
संजय कुमार सिंह
नीट का मामला निपट नहीं रहा है। परीक्षा रद्द नहीं हुई पर आज की एक खबर (द हिन्दू के शीर्षक के अनुसार), सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा है कि नीट-यूजी को तय समय सीमा में दुरुस्त करे। नीट की व्यवस्था सरकार ने की है। उसमें ढेरों खामियां हैं पर सरकार उसका बचाव करती रही है और अब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है। इलेक्टोरल बांड की गड़बड़ियां जग जाहिर हैं पर कानूनन उसकी जांच कराने की जरूरत नहीं है और सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था है तो यह बड़ी खबर है लेकिन गैर सरकारी संस्थाओं की जांच में पता चला कि चुनाव में जितने वोट पड़े उससे ज्यादा या कम गिने गए हैं और ऐसा कई सीटों पर हुआ है तथा ऐसा नहीं होता तो यहां भाजपा हार भी सकती थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह गंभीर मामला है लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में यह खबर नहीं है। इस तथ्य के बावजूद नहीं है कि प्रधानमंत्री ने चुनाव नतीजों के बाद पूछा था, … ईवीएम जिन्दा है कि मर गया। कहने कि जरूरत नहीं है कि ईवीएम की गड़बड़ी की खबरों को मार कर ईवीएम से संबंधित संदेह को छिपाया जा रहा है जबकि नीट का मामला निपट नहीं रहा है।
आजकल अखबारों में सरकार के काम-काज, प्रशासनिक लापरवाही और मनमानी की कई खबरें रहती हैं। आप जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम हुई और एनडीए के सहयोगी दलों के समर्थन से सरकार चल रही है और नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं। इससे पहले के 10 वर्षों में तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर अपने लोगों को बैठाकर सबकी साख खराब करने का काम किया है और अब मतगणना पर शक मुद्दा नहीं है। नीट की परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक होना मुद्दा बना हुआ है। कई मामलों में जजों को पुरस्कार देकर उनके फैसलों को संदिग्ध बना दिया गया है। रिटायर जजों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट देना आगे के लिए भी गड़बड़ है लेकिन ये सब मुद्दा नहीं है। वह भी तब जब सहयोगी दलों के समर्थन वाली सरकार के बारे में माना गया था कि वह कमजोर होगी और मनमानी नहीं करेगी। पर उसमें भी कमी आई नहीं दिखती है। इसके कई उदाहरण हैं और यहां उसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। आज मैं दो खबरों की चर्चा करूंगा। इनमें एक, मतगणना में गड़बड़ी की शंका की चर्चा हो गई जो कई दिनों से पहले पन्ने पर नहीं है।
दूसरी खबर आज सिर्फ नवोदय टाइम्स में प्रमुखता से है। पहली खबर मतगणना में गड़बड़ी की खबरों पर केंद्रीय चुनाव आयोग (केंचुआ) के सांस भी न लेने से संबंधित है तो दूसरी नई, अल्पमत वाली सरकार उसकी कार्यशैली से संबंधित है। मतगणना से संबंधित केंद्रीय चुनाव आयोग के सार्वजनिक आंकड़ों का अघ्ययन करके कुछ संस्थानों ने जो रिपोर्ट जारी की है और उसके आधार पर जो प्रश्न किये हैं उसका जवाब नहीं आया है। ना सवाल खबर है और ना जवाब नहीं आना। कहने की जरूरत नहीं है कि इस तरह के अध्ययन के लिए पैसे चाहिये होते हैं और सरकार ऐसा अध्ययन नहीं करवाती है। पिछली बार एक निजी विश्वविद्यालय ने कराया था उसे कस दिया गया और मामला खत्म हो गया। दूसरी ओर, ऐसी संस्थाओं को पैसे अक्सर दान और चंदे से प्राप्त होते हैं। समाज सेवा के ऐसे काम के लिए लोग दान देते हैं, लेने का सरकारी प्रावधान भी है। लेकिन मोदी सरकार अपने खिलाफ काम करने वालों और उनकी संस्थाओं का आर्थिक रूप से पंगु बनाने का काम करती रही है।

इसके कई उदाहरण हैं और हर क्षेत्र में हैं। अगर चंदा देने वाले देसी हुए तो उनपर वैसे भी दबाव डाला जा सकता है और विदेशी चंदे से काम करने वालों के बारे में देश विरोधी होने से लेकर सरकार को अस्थिर करने की कोशिशों जैसे आरोप लगते हैं। उन्हें बदनाम किया जाता है। ऐसे में आशंका यह भी है कि सरकार के खिलाफ इस तरह के काम अब ज्यादा समय तक नहीं चलते रह सकते हैं। दूसरी ओर सरकारी एजेंसियों की निष्पक्षता संदिग्ध है। ऐसे में अगर निर्वाचित सरकार बेईमानी से सत्ता में बनी हुई है तो सबसे पहले समर्थन देने वालों को सोचना चाहिये। जनता को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि सम्मान देकर से दिल खुश किया गया है और सरकार को ऐसे लोगों का भी समर्थन है। ये समर्थक अपनी कीमत वसूल सकते हैं और वसूलेंगे। इन सबके साथ यह जोड़ दीजिये कि 79 सीटों पर भाजपा की जीत संदिग्ध मानी जा रही है। चुनाव आयोग जवाब क्यों नहीं दे रहा है या जवाब देने की तैयारी में इतना समय क्यों लगा रहा है?
