दीपक गोस्वामी-
नोएडा में मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान एक पत्रकार को पुलिस की लाठी पड़ी है। यह दुखद तो है, लेकिन चौंकाता नहीं है। यह तो पत्रकारिता के उस समर्पण का परिणाम है जहां संपादक और मालिक सत्ता के साथ सौदेबाजी करते हैं।
जब मालिकों द्वारा मीडिया का इस्तेमाल अपने धंधों के कवर के तौर पर किया जाता है तो सरकार के साथ ख़बरों की सौदेबाजी होती है। तब संपादक ऐसा दलाल बन जाता है जो मालिक और सरकार के बीच ख़बरों का तालमेल बैठाता है।
इस सौदेबाजी में कई ख़बरें दबाई जाती हैं और छपी हुई ख़बरें हटाई जाती हैं। यहीं से पत्रकारिता सरकार की नज़र में अपनी साख खो देती है और वह पत्तलकारिता में तब्दील हो जाती है।
फिर जब कोई पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान ईमानदारी से अपना काम करके सरकार को आंखें दिखाता है तो उनके दरवाजे पर पुलिस खड़ी नज़र आती है, जिसका मकसद यह एहसास कराना होता है कि पत्रकार/पत्रकारिता का असल काम नेता जी के चरणों को चाटना है। सरकार यहां पुलिस को खुली छूट देती है कि वह पत्रकार के भीतर कुलबुला रहे क्रांति के कीड़े को जैसे चाहे वैसे ठीक करे।
बस यही वो पल होता है जब पुलिस के लिए पत्रकार पेंडुलम बन जाता है, जिसे कभी भी बजाया जा सकता है। पुलिस जानती है कि पत्रकारों को पीट भी देंगे तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ना। फिर पुलिस हर पत्रकार को एक लाठी से हांकती है, फिर चाहे वह ‘विरोधी’ पत्रकार हो या ‘गोदी’ पत्रकार।
पुलिस जानती है कि पत्रकार जहां से वेतन लेते हैं वो हमारे सरकार के चहेते हैं। इसलिए दलाली के इस खेल में अगर पत्रकार को रेल भी देंगे तो भी हमारा कुछ नहीं बिगड़ना। पूरी क्रोनोलॉजी यही है।
तो मेरे सभी पत्रकार बंधुओं, हक़ीक़त ये है कि अभी आप सिर्फ़ पुलिस की लाठी खा रहे हो, आगे आप पटक-पटक कर पीटे भी जाओगे। आपका संपादक बस आपकी पिटाई के विरोध में चार लाइन की ख़बर चला देगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा। तुम जैसे लाख-पचास हजार वाले पत्रकार तो आते-जाते रहते हैं, इसके लिए संपादक और मालिक सरकार से दुश्मनी लेकर अपना करोड़ों-अरबों का नुकसान थोड़ी न करेंगे। आप आज पिटेंगे, कल वो नेता जी के साथ जाम लड़ाते हुए डील साइन करेंगे। लगभग हर कॉरपोरेट मीडिया हाउस की यही कहानी है।
तय अब पत्रकारों को करना है कि वे अपने अपमान के लिए अपने संस्थान पर सरकार के ख़िलाफ़ खड़ा होने का दबाव बनाते हैं या संपादक के आदेश पर अपमान का घूंट पीकर नए असाइनमेंट पर निकल जाते हैं?
अंत में Jist की रिपोर्टर Sonal Pateria की तारीफ बनती है। वो न सिर्फ़ साथी पत्रकार पर लाठी चलाने वाले इस पुलिस वाले से भिड़ गईं, बल्कि उसे भागने पर भी मजबूर कर दिया। सोनल ने तब भी पुलिस वाले का पीछा नहीं छोड़ा और उसके पीछे भागती रहीं। Salute to this Girl
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