नीरेंद्र नागर-
सॉरी अमृत!
किसी अख़बार या वेबसाइट का संपादक रहते हुए अपनी टीम चुनना बहुत ज़िम्मेदारी का काम होता है। नवभारत टाइम्स ऑनलाइन का संपादक होते हुए मैंने क़रीब 11 साल तक यह काम किया और कह सकता हूँ कि बहुत ईमानदारी के साथ किया। बिना किसी सिफ़ारिश के, केवल प्रतिभा के बल पर अपनी छोटी-सी टीम बनाई। लेफ़्टिस्टों को भी रखा, राइटिस्टों को भी रखा, सेंट्रिस्टों को भी रखा। दो-तीन मामलों में धोखा भी हुआ लेकिन ज़्यादातर चयन सही रहा।
परंतु एक प्रत्याशी को लेकर मेरे मन में हमेशा अफ़सोस रहा। मैं उसे लेना चाहता था लेकिन नहीं ले पाया। उसका नाम मुझे आज भी याद है – अमृत तिवारी। उसकी कॉपी ठीक थी, अनुवाद भी अच्छा था, समझ भी बढ़िया थी। मैं उसको लगभग चुन चुका था। बस एक औपचारिकता मात्र बाक़ी थी। फ़ाइनल ‘हाँ’ से पहले उसे मेरे बॉस (प्रधान संपादक) से मिलना था।
मैं उस मुलाक़ात को लेकर निश्चिंत था क्योंकि बॉस ने कभी मेरे सिलेक्शन पर उंगली नहीं उठाई थी।
परंतु अमृत तिवारी से मुलाक़ात के पास बॉस ने मुझे कमरे में बुलाया और कहा, यह लड़का ठीक नहीं है। मैंने पूछा, क्यों? उन्होंने कहा, यह कुछ ऐक्टिविस्ट टाइप का है। यहाँ आएगा तो यहाँ भी लड़ाई-झगड़ा करेगा।
मैं समझ गया, मामला क्या है। दरअसल अमृत तिवारी ने मुझे बताया था कि कैसे उसने अपने गाँव में हो रहे किसी अन्याय का मुक़ाबला करने के लिए लोगों को एकजुट किया था। मेरी नज़र में यह एक पॉज़िटिव बात थी – किसी भी पत्रकार को अन्याय के विरुद्ध बोलना ही चाहिए।
अगर वह ख़ुद सामने आ रहा है तो यह और भी अच्छी बात है। लेकिन बॉस की नज़र में यह एक अवगुण था। बॉस के इस फ़ैसले से मैं बहुत मायूस हो गया। लेकिन कुछ करने की स्थिति में नहीं था।
उस वक़्त मुझे याद आ रहा था मेरा अपना इंटरव्यू जो मैंने Sanmarg Hindi Daily नामक अख़बार की अपनी पहली नौकरी के लिए दिया था।
वह इंटरव्यू अख़बार के मालिक रामअवतार गुप्त ने ख़ुद लिया था। वे संपादक भी थे। इंटरव्यू में उन्होंने क्या-क्या पूछा, यह याद नहीं है लेकिन उनका अंतिम सवाल आज भी याद है। उन्होंने पूछा था, आपने पिछले चुनाव में किस पार्टी को वोट दिया था?
मैंने बिना झिझके कहा, सीपीएम को। उन्होंने कहा, हमने भी सीपीएम को वोट दिया था। फिर बोले, अब आप जा सकते हैं। You will get the letter।
1984 और 2015. समय कितना बदल गया हैो। तब एक मालिक संपादक को इससे कोई समस्या नहीं थी कि वे जिस युवक को अपने यहाँ रख रहे हैं, वह एक कॉम्युनिस्ट पार्टी का समर्थक है। और यहाँ एक प्रधान संपादक, जो ख़ुद मालिक भी नहीं है, उसको इस बात पर आपत्ति है कि वे जिसे रखने जा रहे हैं, वह एक ऐक्टिविस्ट है।
अमृत तिवारी से मैं फिर कभी नहीं मिला। लेकिन कल आधी रात को अचानक उसकी याद आ गई।
उम्मीदवारों की टेस्ट कॉपियाँ मैंने क्लाउड में सेव कर रखी हैं। कल रात उसे खोजकर मोबाइल पर फिर पढ़ा। और अफ़सोस हुआ कि हमने इतने अच्छे और संवेदनशील पत्रकार को उसके अधिकार से वंचित कर दिया। जो दूसरों को न्याय दिलाने के लिए लड़ता था, उसी के साथ हमने अन्याय कर दिया। सॉरी अमृत।
नीरेंद्र जी की पोस्ट को लेकर विस्तार न्यूज़ के डिजिटल हेड अमृत तिवारी जी की प्रतिक्रिया पढ़ें…

मैं हैरान हूँ और ख़ुश भी हूँ कि नागर सर ने मुझे आज तक याद रखा है. वर्ना लोग इंटरव्यू किए और भूल जाते हैं. यह उनके संवेदनशील व्यक्तित्व की निशानी है. मुझे याद है जब मैं आईटीओ स्थित टाइम्स ऑफ इंडिया के दफ़्तर में पहुँचा था, तब बुरी तरह घबराया हुआ था. लेकिन, नीरेंद्र नागर जी प्रकट हुए और उनकी पहली ही लाइन थी- आप पहले थोड़ा रिलैक्स हो लीजिए. फिर टेस्ट कॉपी लिखिए, वर्ना होता है कि आप घबराहट में जानकार होते हुए भी ग़लतियाँ कर बैठते हैं. मैं हैरान था, कोई संपादक ऐसा भी हो सकता है. क्योंकि, उन दिनों नौकरी के चक्कर में जहां भी गया था, मुझे लंबा इंतज़ार करना पड़ा था और फ़ुल एरोगेंस में लोग मुझे कमांड देते हुए कॉपी लिखवाते या इंटरव्यू लेते. लेकिन, यहाँ मामला दूसरा था. नागर सर ने ख़ुद से टेबल पर आकर एक कॉफी से भरा कप रख दिया. मैं रिलैक्स था फिर मैंने तसल्ली से अपनी टेस्ट कॉपी लिखी.