अब आइये कार्यशैली वाली खबर पर। इसके अनुसार, राहुल गांधी ने कहा है कि उनके खिलाफ ईडी की छापेमारी की तैयारी है तो सरकार के नये बने समर्थक, बिहार के नेता लल्लन सिंह नये भक्त हैं। इनने कहा है कि जो गलत नहीं किया है उसे कुछ क्यों होगा। मुझे नहीं लगता है कि लल्लन सिंह को ऐसा कहने की जरूरत थी या उन्हें इसका जवाब पता नहीं है। लल्लन सिंह ने बहुत भोला सवाल किया है और मुमकिन है दूसरों को भी ऐसा ही लगे। पर मुद्दा यह है कि नेशनल हेरल्ड मामले में क्या हुआ या क्यों नहीं हो रहा है। पूछताछ परेशान करना नहीं है? और मामला तो रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ भी था जो 2014 से पहले बनाया गया था और पिछले 10 साल के दौरान हर चुनाव से पहले याद आ जाता था। यही नहीं, मामला तो पी चिदंबरम के खिलाफ भी था वे जेल रह आये। कितने साल हो गये? पर मामला किस हाल में है? और मामला तो तेजस्वी के खिलाफ भी था जिसे मुद्दा बनाकर नीतिश कुमार ने सरकार गिराई थी। क्या हुआ?
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अरविन्द केजरीवाल के दो मामलों के बाद यह सवाल पूछने का कोई मतलब नहीं है। वैसे भी, भाजपा को अब अगर वाशिंग मशीन पार्टी कहा जा रहा है तो उदाहरण की कमी नहीं है। कल मैंने लिखा था कि अरविन्द केजरीवाल को पीएमएलए के तहत बंद रखकर सरकार एलजी यानी उपराज्यपाल के जरिये दिल्ली पर राज कर रही है। एलजी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला है और उनके नियंत्रण में कोचिंग इंस्टीट्यूट हादसे की जांच अदालत ने सीबीआई को सौंप दी। सीबीआई की कहानी अलग है और जांच क्या होगी वह बाद की बात है पर अभी तक की जांच पर अदालत ने जो टिप्पणी की है वह सरकार की कार्यशैली बताता है और सब जानते हुए लल्लन सिंह की पार्टी उसका समर्थन कर रही है और नंबर बढ़वाने के लिए वे ईडी के दुरुपयोग के पक्ष में बोल रहे हैं। आज के अखबारों की कुछ प्रमुख खबरें और शीर्षक से पता चलता है कि सरकार कैसे काम कर रही है पर समर्थकों और सहयोगियों को इससे मतलब नहीं है। वह भी तब जब लल्लन सिंह को हमने भाजपा और केंद्र सरकार ही नहीं नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ बोलते भी देखा सुना है। अब पैकेज मिलने से उन्हें राजनीतिक लाभ हो सकता है और यह उनकी राजनीति हो सकती है पर केंद्र सरकार का काम तो आज की खबरों से भी पता चल रहा है।
1. प्रधानमंत्री ने राज्यपालों से कहा, केंद्र और राज्य के बीच सेतु का काम करें; राष्ट्रपति ने कहा, गरीबों को प्राथमिकता दें। (इंडियन एक्सप्रेस) कल का फॉलो अप है पर किसी और अखबार में नहीं।
2. कोचिंग हादसे की जांच सीबीआई को
3. परियोजना शुरू होते ही क्यों दायर होती है पीआईएल – सुप्रीम कोर्ट को हैरानी
4. सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बांड की जांच की मांग करने वाली याचिकाएं खारिज कीं
5. वैश्विक बिकवाली के दबाव में गिरा बाजार
6. आठ हाईस्पीड रोड कॉरीडोर के लिए 50,655 करोड़ की सहमति
7. केंद्र ने इजराइली संस्थाओं की सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना (पेगासस की याद)
8. इजराइल में भारतीयों को सुरक्षा सलाह
9. एनटीए ने गलतियां की लेकिन बड़े पैमाने पर चोरी नहीं हुई : सुप्रीम कोर्ट (द टेलीग्राफ)
10. सुप्रीम कोर्ट ने एनटीए की खिंचाई की, परीक्षा की गड़बड़ी ठीक करने के लिए कहा
11. नीट, एनटीए को खत्म करने के लिए निजी प्रस्ताव पर संसद में जोरदार बहस (हिन्दुस्तान टाइम्स)
12. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि नीट-यूजी को तय समय सीमा में दुरुस्त करे।
13. वायनाड को आखिरकार ग्रीन प्रोटेक्शन मिल सकता है
14.फैक्ट्री का हिस्सा गिरा, महिला समेत तीन की मौत, चार घायल (नवोदय टाइम्स, दिल्ली की खबर है)
15. वायनाड पर अमित शाह के बयान पर कांग्रेस ने विशेषाधिकार प्रस्ताव रखा
