योगी की पुलिस ने तो एप्पल के अधिकारी का ही एनकाउंटर कर दिया! देखें तस्वीरें

अपडेट 1 : लखनऊ में हुए एप्पल के एरिया सेल्स मैनेजर विवेक तिवारी हत्याकांड पर एसएसपी लखनऊ कलानिधि नैथानी की प्रेस कॉन्फ्रेंस-दोनों सिपाही प्रशांत मलिक & संदीप गिरफ्तार, दोनों जेल भेजे गए, मजिस्ट्रेट जांच बैठी, sit भी गठित हुई, इस केस की जांच दूसरे सर्किल को दी गई।

अपडेट 2 : लखनऊ में हुए एप्पल के सेल्स एरिया मैनेजर विवेक तिवारी हत्याकांड पर डीजीपी का बयान, जेल गए हत्यारोपी सिपाही आज शाम तक होंगे बर्खास्त।

Vivek Kumar : उत्तर प्रदेश में पुलिस बेलगाम हो चुकी है. अलीगढ़ में एसएसपी अजय साहनी के नेतृत्व में पुलिस वालों ने दो निरपराध व  बेहद गरीब मुस्लिम युवकों को उठाया और बदमाश बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार डाला. अभी अलीगढ़ फर्जी मुठभेड़ कांड ठंढा भी न पड़ा था कि योगी की पुलिस ने बहुराष्ट्रीय कंपनी एप्पल के अधिकारी को ही एनकाउंटर में मार गिराया.

विवेक तिवारी और उनका कुनबा (फाइल फोटो)

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योगी की लखनऊ पुलिस ने जानकारी लेने थाने आए डाक्टर को पीट-पीट कर ये हाल कर दिया, देखें तस्वीरें

योगी राज में पुलिस अराजक हो चुकी है. कहीं अपराधियों से सुपारी लेकर निर्दोष युवक को इनकाउंटर में मारने के लिए फर्जी तरीके से इनामी बदमाश में तब्दील कर देती है, तो कहीं संपादक के घर में कूद कर बिना वजह जान मारने की धमकी देती है. Continue reading

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पुलिस सिर्फ एक धोखा है, इससे विश्वास उठाना ही आपके लिए शुभ होगा!

कार की टक्कर के बाद पत्रकार तड़पता रहा, पुलिस वाला पास भी नहीं आया… दोस्तों, अपने अनुभव के आधार पर पुलिस को लेकर अपनी बात रख रहा हूं। 11 अक्टूबर की रात लगभग 11:30 पर लखनऊ के सेंट फ्रांसिस स्कूल के पास एक तेज रफ़्तार वैगन आर ने पीछे से मेरी बाइक पर जोरदार टक्कर मारी और वो तेजी से निकल गया। अपनों के आशीर्वाद से मेरी जान तो बच गई लेकिन शरीर पर चोट आई थी। लेकिन दिल पर गहरा घाव वो पुलिसकर्मी दे गया, जो दूर से यह सब देखता रहा। लेकिन उसने करीब आकर ये देखने की जहमत तक नहीं उठाई कि इतनी तेज टक्कर होने के बाद घायल बाइक सवार यानि मैं, जिंदा हूं या मर गया। बन्दे ने पास की दूकान से गुटखा ख़रीदा, खाया और निकल गया।

इसके बाद अब मेरी सोच पुलिस वालों को लेकर बिलकुल बदल गई है। जबसे पत्रकारिता में आया हूं, हमेशा पुलिसकर्मी से जुडी जब भी कोई वसूली, रिश्वतखोरी की खबर आती या फिर किसी और कारणों से उन पर उंगली उठती तो मुझे लगता कि कुछ पुलिसवालों की वजह से सभी को गलत ठहरा दिया जाता है। लेकिन पहले सीएमएस चौक के पास हुए एक्सीडेंट जिसमें घायल की जान पुलिसकर्मी की लापरवाही से गई, और फिर अपने साथ हुए हादसे में एक पुलिसकर्मी का गैर-संवेदनशील रवैया देख कर इनसे विश्वास उठ गया है।

अब सिर्फ एक चीज समझ आई कि अपने भरोसे रहिए… ये पुलिस वाले किसी के भी सगे नहीं हैं। ये भी समझ में आ गया कि आखिर फरियादी दबंगों की देहरी पर क्यों जाते हैं, थाने क्यों जाने से डरते हैं। मित्र, आप सबको मेरी तरह से बिन मांगी एक सलाह है। जान लीजिए, ध्यान दीजिए, याद रखिए…. पुलिस सिर्फ एक धोखा है… इस धोखे से आपका विश्वास उठना-उठाना ही आपकी सेहत के लिए शुभ होगा।

Regards,
ashish sharma ‘rishi
lucknow
mo- 09721921921
rishimantra@gmail.com

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यूपी में जंगलराज : फिर निर्भया कांड, जननांग पर घाव, जलाने के निशान, बोरे में शव, फिर केस दब जाएगा!

Kumar Sauvir : बीती शाम लखनऊ की एक बेटी फिर कुछ हैवानों की शिकार बन गयी। अलीगंज के बीचोंबीच सेंट्रल स्‍कूल के पीछे बोरे में दो दिन पुरानी उसकी लाश जब बरामद हुई तो लोग गश खाकर गिर पड़े। उम्र रही होगी करीब 25 साल, कपड़े बुरी तरह फटे हुए। हाथ और पैर तार से बंधे थे। इस बच्‍ची को जलाया गया था। इतना ही नही, इसके जननांग पर दरिन्‍दों ने बहुत बड़ा घाव बना दिया था। एक मनोविज्ञानी से बातचीत हुई तो उन्‍होंने बताया कि ऐसी दरिन्‍दगी नव-धनाढ्य और इसके बल पर पाशविक ताकत हासिल किये लोगों की ही करतूत होती है। सत्‍ता का नशा भी सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण कारक तत्‍व बनता है। तो फिर कौन हैं वह लोग ? शायद एडीजी पुलिस (महिला सुरक्षा) सुतापा सान्‍याल को पूरी छानबीन के बाद इस बारे में पता चल जाए। इसके एक दिन पहले भी तेलीबाग में भी इसी तरह की एक लाश बरामद हुई थी। क्‍या वाकई लखनऊ की आबोहवा बेटियों के खिलाफ हो चुकी है? अगर ऐसा है तो हम सब के लिए यह शर्म, भय, निराश्रय, असंतोष के साथ ही साथ चुल्‍लू भर पानी में डूब जाने की बात है। बेशर्म हम।

