अनिल कुमार-
बीती रात गहरी नींद में था, तभी दूसरे कमरे से खटपट की आवाज से नींद में खलल पड़ी। एक बार सोचा उठकर देखूं कि किसकी हिम्मत है मेरे घर में घुस आने की, लेकिन लापरवाही में यह सोचकर सो गया कि कोई कमजात चूहा होगा। अब चूहे से क्या उलझना, जब चूहे को आने जाने से रोकने की औकात एयरपोर्ट खरीदने वाले बड़े लोगों के पास नहीं है तो फिर मैं तो बहुत अदना सा आदमी हूं, चूहे को घर में घुसने से क्या ही रोक पाऊंगा? खटपट को दरकिनार करते हुए बड़ा फार्म हाउस बनाने के सपने देखते-देखते गहरी नींद में चला गया।
सुबह नींद तब खुली, जब पत्नी ने झकझोरते हुए उठाया। आंख मलते हुए उठा तो देखा घर में रोना पिटना मचा हुआ है। एकबारगी शक हुआ कि कहीं मैं स्वर्ग तो नहीं सिधार गया हूं, जो सब इतना बिलख रहे हैं। परंतु अगले ही पल जब मेरा लड़का हाथ खींचकर दूसरे कमरे में ले गया, तब जाकर यकीन हुआ कि अभी मैं जिंदा हूं, पर दूसरे कमरे में पहुंचा तो लगा कि अब क्यों जिंदा हूं? दरअसल, चोरों ने हमारी तिजोरी साफ कर दी थी। हम पति-पत्नी बहुत मुश्किल से सोनभद्र में पहाड़ खरीदने के लिये पचीस-पचास हजार रुपये जुटा रखे थे, लेकिन चोरों ने हमारे अरमानों पर पानी फेर दिया था। कुल जमा इक्यावन हजार चुरा ले गये थे।
बहुत मुश्किल से हमने पेट काट काटकर नदी-पहाड़ खरीदने के लिये रुपये जुटाये थे, लेकिन जेब काटने वालों की तरह पैसों को सुरक्षित रखने का हमारे पास कोई संसाधन नहीं था, इसलिये उसे आलमारी की तिजोरी में ही रख दिया था। चोरी हो गई यहां तक तो ठीक था, पर हमारे पड़ोसी शर्माजी ने सलाह दी कि थाने जाकर एफआईआर करा दीजिये तो हमारी रूह कांप गई। पत्नी ने शर्माजी के सुझाव को दरकिनार करते हुए कहा कि थाने जाने की कोई जरूरत नहीं है। चोरों को पुलिस से पकड़वाने के लिये अब हमारे पास पैसे नहीं हैं। जो पैसे जुटाये थे, सब चले गये हैं। अब गहने बेंचकर मैं पैसे नहीं दूंगी। दूसरे हम इतने इज्जतदार भी नहीं है कि थाने में जाकर बेइज्जत हों।
पत्नी की बात सुनकर मुझे खट से मिश्राजी के यहां हुई चोरी के मामले की घटना याद आ गई। बेचारे को एफआईआर दर्ज कराने और चोरों को पकड़वाने के लिये कर्ज लेकर पैसे खर्च करने पड़े थे। चोर तो नहीं पकड़े गये, लेकिन पुलिस का खर्चा उठाते उठाते मिश्राजी का वह घर बिक गया था, जिसमें चोरी हुई थी। तब थानेदार साहब चोरों पर बहुत नाराज हुए थे, और कहा था कि कमजर्फ चोरों का तो अब कोई स्टैंडर्ड ही नहीं रह गया है। गरीबों-मलेच्छो के घर में भी चोरी करने पहुंच जा रहे हैं। उन्हें अमीर-गरीब की पहचान ही नहीं रही। उन्होंने दीवानजी को ताकीद भी की थी कि अब अगर गरीबों के यहां चोरी करते हैं तो पकड़कर बंद कीजिये ससुरों को।
इस घटना को याद करने के बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई कि थाने जाकर चोरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराऊं, लेकिन पता नहीं क्यों शर्माजी चार और पड़ोसियों को अपने साथ मिलाकर मुझ पर एफआईआर कराने का दबाव लगातार बनाये जा रहे थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि शर्माजी मेरे शुभचिंतक बनकर यह दबाव बना रहे हैं, या कोई पुराना बदला चुकाने की मंशा से थाने जाने को कह रहे हैं। मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने खट से अपने ससुराल में फोन मिला दिया। दरअसल, पत्नी के बाद मुझे दुनिया में सबसे ज्यादा समझदार सास, ससुर और साले ही लगते थे, शर्माजी, पड़ोसी या अपने घर वाले नहीं।
साले ने सुझाव दिया कि मुझे थाने जाकर एफआईआर दर्ज कराना चाहिये। साले के मुंह से यह बात सुनते ही मेरा डर काफूर हो गया। साले के सुझाव की बात मैंने पत्नी को बताई। पत्नी ने कहा कि शर्माजी गलत कह रहे थे, लेकिन जब भाई ने सुझाया है तो थाने जाकर एफआईआर दर्ज कराना ही सही है। मैंने शर्माजी से साथ थाने चलने को कहा तो उन्होंने बताया कि उनके एक रिश्तेदार की किडनी में अटैक आया है, इसलिये वह मेदांता अस्पताल जा रहे हैं, थाने नहीं चल पायेंगे। शर्माजी के साथ आये चारों पड़ोसियों को थाने चलने को कहा तो उन्होंने भी बताया कि वह लोग जुआ और मिलावटी तेल के धंधे का पैसा अभी कारखास को नहीं दिये हैं, लिहाजा उनका थाने चलना उचित नहीं रहेगा।
सबके इनकार करने के बाद हम अकेले ही थाने निकल पड़े। थाने में घुसते ही डर लगा, लेकिन जब दीवान जी ने कहा, ‘’आइये श्रीमान जी। आपका स्वागत है।‘’ तब थोड़ी ज्यादा ही घबराहट हुई। सांस तेजी से चलने लगी। धड़कन भी बढ़ गई। एकबारगी लगा कि हम थाने की बजाय कहीं हम गलत जगह तो नहीं आ गये हैं। थाने में इस तरह का व्यवहार तो अपमानजनक है। पुलिस इस तरह अपमानित कैसे कर सकती है? मैं पलटकर बाहर निकला, और थाने का बोर्ड देखकर कनफर्म किया कि हम बिल्कुल सही जगह ही आये हैं। हालांकि दीवान जी के व्यवहार से टेंशन तो बढ़ा ही हुआ था, तब तक एक सिपाही ने कहा, ‘’क्या हुआ श्रीमानजी? आपको क्या परेशानी है?’’
