हृदयेश जोशी-
नोएडा की ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों के पीछे एक ऐसी दुनिया है जिसे मुख्यधारा का मीडिया अक्सर अनदेखा कर देता है। ये दुनिया है उन लाखों मज़दूरों की, जिनके पसीने से देश की अर्थव्यवस्था का पहिया घूमता है, लेकिन जो खुद तंगहाली के अंधेरे में जी रहे हैं।
हाल ही में नोएडा के श्रमिकों का जो गुस्सा सड़कों पर दिखा, वह अचानक नहीं फूटा; यह बरसों से सुलगता हुआ लावा है। PLFS (2025) के आंकड़े चौंकाने वाले हैं—भारत में एक मैन्युफैक्चरिंग मज़दूर की औसत मासिक आय केवल ₹18,735 है। आज की बेतहाशा महंगाई में क्या इतने पैसे एक परिवार के सम्मानजनक जीवन के लिए काफी हैं?
शोषण की इंतिहा:
कागजी अधिकार: केवल 16.5% मज़दूरों के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट है। यानी जब चाहा, ‘Use and Throw’ की तर्ज पर उन्हें बाहर निकाल दिया।
काम के घंटे: कहने को ड्यूटी 8 घंटे की है, लेकिन हकीकत में यह 12 से 14 घंटे तक खिंचती है। बिना रुके असेंबली लाइनों पर खड़े रहना इंसान को मशीन बना देता है।
सामाजिक सुरक्षा का अभाव: 5 में से केवल 1 कर्मचारी को सवैतनिक अवकाश (Paid Leave) या सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलता है। बीमार पड़ने का मतलब है—नौकरी और कमाई दोनों का जाना।
ट्रेड यूनियन नेता अमरजीत कौर (AITUC) और सुदीप दत्ता (CITU) का कहना है कि नए लेबर कोड्स ने मज़दूरों की मोलभाव करने की शक्ति (Bargaining Power) खत्म कर दी है। आज कानून मज़दूरों के हक के बजाय ‘Ease of Doing Business’ की तरफ झुके हुए नज़र आते हैं।
विकास की इस अंधी दौड़ में हमें नहीं भूलना चाहिए कि अगर कारखानों की चिमनियां चमक रही हैं, तो उन्हें चलाने वाले मज़दूरों के चूल्हे भी सुकून से जलने चाहिए। यह सिर्फ वेतन की मांग नहीं, अपनी गरिमा (Dignity) बचाने की लड़ाई है।
पूरी रिपोर्ट यहां देखिए..
सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता लिखते हैं कि उप्र में विधायकों का भत्ता 12 साल में चार गुना हो गया..इस वक्त विधायकों को सब मिलाकर 2.96 लाख रुपए महीने में मिलता है..ऊपर से मंहगाई भत्ता भी उनको मिलता है…अब अगर हम वर्तमान विधायकों के भत्तों पर नज़र डालें
यूपी सरकार ने पिछले साल विधायकों का मूल वेतन (Basic Salary) 25,000 से बढ़ाकर 35,000 कर दिया गया है।निर्वाचन क्षेत्र भत्ता (Constituency Allowance) 50,000 से बढ़ाकर 75,000 प्रतिमाह किया गया है।चिकित्सा भत्ता 30,000 से बढ़ाकर 45,000 कर दिया गया है।सदन की कार्यवाही में शामिल होने का दैनिक भत्ता 2,000 से बढ़ाकर 2,500 किया गया है। जनसेवा कार्यों के लिए यह 1,500 से बढ़कर 2,000 हो गया है।
यही नहीं विधायकों के लिए मुफ्त रेल यात्रा के कूपन की सीमा 4.25 लाख से बढ़ाकर 5 लाख सालाना कर दी गई है।
फिर भी मजदूर अगर आंदोलन करें तो इसके पीछे विदेशी हाथ…hindustan times में छपी खबरों के मुताबिक मजदूरों की वेतन वृद्धि लिए हर पांच में गठित होने वाले wage board का गठन भी 12 साल बाद हुआ है। जिस मजदूरों के दम माननीय बनते हैं उनकी मजदूरी बवाल होने के बाद बढ़ता है…-रवीश रंजन शुक्ला, वरिष्ठ संवाददाता, एनडीटीवी


