रंगनाथ सिंह-
नेपाल में माओवाद की उम्र चीन के ओरिजनल माओ-वाद से भी छोटी साबित हुई। दो दशक पहले युवाओं को बरगलाने वाली पीढ़ी ताजा विद्रोह/उपद्रव के बाद नए सुर में गाल बजा रही है मगर महज दो दशक पहले के उनके लेख और विश्लेषण देखे जाएँ तो पता चलेगा कि जनता को बेवकूफ बनाने वाली बातें बोलकर ही कुछ लोग तब से अब तक बुद्धिजीवी बने घूम रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो कम्युनिस्ट मॉडल की उम्र राजशाही से भी छोटी और निष्प्रभावी साबित हुई है। तोते की तरह रटे हुए कम्युनिस्ट जॉर्गन दुहराने से ऐतिहासिक परिघटनाओं का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। खासकर तब जब ताजा विद्रोह के विश्लेषण के लिए जरूरी जानकारियों का सख्त अभाव है। कुछ रैण्डम इवेंट के डॉट को जोड़कर टेढ़ी-मेढ़ी आकृति बना लेना एक बात है और ठोस गहन जानकारी आधारित विश्लेषण दूसरी बात है। यही कारण है कि इस विद्रोह के उभार के कारण पर बात करने मेरे लिए सिलेबस से बाहर की चीज है मगर यह साफ है कि 2005-06 में हुई माओवादी क्रान्ति का क्लाइमेक्स हो चुका है।
नेपाल के ताजा घटनाक्रम से साफ है कि नेपाली माओवादी पार्टी जितने समय तक अंडरग्राउण्ड रही थी, उतने समय तक भी जनता ने उन्हें ओवर-ग्राउण्ड बर्दाश्त नहीं किया। नेपाली माओवादी क्रान्ति हमारी पीढ़ी के सामने घटित पहली और आखिरी क्रान्ति थी। या यूँ कह लें कि जिसे हमने क्रान्ति माना था। अब मैं खुद उसे एक तख्तापलट से ज्यादा नहीं मान सकता। नेपाली क्रान्ति लम्बे खूनी संघर्ष से जो हासिल किया वही सत्ता-परिवर्तन अन्ना आन्दोलन ने जनउभार से हासिल कर लिया था।
नेपाल में जो हुआ है, उसका टेम्पलेट अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के अतिप्रयुक्त रिजीम-चेंज टेम्पलेट से इतना ज्यादा मिलता है कि इस प्रदर्शन को लेकर मेरे अन्दर कोई उत्साह नहीं है। जिस तरह भारत के युवाओं के अन्दर एकत्रित भ्रष्टाचार के प्रति गहरी नाराजगी दिल्ली में सरकार परिवर्तन के काम आयी थी, उसी तरह नेपाल में भी यह नाराजगी सत्ता परिवर्तन कराकर अपनी आयु पूरी कर लेगी।
नेपाल के कई नौजवान सचमुच ही भ्रष्टाचार से नाराज होकर सड़क पर उतरे होंगे और उनमें से कुछ की जान भी गयी होगी मगर ऐसे सच्चे सहजविश्वासी लोग सत्ता-परिवर्तन की योजनाओं के लिए कैनन-फॉडर (मछली का चारा) साबित होते हैं। ऐसे ज्यादातर उभार का लाभ वही लोग लेते हैं जो होते तो कमजोर हैं मगर उनके अन्दर सत्ता की गहरी भूख होती है। ऐसे लोग अपनी सत्ता की भूख पर अति-आदर्शवाद का लबादा डालकर भोले लोगों को छलते हैं।
नेपाली कांग्रेस भी नेपाल में सत्ता में साझीदार थी मगर वह माओवाद की तरह ऐसी किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व नहीं करती जो समाज को आमूलचूल बदलने का ऐतिहासिक दावा करती हो। भारत में भी माओ-वाद के नाम पर हजारों लोगों की जान जा चुकी है और उनके तरफदार दिल्ली के सेफ-हेवेन में बुद्धिजीवी बने घूमते हैं क्योंकि उन्हें इसकी कीमत नहीं चुकानी पड़ती है। इसलिए अब मैं लोकतंत्र के मॉडल को ऐसे किसी भी कथित रेडिकल मॉडल से बेहतर मानता हूँ।
नेपाल के ताजा विद्रोह में भ्रष्टाचार के प्रति गुस्सा केन्द्रीय भूमिका में है। अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहूँगा कि कोई भी भौतिकवादी दर्शन भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं दिला सकता क्योंकि आदर्श-वाद मूलतः एक भाववादी विचार है। आधुनिक व्यवस्था में टेक्नोलॉजी ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा फिल्टर साबित हो रही है। विचारधारा भ्रष्टाचार रोकने में विफल साबित हुई है। ऐसे में डेमोक्रेसी में नए-नए फिल्टर बनाकर हम भारी खूनखराबे के बिना भी संरचनात्मक सुधार करा सकते हैं।
यदि आपको राजनीतिक मॉडल के बजाय सार्वभौमक भ्रष्टाचार की ज्यादा चिन्ता है तो कृपया इस पर विचार करें कि एक व्यक्ति को ‘चरित्रवान’ कैसे बनाया जा सकता है! इन-थियरी और इन-प्रैक्टिस के बीच के गैप में दुनिया के सारे विमर्श तैर रहे हैं। अकूत सम्पत्ति के केन्द्र में बैठे व्यक्ति को ईमानदार बनाए रखने के तरीकों पर आप विचार कीजिए। अगर कोई उत्तर मिले तो मुझे भी सूचित कीजिए।
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