
निराला बिदेसिया-
पप्पू यादव जी, कल शकील अहमद खान जी (बिहार के कांग्रेस नेता) के यहां गये. शकील साहब पर दुखों का पहाड़ टूटा है. उनके इकलौते बेटे ने परसो रात अपनी जिंदगी खत्म की. स्वाभाविक है, जो जानने वाले हैं शकील साहब को, वे दुख की इस घड़ी में उनके पास जाएंगे.
शकील साहब से पहले बात-मुलाकात होती थी. वे नेकदिल इंसान हैं. उनके बेटे की खबर सुनकर मन सन्न हो गया था. किसी के यहां मृत्यु होने पर उनके यहां जाने की परंपरा पुरानी रही है. हमारे यहां इसे पूछार कहते हैं.
कल पप्पू यादवजी पूछार में गये तो वहां शकील साहब और उनके परिजनों से मिलते हुए दर्जन भर फोटो हुआ. उन तस्वीरों में साफ दिख रहा है कि वह आंख में आंसू भरकर कैमरे की ओर देखने की कोशिश कर रहे हैं.


तस्वीरों के बाद वीडियो भी एकदम सिनेमाई अंदाज में बनवाये. उसे साझा किया. पप्पू यादव की जो ताकत है, वही कमजोरी है. वे सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल करते हैं. बात-बात पर ही नहीं, बे-बात पर भी.
नोट बांटते हैं, तो उसका वीडियो. कुछ भी करते हैं, तो उसका वीडियो. कोविड टाइम में गांव-गांव के युवाओं के बीच पप्पू यादव लोकप्रिय हुए. यह बात चलने लगी कि पप्पू यादव मसीहा टाइप नेता हैं. पर, वह इतना अधिक वीडियो डालने लगे, इतना अधिक फोटो कि उन्हीं युवाओं ने यह भी कहना शुरू किया कि वीडियोबाजी-फोटोबाजी ज्यादा करते हैं.
यह बात सिर्फ पप्पू यादव की नहीं. आज अनेक लोग बात-बात पर फोटो या वीडियो जरूर डालते हैं. विजुअल सपोर्ट के बिना अपने कहे पर उन्हें विश्वास नहीं रहता. यह डर उन्हें कमजोर बना चुका है. यह विश्वास और आत्मविश्वास, दोनों का कम होना बताता है. आपके कहे सामान्य बातों पर भी लोग भरोसा नहीं करेंगे, इस डर से बचना चाहिए.
विजुअल सपोर्ट ठीक है. पर, हर बात पर, बे-बात पर भी, ठीक नहीं. किसी से कायदे से अगर आप घंटे भर मिले हैं, किसी घटना को देखे हैं और उससे आपके मन में कोई बात आई है, तो उसे बताइए. बात में दम होने पर लोग विजुअल ही नहीं खोजेंगे.
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