अरे टेक इट ईजी यार, टेक इट ईजी… यह किसी युवती की लाश ही तो है ना ? मार डाली गयी है ना, हां, तो ठीक है। इसमें बवाल करने की क्‍या बात है। काहे चिल्‍ल-पों कर रहे। इसके पहले कभी ऐसी लाशें नहीं देखीं हैं क्‍या राजधानी में? बेवकूफ कहीं के… पिछले साल भी तो मारी गयी थी एक युवती। है कि नहीं रक्‍त-रंजित ? इसी तेलीबाग के पडोस में ही। इण्डिया मार्क-टू हैंडपम्‍प के हत्‍थे के पास। सीढियों पर। नंग-धड़ंग। मुंह के बल। उसका पूरा का पूरा बदन नोंचा गया था। देखते ही मेरे तो रोंगटे ही खड़े हो गये थे। बरबस आंखें भर गयी थीं। ऐसा लगा था जैसे कि हमारे आसपास की ही कोई मां-बहन-बेटी की ही लाश वहां पड़ी हो। देखनेवालों ने तो उसकी नंगी फोटो भी खींच कर उसे वायरल करा दिया था। लोगों ने तो यहां तक बताया था कि यह फोटाेग्राफी पुलिसवालो की ही करतूत थी। लेकिन इसमें हुआ कुछ? नहीं ना?

तो फिर इसमें काहे हल्‍ला कर रहे हो? खामोश रहो। दीगर लाशों की तरह यह लाश भी खामोश मौत मरेगी। ज्‍यादा हल्‍ला-दंगा करोगे तो मीडिया में बवाल होगा। अखबार और न्‍यूज चैनल गुर्रायेंगे। और फिर अपना पल्‍लू झिझकते सरकार मामले की उच्‍च-स्‍तरीय जांच करने की बात करेगी। एडीजी सुतापा सान्‍याल चूंकि अभी भी अपर महानिदेशक ( महिला सम्‍मान प्रकोष्‍ठ ) नौकरी में हैं। पिछली बार भी उन्‍होंने ऐसी ही नंग-धड़ंग और रक्‍त-रंजित महिला की लाश के मामले को बहुत गम्‍भीरता के साथ जांचा था, पूरी बारीकियों को छानबीन करने के बाद बताया था कि उस महिला के गुप्‍तांगों को बाइक की चाभी से खुरचा गया था, जिसके चलते उसकी मौत हो गयी थी। हालांकि कई लोगों का कहना था कि यह जघन्‍य और नृशंस हत्‍या थी, जिसमें इस हैंडपम्‍प के हत्‍थे को उसके गुप्‍तांग में डाल कर उसे मार डाला गया था।

बहरहाल, पुलिस की आला अफसर मानी जानी वाली सुतापा सान्‍याल ने ही अपनी छानबीन में घटना स्‍थल की जांच के दौरान पहले पत्रकारों को बताया था कि कि इस हादसे में कम से कम दो हत्‍यारों की संलिप्‍तता है, लेकिन उसी शाम जब उन्‍होंने प्रेस-कांफ्रेंस किया था तो अपनी सघन जांच का ब्‍योरा देते हुए बताया था कि इस काण्‍ड को केवल एक व्‍यक्ति ने ही अंजाम दिया है। उसी जांच के बाद जिला पुलिस ने इस मामले में एक निरीह लग रहे एक गरीब और एक अदने से निजी सुरक्षा गार्ड को जेल भेज दिया था। हालांकि बाद में राज्‍य सरकार ने मामला ज्‍यादा भड़कने पर ऐलान किया था कि मामले की जांच सीबीआई को दी जाएगी, लेकिन आखिरकार यह मामला जिला पुलिस के पास ही रहा। तो ठीक है। इस युवती की मौत पर भी ऐसा हो जाएगा। हंगामा होगा तो सुतापा सान्‍याल बुलायी जाएंगे। सघन जांच करेंगे और अपनी महत्‍वपूर्ण जांच रिपोर्ट देकर किसी न किसी को अपराधी के तौर पर पहचान लेगीं। मामला खत्‍म। और कोई खास बात हो तो बताओ?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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ये है अखिलेश यादव की नाक तले काम कर रही लखनऊ पुलिस की हकीकत

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज डीआईजी लखनऊ आर के चतुर्वेदी को पत्र लिख कर लखनऊ पुलिस की हकीकत बताई है. पत्र में उन्होंने कहा है कि उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने स्वयं से सम्बंधित एक शिकायती पत्र थाना गोमतीनगर में भेजा पर थानाध्यक्ष और एसएसआई सहित सभी ने पत्र रिसीव करने तक से मना कर दिया. श्री ठाकुर ने इस सम्बन्ध में एसएसआई से फोन पर बात करना चाहा तो उन्होंने इससे भी मना कर दिया.

इसके बाद श्री ठाकुर ने डीआईजी को फोन कर गहरी नाराजगी जाहिर की जिसके तुरंत बाद डीआईजी ने थानाध्यक्ष को फोन किया जिन्होंने झूठ कह दिया कि पत्र पहले ही रिसीव हो गया है जबकि सच्चाई यह थी कि डीआईजी की डांट के बाद पत्र रिसीव करना शुरू किया गया था. श्री ठाकुर ने डीआईजी को इस सभी बातों से अवगत कराते हुए इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए कठोर कार्यवाही के लिए कहा है ताकि लखनऊ पुलिस में वास्तविक सुधार हो और जनता का वास्तविक भला हो.

