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आज के अखबार : पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने की सरकारी कोशिशों और रणनीति पर कुछ खास नहीं है

द टेलीग्राफ का शीर्षक है, कुछ तो गड़बड़ है। अखबार ने बताया है, अगर मतदाता सूची से नाम हटाकर भी बात नहीं बनेगी तो प्रधानमंत्री जो कह रहे हैं उसमें भी सोचने के लिए कुछ है। यही नहीं ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटों को साधने के लिए 1000करोड़ रुपए के खेल में हुमायूं कबीर का नाम भी आया है। इसके अलावा राजधानी कलकत्ता की 11सीटों पर नाम हटाने से क्या फर्क पड़ सकता है उसका उदाहरण भी अखबार ने दिया है। सबसे खास है, बंगाल के लिए मछली मुहैया कराने का प्रधानमंत्री का संस्कारी।   

संजय कुमार सिंह

आज ज्यादातर अखबारों की लीड कल हुए मतदान की खबर है। ज्यादातर मतदान का प्रतिशत अच्छा है तो बंपर वोटिंग और जमकर वोट पड़े जैसे शीर्षक हैं। लेकिन असली खबर पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने की भाजपा की कोशिशें हैं। केंद्र की जो सरकार मणिपुर में कुछ नहीं कर (पा) रही है वह सत्ता छोड़ने या चुनाव हारने को तैयार नहीं है। अच्छा काम करके, मेहनत से और नियमानुसार चुनाव लड़कर चुनाव जीते जाएं तो किसी को दिक्कत होगी? लेकिन स्थिति यह हो गई है कि हिन्दुओं का भला करने आई सरकार के शासन में अमर उजाला की लीड के अनुसार, मेरठ में 859 अवैध निर्माण गिराने के आदेश कोर्ट ने कहा – यह पूरे देश के लिए चेतावनी है। इसी के साथ एक शीर्षक है, सख्ती से लागू होंगे नियम। आप जानते हैं कि आज का दिन बंगाल जीतने के लिए नियमों से खिलवाड़ की खबर का है और आज ही नियमों को सख्ती से लागू करने की यह खबर है। नियमों के पालन का हाल यह है कि आज द हिन्दू में खबर है, 550 करोड़ रुपए का बैंक घोटाला। सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की। हरियाणा सरकार ने दो आईएएस निलंबित किए हैं। इसमें दिलचस्प यह है कि घोटाला शेल कंपनियों के जरिए हुआ है। तथ्य है कि भ्रष्टाचार खत्म करने और विदेश में रखे काले धन के भारत में निवेश को रोकने के नाम पर इस सरकार ने लाखों कथित शेल कंपनियां बंद कराई हैं। फिर भी यह घोटाला हो गया। आज की खबरों में युद्ध की खबरों के अलावा जो सबसे दिलचस्प खबर है वह पश्चिम बंगाल चुनाव से जुड़ी खबरें ही हैं। लेकिन पहले पन्ने पर कम हैं।

