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आज के अखबार (दो) : नागरिकता की पुष्टि के नाम पर संसाधनों की बर्बादी और परेशान करने की छूट?

आज उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची के ड्राफ्ट से करीब तीन करोड़ मतदाताओं का छूट जाना भी बड़ी खबर है लेकिन यह तो पुराना मामला है, होता रहा है, सबकी जानकारी में है और विवाद तो एसआईआर पर ही है। मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। तमाम तर्क रखे जा चुके हैं और हम रोज सुन-देख-पढ़ रहे हैं। इस लिहाज से आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी सुप्रीम कोर्ट की खबरें ज्यादा महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर पर्यावरण की खबर लीड है जबकि पहले पन्ने पर उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची से संबंधित खबर है। इंडियन एक्सप्रेस में भी मतदाता सूची की खबर लीड है। इसके साथ सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है – चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, उसे नागरिकता की पुष्टि का अधिकार संविधान से मिलता है। द हिन्दू में यह खबर लीड है। शीर्षक है, विदेशियों को मतदाता सूची से बाहर रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। मुझे कानूनी और संवैधानिक स्थिति की जानकारी नहीं है लेकिन चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी का मतलब यह नहीं हो सकता है कि वह अमर्त्य सेन की नागरिकता या उनकी आयु जांचे, इसके लिए उनका, अपना समय खराब करे और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हो। आज द टेलीग्राफ में छपी खबर के अनुसार, नोबल विजेता अमर्त्य सेन के नाम नोटिस तैयार है लेकिन उन्हें भेजा नहीं गया है क्योंकि वे 85 साल से ऊपर के हैं। कलकत्ता डेटलाइन की इस खबर के अनुसार, चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि अमर्त्य सेन के लिए एन्यूमरेशन फॉर्म में उम्र से जुड़ी कुछ एंट्रीज़ को लेकर एसआईआर सुनवाई का नोटिस जारी किया गया है। अधिकारी ने बताया कि सेन को सुनवाई केंद्र जाने की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि उनकी उम्र 85 साल से ज़्यादा है और यह प्रक्रिया उनके घर पर ही पूरी की जाएगी। इससे पहले, तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी ने कहा था कि उन्होंने सुना है कि 92 साल के नोबेल पुरस्कार विजेता को एसआईआर नोटिस दिया गया है और उन्होंने इसमें गड़बड़ी का आरोप लगाया था। लेकिन वह तो राजनीति है। आम नागरिकों को तो कुत्तों की चिन्ता है।

नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, आवारा कुत्तों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि इतने अधिक आवेदन तो इंसानों के मामले में भी नहीं आते। विशेष पीठ आज सुनवाई करेगी। नवोदय टाइम्स में जेएनयू का मामला टॉप बॉक्स है। शीर्षक है, जेएनयू में फिर गूंजे टुकड़े-टुकड़े गैंग के नारे। दि एशियन एज का शीर्षक है, (उमर खालिद और शरजिल इमाम को) जमानत नहीं मिलने पर जेएनयू में प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे : पुलिस एफआईआर दर्ज करने के लिए पूरी तरह तैयार। अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर सुप्रीम कोर्ट वाली खबर तो नहीं ही है, जेएनयू की खबर लीड है। इसके साथ चार कॉलम से ज्यादा में एक शीर्षक है, बांग्लादेश में लगातार दूसरे दिन हिन्दू की हत्या। इसका उपशीर्षक है, 19 दिन में छठे हिन्दू युवक की हत्या। लीड का शीर्षक है, जेएनयू में मोदी व शाह के खिलाफ लगे अभद्र नारे, एफआईआर दर्ज, जांच शुरू। यह खबर इतनी बड़ी या महत्वपूर्ण है कि द हिन्दू में भी पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है और बताया गया है कि विवरण अंदर के पन्ने पर है। देशबन्धु में यह चार कॉलम की खबर है। शीर्षक है, मोदी शाह के खिलाफ नारेबाजी के आरोप।  साथ ही छात्र संघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा का बयान है, सभी नारे वैचारिक थे… वे किसी पर व्यक्तिगत हमला नहीं करते थे। वे किसी के लिए निर्देशित नहीं थे। (संभव है इसका मतलब यह हो कि इनका मकसद किसी को निशाना बनाना नहीं था)। इस खबर का उपशीर्षक है, छात्र संघ अध्यक्ष समेत 35 छात्रों के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए दी गई शिकायत। अमर उजाला में इसी खबर को देखिए तो लगता है कि जेएनयू में छात्र नेता कन्हैया के समय जैसा हुआ था वैसा फिर हुआ है। इसे समझने के लिए जो बताना या याद दिलाना चाहिए वह आज अखबारों में नहीं है।  इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक है, जवाहर लाल नेहरू छात्र संघ के आयोजन में उकसाने वाले नारों के बाद जेएनयू ने एफआईआर की मांग की (उपशीर्षक है) कहा,  छात्रों ने प्रधानमंत्री मोदी, शाह के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए। टाइम्स ऑफ इंडिया में अधपन्ने पर खबर अंदर होने की सूचना सिंगल कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह अधपन्ने पर तीन कॉलम में है। शीर्षक है – मोदी, शाह के खिलाफ नारों के बाद जेएनयू छात्रों को बर्खास्त करेगा।