सेवा में,
श्री आर के चतुर्वेदी,
डीआईजी रेंज,
लखनऊ

विषय- थाना गोमतीनगर में पत्र रिसीव नहीं करने, बात तक करने से इनकार करने, पत्र ले गए व्यक्ति से अनुचित आचरण किये जाने विषयक

महोदय,

कृपया आज समय 01.48 बजे मेरे सीयूजी नंबर 094544-00196 से आपके सीयूजी नंबर 094544-00212 पर किये गए फोन कॉल और इसके उत्तर में आप द्वारा 02.00 बजे किये गए कॉल का सन्दर्भ ग्रहण करें. आपको स्मरण होगा कि मैंने आपको कॉल कर अवगत कराया था कि मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर की ओर से एक प्रार्थनापत्र (प्रतिलिपि संलग्न) ले कर एक व्यक्ति थाना गोमतीनगर में रिसीव कराने गए थे जहां उपस्थित सभी लोगों ने पत्र रिसीव करने से साफ़ इनकार कर दिया था. मैंने यह भी बताया था कि जब पत्र ले गए व्यक्ति ने फोन मिला कर थाने के लोगों से मुझसे फोन से बात करने को कहा तो उन्होंने इससे तक इनकार कर दिया था. मैंने आपको निवेदन किया था कि थाने पर थानाध्यक्ष तथा एसएसआई बैठे हैं पर कोई भी व्यक्ति पत्र रिसीव नहीं कर रहा है.

मैंने आपसे निवेदन किया था कि आप और सभी वरिष्ठ अधिकारी लगातार कहते हैं कि थानों पर सभी पत्र तत्काल रिसीव होंगे पर यह उसकी वास्तविक स्थिति है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि मैं मात्र अपना पत्र रिसीव करवाने हेतु यह फोन नहीं कर रहा, बल्कि इस मामले को एक नजीर के रूप में देखने के लिए कर रहा हूँ कि थाने पर इस प्रकार खुलेआम प्रार्थनापत्र रिसीव नहीं किये जा रहे हैं, क्या इस पर कोई कार्यवाही भी हुआ करती है और आप जैसा सक्षम अधिकारी क्या इस पर कोई कार्यवाही करेगा.

आपने मुझसे कहा था कि आप अभी मामले को देख रहे हैं और मुझे सूचित करेंगे. आपने कुछ देर बाद मुझे फोन कर बताया था कि वह पत्र तो पूर्व में रिसीव हो गया है जिस पर मैंने आपको बताया था कि मुझे अभी-अभी थाने पर मौजूद व्यक्ति ने बताया कि थानाध्यक्ष अभी-अभी किसी का फोन हाथ में लिए सर-सर करते निकले हैं और पत्र रिसीव करने के आदेश दिए हैं. मैंने यह भी बताया था कि अभी तक पत्र रिसीव नहीं हुआ है, बल्कि आपके फोन के बाद पत्र रिसीव करने की कार्यवाही शुरू हुई है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि इस मामले को यूँ ही बीच में छोड़ने की जगह इसमें कोई ठोस कार्यवाही करें ताकि सही सन्देश जाए.

बाद में मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने भी आपसे फोन कर इस मामले में ठोस कार्यवाही का निवेदन किया था पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ दिखता है. निवेदन है कि हमारे लिए यह एक अकेला मामला नहीं, एक उदहारण है कि किसी प्रकार स्वयं लखनऊ जनपद में पुलिस द्वारा थाने पर व्यवहार किया जा रहा है. जैसा मैंने आपको बताया था कि थाने के लोग जानते हैं कि मैं एक आईपीएस अफसर हूँ, तब उन्होंने उस समय तक पत्र रिसीव नहीं किया जबतक मैंने आपके समक्ष अपनी गहरी नाराजगी और भारी कष्ट व्यक्त नहीं किया था और जब तक आपने इसे पुनः थानाध्यक्ष गोमतीनगर को आगे संप्रेषित नहीं किया था.

निवेदन करूँगा कि यदि यह एक उस आदमी के साथ स्थिति हो जो मौजूदा समय में आईपीएस पद पर तैनात है तो आम आदमी की स्थिति का अनुभव स्वयं किया जा सकता है. अतः जैसा आपके विषय में आम शोहरत है और जैसा मैंने आपसे फोन पर भी कहा था कि आप एक सक्षम अधिकारी माने जाते हैं, मैं समझता हूँ यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि मात्र पत्र रिसीव होने को प्रकरण का अंत समझने की जगह इसे प्रकरण की शुरुआत मानते हुए इसे एक उदहारण के रूप में देखने की कृपा करें. तदनुसार यदि आपको मेरी बातों में कोई अर्थ दिख रहा हो तो न सिर्फ इस मामले में
आवश्यक जांच कर आवश्यक कार्यवाही कार्यवाही करने की कृपा करें बल्कि इस सम्बन्ध में भविष्य में किसी घटना की पुनरावृति को रोकने के लिए भी सभी आवश्यक निर्देश निर्गत करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-AT/Complaint/85/15                                  
दिनांक- 26/02/2015
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

प्रतिलिपि- डीजीपी, यूपी, लखनऊ को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

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गायत्री प्रजापति धमकी के एफआईआर में लखनऊ पुलिस ने किया खेल

मुझे और मेरे पति पति आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को एक कथित टीवी पत्रकार द्वारा दी गयी धमकी में दी गयी शिकायत पर गोमतीनगर थाने में पूरी तरह गलत तरीके से एफआईआर दर्ज की गयी है. मेरे प्रार्थनापत्र के अनुसार मामला 506 आईपीसी तथा 66ए आईटी एक्ट 2000 का संज्ञेय अपराध बनता है लेकिन थानाध्यक्ष ने इसे सिर्फ धारा 507 आईपीसी के असंज्ञेय अपराध में दर्ज किया. आम तौर पर धमकी देने पर 506 आईपीसी का अपराध होता है जबकि 507 आईपीसी तब होता है जब कोई आदमी अपना नाम और पहचान छिपाने की सावधानी रख कर धमकी देता है.

एक निश्चित मोबाइल नंबर से दी गयी धमकी कभी भी अनाम नहीं मानी जा सकती क्योंकि इसे आसानी से ट्रेस किया जा सकता है. संज्ञेय अपराध में पुलिस स्वयं विवेचना और गिरफ़्तारी करती है जबकि असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही विवेचना या गिरफ़्तारी होती है. अतः मैंने पुलिस द्वारा जानबूझ कर मामले को ठन्डे बस्ते में डालने का आरोप लगाते एसएसपी लखनऊ को मुकदमे को सही धाराओं में दर्ज कर उसकी विवेचना कराने के लिए प्रार्थनापत्र दिया है ताकि प्रदेश के एक मंत्री से जुड़े इस मामले में सच्चाई सामने आ सके.