दि एशियन एज की लीड प्रधानमंत्री की खबर है – टीएमसी के पापों की आलोचना की, बंगाल को खुश करने के लिए 6 गारंटी का वादा किया। द टेलीग्राफ ने लिखा है,शायद प्रधानमंत्री ने यह तय कर लिया है कि बंगाली वोटर के दिल तक पहुँचने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है। हो सकता है कि तृणमूल के इस दावे ने उन्हें घबरा दिया हो कि बंगाल में भाजपा  सरकार बनने पर मछली खाने पर रोक लगा दी जाएगी। या, शायद, पक्के शाकाहारी नरेंद्र मोदी की आँखों से आखिरकार परदा हट ही गया है; गुरुवार को जब नरेंद्र मोदी चुनाव वाले बंगाल में वोटों की ‘मछली’ पकड़ने निकले, तो उन्होंने पूरी गंभीरता से चारा डाला। हल्दिया में एक चुनावी रैली में उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस के भ्रष्टाचार की वजह से बंगाल को अपने पसंदीदा खाने के लिए दूसरे राज्यों के दरवाज़े खटखटाने पड़ते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि भाजपा सरकार इस स्थिति को सुधारेगी। उन्होंने कहा, “बंगाल में मछली की इतनी ज़्यादा माँग होने के बावजूद, यह राज्य मछली उत्पादन में अभी भी आत्मनिर्भर नहीं है। आज भी, बंगाल दूसरे राज्यों से मछली मँगवाता है।” आगे कहा, “अपने 15 साल के शासन में टीएमसी आपको मछली भी उपलब्ध नहीं करवा पाई है… यह भी टीएमसी के भ्रष्टाचार का ही एक उदाहरण है।” मोदी ने दावा किया कि पिछले 11 सालों में भारत में मछली का उत्पादन दोगुना हो गया है। उन्होंने पड़ोसी राज्यों बिहार और असम का उदाहरण देते हुए कहा, “जहाँ भी राजग सरकार सत्ता में है, वहाँ मछली का उत्पादन तेज़ी से बढ़ रहा है।” मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जो वोटरों को लगातार चेतावनी देती रही हैं कि बंगाल में भाजपा सरकार बनने पर मछली और माँस पर रोक लगा दी जाएगी, ने पलटवार किया। “इस बात का क्या कि वे खुद बिहार, यूपी और राजस्थान में मछली खाने की इजाज़त नहीं देते? दिल्ली में तो मछली और माँस बेचने वाली दुकानों पर हमले किए जाते हैं,” उन्होंने उत्तर 24-परगना के पाल्टा में कहा।

पश्चिम बंगाल में चुनाव है। इस बार दो ही चरणों में होना है। तृणमूल कांग्रेस से चुनाव जीतने की कोशिश में लगी भाजपा लगातार तीसरी बार मैदान में है। केंद्र में सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बार भी प्रधान प्रचारक की भूमिका में हैं। खबर है कि मतदाता सूची फाइनल हो गई, हटाए गए 27 लाख मतदाताओं में से दो की ही सुनवाई हो पाई। इंडियन एक्सप्रेस की खबर से स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के बनाए 19 ट्रिब्यूनल ने इन मामलों को देखा ही नहीं तो अब इन लोगों के वोट कर पाने की संभावना काफी कम है। इसलिए यह बड़ी खबर है लेकिन आज इस प्रमुखता से नहीं दिखी। कहने की जरूरत नहीं है कि घुसपैठिए हटाने के नाम पर शुरू हुआ यह अभियान आखिरकार लॉजिकल डिसक्रिपेंसी तथा मैपिंग आदि में फंस गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया, ट्रिब्यूनल बने लेकिन जिस दिन काम शुरू होना था, नहीं हुए। बाद में खबर थी कि एक कांग्रेस उम्मीदवार के मामले की सुनवाई हुई और उसका काम हो गया। आज खबर है कि ट्रिब्यूनल ने 27 लाख हटाए गए मामलों में से दो की ही सुनवाई ट्रिब्यूनल में हो पाई। बाकी इस बार वोट नहीं दे पाएंगे। दिलचस्प है कि ऐसा सुप्रीम कोर्ट की जानकारी और निगरानी में हुआ है। स्थिति यह बनी कि चुनाव आयोग या सरकार जिन मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर करके चुनाव से अलग रखना चाहती थी उनके अधिकारों की रक्षा सुप्रीम कोर्ट को करनी थी। सुप्रीम कोर्ट का रुख शुरू से एसआईआर करवाने वाला रहा मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा का नहीं। अगर रहा भी हो तो पोल तब खुली जब कहा गया कि जो इस बार वोट नहीं दे पाएंगे उनके मताधिकार (और दूसरे संबद्ध अधिकार भी) वोट नहीं देने के बावजूद सुरक्षित रहेंगे। यह नोटबंदी के बाद 500 के नोट के बदले 500 रुपए मिल जाने की ही तरह है। लेकिन यह समझ में नहीं आया कि बीच में जो परेशानी हुई वह किसलिए थी। इस बार समझ में आ रहा है।