जेएनयू का मामला इसलिए भी खास है कि जेएनयू का मामला इसलिए भी खास है कि उमर खालिद और शर्जिल इमाम के खिलाफ जो फैसला आया वह असामान्य है। यह फैसला पहले सुरक्षित रख लिया गया था। 5 जनवरी को सुनाया गया। 5 जनवरी 2020 को जेएनयू कैंपस में नकाबपोश लोगों ने छात्रों और शिक्षकों पर हमला किया था। इसमें काफी हिंसा और तोड़फोड़ हुई थी। तबकी छात्रसंघ अध्यक्ष आईशी घोष गंभीर रूप से घायल हुई थीं। इसके बाद से विश्वविद्यालय के कुछ छात्र समूह और शिक्षक संघ हर साल 5 जनवरी को उस घटना को याद करते हैं और विरोध प्रदर्शन या सभा का आयोजन करते हैं। ऐसा इस वर्ष भी हुआ। जेएनयू के दो पूर्व छात्रों – उमर खालिद और शरजिल इमाम को पांच साल बाद भी जमानत नहीं मिलने तथा अन्य संबद्ध कारणों से माहौल गर्म हो गया। जाहिर है नाराजगी भी होगी, नारे भी लगे होंगे। पांच जनवरी की शाम जो सब हुआ वह छह को खबर नहीं बनी, सात के अखबारों में छपी है। 2020 के नकाबपोश हमलावरों में एक, कोमल शर्मा की पहचान हो गई थी और काफी समय तक उसका पता नहीं चला अभी भी पता नहीं है कि इस मामले में या उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई। 2020 के इस तोड़फोड़ से पहले जेएनयू में एक और हंगामा हुआ था। जिसमें कन्हैया मुख्य अभियु्क्त या हीरो थे। यह 9 फरवरी 2016 को हुआ था, इसे लेकर भी विवाद हुआ था कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया उन पर भी देशद्रोह का मामला था। 2016 का यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है और ना अभी तक किसी को दोषी ठहराया गया है ना सजा दी गई है। अब फिर नारे लगने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने दिल्ली पुलिस से प्राथमिकी  दर्ज करने की मांग की है। क्योंकि ऐसे नारों से सार्वजनिक शांति और परिसर का माहौल प्रभावित हो सकता है। यहां गौर करने वाली बात है कि कैम्पस में हिन्सा के 2020 के मामले में किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। कन्हैया का मामला अभी नहीं निपटा है। उमर खालिद और शर्जिल इमाम का मामला है ही। (समाप्त) 

इससे पहले की किस्त पढ़ें – आज के अखबार : जेएनयू-जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का तो पता नहीं, ज्यादातर पक्षपाती लग रहे हैं। लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/supreme-court-ka-pata-nahee-jnu-jamanat-ke-mamle/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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