डॉ नूतन ठाकुर
# 094155-34525

सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
लखनऊ
विषय- एनसीआर संख्या 0001/2015 धारा 507 आईपीसी विषयक
महोदय,

निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या-NT/Complaint/40 दिनांक- 04/01/2015 के माध्यम से थानाध्यक्ष, थाना गोमतीनगर को दिनांक 03/01/2014 को मेरे पति आईपीएस अफसर श्री अमिताभ ठाकुर तथा मेरे मोबाइल पर फोन नंबर 093890-25750 द्वारा अपने आप को किसी टीवी चैनेल का पत्रकार कोई श्री मिश्रा बताते हुए मुझे श्री गायत्री प्रजापति मामले से अलग हो जाने की धमकी के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज करने को एक प्रार्थनापत्र दिया था.

कल दिनांक 05/01/2015 को समय लगभग 21.10 बजे रात्रि थाने जाने पर मुझे इस एफआईआर की प्रति प्राप्त हुई. अभिलेखों के अनुसार यह एफआईआर दिनांक 04/01/2015 को समय 21.45 धारा 155 सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत मु०अ०स० 0001/2015 धारा 507 आईपीसी में दर्ज हुआ. (एफआईआर की प्रति संलग्न) निवेदन करुँगी कि धारा 507 आईपीसी एक असंज्ञेय अपराध है जिसमे पुलिस धारा 155(2) सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के विवेचना नहीं कर सकती और धारा 2(घ) सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि मेरी शिकायत पर जो अभियोग पंजीकृत हुआ है उसकी विवेचना अब तभी होगी जब मैं अथवा पुलिसवाले इसके लिए मा० न्यायालय से अनुमति लें. यह भी लगभग स्पष्ट है कि पुलिसवाले इसके लिए अनुमति लेने से रहे, ऐसे में यह मुझसे ही अपेक्षित हुआ कि मैं मा० न्यायालय जाऊं और अनुमति प्राप्त करूँ.  इसके विपरीत सत्यता यह है कि मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र असंज्ञेय अपराध धारा 507 आईपीसी की श्रेणी में आता ही नहीं है बल्कि यह धारा 506 आईपीसी के अधीन आता है. मैं इसके लिए इन दोनों धारा को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ.

धारा 507- Criminal intimidation by an anonymous communication.—Whoev­er commits the offence of criminal intimidation by an anonymous communication, or having taken precaution to conceal the name or abode of the person from whom the threat comes, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, in addition to the punishment provided for the offence by the last preceding section.

धारा 506- Punishment for criminal intimidation.—Whoever commits, the offence of criminal intimidation shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both; If threat be to cause death or grievous hurt, etc.—And if the threat be to cause death or grievous hurt, or to cause the destruction of any property by fire, or to cause an offence punishable with death or 1[imprisonment for life], or with imprisonment for a term which may extend to seven years, or to impute, unchastity to a woman, shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to seven years, or with fine, or with both.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि धारा 507 आईपीसी अनाम संसूचना अथवा धमकी देने वाले व्यक्ति द्वारा अपना नाम या निवास छिपाने की पूर्व सावधानी बरतने पर लगाया जाता है. इसका अर्थ हुआ कि यह धारा तब लगेगी जब आपराधिक अभित्रास करने वाला व्यक्ति अपना नाम, पता, अपनी पहचान छिपाने का उपक्रम करे. जिस मामले में व्यक्ति ने एक ज्ञात फोन नंबर (जिसे शिकायत में लिखा गया है) से फोन किया वह किसी भी स्थिति में अनाम या पहचान छिपाने का मामला नहीं हो सकता क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि आज के टेक्नोलॉजी युग में तत्काल ही किसी भी नंबर से उसके धारक, धारक के सिम नंबर, आईएमई नंबर, उसके पता आदि की तत्काल जानकारी हो जाती है और यह बात आज के समय हर कोई जानता है. ऐसे में ज्ञात फोन नंबर से किये गए फोन को अनाम व्यक्ति अथवा पता, नाम छिपाने के साथ किया गया अपराध किसी भी सूरत में नहीं माना जा सकता. यह बात इतना सर्वज्ञात है कि यह किसी भी स्थिति में नहीं माना जा सकता कि थानाध्यक्ष गोमतीनगर को यह नहीं मालूम है. अतः प्रथमद्रष्टया ही लगाई गयी धारा पूरी तरह गलत है जो बात कोई भी समझ सकता है. इतना ही नहीं, तहरीर के अनुसार उस व्यक्ति ने अपना एक नाम भी बताया था जो मिश्रा जी लिखा हुआ है. साथ ही उसमे यह भी लिखा है कि उस व्यक्ति ने खुद को टीवी पत्रकार बताया. जब एक व्यक्ति अपना मोबाइल नंबर दे रहा है, अपना नाम बता रहा है, अपनी आइडेंटिटी बता रहा है तो वह धारा 507 आईपीसी में कैसे हुआ? जाहिर है कि थानाध्यक्ष द्वारा यह धारा गलत लगाई गयी है और मेरा यह खुला आरोप है कि उनके द्वारा यह जानबूझ कर आरोपी को बचाने के लिए किया गया है.

ऐसा इसीलिए क्योंकि दोनों धारा में दंड सामान है- 2 वर्ष, पर इन दोनों में एक बहुत बड़ा अंतर है. वह यह कि धारा 507 आईपीसी असंज्ञेय अपराध है और दिनांक 02/08/1989 को उत्तर प्रदेश गज़ट में प्रकाशित शासनादेश संख्या 777/VIII-9-4(2-(87) दिनांक 31/07/1989 के अनुसार धारा 506 आईपीसी उत्तर प्रदेश में संज्ञेय अपराध घोषित किया जा चुका है. थानाध्यक्ष को ज्ञात है कि इस धारा में विवेचना नहीं होगी और कोई पूछताछ नहीं होने के कारण यह मामला यहीं रुक जाएगा और ठप्प हो जाएगा. मैं यह आरोप इसीलिए भी लगा रही हूँ कि मेरी जानकारी के अनुसार यह धारा शायद ही किसी मामले में लगाई जाती हो पर यहाँ यह मात्र मामले को असंज्ञेय बनाए के लिए लगाई गयी. मैं यह बात इस आधार पर भी कह रही हूँ कि कल रात जब मैंने थानाध्यक्ष से फोन पर पूछा था कि दिए गए नंबर पर कॉल कर देखा गया है कि किसका फोन है तो उन्होंने बहुत रूखेपन से कहा था कि यह उनका काम नहीं है.

