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आज के अखबार : पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए मैदान तैयार होने की खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सभी अखबारों में सभी अखबारों की लीड ईरान पर हमले की खबर है। देसी खबरों में लगभग सबों में पश्चिम बंगाल एसआईआर की खबर है। अमर उजाला मेरे नौ अखबारों में अकेला है जिसमें पश्चिम बंगाल एसआईआर की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। आज की अन्य खास खबरों में एक है, दि एशियन एज ने कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के आरोप को सिंगल कॉलम में ही सही, पहले पन्ने पर जगह दी है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि कांग्रेस जहां कहीं भी भारत को बदनाम कर सकती है करती है। यह तब है जब एपस्टीन फाइल में नाम होने, बचाव में झूठ बोलने के बावजूद केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी के बारे में मीडिया ने सूत्रों के हवाले से कहा है उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है। यह भारतीय मीडिया का चरित्र है। इसीलिए द हिन्दू की खबर, राहत मिलने के कुछ ही घंटे में युवक कांग्रेस अध्यक्ष को मिले जमानत पर स्टे लग गया को दूसरे अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। द हिन्दू में यह चार कॉलम की खबर इस प्रकार है, दिल्ली की एक अदालत ने भारतीय युवा कांग्रेस (आईवाईसी) के अध्यक्ष उदय भानु चिब को जमानत दी। इसके कुछ ही घंटों बाद, एक सत्र न्यायालय ने शनिवार को उनकी जमानत पर रोक लगा दी। आप जानते हैं कि नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट में 20 फरवरी को हुए विरोध प्रदर्शन से सरकार और प्रधानमंत्री खासे नाराज हैं और इसी को देश को बदनाम करने की कांग्रेस की कोशिश कहते हैं। वे शर्ट उतार कर बनियान में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को नंगई कह रहे हैं। उदय भानु चिब को इसी सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है और जमानत नहीं हो रही है। चिब का यह मामला जो आज अखबारों में छपा है, अदालतों या अदालती प्रक्रिया पर सरकारी दबाव का नतीजा है। इस कारण यह बड़ी खबर है लेकिन अखबारों में प्रधानमंत्री के आरोप को तूल दिया जा रहा है।

इसी तरह, टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है जो बताती है कि आम आदमी पार्टी की शराब नीति के मामले में अरविन्द केजरीवाल और दूसरों के खिलाफ मामले को खत्म करते हुए। अदालत ने कहा है कि इस नीति के लिए उस समय के एलजी से भी सलाह ली गई थी। फिर भी मुख्यमंत्री (सरकार) के खिलाफ ही कार्रवाई की गई। जाहिर है कि अरविन्द केजरीवाल चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बने थे जबकि एलजी सरकार की कृपा से बना जाता है और मोदी सरकार ने दिल्ली के उपराज्पाल के अधिकार बढ़ा दिए हैं। द हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, महाराष्ट्र के पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के विमान की दुर्घटना की शुरुआती रिपोर्ट में विजिबिलिटी पर फोकस किया जा रहा है। नवोदय टाइम्स में फोल्ड के नीचे बंगाल में 63 लाख नाम कटे शीर्षक से खबर है। इस खबर के साथ सूचना यह भी है कि ममता बनर्जी के भवानीपुर सीट से 47,000 नाम हटाए गए। देशबन्धु की खबर का शीर्षक 61 लाख से अधिकर नाम हटाए जाने की जानकारी देता है। इस खबर के अनुसार, अमर्त्य सेन का नाम शामिल हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर टॉप पर है। इस खबर के अनुसार पश्चिम बंगाल में एसआईआर पूरा हुआ। मतदाताओं की संख्या आठ प्रतिशत कम हुई, आठ प्रतिशत के मामले में निर्णय होना है। इस खबर का उपशीर्षक है, 60 लाख मतदाताओं के मामले में फैसला होना है और क्लियर नहीं होने तक वोट नहीं दे पाएंगे। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर भी यही है कि एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल में 62 लाख वोटर कम हुए।