द टेलीग्राफ में कोलकाता डेटलाइन से प्राणेश साकार की खबर छपी है। इसमें बताया गया है कि एसआईआर के कारण हटाए गए मतदाताओं की संख्या शहर की 11 सीटों पर बढ़त के अंतर को कम करती है। कोलकाता के सभी 11 विधानसभा क्षेत्रों में, हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2024 के आम चुनाव के दौरान इन सीटों पर तृणमूल या भाजपा की बढ़त के अंतर से कहीं अधिक है। जैसा कि इस समाचार पत्र ने पहले बताया था, तृणमूल के मुस्लिम, महिला और गरीब मतदाता वर्ग के कारण हटाए गए मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है। ऐसे में बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के कई मजबूत गढ़ अचानक असुरक्षित हो सकते हैं। 2024 में, तृणमूल शहर की 11 विधानसभा सीटों में से 9 पर आगे थी और भाजपा 2 पर। चुनाव आयोग के सूत्रों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों से पता चलता है कि एक विशेष सीट (चौरंगी) पर 80,000 से अधिक मतदाताओं को हटा दिया गया है। जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में वोटर घुसपैठिये नहीं हो सकते हैं और कथित विशेष सघन पुनरीक्षण के लिए या के कारण उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित करना लापरवाही हो या मनमानी, चूक हो या जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए थी। इस कारण चुनाव नतीजे बदल सकते हैं तो यह चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की श्रेणी में आएगा। इसलिए इसपर खबर होनी चाहिए थी लेकिन नहीं के बराबर है। जो है वह पर्याप्त गंभीर है। जैसे हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने वाले क्षेत्र मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं। यह व्यवस्था सत्तारूढ़ पार्टी ने समर्थक चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के सहयोग से कर ली है। चुनाव जीतने की इस चाणक्य नीति का आधार यही है कि जीत हार के अंतर से ज्यादा वोटर हटा दिए गए हैं।

द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, कलकत्ता पोर्ट से  77,125 नाम हटाए गए हैं यहां टीएमसी 42,893 वोट से आगे थी। भबानीपुर में 48,680 वोट हटाए गए हैं यहां टीएमसी 8,297 वोट से आगे थी। इसी तरह, राशबिहारी में 47,525  वोट हटाए गए हैं यहां टीएमसी 1,691 वोट से आगे थी। बालीगंज में 71,345 वोट हटाए गए हैं जबकि यहां टीएमसी 56,113 वोट से आगे थी। चौरंगी में 84,977 वोट हटाए गए हैं। यहां टीएमसी 14,645 वोट से आगे थी। एंटाली में 58,176 वोट हटाए गए टीएमसी 29,309 वोट से आगे थी। बेलघाटा में 66,019 वोट हटाए गए हैं यहां टीएमसी 46,112 वोट से आगे थी। माणिकतला में 42,603 वोट हटाए गए हैं यहां टीएमसी 3,575 वोट से आगे थी। काशीपुर बेलगछिया में 56,729 वोट हटाए गए हैं तृणमूल 7,268 वोट से आगे थी। जोराशांको में 76,524 में वोट हटाए गए हैं यहां भाजपा  7,401 वोट से आगे थी। इसी तरह श्यामपुकुर में 44,693 वोट हटाए गए हैं भाजपा 1,599 वोट से आगे थी। जिस संख्या में वोट हटाए गए हैं उसमें नतीजे बदलना मुश्किल नहीं है और बदल जाने के बाद एसआईआर या इस बहाने नाम हटाने के लिए अपनाए गए लॉजिकल डिसक्रिपेंसी या मैपिंग के बहाने को अच्छी तरह समझा जा सकता है। वैसे भाजपा के चाल-चरित्र और चेहरे से भी लग रहा है कि यह सब चुनाव जीतने के लिए किया गया। इतना सब करके भी भाजपा जैसी पार्टी चुनाव नहीं जीते तो सोचना पड़ेगा कि 2014 कैसे जीती होगी लेकिन वह अलग मामला है। 