स्पष्ट है कि एफआईआर में मोबाइल नंबर, एक नाम और एक आइडेंटिटी होने के बाद भी बिना उस पर फोन किये, बिना उसकी कोई जानकारी लिए, बिना कोई प्रयास किये  अपने स्तर से ही उसे अनाम या अपनी पहचान छिपाने के लिए किया गया अपराध बताना सीधे-सीधे दोषियों को बचाना और यह जानते हुए कि असंज्ञेय अपराध की विवेचना नहीं होती मामले को जस का तस दफ़न करने का प्रयास है.

निवेदन करुँगी कि यह मामला मात्र धारा 506 आईपीसी का अपराध ही नहीं है बल्कि धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 का भी अपराध है. मैं यह धारा आपके सम्मुख रखना चाहूंगी “Punishment for sending offensive messages through communication service, etc- Any person who sends, by means of a computer resource or a communication device,—(a) any information that is grossly offensive or has menacing character; or (b) any information which he knows to be false, but for the purpose of causing annoyance, inconvenience, danger, obstruction, insult, injury, criminal intimidation, enmity, hatred or ill will, persistently by making use of such computer resource or a communication device,(c) any electronic mail or electronic mail message for the purpose of causing annoyance or inconvenience or to deceive or to mislead the addressee or recipient about the origin of such messages,shall be punishable with imprisonment for a term which may extend to three years and with fine. Explanation.— For the purpose of this section, terms “electronic mail” and “electronic mail message” means a message or information created or transmitted or received on a computer, computer system, computer resource or communication device including attachments in text, images, audio, video and any other electronic record, which may be transmitted with the message”
आईटी एक्ट की धारा 2 (1) (ha) के अनुसार “Communication Device” means Cell Phones, Personal Digital Assistance or combination of both or any other device used to communicate, send or transmit any text, video, audio, or image.

उपरोक्त तथ्यों से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि मोबाइल फ़ोन के मामले में criminal intimidation (आपराधिक अभित्रास) धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत अपराध है, जो पुनः संज्ञेय अपराध है. लेकिन थानाध्यक्ष ने इस धारा को भी इस मामले में नहीं लगाया है जो इनकी जानबूझ कर की गयी गलती प्रतीत होती है.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत न्याय के हित में आपसे निवेदन है कि आप तत्काल मामले को सही धाराओं धारा 506 आईपीसी तथा धारा 66ए, आईटी एक्ट  2000 में तरमीम कराते हुए इस मामले की निष्पक्ष विवेचना कराने की कृपा करें. निवेदन करुँगी कि यह प्रकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से श्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के नाम से जुड़ा है जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और यह मामला मेरे और मेरे पति की सुरक्षा के भी जुड़ा है अतः इस पर यथेष्ट गंभीरता से ध्यान देने की कृपा करें ताकि यह सन्देश न जाए कि विवेचना से बचने का कोई प्रयास हो रहा है और जानबूझ कर मामले को दबाया जा रहा है.

पत्र संख्या-NT/Complaint/40                               
दिनांक- 06/01/2015
भवदीया,                                                     
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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वाह रे लखनऊ पुलिस! : जो लड़की को बचा रहा था उसे एएसपी पर फायरिंग का आरोपी बना दिया

हमने हजरतगंज, लखनऊ में एएसपी दुर्गेश कुमार पर हुए कथित फायरिंग मामले में अपने स्तर पर जांच की. हमने आरोपी पुलकित के घर जाकर उसके पिता राम सुमिरन शुक्ला, माँ सावित्री शुक्ला, भाई पीयूष शुक्ला तथा अन्य परिचितों से मुलाकात की. इन लोगों ने बताया कि घटना प्रोवोग शॉप के पास हुई जिसमें परिचित लड़की को छेड़े जाते देख पुलकित और साथियों ने बीच-बचाव किया.

तभी पुलिस आ गयी और आपाधापी में बिना समझे पुलकित का एएसपी पर हाथ चल गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया और थाने पर काफी मारा-पीटा गया. यह भी बताया कि गिरफ्तारी की सूचना अगले दिन 11.00 बजे दी गयी. उस रात भी वह लड़की थाना गयी थी पर पुलिस ने उसे भगा दिया था. उन्होंने कहा कि यदि प्रोवोग शॉप के पास के सीसीटीवी फुटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी. पुलकित के पिता ने स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रहने के कारण इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने की मांग की.

हमने एफआईआर तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इसमें फायरिंग का उल्लेख है जबकि ना कोई हथियार नहीं मिला और ना खोखा आदि. अतः हमने प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर मामले की सीबी-सीआईडी जांच कराने और दस दिनों में मामले की प्रशासनिक जांच किसी सचिव स्तर के अधिकारी से कराने की मांग की है.

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- थाना हजरतगंज पर एएसपी और पुलिस पर हुए कथित फायरिंग मामले में श्री पुलकित की गिरफ़्तारी विषयक

महोदय,

पिछले कुछ दिनों से थाना हजरतगंज, जनपद लखनऊ में 23/11/2014 एएसपी श्री दुर्गेश कुमार पर श्री पुलकित शुक्ला तथा तीन अन्य द्वारा फायरिंग करने की घटना के विषय में कई प्रकार की बातें लिखी जा रही थीं. हम अमिताभ और नूतन ठाकुर ने इस सम्बन्ध में दिन भर गहराई से मामले की अपने स्तर पर जांच की. हमने इसके लिए पुलकित के 5/25, 5ई, वृन्दावन कॉलोनी स्थित निवास स्थान भी गए जहां हमें उनके पिता श्री राम सुमिरन शुक्ला (फोन नंबर 098385-78971), माँ सुश्री सावित्री शुक्ला, भाई श्री पियूष शुक्ला (फोन नंबर 098391-30012), मामा बद्री प्रसाद शुक्ला पुत्र श्री महेश नारायण,  719, सीतापुर रोड महायोजना, निकट महादेव रोड, (फोन नंबर #098391-72505) तथा परिचित श्री ए के मिश्रा पुत्र श्री एस पी मिश्रा, 2ए/287, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 097951-67623 ), श्री आशुतोष ओझा पुत्र श्री गया प्रसाद ओझा, 5 ई, 3/24, वृन्दावन कॉलोनी तथा श्री राजेश कुमार पुत्र श्री दुर्गा प्रसाद, 5ई, 1/225, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 074088-10980) मिले.

