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पाकिस्तान का सिनेमा : क्या संगीत, नृत्य गैर-इस्लामी हैं?

-अजित राय-

सिनेमा से जुड़ी एक अच्छी खबर पिछले दिनों जब पाकिस्तान से आई तो अचानक हमारा ध्यान वहां के फिल्म उद्योग की ओर गया। खबर यह थी कि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की सरकार ने पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में स्थित जर्जर हो चुके दो मशहूर भारतीय फिल्म अभिनेताओं , राज कपूर और दिलीप कुमार की पैतृक हवेलियों को खरीदने और संरक्षित करने का फैसला किया है। इन हवेलियों को कुछ साल पहले ही राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जा चुका है। हाल ही में दिलीप कुमार की अपील पर पाकिस्तानी पत्रकार शिराज हसन ने उनके मकान की कुछ तस्वीरें ट्वीटर पर उन्हें टैग करके साझा किया था।

आश्चर्य है कि जो पाकिस्तान 1948 से 1977 तक उर्दू में दस हजार, पंजाबी मे आठ हजार, पश्तो में छह हजार और सिंधी भाषा में दो हजार फिल्में बनाकर दुनिया का चौथा सबसे बड़ा फिल्म निर्माता देश बन चुका था, उसकी फिल्मों के बारे में हम बहुत कम जानते हैं।

पाकिस्तान में सिनेमा का इतिहास लाहौर में अब्दुर रशीद कारदार की मूक फिल्म ” हुश्न का डाकू ” से शुरू होता है जब देश का विभाजन नहीं हुआ था और लाहौर भारतीय सिनेमा, थियेटर और संस्कृति का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। पाकिस्तान के बनने के बाद पहली फिल्म दाऊद चंद ने 1948 में बनाई – ” तेरी याद ।” उसके बाद 1950 में आई अनवर कमाल पाशा की” दो आंसू ” पाकिस्तान की पहली सिल्वर जुबली मनाने वाली फिल्म बनी। परवेज मलिक की फिल्म ” अरमान ” सिनेमाघरों में पचहत्तर हप्ते चली।

यह सिलसिला 1977 तक चला। 1959-1977 तक के दौर को पाकिस्तान में सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है। 1978 में जनरल जिया उल हक की सरकार के आने के बाद उग्र इस्लामीकरण और सेंसर के अराजक नियमों ने पाकिस्तानी फिल्म उद्योग की कमर तोड दी। कई उतार चढ़ावों के बाद पाकिस्तानी फिल्म उद्योग 2007 तक लाहौर से धीरे धीरे करांची चला गया। इसी बीच शोएब मंसूर की फिल्म आई ” खुदा के लिए ” ( 2007) जिसमें नसीरुद्दीन शाह ने मौलवी वली की यादगार भूमिका निभाई है जो लाहौर हाईकोर्ट में गवाही देते हुए अपनी विद्वत्ता और तर्क शक्ति से कट्टरपंथियों को निरूत्तर कर देते हैं। वे इस्लाम के सुप्रसिद्ध विद्वान हैं और बताते हैं कि वेश-भूषा, बुर्का या दाढ़ी का इस्लाम धर्म से कुछ लेना-देना नहीं है।

इस फिल्म ने न सिर्फ लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, बाक्स आफिस पर अकूत कमाई की, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रीलीज होकर चर्चित हुई, वल्कि इस फिल्म ने पाकिस्तानी फिल्म उद्योग को नया जीवन दिया। हालांकि इसकी हल्की शुरुआत फ्रांस- जर्मनी- भारत के सहयोग से बनी सबीहा सुमर की फिल्म ” खामोश पानी ” (2003) से ही चुकी थी। इस फिल्म में मुख्य भूमिका भारतीय अभिनेत्री किरण खेर ने निभाई है। शोएब मंसूर की अगली फिल्म ” बोल ” (2011) ने भी बेशुमार शोहरत और दौलत बटोरी। यह फिल्म पितृ प्रधान पाकिस्तानी परिवार में एक ट्रांसजेंडर की करूण त्रासदी है जिसे परिस्थितियां फांसी के फंदे तक पहुंचा देती है और उसको बचाने के सारे प्रयास असफल हो जाते हैं।

