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फुले : फिल्म में शोषण और अत्याचार के तीखेपन को हल्का रखा गया है, ताकि कोई नाराज न हो!

दिनेश श्रीनेत-

त्तर भारत का साधारण पढ़ा-लिखा मिडिल क्लास वर्ग फुले के बारे में नहीं के बराबर जानता है। महाराष्ट्र में कितना जानता होगा, अंदाजा नहीं। फिर भी यह फिल्म सिर्फ अपनी उपस्थिति से मौजूदा समय में हलचल पैदा करती है। फिल्म चले या न चले, यह बात रेखांकित की जानी चाहिए।

यहां ड्रामा नहीं है। ज्यादातर अंग्रेजी के समीक्षकों ने इसको औसत से बेहतर और ‘संतुलित’ फिल्म ठहराया है। यही संतुलन इसकी कमजोरी भी लगता है। यह एक शांत, ‘मिडल ऑफ द रोड’ फिल्म है, बनाते समय कोशिश की गई है कि कोई नाराज़ न हो। शोषण और अत्याचार की बात कही जाए मगर उसके तीखेपन को हल्का रखा जाए।

मगर इसे बिल्कुल अलग पर्सपेक्टिव में देखना चाहिए। यह ठहराव के साथ कई बातों की तरफ इशारा करती है, भले ही उसे किसी विचारोत्तेजक बहस में नहीं बदल पाती, मगर इस मिथ को तोड़़ती है कि भारत के लोग अंग्रेजों के गुलाम भर थे। इसके बरअक्स यह समाज के भीतर जड़ बना चुकी हजारों सालों की गुलामी को खड़ा करती है। शिक्षा के अधिकार को स्त्रियों की आजादी से जोड़कर आगे बढ़ती है।

फिल्म का एक दृश्य

यह हिंदू समाज में एका के थोपे गए मिथ को भी तोड़ती है। ‘फुले’ ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अत्याचारों को दर्शाती तो है मगर उन पर बहुत समय नहीं खर्च करती, इसकी जगह वह फुले दंपती की रणनीतिक गतिविधियों पर अपना ध्यान केंद्रित करती है। इसमें दिलीप मंडल की ‘कल्पना’ फातिमा शेख भी शामिल हैं। उनके रोल में अक्षया गुरव ने बहुत कम संवादों के बावजूद स्क्रीन में अपनी उपस्थिति भर से आकर्षण बनाए रखा है। फुले दंपती बने प्रतीक गांधी और पत्रलेखा ने बढ़िया अभिनय किया है।

प्रतीक गांधी ने अंडरप्ले किया है। यह इसलिए गले उतरता है, क्योंकि वे अपने समय के एक पढ़े-लिखे अंग्रेजी शिक्षा हासिल करने वाले व्यक्ति का धैर्य भी सामने लाते हैं, जो आवेश में फैसले नहीं लेता। जो बहुत गहराई से उस दौर की दुनिया को बदलते हुए देख रहा है, जो अपनी सामाजिक विसंगतियों को समझने लगा है, उसे भावनात्मक उद्वेलन से नहीं बहकाया जा सकता। न तो उसे ब्राह्मणवादी स्वतंत्रता सेनानी अपने पाले में खींच पाते हैं और ईसाई बन जाने का लालच देने वाले अंग्रेज।

फिल्म इसलिए भी उल्लेखनीय है कि यह बताती है कि ब्रिटिश शासन में सब कुछ बुरा नहीं था, वे अपने साथ शिक्षा, टेक्नोलॉजी और दुनिया भर में बह रही लोकतांत्रिक मूल्यों की बयार भी लेकर आ रहे थे। वहीं भारत में सब कुछ अच्छा नहीं था, मनुष्य द्वारा मनुष्य को नीचा दिखाया जा रहा था। उसे कई पीढ़ियों तक बुनियादी अधिकारों से परंपरा और शास्त्रों के नाम पर वंचित रखा जा रहा था।

ज्योतिबा फुले के जरिए निर्देशक अनंत महादेवन ने तीन महत्वपूर्ण बातों जिक्र करते हैं। पहली फ्रांस की क्रांति का – जो इस फिल्म के नायक का स्वप्न है, जब उदारवादी विचारधारा की बुनियाद पड़ रही थी, मनुष्य को मूलतः स्वतंत्र मानने की शुरुआत – न कि किसी राज्य सत्ता या धर्म सत्ता की मेहरबानी पर जीने की लाचारगी। दूसरी थॉमस पेन की किताब ‘राइट्स आफ मैन’ जो इस नायक को एक वैचारिक मजबूती देती है।

तीसरी अमेरिका में गुलामी प्रथा के खत्म होने की घटना, जिसके बारे में वह उत्साह से अपनी पत्नी को बताता है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन पहले जूते बनाते थे और यह बात वह एक ऐसे समय में कह रहा होता है जब ब्राह्मण अछूतों की परछाईं से भी दूर भागते थे। फिल्म के एक दृश्य में सावित्री बाई ब्राह्मणों के इसी डर को अपनी ताकत बनाती दिखती है। फिल्म में इन घटनाओं को ब्योरों से हमें समानांतर तिथियों में पता लगता है कि भारत और दुनिया में किस तरह की हलचल हो रही थी। यह अपने समय से आगे ज्योतिबा फुले के प्रति सम्मान और अधिक बढ़ा देती है।

निर्देशन बढ़िया है। अनंत महादेवन ने ‘स्टोरीटेलर’ (2022) जैसी सहजता बनाए रखी है। फोटोग्राफी कई बार पेटिंग की तरह दिखती है। फ्रेम सुंदर हैं और लोकेशन को इस प्रभावशाली ढंग से कैप्चर किया गया है कि वे फिल्म की प्रामाणिकता में इजाफा करते हैं। फिल्म की एक और खूबी इसके सरल मगर गहरे अर्थ खोलने वाले संवाद हैं। जैसे एक दृश्य में फुले से कहा जाता है, “धर्म आस्था का विषय है तर्क वितर्क का नहीं…”फुले का जवाब है, “जो विषय तर्क नहीं झेल सकता, पाखंड कहलाता है।”

फिल्म इसलिए देखी जानी चाहिए कि ज्योतिबा की मृत्यु के 130 साल से ज्यादा होने, और देश को आजाद हुए 75 साल से ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद यह फ़िल्म देश के एक वर्ग को इस कदर परेशान करती है। कि फुले के जन्मदिन पर इसकी रिलीज टालनी पड़ती है और ‘तीन हजार वर्षों की गुलामी’ जैसे संवाद हटाने पड़ते हैं।

समझ में आता है कि फिल्म असल में देश की जिस बड़ी आबादी के हितों की बात करती है, वह अभी भी इतनी मजबूत नहीं है कि अपने ऐतिहासिक अधिकारों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ खड़ी हो पाए। बस, जब हम इस पर्सपेक्टिव से पूरी फ़िल्म को देखते हैं तो पूरा ऐतिहासिक संदर्भ हमारे सामने होता है।

जिसकी रोशनी में शिक्षा और संघर्ष की आंच में खरे सोने सा तपता प्रतीक गांधी का किरदार ‘फुले’ बहुत बड़ा लगने लगता है!

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