इनमे श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन, भाई श्री पियूष, माँ सुश्री सावित्री श्री पुलकित से उनकी गिरफ़्तारी के बाद मिल चुके थे. उन्होंने हमें यह बताया कि श्री पुलकित का कहना है कि यह पूरी घटना हज़रातगंज से थोड़ी दूर पर स्थित Provogue शॉप के पास हुआ. घटना मूल रूप से यह हुई कि एक लड़की, जो उनकी परिचित थी, को कुछ अज्ञात लड़के छेड़ रहे थे, जिस पर इन लोगों ने बीच-बचाव किया जिसके बाद इनमे आपसी कहासुनी शुरू हो गयी. इतने में पुलिस आ गयी और उनमे एक ने श्री पुलकित पर हाथ चलाया. श्री पुलकित यह समझ नहीं पाए कि ऐसा किसने किया और उनका हाथ भी अकस्मात उठ गया. उसने कत्तई जानबूझ कर पुलिस पर हाथ नहीं उठाया था. जैसे ही उसे मालूम हुआ कि उन्होंने गलती से एएसपी साहब पर हाथ चला दिया है, वह एकदम से घबरा गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. उसने यह भी बताया कि उसे थाने पर काफी मारा-पीटा गया. उसने यह भी कहा कि यदि Provogue शॉप के पास के सीसीटीवी कैमरों के फूटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी.

श्री राम सुमिरन से बताया कि उन्हें अपने बेटे की गिरफ़्तारी की सूचना दिनांक 24/11/2014 को लगभग 11.00 बजे हजरतगंज थाने के किसी तिवारी जी ने उनके मोबाइल पर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि श्री पुलकित ने कहा कि उसे थाने में बहुत मारा गया. इन लोगों ने यह भी बताया कि उस रात भी वह लड़की स्वयं थाना हजरतगंज गयी थी पर पुलिस ने उसे थाने से भगा दिया था.

हमने इस सम्बन्ध में लड़की से भी उसके मोबाइल नंबर पर बात की और उससे मिलना चाहा पर लड़की ने शायद घबराहट के कारण हमसे मिलने में हिचक दिखाई. लेकिन हमें उस लड़की द्वारा प्रमुख सचिव गृह को दिया प्रार्थनापत्र मिला जिसमे उन्होंने दिनांक 23/11/2014  को शाम की पूरी घटना स्वयं बतायी. उसने बताया कि गिरफ्तार श्री पुलकित आदि उसकी मदद कर रहे थे, ना कि उससे छेड़छाड़. उसने यह भी लिखा है कि पुलिस के अफसर सादे में थे जिनसे श्री पुलकित से झड़प हो गयी. हमने कल हजरतगंज थाने पर आ कर बयान देने वाले श्री विशाल तिवारी से उनके फोन नंबर 097944-15703 पर कई बार फोन किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

हमने गोपनीय स्तर पर इस मामले के जानकार कई लोगों से बात की. हमने इस मामले में पंजीकृत एफआईआर संख्या 592/2014 धारा 307/354/ख/354घ आईपीसी का तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इनके अनुसार दिनांक 23/11/2014 को समय 19.40 शाम गिरफ़्तारी हुई है. एफआईआर में फायरिंग का उल्लेख हुआ जबकि अन्य किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार के फायरिंग की कोई बात सामने नहीं आई है. गिरफ़्तारी के फर्द से भी स्पष्ट है कि गिरफ्तार व्यक्ति के पास से कोई हथियार नहीं मिला. यह भी स्पष्ट है कि हथियार के अलावा कोई खोखा आदि भी मौके पर नहीं मिला. गिरफ़्तारी के फर्द में मा० उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार तत्काल गिरफ़्तारी की सूचना परिजनों को देने की बात कही गयी.

श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन ने हमें लिखित रूप से एक प्रार्थनापत्र दे कर सभी बातें लिखते हुए बताया कि उन्हें अब स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रह गया है और उन्होंने हमें मामले की विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने में मदद करने की प्रार्थना की. उपरोक्त के दृष्टिगत निम्न तथ्य आवश्यक प्रतीत होते हैं-

1. चूँकि मामला लखनऊ पुलिस के एएसपी से सम्बंधित है, अतः इसमें स्थानीय पुलिस की जगह निश्चित रूप से सीबी-सीआईडी से विवेचना कराया जाना प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से अनिवार्य प्रतीत होता है

2. विवेचना तत्काल/अविलम्ब सीबी-सीआईडी को दिया जाना न्याय की दृष्टि से अपरिहार्य प्रतीत होता है

3. इस पूरे मामले की प्रशासनिक जांच दस दिन के निश्चित समयावधि में शासन के किसी प्रमुख सचिव/सचिव स्तर के अधिकारी से अलग से करवाने की आवश्यकता प्रतीत होती है

अतः आपसे निवेदन है कि उपरोक्त बिंदु संख्या एक से तीन पर प्रस्तुत तीनों अनुरोधों को स्वीकार करते हुए तदनुसार आदेश निर्गत करने की कृपा करें

डॉ नूतन ठाकुर                          
अमिताभ ठाकुर
मोबाइल: 094155-34525 और 94155-34526
पता: 5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
प्रतिलिपि- पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

 

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हिन्दी दैनिक जन माध्यम के मुख्य सम्पादक और पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद का फर्जीवाड़ा

: जन माध्यम के तीन संस्करण चलाते हैं मंजूर अहमद : दूसरे की जमीन को अपने गुर्गे के जरिए बेचा, खुद बने गवाह : ताला तोड़कर अपने पुत्र के मकान पर भी कराया कब्जा, पुलिस नहीं कर रही मुकदमा दर्ज : लखनऊ, पटना व मेरठ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जन माध्यम मुख्य सम्पादक, 1967 बैच के सेवानिवृत्त आई0पी0एस0 अधिकारी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर एवं विधायक प्रत्याशी प्रो0 मंजूर अहमद पर अपने गुर्गे के जरिए दूसरे की जमीन को बेचने व खुद गवाह बनने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। प्रो0 मंजूर अहमद के इस फर्जीवाड़े का खुलासा खुद उनके पुत्र जमाल अहमद ने किया।