उन्होंने उन महोदय का ज़िक्र जब अपने पोस्ट में नहीं लिया, तो इस पर्देदारी को मैं भी उजागर नहीं करना चाहता. मैंने रिटेन और इंटरव्यू पास कर लिया था. दोस्तों ने मुबारकबाद दे दी और मैंने उन्हें पार्टी भी दे दी. लेकिन, अगले ही दिन नागर सर से बात हुई थी. उन्होंने कहा कि ग्रुप संपादक मिलना चाहते हैं. यह भी बताया गया कि यह सिर्फ़ औपचारिकता मात्र है. लेकिन, मैं पहुँचा और फिर आगे की कहानी तो ख़ुद सर ने अपने पोस्ट में लिखा है.
एक्टिविस्ट वाली बात ये थी कि मैंने अपने गाँव में घोटाले की भेंट चढ़े एक मुख्य मार्ग को लेकर आरटीआई डाली थी. उसके बाद मैंने अपने ग्रामीण युवा साथियों के साथ मिलकर आंदोलन छेड़ा था. यह काम मैंने एक न्यूज़ चैनल (श्री न्यूज़) से इस्तीफ़ा देकर किया था. आंदोलन को कामयाबी भी मिली थी और टूटी हुई गड्ढानुमा सड़क बनकर तैयार हो गई. बलिया-सिकंदरपुर मार्ग के नाम से यह सड़क जानी जाती है. इस बात का ज़िक्र भी इंटरव्यू में तब आया था, जब मैं ऑनलाइन “लोकल पत्रकारिता” के विशेष महत्व को उजागर कर रहा था. 2013 में मैं उनके सामने दलील रख रहा था कि लोकल लेवल पर यदि ऑनलाइन पत्रकारिता हो, तो सूरत काफ़ी हद तक बदल जाएगी और मैंने ‘सड़क’ वाला उदाहरण दिया था.
खैर, उस दौरान मेरा दिल काफ़ी टूटा था. लेकिन, आज एक दशक बाद नीरेंद्र नागर सर के शब्दों से मैं निहाल हो गया. यह मेरे लिए सबसे बड़ा अवॉर्ड है. कोशिश करूँगा कि अपने पत्रकारीय जीवन में उनके जैसा व्यक्तित्व अपने भीतर समाहित कर सकूँ… धन्यवाद।
पढ़िए अमृत तिवारी ने नीरेन्द्र नागर जी की पोस्ट को शेयर करते हुए एफबी पर क्या लिखा है-
2008 से पत्रकारिता में हूँ. आज जाकर मुझे रिकग्निशन मिली है. आज तक मुझे कोई अवॉर्ड नहीं मिला, लेकिन आज सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मिला है. माफ़ी नहीं Nirendra Nagar सर, गुरुजन आशीर्वाद देते हैं. अप्रत्यक्ष रूप से मैंने हमेशा आपकी शैली में काम करने और नेतृत्व सँभालने की कोशिश की है. Aadarsh Rathore और Ameesh Rai न्यूज रूम में आपकी चर्चाओं का मुझसे विस्तार से वर्णन करते थे. मैंने आपसे ही सीखा कि अंग्रेज़ी के शब्दों को हिंदी में कैसे लिखा जाए. विचारों की आज़ादी को पत्रकारिता में कैसे पिरोया जाए. संपादकीय रूप से काफ़ी कुछ समझ आपसे ही मिली. आपसे ही जाना कि टीम को बिना पूर्वाग्रह कैसे संभाला जाता है. आज उस इंटरव्यू के बारे में काफ़ी कुछ कहने को जी चाह रहा है, लेकिन आज आपके शब्दों को महसूस करने का दिन है, इसे फीलिंग्स को जाया नहीं जाने देना चाहता. शुक्रिया सर. मुझे सबसे बड़ी नौकरी मिल गई. मेरे माँ-बाप और मेरे गाँव के लोग ज़रूर आपका पोस्ट पढ़ेंगे. उन्हें आज मेरे ऊपर फक्र ज़रूर होगा!


