प्रभात रंजन-
फेसबुक से कोई अपराधी भी सम्मानित लेखक के रूप में स्थापित हो सकता है। लेकिन अपराधी तो अन्ततः अपराधी होता है। पटना की अकल्पनीय घटना कल्पित नहीं वास्तविक है।
संजीव चंदन-
पटना में युवा महिला लेखक के साथ जो हुआ उसके आरोपी का नाम लोग जानना चाहते हैं, उन्हें जानना चाहिए।
मैंने साहित्य समाज के सामने जो संकेत दिए उससे वे जान भी गए हैं। कुछ संकेतों में लिख रहे हैं। लेकिन गैर साहित्यिक लोग जानना चाहते हैं। मैंने इसके पहले जो पोस्ट लिखा था वह पटना के महिला साहित्यकारों के लिए खासकर लिखा था, खासकर जो एक्टिविस्ट भी हैं कि वे उस युवा लेखिका के पास जाएं और उनका मन बनाये, उन्हें साहस दें, साथ दें ताकि वह खुद सामने न आये तो भी हमें अनुमति दे कि नाम लें।
क्योंकि इस घटना में एक संस्था है, जिसके पास फेलोशिप है, वह देश के एक बड़े विश्विद्यालय के संस्थापक की संस्था है, उसे जिम्मेवार बनाना मेरे पोस्ट या मेरे कल के लाइव का उद्देश्य है। उसका नाम आयेगा तो आरोपी भी सामने होगा और विक्टिम भी होगी।
उस संस्थान ने इस मामले को चुपके से निपटाने की कोशिश की है।
हमारी आपकी भूमिका है कि उसे जिम्मेवार बनाने के लिए लेखिका का साथ दें, उनमें साहस भरें। पीड़ा में लिखी उनकी कविता पढ़ी। पढ़कर दुख हुआ। इरादा सिर्फ हंगामा नहीं हो। आमतौर पर साहित्य में ऐसे मामले आते हैं और आपस में निपटारे, सेटिंग का प्रसंग बन जाते हैं।
बात आरोपी से ज्यादा बड़ी है। संस्था आरोपी है। साहित्यिक संस्था है। कल नाम भी लेंगे। प्रमाण आ जाएं हाथ में तो। लेकिन साहित्यकारों को भी मिलने वाले फेलोशिप का लोभ छोड़कर संस्था को जिम्मेवार बनाना होगा। आखिर उसने मामले की लीपापोती क्यों की?
पहले भी फेलोशिप या अन्य लाभ के लिए कई मामले यूं ही निपटा दिए गए हैं। यदि आपका इरादा नाम से ज्यादा न्याय है तो पटना की महिला साथी आप जरूर उस लेखिका का साहस बनें। वे आपके यहां मेहमान हैं। आपका न्यायिक विवेक उन्हें, लेखिकाओं को और देश को एक संदेश देगा।
क्या यह सिर्फ लेखिकाओं का शोर बनकर रह जायेगा? पटना में दो सेक्सिस्ट हरकतें हुईं। एक लंपट सवर्ण नेता ने एक दलित महिला नेता को खुलेआम कपड़े उतारने की धमकी दी और माफी मांगी।
एक बाहर से आकर पटना में रह रहा साहित्यकार एक सेक्सिस्ट घटना को, शायद छेड़छाड़ को अंजाम देकर एक निजी संस्था को अंडर टेकिंग देकर भाग गया। जबकि उसके खिलाफ सारे प्रमाण हैं संस्था और विक्टिम के पास।
सब लोग बात कर रहे हैं, लेकिन कोई बात नहीं कर रहा है कि आज से 7 साल पहले जब उसने एक सम्मानित लेखिका को और कई लेखिकाओं को गालियां दी, सरेआम सेक्सिस्ट टिप्पणियां की तब उसे क्यों सम्मान मिलता रहा। फिर उन्हीं लेखिका ने उसका इंटरव्यू करवा लिया। और एक लेखिका ने एक निजी संस्था के एक कार्यक्रम के तहत उसे पटना भेज दिया।
यदि शोर मचाना और महिलाओं को सिर्फ ऑब्जेक्टिफाय करना इरादा नहीं है तो इसपर बात करें।
तो आइए कल रात 9 बजे बात करें। स्त्री काल पर ऑनलाइन । जिन्हें इस घटना की तफसील पता है वे इनबॉक्स कर लाइव डिस्कसन में भागीदार हों। संस्था, आरोपी को जिम्मेवार बनाना जरूरी है। विक्टिम को सामने आने का साहस देना जरूरी है। अन्यथा इस देश में मामले बिना रिपोर्ट हुए यूं ही दफन हो जाते हैं। कथित इज्जत के नाम पर।
विक्टिम लेखिका है इसलिए भी इसे नजीर बनाना चाहिए। संस्था को भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसका फेलोशिप और प्रवास सुरक्षित है। आरोपी लेखक के साथ पटना के बड़े बड़े लोग बैठक कर रहे थे कुछ दिनों से। वे आज फोन की घंटियां बजा रहे। इसमें सिर्फ उत्सुकता भर है, न्याय का आग्रह नहीं।
इसमें विक्टिम लड़कियों की जाति है और आरोपी पुरुषों की भी। चुप्पी किसी भी मसले पर उचित नहीं। महिला नेता एस सी , एसटी थाना पहुंच गई,लेखिका जो डरी हुई है बड़ी मुश्किल से कुछ कहना चाह रही है। यह फर्क साहस और माहौल का है।
अशोक कुमार पांडेय-
यहाँ खुलेआम गाली गलौज करने वाले, अपने साथ के लोगों और यहाँ तक महिलाओं के लिए घटिया बातें करने वाले लोगों को अगर आप फलाना सर और ढिमकाना सर कहके सम्मान देते हो कि वे सत्ता के विरोधी हैं तो असल में आप एक गंदगी के ख़िलाफ़ दूसरी गंदगी को पालते हो।
फिर अगर एक बूढ़ा अगर शराब के नशे में एक युवा महिला के कमरे में घुस कर घटिया हरकतें करता है तो उसको शिकायत का कोई हक नहीं रह जाता आपको।
जिस दिन पहली बात उसने किसी वरिष्ठ महिला कवि के लिए घटिया बात लिखी थी, उसी दिन उसे बहिष्कृत कर दिया होता तो यह दिन न आता। सबसे घटिया वे लोग हैं जिन्हें रेसीडेंसी में चयन करने के लिए यही एक आदमी (?) मिला।



रमेश
June 26, 2025 at 9:51 am
नाम लेने में तो आपकी भी फटति फटत: फटंति हो रही है, आखिर क्यों, इतनी कहानी लिख दी लेकिन नाम किसी का नहीं लिख पाए