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार के सही-गलत हर तरह के कामों का समर्थन और उसके बदले में बिहार के लिए केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता लेने का मामला तो अब स्पष्ट है ही। केंद्र सरकार ने अपने खिलाफ काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों को किस तरह पंगु बनाया है यह भी जानने-समझने की बात है। इंडियन एक्सप्रेस की 5 दिसंबर 2019 की एक खबर के अनुसार गृहमंत्रालय ने संसद में जानकारी दी थी कि पांच साल में (2014 के बाद से) 14500 एनजीओ के पंजीकरण रद्द किये गये हैं। विदेशी संस्थाओं से चंदा लेने के लिए यह लाइसेंस जरूरी है। इसे फॉरेन कांट्रीब्यूशन रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 2020 कहा जाता है। लाइव मिन्ट ने 30 सितंबर 2020 को एनजीओ के खिलाफ कार्रवाई को चार चार्ट के जरिये समझाया था। इसमें कहा गया था, भारतीय गैर सरकारी संगठनों को विदेशी अनुदान का नियमन करने वाले कानून में नवीनतम संशोधन अनुपालन लागत बढ़ाने के हाल के हालिया पैटर्न को जारी रखते हैं। केंद्र का कहना है कि बदलावों का उद्देश्य एनजीओ क्षेत्र के लिए प्रमुख, फंडिंग के स्रोत में “अनुपालन तंत्र को मजबूत करना, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना” है। नागरिक समाज का कहना है कि नए नियम गलत धारणा वाले हैं और कामकाज में कठिनाई बढ़ा रहे हैं या अनुपालन मुश्किल है।
यह स्थिति तब है जब डेवेक्स डॉट कॉम की 13 जनवरी 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि 2011 के बाद से 20675 एनजीओ के एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिये गये थे। ये लाइसेंस अधिनियम के कथित उल्लंघन के लिए रद्द किये गये हैं पर उल्लंघन का विवरण नहीं है। द वायर की 4 अप्रैल 2024 की खबर के अनुसार, सरकार ने जिन प्रमुख गैर सरकारी संस्थाओं के लाइसेंस रद्द किये हैं उनमें सीएनआई साइनोडिकल बोर्ड ऑफ सोशल सर्विस, वालंट्री हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया, इंडो ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी, चर्च ऑक्जीलरी फॉर सोशल ऐक्शन और ईवैनजेलिकल फेलोशिप ऑफ इंडिया (ईएफआई) शामिल हैं। इनपर धर्मांतरण का भी आरोप है लेकिन इनमें से एक ईएफआई भारत में ईसाइयों पर हमले का विवरण इकट्ठा करता है और उसका विवरण प्रकाशित करता है। ईएफआई ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में इसाइयों के खिलाफ हिंसा के मामलों में भारी वृद्धि की रिपोर्ट की है। वालंट्री हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया 27 राज्यों में काम करने वाले स्वैच्छिक स्वास्थ्य संगठनों का फेडरेशन है जो देश भर के 4500 स्वास्थ्य और विकास संस्थानों से जुड़ा हुआ है।
आप समझ सकते हैं कि इस विवरण (और संबंधित कार्रवाई के बिना) सिर्फ लाइसेंस रद्द करने (और पहले देने) का क्या मतलब हो सकता है। इसके विस्तार में जाने के लिए पैसे चाहिये यह मीडिया संस्थानों का काम है। उन्हें निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रों से विज्ञापन मिल रहे हैं पर काम कोई नहीं कर रहा है। और तो और खबर भी नहीं के बराबर छपती है। इन गैर सरकारी संस्थाओं को विदेशी चंदे के रूप में हजारों करोड़ रुपये मिलते थे और इनसे हजारों लोगों की रोजी-रोटी चलती थी। देश में रोजगार की कमी का एक कारण यह भी है कि स्वरोजगार और काम दे सकतने वाली इन गैर सरकारी संस्थाओं को जानबूझकर योजनाबद्ध ढंग से बंद कराया गया है और सरकार को जब पता चला कि इन कारणों से वह चुनाव हार सकती है (ईवीएम के मामलों के बावजूद) तो प्रधानमंत्री ने जो मंदिर, मस्जिद, मुसलमान, मांस-मछली और मुजरा किया उसे चुनाव आयोग को छोड़कर सबने देखा है। इस तरह, भाजपा ने जो किया है उसी सबसे घिरी हुई है उससे किसी अच्छे काम की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वह सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी करेगी और वही कर रही है जो जरूरी है। हेडलाइन मैनेजमेंट इस सरकार की बुनियादी जरूरत है।


