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मीडियाकर्मियों को अपनी कमर कसकर रहना होगा, मालिकान के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का समय करीब आ रहा है…

Abhishek Srivastava : रात साढ़े दस बजे जब मैं शनि बाज़ार में सब्‍ज़ी खरीद रहा था, कि अचानक मोबाइल पर Yashwant Singh का नाम चमका। हलो बोलने के बाद बिना किसी औपचारिकता के उधर से आवाज़ आई, ”जागरण में हड़ताल हो गई है। दो सौ लोग सड़क पर हैं। पहुंचिए।” मैंने Sandeep Rauzi को फोन मिलाया, तो वे दफ्तर में थे। वे बोले कि घर पहुंचकर और बाइक लेकर मेरे यहां कुछ देर में पहुंच रहे हैं। फिर मैंने Pankaj भाई को एसएमएस किया। संयोग देखिए कि आंदोलन के बीचोबीच हम सभी मौके पर घंटे भर बाद मौजूद थे। पंकज भाई के साथ वरिष्‍ठ पत्रकार प्रशांत टंडन भी आंदोलनरत कर्मचारियों को समर्थन देने रात एक बजे पहुंचे। तीन चैनलों के पत्रकारों के वहां कैमरा टीम के साथ पहुंचने से आंदोलन को और बल मिला।

(दैनिक जागरण के महाप्रबंधक का घेराव और कर्मचारियों के साथ सड़क पर समझौते की वार्ता.)

Abhishek Srivastava : रात साढ़े दस बजे जब मैं शनि बाज़ार में सब्‍ज़ी खरीद रहा था, कि अचानक मोबाइल पर Yashwant Singh का नाम चमका। हलो बोलने के बाद बिना किसी औपचारिकता के उधर से आवाज़ आई, ”जागरण में हड़ताल हो गई है। दो सौ लोग सड़क पर हैं। पहुंचिए।” मैंने Sandeep Rauzi को फोन मिलाया, तो वे दफ्तर में थे। वे बोले कि घर पहुंचकर और बाइक लेकर मेरे यहां कुछ देर में पहुंच रहे हैं। फिर मैंने Pankaj भाई को एसएमएस किया। संयोग देखिए कि आंदोलन के बीचोबीच हम सभी मौके पर घंटे भर बाद मौजूद थे। पंकज भाई के साथ वरिष्‍ठ पत्रकार प्रशांत टंडन भी आंदोलनरत कर्मचारियों को समर्थन देने रात एक बजे पहुंचे। तीन चैनलों के पत्रकारों के वहां कैमरा टीम के साथ पहुंचने से आंदोलन को और बल मिला।

(दैनिक जागरण के महाप्रबंधक का घेराव और कर्मचारियों के साथ सड़क पर समझौते की वार्ता.)

(दैनिक जागरण गेट के सामने खड़े हड़ताली मीडियाकर्मी)

(मीडियाकर्मियों के आंदोलन को कैमरे में कैप्चर करते पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव)

यह सब हालांकि उतना अप्रत्‍याशित नहीं था, जितना सुखद आश्‍चर्य रहा वहां एक बुजुर्ग से मिलना। नाम राजू मंडल, उम्र 70 पार, निवासी सुपौल (बिहार), 14 साल पहले टाइम्‍स ऑफ इंडिया की प्रेस से रिटायर, एक ज़माने में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में छह माह की ऐतिहासिक हड़ताल के सूत्रधार और जागरण के एक कर्मचारी के पिता। एक पिता अपने बेटे को आंदोलन में समर्थन देने आया था। मुझे गोर्की की ”मां” याद आ गई। मंडल बोले, ”नोएडा की धरती पर मैंने पहली बार कदम रखा है। बेटे ने बताया कि सब लोग सड़क पर हैं तो मैंने उससे कहा कि मुझे भी ले चल। आप लोग सिर्फ दो बात याद रखो- ईमानदारी और हिम्‍मत। लड़ाई जीत जाओगे।” महाप्रबंधक के साथ समझौते के बाद दो बजे जब अधिकतर कर्मचारी भीतर चले गए, तो मंडलजी ने वहां मौजूद हम चार-पांच नौजवानों को गले लगाया और हमारा सिर चूमते हुए बोले, ”मेरे बेटे का खयाल रखना।”

जब आंदोलन का पानी चढ़ता है, तो कैसे-कैसे पुराने चावल उसमें उबलने लगते हैं, यह घटना इसकी एक मिसाल भर है। दैनिक जागरण में कल रात एक साथ नोएडा और हिसार में हुई हड़ताल इस बात का प्राथमिक संकेत है कि आने वाले दिनों में मीडियाकर्मियों को अपनी कमर कसकर रहना होगा। मालिकान के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का समय करीब आ रहा है। मुझे लगता है कि अपने आपसी मतभेद भुलाकर पत्रकारों को अपने मजदूर वेश में आ जाना चाहिए। अगले महीने 9 मार्च की तारीख अहम है जब मजीठिया से जुड़े सारे मुकदमों को एक साथ क्‍लब कर के सुनवाई होगी। उम्‍मीद की जाए कि विजय अपनी होगी और मालिक हमारा हक़ देने को मजबूर होंगे।

पत्रकार और एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. abhiyan chalayein

    February 9, 2015 at 10:25 pm

    Kyon na sabhi newspaper mein strike ki jaye.
    Ek saath. Sabhi akhbaron mein.

    Phir akhbar malik hi nahin, puri duniya sunegi. Wo bhi gaur se.

    Bhadas din tay kare. Sabhi mediakarmi saath dein…

    Pathkon ko nuksan hoga, lekin wo electronic media aur social media ki khbron se kaam chala lenge.

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