Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : पश्चिम बंगाल चुनाव में जो हो रहा है और केरल में भाजपा जो कर रही है वह ‘खबर’ नहीं है

पश्चिम बंगाल में फर्जी वोटर बनाने की कोशिश और साजिश का पर्दाफाश हुआ, कुछ होगा इसकी उम्मीद तो नहीं ही है खबर भी नहीं है। आज जो खबर या शीर्षक सबसे आम है वह है, ट्रम्प ने सहयोगियों से कहा – होर्मुज जाइये और अपना तेल ले आइए। अखबारों को बताना चाहिए था कि भारत के लिए इसका क्या मतलब हुआ या यह भी कि उन्हें क्या समझ में आया या क्या नहीं समझ में आया। पर महामारी भगाने के लिए ताली थाली बजाने वालों के देश और राज में जो हो रहा है वह खबर नहीं है।

संजय कुमार सिंह

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी की सरकार जो कुछ भी करती रही है उसमें ज्यादातर का लक्ष्य चुनाव जीतना लगता है। इसमें ऑपरेशन सिन्दूर से लेकर ईरान मामले में प्रधानमंत्री का देर से बोलना शामिल है। तब बिहार में चुनाव थे अब बंगाल समेत पांच राज्यों में चुनाव है। अखबारों में जो प्रचार है उससे अलग, ऐसी खबरें पहले पन्ने पर नहीं होती हैं जो भाजपा के अनुकूल नहीं है। आज भी ऐसा ही है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर और उसके बाद की स्थितियों पर सोशल मीडिया में काफी कुछ है। दि एशियन एज में छपी खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि भाजपा पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में 30 हजार बाहरी लोगों को घुसाना चाहती है। ठीक है कि यह आरोप है और सबूत या शपथपत्र ‘नहीं’ है। हालांकि सोशल मीडिया पर तृणमूल कांग्रेस ने ढेर सारे सबूत पोस्ट किए हैं। इनमें तर्क, वीडियो और तस्वीरों के अलावा खबरें भी हैं जो मीडिया आम तौर पर रिपोर्ट नहीं करता है या इन्हें प्रमुखता नहीं देता है। इसलिए मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप पर्याप्त गंभीर है। दिल्ली में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो कहा जा सकता है कि मीडिया भाजपा विरोधी खबरों को कुचल देता है। दि एशियन एज में केरल चुनाव से जुड़ी एक खबर भी है। भाजपा ने केरल को प्रभावित करने के लिए मुफ्त एलपीजी, एम्स, 3000 रुपए पेंशन का वादा किया। खबर के अनुसार भाजपा अध्यक्ष ने घोषणा पत्र जारी किया और एलडीएफ-यूडीएफ के 17 ‘कुशासन’ की आलोचना की।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह उत्तर भारत या हिन्दी पट्टी की भाजपाई घोषणा से अलग नहीं है और अलग है तो इसमें गोभक्ति या गोमांस का विरोध नहीं है। भाजपा की राजनीति से अब यह स्पष्ट हो चला है कि उसकी कथनी और करनी में भारी अंतर है तथा चुनाव जीतने का उसका फॉर्मूला या रणनीति घिसी-पिटी है। मीडिया का काम था कि वह झूठ बोल कर सत्ता में आई भाजपा से जुड़े ऐसे तथ्य उजागर करता जिससे आम लोगों को भाजपा के बारे में सही राय बनाने में मदद मिलती। लेकिन मीडिया यह सब नहीं कर रहा है। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में अब नाम जुड़वाने की कोशिश चुनाव चोरी में आएगी और केरल में भाजपा का प्रचार उसी रणनीति पर चलना है। इसलिए दोनों बड़ी खबर है लेकिन दिल्ली में पहले पन्ने पर नहीं है। यही नहीं, कोलकाता के द टेलीग्राफ के अनुसार, बंगाल भाजपा में ज़ोरदार चर्चा है कि गुरुवार को सुवेंदु अधिकारी जब भवानीपुर विधानसभा सीट के लिए अपना नामांकन दाखिल करेंगे तो गृह मंत्री अमित शाह उनके साथ होंगे। इस सीट पर वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टक्कर दे रहे हैं। अमित शाह का यह दुर्लभ कदम अधिकारी को बंगाल में पार्टी के मुख्य चेहरे के तौर पर मज़बूती से उभारेगा, हालाँकि पार्टी ने अपनी अलिखित नीति के अनुसार इन चुनावों के लिए मुख्यमंत्री पद का कोई चेहरा पेश नहीं किया है। कलकत्ता में भाजपा  के एक नेता ने कहा, “अगर राष्ट्रीय महत्व का कोई और मुद्दा सामने नहीं आता है, तो यह तय है कि सुवेंदु अधिकारी जब भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन दाखिल करेंगे तो अमित शाह पश्चिम बंगाल विधान सभा में विपक्ष के नेता के साथ होंगे। गुरुवार को होने वाले भव्य नामांकन जुलूस में अमित शाह खुद हिस्सा लेंगे – यह बात विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।” खासकर तब जब मतदाता सूची में पिछले दरवाजे से 30 हजार नाम शामिल करवाने की भाजपाई कोशिश और उसकी लगभग कामयाबी उजागर हो चुकी है। इसलिए भी इन खबरों का महत्व है।