जमाल अहमद ने बताया कि अपनी नौकरी के दौरान मंजूर अहमद ने अरबों रूपयों की नामी-बेनामी सम्पत्ति बनाई है। लखनऊ के नजदीक जनपद बाराबंकी, कुर्सी रोड के ग्राम गुग्गौर में मंजूर अहमद ने अपने सगे भांजे मों0 निजामुद्दीन पुत्र एनुलहक निवासी खालिसपुर जिला सीवान बिहार, जो ड्रग्स बेचने का धंधा करते थे, कई साल तिहाड़ जेल में बंद रहे, के नाम ग्राम गुग्गौर में गाटा सं0 385 क्षेत्रफल 1.481 हेक्टेयर भूमि खरीदी। मों0 निजामुद्दीन का लोकल पता सी-189, इन्दिरानगर लखनऊ यानि मंजूर अहमद के अपने घर का पता लिखाया। इसी बेशकीमती करोड़ों-अरबों  की जमीन पर अब प्लाटिंग की जा रही है। इस जमीन को दिनांक 27.08.2013 को बही सं0 1, जिल्द सं0 3099, पृष्ठ सं0 347 से 400 क्रमांक 5881 पर रजिस्टर्ड किया गया है।

श्री मंजूर अहमद ने इस जमीन को धोखे से बेचा है एवं जालसाजी की है, जिस व्यक्ति को मंजूर अहमद ने मों0 निजामुद्दीन निवासी बिहार बताया है, वह कोई बहुरूपीया है एवं मंजूर अहमद का गुर्गा है, क्योंकि रजिस्ट्री में गवाह मंजूर अहमद स्वयं हैं। मों0 निजामुद्दीन ने स्वयं रजिस्ट्री नहीं की है, बल्कि उनके नाम से किसी फर्जी आदमी को खड़ा करके रजिस्ट्री की गई है। उप निबंधक कार्यालय में इस फर्जी निजामुद्दीन की डिजिटल फोटो व डिजिटल अंगूठे के निशान मौजूद हैं।  जमाल अहमद ने बताया कि उनके पिता ने तीन शादियां की एवं तीनों पत्नियां जीवित हैं, वह उनकी पहली पत्नी के पुत्र हैं। जमाल ने बताया कि उनके सगे नाना स्व0 खुर्शीद मुस्तफा जुबैरी बिहार कैडर के 1953 बैच के आई0ए0एस0 अधिकारी थे, उनकी मौत एक किराए के मकान में हुई थी, आज भी उनकी नानी, मां एवं उनकी अविवाहित बहन किराए के मकान (गौतम कालोनी, आशियाना नगर फेस-2, पटना) में ही रहते हैं।

जमाल ने बताया कि मंजूर अहमद अपनी हवस के चलते गैंग बनाकर आदतन अपराध करते हैं। दूसरे की सम्पत्ति पर कब्जा करना, व्यवधान डालना इनकी आदत है। जमाल ने बताया कि उनके मकान 1/140 विश्वास खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ पर भी मंजूर अहमद की नीयत खराब है। मकान का ताला तोड़कर श्री मंजूर अहमद, श्री यूसुफ अयूब व अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसके खिलाफ वह लगातार दिनांक 14.05.2014 से एफ़0आई0आर0 दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

इसी क्रम में उन्होंने दिनांक 28.10.2014 को महामहिम राज्यपाल महोदय, से मिलकर न्याय की गुहार लगाई थी। महामहिम जी ने अपने ए0डी0सी0 श्री गौरव सिंह, आई0पी0एस0 के माध्यम से एस0एस0पी0 लखनऊ को फोन कराकर जमाल के साथ न्याय करने के लिए कहा था। एस0एस0पी0 लखनऊ ने दिनांक 31.10.2014 को थानाध्यक्ष गोमती नगर, जहीर खान को फोन पर निर्देश दिए कि प्रकरण में एफ़0आई0आर0 दर्ज की जाए। थानाध्यक्ष गोमतीनगर ने उनके प्रार्थना पत्र को देखते ही कहा कि मंजूर साहब तो अच्छे अधिकारी रहे हैं, एफ़0आई0आर0 दर्ज होने से साहब की बड़ी बदनामी हो जाएगी। थानाध्यक्ष ने कहा कि वह एस0एस0पी0 साहब से बात कर लेंगे। एफ़0आई0आर0 दर्ज नहीं होने पर ही जमाल ने दिनांक 03.11.2014 को मुख्य सचिव उ0प्र0 से मुलाकात की, जिस पर उन्होंने प्रमुख सचिव गृह को कार्यवाही के निर्देश दिए। प्रकरण पर प्रमुख सचिव गृह ने स्वयं दिनांक 03.11.2014 को ही एस0एस0पी0 लखनऊ से वार्ता कर उनको न्याय देने की बात कही।

जमाल ने बताया कि अभी तक एफ0आई0आर0 इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि  उनके पिता मंजूर अहमद, आई0पी0एस0, ए0डी0जी0 उ0प्र0 के पद से रिटायर अधिकारी हैं, मंजूर अहमद लखनऊ से मेयर एवं विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, कई विश्व विद्यालयों के कुलपति रह चुके हैं एवं वर्तमान में शुभार्ती वि0वि0 मेरठ के कुलपति हैं। उनके पिता के खास गुर्गे यूसुफ थाना क्षेत्र गोमतीनगर लखनऊ में ही जीरो डिग्री बार, रेस्टोरेन्ट व डिस्कोथेक चलाते है। इनकी दबंग छवि व बार आदि के चलते स्थानीय पुलिस से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

