देश की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में एक जज के साथ न्याय होता तो नहीं दिखा। इसलिए उनका इस्तीफा खबर है, सिस्टम के शिकार हुए हुए जज। पर शीर्षक ऐसा नहीं है। अखबार यह नहीं बताते कि उनके घर देखे गए पैसों के कारण इस्तीफा देना पड़ा तो किन मामलों से पैसे कमाए होंगे या किसके लिए रास्ते से हटाए गए। मीडिया ने ना उनका दोष बताया ना उनके घर पैसे मिलने से हुई बदनामी को सही बताया या सिस्टम की मनमानी का संकेत दिया है। आम आदमी का मामला हो तो मीडिया ट्रायल चलता रहा है। अभी तो वह भी नहीं हुआ। एकतरफा बदनाम किया और इस्तीफा यानी हार मान लेना। ना यशवंत वर्मा का इंटरव्यू आया ना जगदीप धनखड़ का। यह मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति है या प्राप्त स्वतंत्रता के उपयोग की हद अथवा आजादी का स्तर।

संजय कुमार सिंह
आज की महत्वपूर्ण खबरों में एक दिलचस्प खबर है न्यायमूर्ति यशंवत वर्मा के इस्तीफे की। देश में जज लोया की संदिग्ध मौत के बाद जज के इस्तीफे की इस खबर के बीच न्यायपालिका में राजनीति या राजनीति में न्यायपालिका के ढेरों मामले हैं। इसलिए यह इस्तीफा अकेला या साधारण नहीं हो सकता है। बहुत संभावना है कि उनके पास पैसे होंगे जो जल गए और उतनी ही संभावना है कि उनके घर पैसे रखकर बाकी का नाटक किया गया। इसी वजह से अब इस्तीफा हुआ और इसकी खबर आई है। इस बीच उपराष्ट्रपति के इस्तीफे के साथ उनके गायब हो जाने, यह कहना कि दाढ़ी वालों से डर लगता है फिर भी उनका कोई एक्सक्लूसिव इंटरव्यू नहीं आना मीडिया के दिशाहीन होने का भी संकेत देता है। चिन्ता की बात है कि जज लोया को 100 करोड़ रुपए की रिश्वत की पेशकश किए जाने के बाद उनकी संदिग्ध मौत की जांच नहीं हुई और अब एक जज को इस तरह फंसाए जाने की आशंका पर कायदे की खबर नहीं है। एक साल से ज्यादा समय के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हम जानते हैं कि जज लोया के निधन के बाद जो हुआ है उसमें मुख्य आरोपी अमित शाह 2019 में देश के गृहमंत्री बन गए। भारतीय जनता पार्टी के विरोधियों को परेशान करने, कुचलने और नियंत्रित करने के तमाम उपाय किए गए। इनमें विपक्षी दलों और लोगों को दबाने, कुचलने के लिए जो सब किया गया वह भी शामिल है। आम आदमी पार्टी के खिलाफ एक (फर्जी) मामला बनाना, उसके कई नेताओं को जेल भेजना और पहली बार किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री का पद पर रहते जेल जाना, पीएमएलए के तहत मामला बना दिया जाना और फिर जेल से सरकार चलाने की ‘परंपरा’ को रोकने और जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए नए कानून का प्रस्ताव।
केंद्रीय गृहमंत्री और भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने (130वां) संविधान संशोधन विधेयक 2025 प्रस्तावित किया गया। इसके तहत, यदि कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री गंभीर आपराधिक मामलों (5 वर्ष या अधिक की सजा) में लगातार 30 दिनों से ज्यादा जेल (हिरासत) में रहता है, तो 31वें दिन उनका पद स्वतः ही समाप्त माना जाएगा। 31वें दिन निर्वाचित केंद्रीय मंत्रियों को राष्ट्रपति और राज्य मंत्रियों को राज्यपाल द्वारा हटाया जाएगा। राष्ट्रपति या राज्यपालों की नियुक्ति और अधिकार के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। कहने के लिए तो इस नियम में प्रधानमंत्री को भी शामिल किया गया है लेकिन ऐसे कानून की जरूरत किसी प्रधानमंत्री को ही हो सकती है और जाहिर है उसी का बनाया राष्ट्रपति उसके खिलाफ इसका उपयोग नहीं करेगा। यह वैसे ही होगा जैसे राज्यपालों से मुख्यमंत्रियों के खिलाफ काम करवाया जाता रहा है। देश में कानून की स्थिति और उसका हाल बताने वाला यह मामला आज अखबारों में एक सामान्य खबर की तरह छपा है।