सरमद सुलतान खूसात की फिल्म ” मंटो ” (2015) को अभी हाल तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाता रहा है।

शोएब मंसूर की फिल्म ” खुदा के लिए ” ( इन द नेम आफ गाड ) नई पीढ़ी के तीन चरित्रों की यातना और संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। लाहौर का बेहद प्रतिभाशाली युवक मंसूर उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाता है। वहां जेनी नामक अमेरिकी युवती उससे प्रेम विवाह करती है। जिस दिन वे शादी करते हैं, उसी दिन 9/11 की घटना हो जाती है। सुहागरात में हीं एक पड़ोसी की झूठी शिकायत पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई मंसूर को अलकायदा से संबंध रखने के शक में गिरफ्तार कर लेती है। फिर अमानवीय यातना का दौर शुरू होता है। मंसूर का भाई समद अपने एक मित्र के बहकावे में कट्टरपंथियों के जाल में फंस जाता है।

उधर लंदन में जन्मी, पली-बढ़ी एक पाकिस्तानी युवती मरियम को उसका पिता धोखे से लाहौर लाकर समद को सौंप देता है जो उसका भांजा है। पिता नहीं चाहता है कि उसकी बेटी किसी ब्रिटिश युवक से शादी करे जिससे वह प्रेम करती है। समद मरियम को अफगानिस्तान की सीमा से सटे एक क़बीलाई इलाके में ले जाता है जहां तालिबानी सक्रिय हैं। वहां मरियम की इच्छा के विरुद्ध उसकी शादी समद से करा दी जाती है।

मरियम को सुधारने के लिए तालिबानियों के कहने पर समद उसके साथ लगातार बलात्कार करता है। वह एक बच्ची को जन्म देती है। मरियम कई बार वहां भागने की कोशिश करती है और पकड़ी जाती है। किसी तरह उसका एक पत्र लंदन में उसके ब्रिटिश प्रेमी तक पहुंचता है। चूंकि वह ब्रिटिश नागरिक है, उसके प्रेमी को अपील पर ब्रिटेन की सरकार हस्तक्षेप करती है और उसे मुक्त कराती है।

कट्टरपंथी लाहौर हाईकोर्ट में मुकदमा करते हैं कि समद द्वारा मरियम के साथ बलात्कार से पैदा हुई बच्ची पाकिस्तानी नागरिक है। वह लंदन कैसे जा सकती है। मंसूर और समद अच्छे संगीतज्ञ है। संगीत ही समद को दोबारा अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देता है।

संगीत ही मंसूर को अमेरिकी कैद में यातना सहने और जिंदा रहने की शक्ति देता है। उधर जेनी मानवाधिकार संगठनों की मदद से मंसूर को आजाद कराती है। अंतिम दृश्यों में जींस और टी-शर्ट में समद को आधुनिक टोपी को उलटा कर मस्जिद में नमाज पढ़ते दिखाया गया है। उधर मरियम भी लंदन जाने से इंकार कर देती है और अपनी बेटी के साथ तालिबानी प्रभाव वाले क़बीलाई इलाके में औरतों को पढ़ाने का काम शुरू करती है।

शोएब मंसूर की फिल्म “खुदा के लिए” में इस बात पर भी बहसें है कि संगीत, नृत्य, कलाएं क्या गैर इस्लामी है? एक मुसलमान लड़की अपनी मर्जी से किसी दूसरे धर्म के युवक से शादी कर सकती हैं कि नहीं ? धर्म एक जटिल और विवादास्पद विषय है और इसे फिल्माना तो और भी मुश्किल काम है। इस फिल्म में यह भी बात उठाई गई है कि सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होते या सारे आतंकवादी मुसलमान है।

आश्चर्य की बात है कि पूरी फिल्म में भारत, कश्मीर या हिंदू धर्म का कोई जिक्र नहीं आता। लोगों की निजी जिंदगियों की त्रासदी के माध्यम से फिल्म 9/11 की घटना के बाद की उन खतरनाक परिस्थितियों को दर्शाती है जिसका सामना दुनिया भर के मुसलमानों को करना पड़ रहा है। निर्देशक ने बड़ी सूझबूझ के साथ मुसलमानों के प्रति अमरिकीयों के नस्लभेदी व्यवहारों की ईसाई वर्चस्व के बदले अमेरिकी साम्राज्यवादी वर्चस्व से जोड़ा है।

