दीपक गोस्वामी-
ग़ज़ब नरक कर रखा है भाई। सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप छोड़ा है, दुनिया नहीं छोड़ी। इसी देश में हैं और दिल्ली में ही हैं।
सब के सब ऐसे टेसू गिराते हुए उन्हें याद कर रहें हैं कि मानो वो समय से पहले ऊपर निकल लिए हों।
ठीक है भाई, तुमने उनसे बहुत सीखा और वो बहुत अच्छे मार्गदर्शक थे। फिर छोड़कर काहे चले गए उनका साथ, और सीखते रहते, और मार्गदर्शन ले लेते।
ये तो वही बात हो गई कि पहले तो मां-बाप को छोड़कर चले जाओ और जब वो परलोक सिधार जाएं तो चिल्लाओ, ‘बापू… कितेक अच्छे थे, काहे छोड़ गए।’
ठीक है, अब बस भी करो। बहुत हो गया। अपना अपडेटेड सीवी उन्हें भेज दो। कहीं बड़ा हाथ मारा तो कर लेंगे सबको याद।
अब बस हमारी एफबी फीड को ‘सौरभ मुक्त’ हो जाने दो प्लीज़!
ललित शर्मा-
पत्रकारिता को भी दो खेमों में बांट दिया गया है, बीते कुछ दशकों में। कुछ समर्थन में हैं, तो कुछ विरोध में। और यह विरोध और समर्थन पाठकों और दर्शकों का नहीं। यह स्वयं पत्रकारिता का है… और जरूरी नहीं की समर्थन करने वाला पत्रकार ही so called “गोदी मीडिया” होता है। बेवजह और एजेंडा चलाने वाले पत्रकार भी “गोदी मीडिया” वाले ही हैं। गोदी केवल एक खेमा नहीं लगाता, दूसरा भी पलथी मारे तो गोदी ही बनती है। दोनों ही परिस्थितियों में नुकसान पाठकों का और दर्शकों का ही हुआ है।
एक तरफ सुधीर चौधरी, रजत शर्मा या अर्नब थे तो दूसरी ओर राजदीप, पुण्य प्रसून और रवीश… इनके द्वंद्व में पाठक मारा गया, हत्या मीडिया की हुई खुद अपने हाथों से, और मारा गया एक दर्शक।
मेरे जैसे तमाम जिनका राजनीति और नेताओं से दूर तलक कोई वास्ता नहीं। पांच साल में एक बार काली स्याही लगवाने के अलावा कोई दखल नहीं के लिए यह दौर सबसे बुरा है। रवीश की कुंठा और रजत की तीमारदारी के बीच 13 साल पहले लल्लनटॉप जैसे नई विधा “इंटरनेट पत्रकारिता” का जन्म होता है। 30 साल के युवा सौरभ त्रिवेदी का जन्म होता है।
आहिस्ता आहिस्ता, हौले हौले, धीरे धीरे पाठकों की दर्शकों की पसंद बदलते, भाषा और संवाद के साथ सरलता से सौम्यता से अपनी बात रखने का प्रयास शुरू होता है। सफलता के लिए केवल प्रयास करना होता है, निरंतर करना होता है… सौरभ लगे रहे, लगे हुए हैं। भाषा का स्तर, रिसर्च का मजमा, निर्भीक बेबाक बोलचाल… यही तो गुम हुआ था बीते दशकों में। एकतरफा मोहब्बत का सिलसिला रवीश से होता सुधीर तक चलता चला आया… आधे दर्शकों ने उसका प्यार कबूला तो आधे ने दूसरे का। यह मोहब्बत संपूर्ण नहीं थी।
बीते कुछ सालों में इस मोहब्बत का सिलसिला सौरभ से होता गुजरा और सभी को दीवाना बना दिया। किताब वाला, गेस्ट इन द न्यूज रूम जैसे तमाम गैर राजनैतिक कार्यक्रम इनकी सफलता हैं।
सौरभ ने सिर्फ लल्लनटॉप छोड़ा है… सौरभ अभी बाकी हैं। सौरभ से लल्लनटॉप हो सकता है, पर लल्लनटॉप से सौरभ नहीं… आशा है की सौरभ जल्द ही किसी नए अवतार में हाजिर होंगे, और उम्मीद है की वो बदल कर नहीं लौटेंगे।



Vikas Srivastava
January 7, 2026 at 1:52 pm
एकतरफा पूर्वाग्रह से ग्रस्त टिप्प्णी
Manoj
January 7, 2026 at 6:26 pm
Ravish fight against power but Arnab fight against powerless so no comparison, saurabh you are totally wrong.