
संजय कुमार सिंह
आज तक डॉट इन की एक खबर के अनुसार, देश को ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के बारे में जानकारी देने के लिए महिला अधिकारियों को चुनकर, पीएम मोदी ने एक स्पष्ट संकेत दिया। यह सिर्फ सैन्य प्रतिशोध नहीं था; इसमें संदेश था कि भारत की महिलाएं सिर्फ आतंकवादियों द्वारा दिए गए घाव को नहीं झेलतीं – वे आतंक का निडर होकर सामना करती हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक खबर का शीर्षक लगाया है, ऑपरेशन का नाम और दो महिलाओं ने मजबूत संदेश दिया है। एक और खबर का शीर्षक है, पति को आतंकियों ने मारा ऑपरेशन सिन्दूर से न्याय मिला।
दैनिक भास्कर के अनुसार हिमांशी ने कहा…. जो खोया है, वो नहीं मिल सकता, पर पति को शांति मिलेगी।
आज दैनिक भास्कर की प्रस्तुति गौर करने लायक है। दूसरी ओर द टेलीग्राफ के शीर्षक का अर्थ होगा, (ऑपरेशन सिन्दूर नाम देकर) पाप धो लिया। दैनिक भास्कर का शीर्षक और प्रस्तुति तो फिदा होने जैसा है उसपर कुछ कहने की जरूरत नहीं है।
जरूरी नहीं है कि ऑपरेशन सिन्दूर का या नाम का विरोध किया जाये। उसकी आलचोना तो हो सकती थी। उसे रेखांकित तो किया ही जाना चाहिये (था)। आज टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि पहली जिम्मेदारी या प्रतिक्रिया हिन्दी वालों की होनी चाहिये थी। लेकिन हिन्दी भाषी अक्सर हिन्दू हो जाते हैं और भाजपा का इको सिस्टम नहीं होने पर आलोचना भी करता है। हालांकि वह अलग मुद्दा है।
सच्चाई यह कि भिन्न कारणों से ऑपरेशन सिन्दूर नाम मुद्दा भी नहीं बना। लेकिन, जो सरकार (सत्तारूढ़ दल) खुलेआम हिन्दुत्व के समर्थन पर चल रही है उसके इस अभियान में राजनीति न हो यह मानना मुश्किल है। हालांकि, पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई में पूरा देश सरकार के साथ है तो मैं भी हूं। इसलिए कल इसका विरोध करना, इसकी चर्चा करना उचित नहीं था और मैंने कल यह कॉलम नहीं लिखा। वैसे भी, कल कई अखबारों में हमले की खबर थी ही नहीं और मैं जानता हूं कि ऐसा हेडलाइन मैनेजमेंट से अलग, कई और कारणों से होता है। इसलिए कल इसपर लिखने की जरूरत नहीं थी। मेरा मानना है कि इस ऑपरेशन की जरूरत नहीं थी और इसका माहौल, इसकी जरूरत राजनीतिक कारणों से बनाई गई है। हमले के बाद पाकिस्तान की ओर से जवाबी कार्रवाई नहीं होना और दूसरी खबरों से पता चलता है कि वह हमारे मुकाबले बहुत कमजोर है। सोशल मीडिया पर इस बारे में लोगों ने लिखा भी है। ऐसे में भारतीय सेना की प्रशंसा, कार्रवाई के सटीक होने की टिप्पणी आदि मुद्दे तो हैं पर जब ऑपरेशन राजनीतिक है तो चर्चा राजनीति की ही होनी चाहिये। राजनीति यह है कि मीडिया ने सरकार की (सेना की नहीं) बहादुरी का प्रचार बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया और सत्तारूढ़ दल को इसका राजनीतिक लाभ मिलेगा। स्थितियां ऐसी तो नहीं ही थीं कि चुनाव आयोग इसे रोक सकता लेकिन जो आयोग प्रधानमंत्री को अपने भाषणों पर नियंत्रण रखने के लिए नहीं कह सकता है तो इस मामले में क्यों कहने जाता। यह अलग बात है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति संबंधी विवाद को सुप्रीम कोर्ट में नहीं सुना जा सकता है या उसक मौका ही नहीं आ रहा है। सरकार उससे बड़े मामले देती जा रही है।