सबीहा सुमर की फिल्म ” खामोश पानी ” 1947 के भारत पाक विभाजन और 1979 में जनरल जिया उल हक के सैनिक शासन के दौरान घटी कुछ सच्ची घटनाओं पर आधारित है। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चरखी गांव में आयशा ( किरण खेर) अपने अठारह वर्ष के इकलौते बेटे सलीम के साथ सुख से रह रही है। उसका पति मर चुका है और वह विधवा पेंशन और बच्चियों को ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करती है। सलीम गांव की ही एक लड़की जुबैदा के इश्क में हैं।

जनरल जिया उल हक के सैनिक शासन में इस्लामीकरण और कट्टरपंथ के बेतहाशा विकास से जन जीवन अशांत हो गया है। सलीम जुबैदा को छोड़कर जेहादी समूहों में शामिल हो जाता है। ये गुमराह नौजवान है जिन्हें लगता है कि जिस इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बना वह सपना अभी अधूरा है। गैर इस्लामी लोगों में दहशत फैलने लगती हैं। गुमराह कट्टरपंथी युवक लड़कियों के स्कूलों की चारदीवारी उंची करवाने लगते हैं जिससे कोई उन्हें देख न सके। वे दूकाने बंद कराते हैं, आक्रामक जुलूस निकालते हैं और हिंदुओं को डराते हैं।

आयशा के लिए असली संकट तब आता है जब एक समझौते के तहत भारत से सिख तीर्थयात्रियों का एक समूह चरखी गांव के गुरूद्वारे में आता है। 1947 के पहले इनमें से कुछ परिवार चरखी के बाशिंदे थे। गांव में वह कुआं अब है जिसमें विभाजन के दंगों के दौरान मुसलमानों से बचने के लिए बाईस हिंदू – सिख औरतों ने कूदकर अपनी जान दे दी थी। एक सरदार गांव में अपनी उस बहन को खोज निकालता है जो कुएं में कूदते वक्त अपने मुसलमान प्रेमी के साथ भाग गई थी। उस सरदार की बहन बीरू ही अब आयशा है।

यहां से फिल्म नया मोड़ लेती है। आयशा का बेटा सलीम उससे पूछता है – ” मां, तुम मुझपर गर्व क्यों नहीं करती। मैं एक पवित्र मकसद के लिए काम कर रहा हूं। ” आयशा गुस्से में कहती हैं – ” तुम सत्यानाश कर रहे हो , वे इस्लाम के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। ”

जब सलीम को पता चलता है कि उसकी मां एक काफिर की बहन है तो वह विचलित हो उठता है। यह बात उसके जिहादी दोस्तों को पता चलती है। धीरे धीरे हालात इतने तनावपूर्ण हो जाते हैं कि आयशा मजबूरन उसी कुएं में कूदकर जान दे देती है जिसमें 1947 में बाईस हिंदू सिख औरतें मरी थी। सलीम अपनी मां की तमाम निशानियों को मिटाने के लिए उसका बक्सा नदी में बहा देता है। यहां से फिल्म 2002 में पहुंचती है।

जुबैदा इस्लामाबाद में एक आधुनिक नौकरीपेशा जिंदगी जी रही है और सलीम एक बहुत बड़ा धार्मिक राजनेता बन चुका है। इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि जो हिन्दू लड़की 1947 में अपने पिता का हुक्म ठुकरा कर कुएं में कूदने से इन्कार करती है, अपने मुसलमान प्रेमी से शादी करती है , धर्म बदलकर बीरू से आयशा बन जाती है, वहीं लड़की पैंतीस साल बाद उसी कुएं में कूदकर जान दे देती है। सबीहा सुमार की फिल्म “खामोश पानी” धर्म और राजनीति और देशों की सीमाओं के चक्रव्यूह में एक स्त्री की अस्मिता की खोज करती है जो एक यूनिवर्सल उपस्थिति है।

