काठमांडू। नेपाल का मीडिया उद्योग इन दिनों अभूतपूर्व आर्थिक और संस्थागत संकट से जूझ रहा है। जिसे कभी लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाता था, वही मीडिया आज वित्तीय तंगी, कमजोर प्रबंधन और सरकारी नीतियों के दबाव में संघर्ष कर रहा है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई मीडिया संस्थानों में पत्रकार महीनों से बिना वेतन काम करने को मजबूर हैं।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस संकट की भयावह तस्वीर तब सामने आई जब पत्रकार सुरेश रजक की मौत ने पूरे सिस्टम की हकीकत उजागर कर दी। पिछले साल 28 मार्च को ड्यूटी के दौरान उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन बाद में पता चला कि उन्हें करीब 10 महीनों से वेतन नहीं मिला था। उनकी मौत के बाद ही बकाया भुगतान किया गया, जिसने मीडिया इंडस्ट्री की अंदरूनी सच्चाई को सार्वजनिक कर दिया।
बड़े मीडिया संस्थान भी संकट में
नेपाल में केवल छोटे या नए मीडिया स्टार्टअप ही नहीं, बल्कि स्थापित संस्थान भी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
- उकालो (Ukaalo): खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित इस प्लेटफॉर्म के पत्रकार कई महीनों से बिना वेतन काम कर रहे हैं। हालात बिगड़ने पर 10 से ज्यादा कर्मचारी इस्तीफा दे चुके हैं।
- नेपाल रिपब्लिक मीडिया (Nagarik): देश की पहली पब्लिक लिस्टेड मीडिया कंपनी होने के बावजूद यहां करीब 6 महीने का वेतन बकाया है।
- कान्तिपुर मीडिया ग्रुप: नेपाल के सबसे बड़े मीडिया हाउस में भी भुगतान में देरी आम हो गई है, जबकि पिछले एक दशक में इसके राजस्व में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
- अन्नपूर्णा पोस्ट और राजधानी डेली: पारिवारिक विवाद और वित्तीय संकट के चलते यहां 5 से 12 महीने तक वेतन अटका हुआ है।
वैश्विक दबाव के साथ स्थानीय समस्याएं
नेपाल का मीडिया संकट केवल वैश्विक डिजिटल बदलाव का असर नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी कई समस्याएं इसे और गहरा बना रही हैं। गूगल और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने विज्ञापन बाजार पर कब्जा कर लिया है, वहीं नेपाल में श्रम कानूनों का सही पालन न होना और पत्रकारों के लिए सुरक्षा तंत्र का अभाव स्थिति को और खराब कर रहा है।
फेडरेशन ऑफ नेपाली जर्नलिस्ट्स के आंकड़ों के मुताबिक, पेशेवर असुरक्षा से जुड़े मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, हालांकि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा मानी जा रही है क्योंकि कई पत्रकार शिकायत करने से बचते हैं।
सरकारी फैसले ने बढ़ाई चिंता
हाल ही में नेपाल सरकार के एक फैसले ने निजी मीडिया की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सरकार ने निर्देश दिया है कि सभी सरकारी विज्ञापन अब केवल सरकारी मीडिया संस्थानों को दिए जाएंगे।
नेपाल में हजारों पंजीकृत मीडिया आउटलेट्स के लिए सरकारी विज्ञापन आय का बड़ा स्रोत रहे हैं। ऐसे में इस फैसले को स्वतंत्र मीडिया के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
डिजिटल बदलाव और नौकरी का संकट
मीडिया संस्थान अब डिजिटल मॉडल की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं और लागत कम करने के लिए न्यूज़रूम छोटा किया जा रहा है। इसका सीधा असर उन पत्रकारों पर पड़ रहा है जो लंबे समय से पारंपरिक पत्रकारिता में काम कर रहे हैं और तकनीकी बदलाव के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे।
न्याय की प्रक्रिया भी कठिन
वेतन न मिलने की स्थिति में कानूनी रास्ता अपनाना भी आसान नहीं है। शिकायतों को लेकर लंबी प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया के कारण पत्रकारों को समय पर राहत नहीं मिल पाती, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और खराब हो जाती है।
कुछ संस्थान बने उदाहरण
इन चुनौतियों के बीच कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे ‘सेतोपाटी’, ‘बाह्रखरी’ और ‘ऑनलाइनखबर’ नियमित वेतन भुगतान के मामले में बेहतर उदाहरण पेश कर रहे हैं। इन संस्थानों का मानना है कि यदि कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया जा सकता, तो संस्थान चलाने का कोई औचित्य नहीं है।
भविष्य पर सवाल
नेपाल के पत्रकार आज एक कठिन मोड़ पर खड़े हैं। एक ओर पेशे के प्रति उनका समर्पण है, तो दूसरी ओर आर्थिक असुरक्षा की कठोर सच्चाई।
यदि हालात में सुधार नहीं हुआ, तो खोजी पत्रकारिता कमजोर पड़ सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है।