ऐसे में खबर है कि इस ऑपरेशन सिन्दूर का उपयोग दोनों देशों के प्रचारकों ने अपने-अपने हित में किया है। पाकिस्तान (वालों) की तो भारत सरकार ने खबर ले ली लेकिन भारतीय मीडिया की गलत खबरों / वीडियो के बारे में क्या कहा जाये। मुझे लगता है कि इस ऑपरेशन का सरकारी मकसद राजनीतिक दल के लिए लाभ कमाना नहीं भी हो तो प्रचारक और मीडिया वाले अपना काम कर रहे हैं। संभव है मुफ्त में या उन्हें यह काम मिला हो। पर हिन्दी वाले हिन्दू हो जायेंगे तो चुनाव निष्पक्ष कैसे होंगे। गैर हिन्दू चुनाव आयुक्तों पर भाजपाई हमले और उनका स्तर आप जानते हैं। ऐसी हालत में आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक हिन्दी में, न्याय कर दिया गया होता। मुझे नहीं लगता है कि यह सही है। जिन (नव) विवाहितों के पति मारे गये, आतंकियों ने जिसे गोली नहीं मारी और कहा कि मोदी को बता देना – उन्हें क्या मिला। आप उनके पति की हत्या के बदले 10-20-50 और महिलाओं को विधवा बना दें, उसके पूरे शहर या खानदान को तबाह कर दें, उसे क्या मिला? कहने की जरूरत नहीं है कि उसे अपने मन की बात कहने के लिए सोशल मीडिया पर क्या सब सुनना-झेलना पड़ा है। अगर प्रधानमंत्री ने इस बारे में दो शब्द कहे होते तो उसे कुछ मिलता। सरकारी सुरक्षा (या व्यवस्था) में चूक के कारण हुई हत्या का कोई मुआवजा मिला तो उसे कुछ मिलता। किसी के खिलाफ कार्रवाई हुई होती तो न्याय होता। शायद एयर स्ट्राइक से बहुत कम खर्च में यह हो सकता था लेकिन तब लोग तारीख जोड़कर नहीं बताते कि 56 होता है और सत्तारूढ़ दल या नरेन्द्र मोदी को इतना राजनीतिक लाभ तो नहीं ही मिलता।

यह राजनीति है, लोगों को भावना में बहाकर वोट लेने की व्यवस्था की जा रही है और चुनाव आयोग मतदाता सूची में गड़बड़ी पर कार्रवाई नहीं कर रहा है जबकि ‘मोदी को बता देना’ का एक मतलब यह भी है कि उनकी कार्रवाई का संबंध मोदी की राजनीति से है। और इसके साथ यह सवाल जुड़ा हुआ है कि नाम पूछकर, धर्म जांचकर मारने से उनका क्या मतलब हो सकता है। एक मतलब तो यह भी था कि हमें जल्दी नहीं है, (इस समय) किसी कार्रवाई का डर नहीं है। और वह साबित भी हुआ। ऐसे में मरने के लिए तैयार लोगों को मार देने से न्याय कहां हुआ? उनकी चाहत पूरी हुई। इस राजनीति में जिन्दा पकड़े गये आतंकी को बिरयानी खिलाने का आरोप और कहानी गढ़ने वाले को चुनाव लड़ने के लिए टिकट देना बहुत कुछ कहता है। इतनी जोर से कि लोगों ने कान बंद कर रखे हैं। इतना कि फाइनेंशियल एक्सप्रेस की सात कॉलम की लीड का शीर्षक होगा, संदेश पहुंचा दिया गया। दि इकनोमिक टाइम्स की लीड का शीर्षक होगा, भारत ने गहरा घाव किया। आप दोनों शीर्षक का अंतर समझ सकते हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड को इसे समझा कर लिखना पड़ा है, ऑपरेशन सिन्दूर ने आतंक के किलाफ संघर्ष को पाकिस्तान पहुंचा दिया। हम जानते हैं कि अमित शाह ने एलान कर दिया था कि आतंकवाद कुचल दिया गया है, खत्म हो गया है। यह अलग बात है कि 2016 की नोटबंदी से जिस आतंकवाद की कमर टूट जानी थी वह 2019 में पुलवामा के बाद बालाकोट के एक हवाई हमले और फिर 370 जैसी कार्रवाई से ‘खत्म’ हो गया था। 2025 में पहलगाम के, ‘मोदी को बता देना’ के बाद नौ एयर स्ट्राइक करने पड़े हैं और नाम रखा गया ‘ऑपरेशन सिन्दूर’। समझने वाले सब समझते हैं पर जो नहीं समझ रहे हैं उन्हें समझाने की जरूरत नहीं है? देशभक्ति क्या है?

