का सहारा
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट 2002 गैरकानूनी तरीके से कमाए गए धन पर रोक लगाना है। यह अधिनियम 1 जुलाई, 2005 से प्रभावी है। इसमें तीन बार संशोधन किया जा चुका है। 2012 में किए गए संशोधन के मुताबिक सभी फाइनेंशियल संस्थाओं, बैंकों, म्यूचुअल फंडों, बीमा कंपनियो और उनके वित्तीय मध्यस्थों पर भी पीएमएलए लागू होता है। 2019 में भी इस कानून में कुछ संशोधन के रूप में बदलाव किए गए थे। इसके मुताबिक ईडी द्वारा उन लोगों या संस्थाओं पर भी कार्रवाई की जा सकती है जिनका अपराध पीएमएलए के तहत न हो। कार्ति चिदंबरम ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर अगस्त 2022 में सुनवाई हुई थी। याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पी. चिदंबरम के 2012 में संसद में दिये बयान का भी हवाला दिया था। दिलचस्प है कि याचिकाकर्ता पी. चिदंबरम के बेटे और कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम थे। पी. चिदंबरम ने न सिर्फ पीएमएलए कानून को धारदार बनाया, बल्कि ईडी के मजबूत बनाने की भी नींव रखी।
फरवरी 2024 की एक खबर के अनुसार पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल ने कहा है कि पीएमएलए के प्रावधानों को स्वीकार करने का फैसला कानून के खिलाफ था और इसकी शीघ्र समीक्षा होनी चाहिये। हाल में इंडियन एक्सप्रेस में पी चिदंबरम का एक इंटरव्यू छपा था और इसमें एक सवाल पीएमएलए पर भी था – पीएमएलए मामले में जमानत में सख्ती की इस व्यवस्था में ज्यादातर तो यूपीए के कार्यकाल में लागू किया गया था। जवाब – पीएमएलए 2002 में पास हुआ था ….उस समय सत्ता में कौन था? तब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार थी जिसने कानून पास किया और इसे राष्ट्रपति की सहमति 17 जनवरी 2003 को मिली। उस समय प्रधानमंत्री कौन था? अटल बिहारी वाजपेयी। पर इसकी अधिसूचना तब जारी हुई जब आपकी सरकार सत्ता में आई 2004 में। फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स हमपर 2002-03 से दबाव डाल रहा था। यशवंत सिन्हा (एनडीए के वित्त मंत्री) और वाजपेयी 2004 तक सवाल से बचते रहे। और तब हम सत्ता में आये। एफएटीएफ ने हमें चेतावनी दी कि आप इस कानून को अधिसूचित नहीं करेंगे तो हम आपको अलग कर देंगे। तब हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। और हमलोगों ने दो महत्वपूर्ण संशोधन के बाद इसे एक जुलाई 2005 को अधिसूचित किया। आइये धारा 45 का इतिहास (भी) समझ लें …. इसके लिए हमलोगों ने 2005 में एक महत्वपूर्ण संशोधन किया पर इसे 2018 में फिर संशोधित किया गया। जज साब को ईनाम मिला है।