हमारी रूह कांप गई। हमने फटाक से सिपाही के पैर पकड़ लिये और रोते-गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘’साहब हमसे कौन सी गलती हो गई है, जो आप लोग थाने में इस तरह का अपमानजनक व्यवहार कर रहे हैं? अगर कोई गलती हुई है तो हमें माफ कर दीजिये। हम आगे से आपको शिकायत का कोई मौका नहीं देंगे।’’ सिपाही ने कहा, ‘’उठिये श्रीमान जी, आपने कोई गलती नहीं की है।‘’ तब मैंने पूछा, ‘’फिर आप लोग थाना विरोधी गतिविधियों में क्यों लगे हुए हैं?’’ सिपाही ने बेहद विनम्रतापूर्वक कहा, ‘’श्रीमान जी थाने में शिष्टाचार पखवाड़ा चल रहा है, इसलिये हम लोग शिष्टाचार का पालन कर रहे हैं। सबको सम्मान दे रहे हैं।‘’
यह सुनते ही मेरा जी धक्क से कर गया। मेरी नजरों में पुलिस वालों की इज्जत और बढ़ गई। मैंने कहा, ‘’जनाब आप लोग कितने महान हैं। थाने में शिष्टाचार जैसा मुश्किल काम आप लोग जिस आसानी से कर ले रहे हैं, सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा है कि थाने में ऐसा भी संभव हो सकता है। हम समझ सकते हैं कि अपने ही थाने में आप लोगों के लिये शिष्टाचार निभाना कितना मुश्किल होता होगा, लेकिन यह आप लोगों की महानता है।‘’ तारीफ सुनकर पास खड़े दीवान जी बीच में कूद गये, और कहा, ‘’अबे श्रीमान जी यह तो कुछ भी नहीं है। चोर, लुटेरों, डकैतों से जिस इज्जत एवं सम्मान से हम लोग बात कर रहे हैं, वह सुनोगे तो तुम पगला ही जाओगे साले श्रीमान जी।‘’
अब तक हमारी बात सुन रहे एक दरोगाजी ने पूछा, ‘’बोलो बे श्रीमानजी, यहां थाने में कैसे आना हुआ?’’ मैंने कहा, ‘’सर हमारे घर में चोरी हो गई है। उसी की रिपोर्ट लिखाने आये हुये हैं।‘’ दरोगा जी ने पूछा, ‘’कितने की चोरी हुई है?’’ मैंने बताया, ‘’सर एक्यावन हजार रुपये की चोरी हुई है, जिसे हम पहाड़ खरीदने के लिये बहुत मेहनत से जुटा रहे थे।‘’ इतना सुनते ही दरोगा जी ने शिष्टाचारपूर्वक कहा, ‘’अबे साले श्रीमान जी की औलाद। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई बे श्रीमान जी कि आप इतनी छोटी चोरी की एफआईआर लिखाने थाने पहुंच गये? अबे श्रीमान जी के यह थाना है कि तुम्हारा ससुराल, जो मुंह उठाकर चले आये?’’
उन्होंने दीवान जी से कहा, ‘’दीवान जी, इस श्रीमान जी साले को लॉकअप में डालिये तो, आखिर इस श्रीमान जी की हिम्मत कैसे हुई इतनी छोटी चोरी की एफआईआर लिखाने थाने आने की? थाना है कि मजाक घर? शिष्टाचार पखवाड़ा चल रहा है तो कोई भी हमसे मजाक करने चला आयेगा?’’ दरोगा जी की बात सुनकर दीवान जी ने कहा, ‘’आओ बे श्रीमान जी, उधर लॉकअप की तरफ चलो श्रीमान जी नहीं तो पचीस जूते मारुंगा, और गिनूंगा भी एक भी नहीं श्रीमान जी।‘’ खैर, अब हम खुद ही थाने में चल रहे शिष्टाचार पखवाड़ा में कैसरबाग बस स्टैंड से तीन पुडि़या हेराइन के साथ मुखबिर की सूचना पर पकड़े गये हैं। पत्नी पैसा जुटाने के लिये जेवर बेचने सोनार के पास गई हुई है।