कहने की जरूरत नहीं है कि मीडिया की मदद और नाम पूछकर मारा के प्रचार से ऐसा माहौल बनाया गया, इसीलिए ऑपरेशन सिन्दूर नाम रखा गया (उसका लोगो और डिजाइन भी है)। लीड के शीर्षक पर आने से पहले बता दूं कि अमर उजाला की टॉप की खबर का शीर्षक है, “देश की अपेक्षा थी, यह तो करना ही था : पीएम मोदी”। दूसरी ओर, सुरक्षा में चूक, खुफिया सूचना के बावजूद कार्रवाई नहीं होना और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सवाल उठाने पर भाजपा के इको सिस्टम का उनके पीछे पड़ जाना बताता है कि हम और हमारा मीडिया कई मामलों में निष्पक्ष नहीं है। नरेन्द्र मोदी के पक्ष में जरूरत से ज्यादा झुका हुआ है और यह उन्हें तानाशाह बना रहा है। भाजपाई मनमानी की आलोचना नहीं के बराबर है। इमरजेंसी में अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले पत्रकार अब प्रचारकों की तरह तर्क दे रहे हैं। किसी को ईनाम मिल गया है कुछ ईनाम के इंतजार में होंगे। हालांकि पत्रकार और पत्रकारिता का जो हुआ है वह भी बड़ा मुद्दा है लेकिन उसकी परवाह कौन करे।
हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, सिन्दूर सर्व्स जस्टिस। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, पहलगाम का बदला लिया (यह पता नहीं चला है कि जिन्होंने गोली मारी थी वो पकड़े गये या नहीं)। एक और खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल से कहा, गर्व के क्षण, एक अनूठा मौका, यह तो शुरुआत है। द हिन्दू का शीर्षक है, भारतीय सेना ने पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर निशाना साधा। द हिन्दू में छह कॉलम की खबर है, पहलगाम के आतंकी हमले के रिश्तेदारों ने जवाबी हमलों की तारीफ की। मुझे लगता है कि यह बहुत स्वाभाविक है और पहले पन्ने पर छह कॉलम के लायक खबर नहीं है। लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है, समझना मुश्किल नहीं है और कैसे कराया जा रहा है वह पहले यहीं बता चुका हूं। दि एशियन एज का शीर्षक है, भारत ने पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में नौ ठिकानों पर हमला किया, 100 से ज्यादा आतंकी मारे गये। यहां मुझे बालाकोट हमले के बाद किये गये दावे और रायटर की खबर की याद आती है। इस हिसाब से 9-10 लोग मरे हो सकते हैं क्योंकि आधी रात के बाद अगर रिहाइशी इलाके में हमला नहीं किया गया है तो इतने लोगों के होने का आधार क्या है। पिछली बार बताया गया था कि तीन सौ मोबाइल फोन चार्ज हो रहे थे इसलिए 300 मर गये होंगे और सब आतंकी ही थे। नवोदय टाइम्स ने लिखा है, तीन दशक में तैयार किया गया टेरर इंफ्रास्ट्रक्चर मिट्टी में मिला दिया गया। अगर ऐसा है तो अमित शाह किस आधार पर आतंकवाद खत्म होने की बात कर रहे थे और पुलवामा के बाद (से अब तक) यह सब क्यों नहीं किया गया।
पाकिस्तानी ठिकानों पर हमले में कितने मरे यह मेरे आठ अखबारों में सिर्फ दि एशियन एज में है। यहां सौ से ज्यादा आतंकियों के मारे जाने की सूचना है लेकिन दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में लीड का शीर्षक है, 25 मिनट में 9 ठिकाने ध्वस्त, 70 आतंकी ढेर। जब तीन आतंकियों ने इतना हंगामा बरपा रखा है तो 30 का अंतर मामूली नहीं है। पर मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई में दि एशियन एज के शीर्षक के अनुसार जम्मू व कश्मीर के पूंछ में 14 असैनिक मारे गये हैं। 60 जख्मी हुए हैं। 26 पर्यटक मारे गये तो ऑपरेशन सिन्दूर और 14 जवाबी कार्रवाई में मारे गये तो खबर ही नहीं। इनके धर्म का पता ही नहीं। यह सरकारी काम और अखबारी रिपोर्टिंग का उदाहरण है। मुझे याद आता है कि 6 दिसंबर 1992 को जब बाबरी मस्जिद गिरा दी गई तो दुनिया भर में दंगे हुए। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी। तीनों देशों में असंख्य लोग मारे गए। भारत में तीन हज़ार और पाकिस्तान व बांग्लादेश में भी कई सौ लोग मरे। लाहौर में तो पंडित मोतीलाल लाल नेहरू द्वारा बनवाया गया मंदिर भी ढहा दिया गया था। बांग्लादेश के बारे में तस्लीमा नसरीन ने पूरी किताब लिखी है। ऐसे में उस दिन खबर बनाते हुए मैंने अपने सीनियर शंभू नाथ शुक्ल से पूछा, शम्भू जी मौत का आंकड़ा 2000 पार कर गया है और लगातार बढ़ रहा है। क्या 2200 लिख दूँ? शंभू जी ने कहा, ठीक है लिख दो। अचानक प्रभाष जी वहाँ दिखे। उन्होंने यह वार्तालाप सुन लिया था। बोले, 2200 क्यों ढाई हज़ार लिख दो। आदमी की ज़िंदगी को मज़ाक़ बना रखा है। मैं इसे भूल गया था। शंभू जी ने बाद में याद दिलाया था। और 32 साल बाद आज फिर याद कर रहा हूं तो इसलिये कि राजनीति वही है, उन्हीं लोगों की है और विचारधारा यही है। चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करेगा में जो हो रहा है अपनी जगह, चर्चा भी नहीं है।
जो नहीं जानते उन्हें बता दूं कि प्रभाष जोशी आम धर्म प्रेमी हिन्दुओं की तरह भाजपा समर्थक होंगे लेकिन बाबरी मस्जिद के बाद उन्होंने भाजपा की खूब खबर ली। जवाब में यह उड़ा दिया गया था कि इसका कारण उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा जाना था। यह अब भी चल रहा है। कहानी लंबी है पर भाजपा को समझने के लिए अभी इतना ही।


