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पत्रकारिता में ‘लिफाफा’ संस्कृति अगर भ्रष्टाचार है तो मैं भी इसका दोषी हूँ!

प्रभाकर मणि तिवारी-

ध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में करीब दो सौ पत्रकारों की एक सूची इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल है. बताया जा रहा है कि परिवहन विभाग की ओर से तैयार यह सूची उन पत्रकारों की है जिनको हर महीने उनकी औकात के मुताबिक नजराना भेंट किया जाता था. यह सूची कैसी है या फिर इस आरोप में कितना दम है, यह तो जांच का विषय है. हालांकि यह भी पता है कि इसकी जांच नहीं होगी.

वैसे मामला चाहे जो भी हो, पत्रकारिता में लिफाफा संस्कृति नई नहीं है. खासकर नब्बे के दशक की शुरुआत से यह संस्कृति तेजी से फली-फूली है. जनसत्ता का कोलकाता संस्करण भी इससे अछूता नहीं रहा. खासकर इस अखबार के उत्कर्ष के दौर में लिफाफा हो, प्रेस क्लब में दारू के बिल का भुगतान हो या फिर दूरदराज के स्ट्रिंगरों की ओर से पहुंचाई जाने वाली बासमती चावल की बोरियां, सब कुछ चलता था.

मैंने अखबार शुरू होने से पहले अक्तूबर, 1991 में ज्वाइन जरूर किया था. लेकिन पहले सिलीगुड़ी और फिर गुवाहाटी में करीब एक दशक बिताने के बाद कोलकाता आने तक जनसत्ता अपने उतार पर था. मुझे तत्कालीन संपादक शंभूनाथ शुक्ल चीफ रिपोर्टर के तौर पर गुवाहाटी से कोलकाता ले आए थे. तब तक अखबार की वैसी धमक नहीं रही थी कि कोई कुछ आफऱ करता. वैसे भी गैर-हिंदी प्रदेशों में हिंदी अखबारों की खास पूछ नहीं होती.

यह सवाल अब भी खुद से पूछता हूं कि क्या अगर मौका मिला होता तो मैं तब ऐसी संस्कृति को आत्मसात कर पाता? पता नहीं. लेकिन गुवाहाटी के ‘पूर्वांचल प्रहरी’ अखबार में मेरे मातहत रहे एक पत्रकार, जो अब इंटरनेशनल खिलाड़ी हो गए हैं, ने एक बार कहा था कि भ्रष्टाचार की बात वही करते हैं जिनको मौका नहीं मिलता. उन्होंने खुद को मिले मौकों का भरपूर फायदा उठाया है. क्या वह सही थे? पता नहीं.

वैसे, इस लिफाफा संस्कृति के लिए अखबारों का प्रबंधन भी काफी हद तक दोषी है. वो अपने पत्रकारों और खासकर स्ट्रिंगरों को इतना पैसा ही नहीं देते कि वो सिर उठा कर जीवन गुजार सकें. पहले जीवन आसान था. लेकिन अब आधुनिकता की होड़ में बच्चों को महंगे स्कूलों में पढ़ाने की फीस, कार, मोटरसाइकिल, फ्लैट, देश-विदेश घूमने और सोशल स्टेटस बनाए रखने के लिए कहीं न कहीं तो समझौता करना ही पड़ता ही है.

मैंने खुद अपने कई स्ट्रिंगरों को कार से घूमते देखा है. उनमें से ज्यादातर के घर सौ बीघे पुदीने की खेती नहीं होती थी. और तो और मैंने होली-दीवाली पर स्थानीय थाने से उनके घर भारी-भरकम और महंगे उपहार पहुंचते भी देखे हैं. हिंदी प्रदेशों में यह संस्कृति कुछ ज्यादा ही फली-फूली है. वेतन आयोग के तहत स्थायी कर्मचारी होने के बावजूद मैं खुद अब तक एक अदद स्कूटर तक नहीं खरीद सका.

तमाम वेतन आयोगों के बावजूद प्रबंधन उनकी सिफारिशों को ठीक से लागू नहीं करता. अगर जनसत्ता जैसे किसी अखबार ने कर भी दिया तो कानूनी खामियों की आड़ में कोशिश रहती है कि कम से कम देना पड़े. पत्रकारों के वेतन के कुछ हजार रुपए बचाने के लिए प्रबंधन लाखों के पैकेज पर मैनेजर रखता है.

वैसे, कुछ शुभचिंतकों ने मुझ पर भी आरोप कम नहीं लगाए. कोलकाता आने के बाद के कुछ महीनों के दौरान ही आरोप लगा कि मेरे चूंकि तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के कई मंत्रियों से करीबी संबंध हैं, इसलिए मैं काफी माल पीट रहा हूं. यह सही था कि सिलीगुड़ी में लंबे अरसे तक काम करने और वहीं पले-बढ़े होने के कारण उत्तर बंगाल के करीब पांच मंत्रियों से अपना करीबी संबंध था.

नगर विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य तो मोहल्ले के ही थे. उनके अलावा वनमंत्री और पर्यटन मंत्री भी जलपाईगुड़ी के थे. लेकिन ऐसा आरोप लगाने वालों की मोटी बुद्धि में यह बात नहीं घुसी कि अगर मुझे करना ही होता तो सबसे पहले अशोक भट्टाचार्य से एक सरकारी मकान अपने नाम अलॉट करा लेता. वह भी तब जबकि ऐसा करना कोई अपराध नहीं था और भट्टाचार्य खुद कई बार मुझे कह चुके थे. उनका विभाग ही मकान आवंटित करता था.कई बांग्ला पत्रकारों ने ले भी रखे थे. लेकिन अपने तब के वेतन का करीब 40 फीसदी मकान किराए में जाने के बावजूद मैंने उनसे सरकारी मकान नहीं लिया.

तब वो मंत्री औऱ सरकार मेरे कोलकाता तबादले के बाद करीब 11 साल तक सत्ता में रही. अशोक भट्टाचार्य मेरे दफ्तर के पास ही राजभवन परिसर में रहते थे. लेकिन मैं वहां महज एक बार गया था. वह भी किसी दूसरे के काम से. वरना बाकी तमाम मुलाकातें राज्य सचिवालय नवान्न में ही हुईं.

लेकिन क्या मेरा करियर पूरी तरह बेदाग रहा है. असम में रहने के दौरान लोकसभा चुनाव की कवरेज के दौरान मुझे एक रात ऐसी जगह एक होटल में ठहरना पड़ा था जो एक राजनीतिक पार्टी ने बुक कर रखा था. वहां वही एकमात्र होटल था. नतीजतन न तो मेरे पैसे लगे और न ही मैंने दफ्तर को उसका बिल दिया. साथ ही संपादक को इसकी जानकारी भी दे दी थी. अगर यह भ्रष्टाचार था तो मैं इसका दोषी हूं.

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1 Comment

1 Comment

  1. शिवशरण त्रिपाठी

    October 31, 2024 at 10:31 am

    तिवारी जी की बेबाकी बेहद पसंद आई।काश ! आवाज़ सारे पत्रकार तिवारी जी के पद् चिन्हो पर चल पाते।
    शिवशरण त्रिपाठी
    सम्पादक दि मोरल

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