जहां तक खबरों की बात है आज की कई खबरें दिलचस्प हैं। राज्यसभा के पूर्व उपसभापति हरिवंश को राज्यसभा सदस्य के रूप में मनोनीत कर दिया गया है। यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा। केंद्र सरकार के लिए बैसाखी के रूप में काम कर रहे नीतिश कुमार को दिल्ली में टाइप आठ का बंगला मिलेगा। आम आदमी पार्टी के अरविन्द केजरीवाल ने विधिवत मांग की है कि न्यायमूर्ति स्वर्ण लता शर्मा उनका मामला न सुनें (किसी और जज को दे दिया जाए) इस पर सुनवाई 13 अप्रैल को है। इस बीच खुलासा हुआ है कि न्यायमूर्ति के बेटे और बेटी – दोनों सरकारी वकील हैं। इस मामले में सरकार एक पक्ष है, सीबीआई की कथित जांच पर अदालत की टिप्पणी है। आम आदमी पार्टी से पीड़ित एक नेता की दलील है कि ऐसा तो हर राज्य में हर जगह है। उन्होंने लिखा नहीं है लेकिन समझाने की कोशिश की है कि केजरीवाल की यह मांग थिएटर करने जैसी है और सरकारी वकील ने यही कहा था। इस तरह यह खास किस्म की चाटुकारिता है पर वह अलग मुद्दा है। मामला हाईकोर्ट में अपील पर है। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने मिलकर जो कुछ किया उसका नतीजा यह है कि पश्चिम बंगाल के 27 लाख वोटर इस बार चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे। यही नहीं, भाजपा की जीत सुनिश्चित करने के लिए गोवा में गोमांस मुहैया कराने वाली भाजपा के प्रधान प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने बंगाल में पर्याप्त मछली मुहैया कराने का आश्वासन दिया है। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को किसी भी तरह हराने पर आमादा पूरा भाजपाई सिस्टम नारी शक्ति वंदन के विज्ञापन कई दिनों से छपवा रहा है। खबर है कि अगले चुनाव में फायदे के लिए महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी है। ऐसे में आज दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर पूरे पन्ने का विज्ञापन छपवा कर राजस्थान सरकार ने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी का हार्दिक आभार जताया है। यह आभार राजस्थान को दो बड़ी सौगात के लिए है। उधर बंगाल चुनाव के समय भी कह रहा है कि उसे केंद्र सरकार की योजनाओं के पैसे नहीं मिले हैं। जाहिर है, सरकार राज्यों को सौगात देने में मनमानी करती है, विपक्षी राज्यों को उनका जायज हक भी नहीं देती है। पश्चिम बंगाल के सांसद आरोप लगाते रहे हैं कि मनरेगा के पैसे उसे नहीं मिले हैं। फिर भी राजस्थान सरकार सौगात के लिए आभार जनता के पैसे से जता रही है। सरकारी पैसे की इस बर्बादी को रोकने का सबसे आसान तरीका था, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर करना। लेकिन हाल में मैंने सुना था, भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से जनहित याचिका (पीआईएल) व्यवस्था को खत्म करने का आग्रह किया है, क्योंकि इसका दुरुपयोग बढ़ रहा है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने माना कि कोर्ट अब पीआईएल को लेकर बहुत सतर्क है। केंद्र का तर्क है कि अब न्याय व्यवस्था पारदर्शी है, इसलिए निजी स्वार्थ के लिए पीआईएल की की आवश्यकता नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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