जज के घर में पैसे मिलना निश्चित रूप से असामान्य है लेकिन उनका कहना भी मायने रखता है। आज की खबर से लगता है कि जज को भी फंसाया जा सकता है और उसके पास भी इस्तीफा देने या बदनामी स्वीकार करने के अलावा विकल्प नहीं है। अगर जज को न्याय नहीं मिला या मिलता हुआ नहीं लग रहा है तो बाकी मामलों में न्याय कहां हुआ होगा या क्यों माना जाए कि हो रहा है। अरविन्द केजरीवाल का मामला अभी चर्चा में है। उसके साथ यह तथ्य भी कि अरविन्द केजरीवाल ने मामले को किसी और पीठ में भेजने की मांग की है। जज अपने स्तर पर इसके लिए तैयार नहीं हैं। मोटे तौर पर मामला सीबीआई बनाम अरविन्द केजरीवाल या आम आदमी पार्टी का है और सीबीआई की ओर से सरकारी वकील जज का बचाव कर रहे हैं जबकि जज के बच्चे सरकारी वकील हैं। जाहिर है मामला हितों के टकराव का हो सकता है और पिछली सरकार में ऐसे मामलों में जज स्वयं ऐसे मामलों से अलग हो जाते थे। यहां मांग करने पर भी बहाने बनाए जा रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि कितना बदलाव आ गया है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि जज पर खास फैसला देने का दबाव हो और उन्हें इससे अलग होने की इजाजत ही नहीं हो। जो भी हो, स्थिति चिन्ताजनक है पर खबरें अखबारों में नहीं होती हैं। आज भी नहीं हैं। अक्सर नहीं होती हैं, ऐसी बहुत सारी खबरें नहीं होती हैं।
अमर उजाला में आज यह खबर लीड है। शीर्षक है, घर से मिले अधजले नोटों की जांच के बीच जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा। उपशीर्षक है – लोकसभा में महाभियोग की प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रपति को भेजा त्यागपत्र… अब कार्यवाही हो जाएगी निष्प्रभावी। इसमें जस्टिस वर्मा का कहा यह भी है कि, मुझे बदनामी अभियान का शिकार बनाया गया। एक खबर यह भी है कि इस्तीफा स्वीकार हुआ तो पारदर्शी जांच पर असर होगा। जाहिर है, ऐसा है तो इस्तीफा देना मजबूरी हो या दबाव – इस बात की संभावना नहीं दिखी होगी कि पारदर्शी जांच होगी। वैसे भी, एक साल से ज्यादा हो गए – मीडिया ने यह नहीं बताया कि जज यशवंत वर्मा ने पैसे कमाए होंगे तो किन मामलों में या उनका कहना या कहने का मतलब सही है कि किसी ने पैसे रखकर सारा ड्रामा किया या करवाया। जब सीबीआई के जज लोया को वर्षों पूर्व 100 करोड़ की पेशकश थी तो इन्हें रास्ते से हटाने, बदनाम करने के लिए भी ऐसी राशि खर्च की जा सकती है। मीडिया ने यह भी नहीं बताया कि ऐसा कोई मामला था या नहीं और था तो किसका या नहीं था तो उनके आरोप में दम नहीं है। कुल मिलाकर, न्यायमूर्ति वर्मा सिस्टम के शिकार हो गए लगते हैं और जब उन्हें मदद नहीं मिली तो किसे मिलेगी? क्या मीडिया और मीडिया के लोग वाकई स्वतंत्र हैं या तिहाड़ी चौधरी की तरह वसूली ही करते हैं।
देशबन्धु में तीन कॉलम की एक सामान्य खबर है। इसमें लिखा है, … वह अपने फैसले के पीछे के कारणों से राष्ट्रपति के गरिमापूर्ण पद पर बोझ नहीं डालना चाहते हैं। यह लाइन संकेत देती है कि वे सिस्टम के शिकार हुए हैं और मीडिया का साथ नहीं मिला। नवोदय टाइम्स में दो कॉलम की खबर है, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का इस्तीफा महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी। इस शीर्षक का संदेश यही है कि महाभियोग की कार्यवाही निष्प्रभावी हो गई। सिस्टम जीत गया या जज सिस्टम से हार गए। खबर के साथ हाईलाइट किया हुआ अंश है, आवास से जली हुई नोटों की गड्डियां मिलने पर कर रहे थे आलोचना का सामना। