दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता एवं राहत कोष (PM CARES Fund) को लेकर दायर आरटीआई याचिकाओं पर स्पष्ट किया है कि यह फंड सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) के तहत निजता (Right to Privacy) का अधिकार रखता है, भले ही इसकी स्थापना सरकार से जुड़ी हुई हो। अदालत ने कहा कि पीएम केयर्स फंड की संरचना और कार्यप्रणाली को देखते हुए इसे आरटीआई के दायरे में लाना अनिवार्य नहीं है। इस फैसले के बाद सार्वजनिक फंड की पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों के सूचना के अधिकार को लेकर एक बार फिर व्यापक बहस शुरू हो गई है।
सौरव दास-
PM केयर्स फंड को “राइट टू प्राइवेसी” के दायरे में रखने के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। यह फैसला न्यायिक विवेक और नैतिक साहस की गंभीर कमी को दर्शाता है। उनका तर्क है कि जब स्थिति बिल्कुल साफ हो, तब उसे उलटकर पेश करना बौद्धिक बेईमानी की चरम मिसाल है।
आलोचना करने वालों का कहना है कि इसे दिन बताना, जबकि हकीकत में रात हो, सच से आंख चुराने जैसा है। इस फैसले ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता को लेकर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।
साथ ही, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेकर भी तंज कसा जा रहा है कि शायद ऐसे फैसले भावी पदोन्नति की उम्मीदों से प्रेरित हों। यह टिप्पणी व्यवस्था के भीतर जवाबदेही और नैतिक मजबूती पर एक गंभीर बहस को जन्म देती है।
केरल कांग्रेस का ट्वीट-
पीएम केयर्स फंड को लेकर एक बार फिर पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इस फंड में दसियों हज़ार करोड़ रुपये का दान आता है, लेकिन देश के नागरिकों को यह स्पष्ट जानकारी नहीं है कि यह राशि कहां और कैसे खर्च की जाती है।
आलोचना यह भी है कि एक आम नागरिक को आयकर रिटर्न दाखिल करते समय हर रुपये की जानकारी देनी होती है—चाहे वह शेयर बाज़ार से हुआ छोटा सा कैपिटल गेन हो या बचत पर मिलने वाला ब्याज—जबकि पीएम केयर्स फंड को कई तरह की अनुपालना (कम्प्लायंस) और खुलासों से छूट मिली हुई है।
इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी सार्वजनिक फंड को पूरी तरह गोपनीय रखा जाना उचित है। आलोचक इसे सार्वजनिक धन बनाम सार्वजनिक जवाबदेही की कसौटी पर परखने की मांग कर रहे हैं।
हालांकि, सरकार और फंड प्रबंधन की ओर से पहले भी यह कहा गया है कि पीएम केयर्स फंड का उपयोग आपदा राहत और जनहित के कार्यों के लिए किया जाता है। लेकिन विस्तृत सार्वजनिक खुलासे की मांग लगातार तेज होती जा रही है, ताकि नागरिकों के बीच विश्वास और पारदर्शिता बनी रहे।
मनु-
PM केयर्स फंड को आरटीआई के तहत ‘राइट टू प्राइवेसी’ के दायरे में रखने वाले फैसले को लेकर सोशल मीडिया और सिविल सोसायटी में तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यह फैसला पारदर्शिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है और इसने सार्वजनिक फंड की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस फैसले से जुड़े न्यायाधीशों को लेकर भी चर्चा तेज है। बताया जा रहा है कि—
- जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय
उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले जस्टिस उपाध्याय को 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट से दिल्ली हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था।
- जस्टिस तेजस धिरेनभाई
जिनका पूरा करियर बार काउंसिल ऑफ गुजरात से जुड़ा रहा और बाद में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट का जज नियुक्त किया गया।
आलोचकों का आरोप है कि जब आम नागरिक को अपनी छोटी-सी आय तक का हिसाब देना पड़ता है, तब हजारों करोड़ रुपये वाले फंड को गोपनीयता की ढाल देना न्याय और लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। इस फैसले को लेकर यह बहस और तेज हो गई है कि सार्वजनिक दान से बने फंड पर जनता का सूचना का अधिकार होना चाहिए या नहीं।
फिलहाल यह मुद्दा सिर्फ एक कानूनी निर्णय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और नैतिक जिम्मेदारी पर व्यापक बहस का विषय बन चुका है।


