राफेल सौदे को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री फ्रांस्वा ओलांद के पुराने खुलासे ने मोदी सरकार की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है। 2015 के राफेल सौदे में ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट अनिल अंबानी की कंपनी को दिए जाने और अब 3 लाख करोड़ रुपये के नए राफेल सौदे की तैयारी के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या रक्षा सौदों में निजी उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने का सिलसिला दोहराया जाएगा।
प्रशांत भूषण-
मोदी सरकार जब राफेल जेट्स की खरीद के लिए 3 लाख करोड़ रुपये के नए कॉन्ट्रैक्ट की तैयारी कर रही है, तब 2015 के 60 हजार करोड़ रुपये के राफेल सौदे को याद करना ज़रूरी है, जिसमें 50 प्रतिशत ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट दिवालिया अनिल अंबानी की नवगठित रिलायंस डिफेंस कंपनी को दिए गए थे।
अब सवाल यह है कि क्या इस बार अडानी को चुना जाएगा?
संदीप खासा-
“राफेल डील में अनिल अंबानी को मोदी सरकार ने चुना था, हमारे पास कोई विकल्प नहीं था”
— फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री फ्रांस्वा ओलांद
बीजेपी ने एक सरकार-से-सरकार डील में एक प्राइवेट कारोबारी के लिए ब्रोकर की भूमिका क्यों निभाई?
द सोशल साइंटिस्ट नामक हेंडल का ट्वीट-
केंद्र सरकार ने सवा 3 लाख करोड़ में राफेल फाइटर जेट की जो डील की है, वह पूरी तरह से नरेंद्र मोदी के ‘राष्ट्रवादी’ और नेशनल सेक्योरिटी वाले प्रोफ़ाइल पर काला धब्बा स्थापित कर देगा।
आप 2014 से सत्ता में हैं और शेखी बघारने के नाम पर नेशनल सेक्योरिटी ही आपका सबसे महत्वपूर्ण पार्ट है तो फिर 2026 में राफेल को किस एंगल से जस्टिफाई किया जा सकता है?
कुछ वर्षों में जब पाकिस्तान जैसा पंगु देश 5th जेनेरेशन फाइटर जेट उतारेगा, चीन और अमेरिका 6th जेनेरेशन जेट लेकर आएंगे तो प्रत्युत्तर में हमारे पास वो राफेल जेट होगा जिसकी उपयोगिता ही संदेह के घेरे में आ गयी है। ऑपरेशन सिंदूर के समय राफेल ने कैसा परफॉर्म किया है, इसपर बहस की गुंजाईश है लेकिन वह निर्णायक और उतना बेहतर तो सिद्ध नहीं हुआ जितना उसका हाइप बनाया गया था।
आपके पास 11 साल थे लेकिन आपने स्कवैड्रन स्ट्रेंथ कम होने दी, उसपर कॉंग्रेसियों से भी बदतर तरीके से सोते रहे और अब यकायक इतिहास की सबसे बड़ी डिफेन्स डील करके आप अपनी नाकामी नहीं छुपा रहे तो भला और क्या कर रहे हैं?
इसका जवाब यह तो नहीं हो सकता कि विकल्प क्या है? राफेल के सामने F-35 और SU-57 के साथ जुड़ी समस्या दिखाकर आप वही कर रहे हैं जो राजनीति में आपकी आईटी सेल करती है कि ‘मोदी नहीं तो कौन”
विपक्ष अगर सीरियस और जिम्मेदार है तो इस मुद्दे पर सरकार की बखिया उधेड़ सकता है और उसे करना भी चाहिए। हर जिम्मेदार नागरिक को सरकार से पूछना चाहिए कि वो 11 सालों से क्या कर रही थी।