ऐसे में आज ज्यादातर अखबारों में युद्ध से जुड़ी खबरें ही हैं। निश्चित रूप से ये खबरें महत्वपूर्ण हैं लेकिन इनकी सत्यता से लेकर तर्क संगतता तक सब संदिग्ध है तो मेरा मानना है कि देशी खबरों को खासकर राजनीति को महत्व मिलना चाहिए। अखबारों में ऐसी खबरें ज्यादा पढ़ी जाती हैं और इस सरकार में एक तरफा खबरें ही छप रही हैं तब निष्पक्ष और गंभीर खबरें दुर्लभ हो गई हैं। दि एशियन एज में भी युद्ध की खबर लीड नहीं है। जो कई दूसरे अखबारों में लीड है वह यहां सेकेंड लीड है। लीड गुजरात से प्रधानमंत्री की रैली की खबर है। हालांकि इसमें कुछ नया या खास नहीं है और वही सब है जो वे बोलते रहे हैं यानी कांग्रेस की आलोचना और बस वही। दूसरे अखबारों ने इसे महत्व नहीं दिया है तो इसका भी कारण होगा और ऐसे में युद्ध की खबर ही बचती है। अपने संवाददाता भेजकर खबर या कवर करवाना अब मुश्किल है, महंगा और जोखिम भरा तो था ही। नवोदय टाइम्स में देसी और युद्ध की दो खबरें चार-चार कॉलम में लगभग बराबर में हैं। अमर उजाला में आज भी दो पहले पन्ने हैं। इनमें पहले वाले पर युद्ध की खबर है और दूसरे पर बिहार के एक मंदिर में भगदड़ मचने से नौ लोगों की मौत की खबर है। कहने की जरूरत नहीं है कि मंदिर भले बन गया हिन्दुओं की भीड़ में भगदड़ मचना और उससे मौतें कम नहीं हुई हैं। किसी गैर भाजपाई राज्य में ऐसा हो तो सीबीआई जांच होगी बाकी की खबर भी ठीक से नहीं छपेगी। यह अब न्यू इंडिया में आम है। देशबन्धु में टीएमसी-भाजपा कार्यकर्ताओं में झड़प की खबर लीड है। इसके साथ बाहरी लोगों को वोटर बनाने की कोशिश भी खबर है। अंग्रेजी के बाकी अखबारों में ऐसा नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने या पहले पन्ने पर बंगाल की कोई खबर नहीं है। माओवादियों के समर्पण की खबर और इसका दावा लीड है। पहले पन्ने की लीड युद्ध की खबर है। सेकेंड लीड चुनावी खबर है। द हिन्दू की लीड युद्ध पर ट्रम्प का एक बयान है। सेकेंड लीड बिहार के मंदिर में भगदड़ से मरने वालों की खबर है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड भी ट्रम्प का बयान है। सेकेंड लीड प्रशासनिक व्यवस्था की खबर है और आज इस खबर को सबसे ज्यादा प्रमुखता यहीं मिली है। इंडियन एक्सप्रेस में युद्ध की खबर प्रमुखता से है और सेकेंड लीड जैसा कुछ नहीं है। बंगाल की खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

वोट चोरी और चुनाव चोरी के आरोपों के बाद भाजपा की प्रतिक्रिया, चुनाव आयोग की कार्रवाई और शिकायतों व उदाहरणों आदि से यह लगने लगा है कि भाजपा मतदाता सूची से विपक्षी वोटर को हटवाने और समर्थक वोटर को शामिल करवाने का काम करती है। राहुल गांधी ने शिकायत की है तो उन्हें शपथपत्र देना पड़ेगा या माफी मांगनी होगी कहने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त ने नहीं बताया है कि शपथपत्र मिला या माफी मांग ली। कार्रवाई का तो बताते ही नहीं हैं। ऐसे में आज खबर है कि पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर आरोप लगाया है कि भाजपा पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में 30 हजार बाहरी लोगों को घुसाना चाहती है।

तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर लिखा है और यह खबर नहीं है इसलिए यहां पेश है। भाजपा ने वोटर लिस्ट में हेराफेरी करने की गंदी कला में महारत हासिल कर ली है। उन्होंने दिल्ली और महाराष्ट्र में इसकी ‘वार्म-अप’ प्रैक्टिस की। अब वे बंगाल में असली मैच खेल रहे हैं। महाराष्ट्र में, 5 सालों में 43,84,814 वोटर जोड़े गए, और सिर्फ़ 5 महीनों में 40,81,229 और वोटर जोड़ दिए गए। दिल्ली में: 4 सालों में 4,16,648 वोटर जोड़े गए, और सिर्फ़ सात महीनों में 3,99,362 और वोटर जोड़ दिए गए। मैंने तब भी चेतावनी दी थी कि असली धांधली ईवीएम में नहीं, वोटर लिस्ट में होती है। बंगाल में अब ठीक यही देखने को मिल रहा है। बिहार और उत्तर प्रदेश से वोटरों को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बंगाल की वोटर लिस्ट में शामिल करने की साज़िश रची जा रही है। और यह बेहद चौंकाने वाली बात है कि चुनाव आयोग ने इस साज़िश को रोकने के बजाय इसके आगे घुटने टेक दिए और इसे होने दिया।

चुनाव आयोग के नियमों में कहीं भी ‘फ़ॉर्म 6’ को बड़ी संख्या में (बल्क में) जमा करने की इजाज़त नहीं है। इसकी सीमा साफ़ तौर पर तय है कि एक व्यक्ति ज़्यादा से ज़्यादा 50 आवेदन ही जमा कर सकता है। फिर भी यहाँ, मुट्ठी भर लोग हज़ारों फ़ॉर्म जमा कर रहे हैं—जो न सिर्फ़ नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद पर ही सीधा हमला है। हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हैं, लेकिन हमारे लोकतांत्रिक अधिकारों का रक्षक ही सक्रिय रूप से इस लोकतंत्र को कमज़ोर करने में मदद कर रहा है। जब भाजपा ने “पल्टनो दोरकार” का नारा लगाया था, तो असल में उनका मतलब था “वोटर लिस्ट पल्टनो दोरकार” (वोटर लिस्ट में हेराफेरी करना ज़रूरी है)। जब उन्होंने “पोरिबोरतोन” (बदलाव) का नारा लगाया, तो उनका मतलब था “डेमोग्राफ़िक पोरिबोरतोन” (जनसांख्यिकीय बदलाव)—यानी बंगाल के अपने वोटरों को हटाकर, भाजपा शासित राज्यों से लाए गए वोटरों को उनकी जगह लाना।”

पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल ने कहा है, “….ईआरओ के किसी भी कार्यालय में, कहीं भी, वर्ष के किसी भी दिन फॉर्म 6 स्वीकार किया जा सकता है, इस बात पर कोई प्रतिबंध नहीं है कि चुनाव घोषित हो चुका है और कोई भी फॉर्म-6 एकत्र या जमा नहीं कर सकता है…।” मुद्दा यह है भाजपा हजारों की संख्या में फॉर्म-6 अभी क्यों जमा करवा रही है? चुनाव आयोग लेने से मना नहीं कर सकता है? अगर ले ही लिए हैं तो क्या उसकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि इसे सार्वजनिक कर देता? क्या ऐसा करने वाले में सभी पार्टी के लोग हैं या सब आम मतदाता है या भाजपा के लोग करवा रहे हैं? चुनाव अधिकारी ने यह सब खुद बताया होता कि भाजपा ने बड़ी संख्या में फॉर्म 6 जमा कराए हैं लेकिन मैं उनपर चुनाव के बाद विचार करूंगा तो बात ही कुछ होती। निष्पक्ष दिखने के लिए यह नाटक किया जा सकता था लेकिन मौजूदा व्यवस्था में इसकी भी जरूरत नहीं है जो चोरी पकड़ी गई वह अलग है। उसके बाद भी चुनाव आयोग के अधिकारी ने जो कहा वह यही कि मेरा अधिकार है। और अब यही कहना बाकी है कि चुनाव आयोग को सरकार के पक्ष में काम करने की आजादी है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन