प्रकाश के रे-
जेन ज़ी पहली पीढ़ी बन गई है, जो पिछली पीढ़ी यानी मिलेनियल्स से कम बुद्धिमान है. ऐसा विशेषकर यूरोप और अमेरिका में हो रहा है. अगर भारत समेत अन्य देशों में भी बच्चों को इंसान के बच्चों की तरह नहीं, बल्कि खरगोश के बच्चों की तरह पाला जाता रहेगा और उन्हें मोबाइल में क़ैद रखा जाएगा, तो यही हाल होगा, हो ही रहा है.
प्रदीप चौधरी-
न्यूरोसाइंस की कुछ हालिया रिसर्च यह कह रही है कि मानव सभ्यता के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि अगली पीढ़ी, पिछली पीढ़ी की तुलना में औसतन कम बुद्धिमान पाई जा रही है। यह निष्कर्ष खास तौर पर Gen G या Z को लेकर निकाला जा रहा है, मोटे तौर पर वह पीढ़ी जो 1998–99 से 2010 के बीच पैदा हुई।
अगर हम इसके कारणों पर ईमानदारी से सोचें, तो बात केवल मोबाइल या स्क्रीन तक सीमित नहीं रहती। शारीरिक श्रम और खेलकूद लगभग जीवन से बाहर हो चुके हैं। परिवार के भीतर रोजमर्रा की बातचीत, वह सहज बहस, वह सवाल-जवाब, वह साथ बैठकर समय बिताना, सब कम होता चला गया। खान-पान में तेज और गहरे बदलाव आए, जिनका असर केवल शरीर पर नहीं, मस्तिष्क के विकास पर भी पड़ा।
लेकिन इन सबके बीच एक कारण है, जिस पर अक्सर बात करने से हम कतराते हैं। शिक्षा व्यवस्था को धीरे-धीरे खोखला करने में नंबर आधारित मूल्यांकन प्रणाली की बड़ी भूमिका रही है। शिक्षा का उद्देश्य समझ विकसित करना नहीं रहा, बल्कि एग्जाम पास करना बन गया। और उससे नौकरी पाना।
आज मैंने न्यूज़ में प्रधानमंत्री जी को परीक्षा पर चर्चा के दौरान कहते सुना कि शिक्षा और रोजगार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मैं इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। रोजगार ज़रूरी है, इसमें कोई शक नहीं। पेट खाली हो तो दर्शन भी नहीं चलते। लेकिन शिक्षा का मतलब केवल नौकरी की तैयारी कभी नहीं रहा।
भारतीय दर्शनों में शिक्षा का अर्थ था समझ पैदा करना। विवेक जगाना। आदमी को इतना सक्षम बनाना कि वह जीवन की उलझनों से जूझ सके। विद्या का लक्ष्य मनुष्य बनाना था, कर्मचारी नहीं। रोजगार शिक्षा का परिणाम हो सकता है, उद्देश्य नहीं।
जीवन की रोजमर्रा की चुनौतियाँ, जिनसे जूझकर दिमाग परिपक्व होता है, उन्हें या तो किताबों से हटा दिया गया या इतना सरल कर दिया गया कि सोचने की ज़रूरत ही न पड़े।
जो कभी जानकारी खोजने, जोड़ने, तौलने और समाधान निकालने की जद्दोजहद थी, वह काम मोबाइल ने अपने हाथ में ले लिया। समस्या आए तो दिमाग खपाने की जगह उँगली चलने लगी। धीरे-धीरे ब्रेन स्टॉर्मिंग, स्मृति और विश्लेषण की क्षमता कमजोर होती गई। इसी को आज ‘गूगल सिंड्रोम’ कहा जा रहा है, एक ऐसी महामारी जो चुपचाप सोचने की आदत को खा रही है।
यह पीढ़ी आलसी या अयोग्य नहीं है। समस्या यह है कि हमने उनके दिमाग को इस्तेमाल में ही नहीं आने दिया। और जो अंग इस्तेमाल में नहीं आता, वह स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ जाता है।
मैं ख़ुद इसका शिकार हूँ,एक समय लंबे लंबे कैलकुलेशन मन में कर लेता था,अब छोटे छोटे जोड़ के लिए कैलकुलेटर उठा लेता हूँ । यह मेरे साथ है,जबकि मैंने बचपन से कैलकुलेटर और मोबाइल नहीं प्रयोग किया था,तो जिन्होंने बचपन से किया उनका क्या होगा यह तो सोचने का विषय है।
अब अगर कुछ बदलना है, तो बच्चों को फिर से उलझने देना होगा। हर सवाल का जवाब नहीं देना होगा। शारीरिक काम, खेल, घर के काम, ये सब फिर से जीवन का हिस्सा बनाने होंगे। मोबाइल को औज़ार की तरह इस्तेमाल करना होगा, सहारा नहीं।
.और सबसे ज़रूरी बात, शिक्षा को फिर से जीवन से जोड़ना होगा, सिर्फ रोजगार से नहीं। पहले सोचने वाला इंसान बने, नौकरी बाद में भी हो जाएगी। वरना बहुत पढ़े-लिखे, बहुत नंबर लाने वाले, लेकिन भीतर से खोखले लोग तैयार होते रहेंगे।