टाइम्स ऑफ इंडिया में चुनाव आयोग की अंतिम मतदाता सूची में बंगाल के 64 लाख वोटर हटाए गए, 60 लाख पर विचार होना है कुल संख्या 16 प्रतिशत कम हुई। द हिन्दू में भी यह खबर टॉप पर दो कॉलम में है। सीईओ के हवाले से लिखा है, पश्चिम बंगाल के मतदाता 8.09 प्रतिशत घटकर 7.04 करोड़ रह गए। दि एशियन एज में यह खबर चार कॉलम में है। मुख्य शीर्षक है, चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची को काट छांट कर 7.04 करोड़ का बनाया। उपशीर्षक है, एसआईआर में 63.66 लाख नाम हटाए गए हैं और 60.06 लाख पर फैसला होना है। दे टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, 5 लाख नाम पक्के तौर पर हटाए गए हैं। मुख्य शीर्षक है, बंगाल एसआईआर की अंतिम सूची में 60 लाख सवाल हैं। पूरे मामले का विवरण इस प्रकार है, चुनाव आयोग ने शनिवार को बंगाल के लिए एसआईआर के बाद की प्रारंभिक “अंतिम” सूची प्रकाशित की। इसमें 60 लाख “विचाराधीन” और पांच लाख से अधिक “हटाए गए” मतदाता शामिल हैं। इससे जनता, पार्टियां और अधिकारी अभी भी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि अंततः कितने और कौन से मतदाता मतदान कर पाएंगे। सूत्रों के अनुसार, हटाए गए इन 60 लाख मतदाताओं में से एक तिहाई मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों से हैं, जहां मुस्लिम आबादी का अनुपात सबसे अधिक है। कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में भाजपा के चुनाव जीतने के लिए मैदान तैयार हो गया है। अखबारों ने यह बात सीधे नहीं लिखी है और अमर उजाला ने पहले पन्ने पर कोई संकेत नहीं दिया है।  

एसआईआर से संबंधित इन खबरों से कई चीजें साफ हैं। सबसे पहले तो यह कि चुनाव आयोग समय पर एसआईआर पूरा नहीं कर पाया। मतदाता सूची की समीक्षा ऐसा काम नहीं है कि जल्दबाजी में किया जाए, उसके लिए जजों को लगाना पड़े और फिर भी समय पर पूरा नहीं हो तो एसआईआर करने की जिद्द, जरूरत और झंझट का मकसद क्या था और किसके फायदे के लिए किया गया। कितने लोग हटाए गए इसकी सूचना अलग अखबारों में अलग है। इसका मतलब यही होता है कि कोई स्पष्ट विज्ञप्ति जारी नहीं की गई और ऐसा नहीं किया जाना जल्दबाजी में किए जाने का सबूत है। पारदर्शिता नहीं होना तो स्पष्ट ही है। हालांकि पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी द्वारा प्रेस कांफ्रेंस किए जाने की खबर है। उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि कुल मतदाताओं की संख्या कम हुई है। इससे साफ है कि एसआईआर समावेशी नहीं रहा और शुरू से यही आरोप था कि इसका मकसद मुस्लिम और भाजपा विरोधी  मतदाताओं के नाम काटना है। आरोप यह भी था कि कनिष्ठ अधिकारियों को नाम काटने का अधिकार दे दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद न्यायिक अधिकारियों की सेवा ली गई। द टेलीग्राफ ने एसआईआर में शामिल एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से लिखा है, “फिलहाल, मतदाता सूची में 7.04 करोड़ (पात्र) मतदाता शामिल हैं। पिछले साल 27 अक्टूबर की मतदाता सूची से ‘केवल’ 63.71 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जो उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तुलना में काफी कम है। यहां 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए थे।” साफ है कि बंगाल में एसआईआऱ का विरोध ज्यादा रहा है तो यह बताने की कोशिश चल रही है कि यहां डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश के मुकाबले कम नाम हटाए गए हैं। पर मूल मुद्दा तो यही है कि नाम हटाना सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के हित में है। उत्तर प्रदेश में हटाए गए हैं तो पश्चिम बंगाल में हटाना ठीक नहीं हो जाएगा और भाजपा का उद्देश्य तो एक ही है। एसआईआर के तहत मुसलमानों के नाम हटाने के लिए थोक और फर्जी आवेदन की खबरें आती रही हैं लेकिन कार्रवाई की सूचना नहीं है। इस तरह कारण और आधार चाहे जो हो, एसआईआर के तहत बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए। शुरू में एसआईआर का मकसद यही कहा-बताया गया था कि विदेशियों को मतदाता सूची में नहीं रखा जा सकता है और चुनाव आयोग इसी की जांच कर रहा है तथा उसे इसका अधिकार है। लेकिन बाद में लॉजिकल डिसक्रिपेंसी की जांच हुई और इसी आधार पर लोग न सिर्फ हटाए परेशान भी किए गए जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। कहने की जरूरत नहीं है कि इस आधार पर हटाए और छूट गए सभी लोग विदेशी या घुसपैठिए नहीं होंगे और एसआईआर के तहत जो हुआ उसका नतीजा यही रहा कि तमाम मतदाता अब मतदान के अधिकार से वंचित हो गए। अफसोस की बात यह कि यह सब चुनाव आयोग ने किया और सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में हुआ है।       

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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