शैलेश अवस्थी-
नीरज तिवारी….. एक धुनी संपादक
नीरज तिवारी जी कोई एक हफ्ते पहले ही कानपुर में अमर उजाला अख़बार के संपादक की कुर्सी पर बैठे हैं। इसके पहले वह बरेली और मुरादाबाद में अमर उजाला के स्थानीय संपादक रह चुके हैं। यानि तीन साल के भीतर ही तीन बड़ी यूनिट के संपादक बने।
यह एक रिकार्ड हो सकता है। नीरज की पत्रकारीय यात्रा दो दशकों से ज्यादा की है। वह पत्रिका और अन्य अख़बारों से होते हुए मेरठ अमर उजाला पहुंचे और इसके बाद कानपुर आए। वह यहां डेस्क और सिटी रिपिर्टिंग टीम के इंचार्ज रहे।
अपने काम, समर्पण, समझ, मृदुभाषिता और टीम भावना के कारण तब के कानपुर में स्थानीय संपादक विजय त्रिपाठी जी और समूह संपादक सहित अमर उजाला के शीर्ष प्रबंधन के प्रिय हो गए। फिर उन्हें संपादक के लिए तैयार किया जाने लगा।
इस कड़ी में कानपुर रहे प्रदीप अवस्थी और संतोष सिंह भी थे। इन सभी को अमर उजाला नोएडा में कड़े प्रशिक्षण से गुजरना पड़ा और ये संपादक के मानकों पर खरे उतरे। इन सबके बीच नीरज तिवारी जी को सबसे पहले मुरादाबाद का संपादक बनाया गया और कुछ दिन बाद ही बरेली जैसी बड़ी महत्वपूर्ण जगह भेजा गया। वहां कोई दो साल शानदार काम किया तो उन्हें उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े, संवेदनशील और महत्वपूर्ण जिले कानपुर में संपादक बना दिया गया।
अब वह यहां काम संभाल चुके हैं। यह शहर उनके लिए पहले से जाना पहचाना है। वह किसी पर हावी नहीं होते, हां काम के मामले में कड़क और कोई समझौता नहीं। बेहद गंभीर, सरल, सहज नीरज जी ईमानदारी से पूरा समय देते हैं, टीम का उत्साह बढ़ाते हैं, खुश रहते और टीम को खुश रखते हैं।
वह सिखाते, समझाते और साथियों को आगे बढ़ने के लिए हौसला भी बढ़ाते हैं और हर दम प्रबंधन की प्राथमिकताओं पर फोकस रखते हैं।
मेरा मानना है पत्रकारों को अगर तरक्की करनी है नीरज जी की तरह हमेशा अपने को अपडेट रक्खें, शहर से बाहर कहीं भी जाने को तैयार रक्खें। कमफर्ट जोन से बाहर निकलें और तरक्की के मानक गढ़ते रहें। मेरा अनुभव और कई प्रमाण बताते हैं कि एक जगह रहने से आप बने तो रहेंगे, लेकिन संपादक की कुर्सी मिल जाए, यह बेहद कठिन है।
मेरा नीरज जी से सान्निध्य तब रहा, जब मैं अमर उजाला में रोमिंग स्पेशल कोरस्पाडेंट था। आज नीरज जी का जन्मदिन है तो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ लिखने का मन हुआ…. उन्हें बहुत बधाई, शुभकामनाएं।


