पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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