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पीएम मोदी के भाषण में डॉ हेडगेवार की क्रांतिकारिता का सच!

क्या प्रधानमंत्री बतलावेंगे कि उन्होंने आज अपने भाषण में “आज़ादी की लड़ाई के समय ‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया!” किस आधार पर और किन परिप्रेक्ष्यों में कहा है?

Sushobhit-

प्रधानमंत्री ने आज अपने भाषण में कहा कि “आज़ादी की लड़ाई के समय ‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ समेत अनेक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया, डॉक्टर साहब कई बार जेल तक गए!”

आइए, इस कथन के तथ्यों की जाँच करें।

‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ ने बेशक़ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था, लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य के रूप में। आरम्भ में वे महात्मा गांधी से प्रभावित थे और जब असहयोग आंदोलन (1920–21) छिड़ा, तब उन्होंने नागपुर में अपनी मेडिकल प्रैक्टिस को त्यागकर आंदोलन में भाग लिया और जेल गए। प्रधानमंत्री ने सुविधापूर्ण तरीक़े से इस तथ्य को छिपा लिया कि हेडगेवार ने आज़ादी की लड़ाई में शिरकत की तो थी, लेकिन एक कांग्रेसी के रूप में!

1925 में विजयादशमी के अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस संस्था के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के ही अनुपात में घटती चली गई। 1930 में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन छिड़ा तो ‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक संगठन के रूप में इस आंदोलन में शरीक़ नहीं होगा, किंतु अगर संघ के स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से गांधी जी के आंदोलन से जुड़ना चाहें तो यह उनकी स्वतंत्रता है। वे स्वयं गांधीजी के आंदोलन में शामिल हुए थे, लेकिन संघ के सदस्य के रूप में नहीं।

लेकिन कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन (1929) में जब पूर्ण स्वराज्य का संकल्प लिया गया और 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया तो ‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ एक सर्कुलर जारी करते हुए संघ के स्वयंसेवकों से कहा कि वे भी स्वतंत्रता दिवस मनाएँ, लेकिन तिरंगा झंडा नहीं, भगवा ध्वज फहराएँ (संदर्भ पुस्तक : ‘ख़ाकी शॉर्ट्स एंड सैफ्रन फ़्लैग्स’, ओरियंट लॉन्गमैन, 1993)। 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाने का यह संघ का इकलौता प्रयास था, उसके बाद इस दिवस को फिर कभी नहीं मनाया गया।

हेडगेवार के जीवनीकार सी.पी. भिशीकर ने अपनी पुस्तक ‘संघ-वृक्ष के बीज’ में लिखा है कि “संघ की स्थापना के बाद डॉक्टर साहब अपने भाषणों में केवल हिन्दू संगठन की बातें करते थे, वे ब्रिटिश राज पर सीधी टिप्पणी लगभग न के बराबर किया करते थे।”

1940 में- जब भारत अभी भी पराधीन था और भारत छोड़ो आंदोलन अभी दो वर्ष दूर था- अपनी मृत्युशैया पर हेडगेवार ने कहा कि “मुझे अपनी आँखों के सामने हिन्दू-राष्ट्र का एक लघुचित्र दिखलाई दे रहा है।” (‘आरएसएस : ट्रायस्ट विद पोलिटिक्स’, प्रलय कानूनगो (2002)। ध्यातव्य है कि हेडगेवार ने ये नहीं कहा कि मुझे अपनी आँखों के सामने स्वतंत्र भारत या हिन्द स्वराज्य दिखलाई दे रहा है।

क्या प्रधानमंत्री बतलावेंगे कि उन्होंने आज अपने भाषण में “आज़ादी की लड़ाई के समय ‘परम पूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी’ ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया!” किस आधार पर और किन परिप्रेक्ष्यों में कहा है?

कांग्रेस के झंडे तले स्वतंत्रता आंदोलन में प्रतिभाग लेने वाले संदर्भ को प्रधानमंत्री ने उल्लेखित क्यों नहीं किया? दूसरी बात यह कि असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले हेडगेवार की बौद्धिक प्रक्रिया में कालान्तर में क्या अंतर आए, वो राष्ट्रीय आंदोलन से क्यों कटे, ब्रिटिश राज के बजाय कांग्रेस को प्रथम-शत्रु क्यों मान बैठे?

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