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है। हालांकि शीर्षक मुझे तथ्यों से थोड़ा अलग लगता है। जरूरत से ज्यादा सामान्यीकरण न सिर्फ सिस्टम की जीत बताता है उसे सामान्य भी बना देता है। द हिन्दू में यह टॉप पर सिंगल कॉलम की खबर है। इसका शीर्षक है, हटाने की कार्यवाही के बीच न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा दिया। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर टॉप पर है और दो कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सेकेंड लीड है। मुख्य खबर के साथ न्यायमूर्ति वर्मा का पक्ष बॉक्स में हाईलाइट किया गया है। इसके अनुसार, जांच पैनल से उन्होंने कहा है कि, ‘जांच में नाइंसाफ़ी हुई’। लोकसभा द्वारा बनाई गई जांच समिति को भेजे गए एक सख़्त संदेश में, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा ने आरोप लगाया है कि उनके ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही शुरू से ही “नाइंसाफ़ी” से भरी थी। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि इतिहास एक दिन इस बात का फ़ैसला करेगा कि एक मौजूदा संवैधानिक अदालत के जज के साथ किस तरह का बर्ताव किया गया।
मुझे लगता है कि इस मामले की खास बात यही है और इसे आज खबरों में प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। लेकिन दि एशियन एज में यह सिंगल कॉलम की खबर है। लीड यूसीसी (समान नागरिक संहिता), घुसपैठियों के खिलाफ कार्रवाई और महिलाओं व बेरोजगारों के लिए 3,000 रुपए प्रति माह का भाजपा का प्रण है। मेरे आठ अखबारों में अकेले द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। कोलकाता के द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर जो खबर है वह दिल्ली के किसी और अखबार में इस तरह से तो नहीं ही है। कहने की जरूरत नहीं है कि 27 लाख से ज्यादा वोटर की सुनवाई नहीं होने और उन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया जाना बड़ा मामला है। लेकिन यह कई और अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। मुझे लगता है कि इसका कारण यही है कि यह सिस्टम का सच बताता है और सिस्टम नहीं चाहता है कि ऐसी खबरों को महत्व मिले। द टेलीग्राफ के अनुसार 23 और 29 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बंगाल की वोटर लिस्ट गुरुवार आधी रात को फ़ाइनल कर दी गई। जाँच-पड़ताल के बाद इस लिस्ट से 27,16,393 नाम हटा दिए गए थे। ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए बनाए गए ट्रिब्यूनलों ने तब तक सिर्फ़ 4 मामलों की सुनवाई करके उन्हें मंज़ूरी दी थी। क्योंकि हटाए गए सभी लोग ट्रिब्यूनल में अपील करने के हकदार थे, इसलिए उनके वोट देने के अधिकार के दरवाज़े बंद होने तक मामलों के निपटारे की दर सिर्फ़ 0.0000014725409% थी। यह एसआईआर की हकीकत है कि जो वोट नहीं दे सकते हैं वे दुनिया का 143वाँ सबसे बड़ा देश बना सकते हैं। कलकत्ता डेटलाइन से सुभाशीष चौधरी और आलमगीर हुसैन की बाईलाइन से छपी खबर के अनुसार जमैका की पूरी आबादी के लगभग बराबर। भूटान की आबादी से तीन गुना ज़्यादा। जाँच-पड़ताल की प्रक्रिया के ज़रिए बंगाल की वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों की संख्या इतनी ही है—सिर्फ़ सत्ताईस लाख सोलह हज़ार तीन सौ तिरानवे। अगर ये लोग अपना खुद का देश बना लें, तो यह दुनिया के 196 आम तौर पर मान्यता प्राप्त देशों में से 143वाँ सबसे बड़ा देश होगा, जो लिथुआनिया, नामीबिया और कुवैत जैसे देशों की कतार में खड़ा होगा। इंडियन एक्सप्रेस की खबर बताती है कि 44 विधानसभा क्षेत्रों में एडजुकेशन से हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 के अंतर से ज्यादा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भाजपा के वादे बड़ी खबर है, एसआईआर की खबर छोटी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