पाकिस्तानी फिल्मों के बारे में भारतीय दर्शक बहुत कम जानते हैं। पाकिस्तान की पृष्ठभूमि पर दुनिया भर में अनेक फिल्में बनी हैं। ब्रिटेन में बड़ी संख्या में पाकिस्तानी आप्रवासी रहते हैं। जाहिर है पाकिस्तानी पृष्ठभूमि पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण फिल्में ब्रिटिश फिल्मकारों ने बनाई है। भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्मकार उदयन प्रसाद ने सबसे पहले ओम पुरी और पवन मल्होत्रा को लेकर लंदन में अवैध रूप से रह रहे पाकिस्तानी आप्रवासियों पर ” ब्रदर्स इन ट्रबुल ” (1995) बनाई। यह ओम पुरी की पहली विदेशी फिल्म थी। उसके बाद ओम पुरी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और करीब तीस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण विदेशी फिल्मों में काम किया।

ओम पुरी की मुख्य भूमिका वाली उदयन प्रसाद की दूसरी फिल्म ” माई सन्, द फैनटिक ” ( 1997) कान फिल्म फेस्टिवल के डायरेक्टर्स फोर्टनाईट खंड में दिखाई गई जो इसी नाम से द न्यू यार्कर ( 1994) में छपी हनीफ कुरैशी की कहानी पर आधारित है। ओम पुरी को लेकर ही डेमिएन ओ डनोल की ” इस्ट इज इस्ट ” (1999) दुनिया भर में ब्लाक बस्टर साबित हुई जिसने उस जमाने में सौ करोड़ का मुनाफा कमाया था। इसका दूसरा भाग ” वेस्ट इज वेस्ट “(2010) आया जिसे एंडी डी ईमोनी ने निर्देशित किया है।

पाकिस्तान में ” वाल स्ट्रीट जर्नल ” के अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की नृशंस हत्या पर माइकल विंटरबाटम की ” आ माईटी हार्ट “(2007) काफी चर्चित रही है जिसमें एक पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी की छोटी सी भूमिका इरफान ने निभाई थी। सलमान रुश्दी के उपन्यास ” मिडनाइट्स चिल्ड्रेन ” पर इसी नाम से दीपा मेहता की फिल्म (2012) भी काफी सराही गई थी। मोहसिन हामिद के उपन्यास ” द रिलक्टेंट फंडामेंटलिस्ट ” (2007) पर इसी नाम से मीरा नायर ने एक बेहतरीन फिल्म (2012) बनाई थी जिसे दुनिया भर में काफी सराहा गया था।

इसी साल भारतीय मूल के ब्रिटिश फिल्मकार अवतार भोगल ने प्रेम चोपड़ा, गुलशन ग्रोवर और कुछ पाकिस्तानी और ब्रिटिश कलाकारों को लेकर ” आनर कीलिंग ” नाम से एक फिल्म बनाई थी।

हंसल मेहता की ” ओमेर्ता “(2017 ) और अभिषेक शर्मा की ” तेरे बिन लादेन “(2010) जैसी कुछ फिल्मों को छोड़ दें तो पाकिस्तान को लेकर बनी अधिकतर मुंबईया फिल्में नकली, मेलोड्रामा के बोझ से दबी हुई और तथ्यहीन पटकथाओं पर आधारित है जिसमें दुश्मन देश के प्रति या तो घृणा है या नकली भाईचारा। यहां हम राजकपूर की आखिरी फिल्म ” हिना ” ( 1991) , जिसे उनके बेटे रणधीर कपूर ने पूरी की, से लेकर अनिल शर्मा की ” गदर” (2001) , यश चोपड़ा की ” वीर जारा” (2004), कबीर खान की ” बजरंगी भाईजान” (2015) या निखिल आडवाणी की ” डी- डे” ( 2013) जैसी दर्जनों ऐसी फिल्मों को याद कर सकते हैं। उसी तरह से पाकिस्तान में भी भारत को लेकर बनी अधिकतर फिल्में भी ऐसी ही है। कितना अच्छा होता कि दोनों देश मिलकर कुछ विश्व स्तर की अच्छी फिल्में बनाते जैसे भारत और बांग्लादेश मिलकर बना रहे हैं।

जाने माने फिल्म विश्लेषक अजित राय की फेसबुक वाल से साभार।

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