मंजूर अहमद किस हद तक सम्पत्ति के भूखे हैं, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इन्होंने अपनी एक कोठी शेरवानी नगर, मडि़यांव, लखनऊ से ठीक सटे एक प्लाट दस हजार वर्ग फीट पर लिखा दिया कि प्लाट बिकाऊ नहीं है, ताकि लोग विवादित समझकर प्लाट न खरीदें। इनके पास एक मकान बी-102, वसुन्धरा इन्क्लेव दिल्ली में है। सी-189, इन्दिरा नगर, लखनऊ में मकान है, इसके अलावा कई सम्पत्तियां हैं। मंजूर अहमद के खास गुर्गे यूसुफ के पास लखनऊ में ही करोड़ों रुपये की अपनी सम्पत्ति है। यूसुफ का लखनऊ में ही नाका क्षेत्र में जस्ट 9 इन नाम का होटल, गोमतीनगर, लखनऊ में जीरो डिग्री बार व रेस्टोरेन्ट है, अपना स्वयं का मकान 107 गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, लालकुआं, लखनऊ के साथ ही और भी कई सम्पत्तियां हैं। साथ ही यूसुफ लगभग पांच कम्पनियों के मालिक भी हैं।   जमाल ने बताया कि वह पुनः दिनांक 08.11.2014 को एस0एस0पी0 से मिले तो एस0एस0पी0 ने पूरे मामले को समझने के बावजूद कहा कि प्रकरण सिविल नेचर का है, वह जांच करवा लेंगे, जबकि सबको पता है कि ताला तोड़कर जबरन कब्जा किया गया है।  जमाल के अधिवक्ता विनोद कुमार ने एस0एस0पी0 से मांग की है कि तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज करके जमाल के साथ न्यायोचित कार्यवाही की जाए।

दिनांक 15.11.2014

(जमाल अहमद)
पुत्र श्री मंजूर अहमद
निवासी- 1/140, विश्वास खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ
09654871990 (मो0)

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अखिलेश, ये हाल है तुम्हारे (जंगल)राज में… पुलिस रिश्वत लेकर देती है डेडबाडी!

Harendra Singh : बीती (23 सितंबर 2014) रात मेरे बेटे हर्षित का करीब 1.45 am पर फोन आया। मैंने फोन उठाया, तो घबराहट में बोला, पापा मैं चारबाग स्टेशन पर हूँ, आप जानते हैं सनबीम में मेरा सहपाठी आशीष था, वह अपने पापा को इलाज के लिए पटना से एम्स दिल्ली ले जा रहा था, पर रास्ते चारबाग से पहले ही अंकल का देहांत हो गया है, और जीआरपी पुलिस के लोग उनकी डेडबाडी नहीं दे रहे हैं, जबकि अंकल का treatment file व reference form मैं दिखा रहा हूं।

पहले तो मुझे हर्षित पर बहुत गुस्सा आया कि 26 सितम्बर से इसका exam है, और ये महोदय रात के डेढ़ बजे चारबाग स्टेशन पर हैं। तुरन्त आभास हुआ कि वह एक अच्छे उद्देश्य के लिए समय दे रहा है, यह निश्चित रूप से अच्छा कार्य है। बातचीत में पता चला कि अन्त में जीआरपी चारबाग के लोगों ने बच्चों से 5000 रुपये लेकर उसके पिता के शव को रात्रि में ही जाने दिया। मैं यह विषय सोशल मीडिया पर इसलिए लिखा रहा हूँ कि आपलोग ज्यादा से ज्यादा शेयर कर विषय को सरकार व उच्च अधिकारियों तक पहुंचायें ताकि भविष्य में किसी बेटे को अपने पिता का शव प्राप्त करने के लिए पुलिस को घूस न खिलाना पड़े।

जौनपुर निवासी हरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नूतन ठाकुर के धरने की सूचना मिलते ही लखनऊ पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्यवाही शुरू की

हमारे घर हुई चोरी में भारी पुलिस निष्क्रियता के विरुद्ध मेरे द्वारा डीजीपी कार्यालय के धरने की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग यकायक तेजी में आ गया. 15 अक्टूबर की रात हुई इस चोरी के बाद किसी पुलिस वाले ने मामले की सुध नहीं ली थी. घटना के दिन से ही मामले के विवेचक छुट्टी पर चले गए थे. पांच लाख से ऊपर की चोरी होने के बावजूद मामले में एसआर केस दर्ज नहीं किया गया था और एसएसपी लखनऊ सहित किसी भी वरिष्ठ पुलिस अफसर ने नियमानुसार घटनास्थल का निरीक्षण नहीं किया था.

पुलिस की इस घोर लापरवाही से क्षुब्ध हो कर मैंने कल रात यह घोषणा की थी कि मैं आज डीजीपी कार्यालय पर धरने पर बैठूंगी. यह सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में तेजी आ गयी. सुबह पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर और उसके बाद सीओ गोमतीनगर सत्यव्रत और एसपी ट्रांसगोमती दिनेश यादव घर आये और शीघ्र अनावरण का आश्वासन दिया. फिर एसएसपी लखनऊ प्रवीण का मेरे पति अमिताभ ठाकुर को फोन आया कि उन्होंने एसपी क्राइम को यह मामला सौंप दिया है और तीन दिन में बरामदगी हो जायेगी, अतः मैं धरना स्थगित कर दूँ.

मैं पूर्व सूचना के अनुसार डीजीपी कार्यालय गयी जहां चोरी होने पर कोई कार्यवाही नहीं होने वाले कई और लोग भी आये थे. मैंने एसएसपी के कहने पर दस दिन का समय देते हुए धरना स्थगित किया है पर हमने एसपी लोक शिकायत से मिल कर उन्हें ज्ञापन दिया. हम इस तरह के चोरियों में एफआईआर नहीं लिखने अथवा अन्य निष्क्रियता दिखाने के तमाम मामलों को इकठ्ठा कर रहे हैं और इन सब मामलों को सामूहिक रूप से उठाएंगे.

ज्ञापन—

सेवा में,
श्री ए एल बनर्जी,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- मेरे घर पर हुई चोरी में पुलिस के पूर्णतया उपेक्षात्मक रुख तथा इसके नाम पर मानवाधिकार विषयक  
महोदय,

कृपया निवेदन है कि दिनांक 15/16-10-2014 की रात्री को मेरे निवास 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ में नकबजनी/चोरी की घटना उस समय घटी थी जब हम गाजियाबाद गए थे. इस घटना के सम्बन्ध में मैंने दिनांक 16/10/2014 को थाना गोमतीनगर पर मु०अ०स० 884/2014 अंतर्गत धारा 457/380 आईपीसी पंजीकृत कराया है.

इस घटना में हमारा करीब छ-सात लाख रुपये का नुकसान हुआ है. यह हमारे लिए बड़ी धनराशि है.  दो लाख रुपये से ऊपर की चोरी होने के नाते यह प्रकरण पुलिस की परिभाषा में एसार केस की श्रेणी में आता हैं, अतः मेरे पति श्री अमिताभ ठाकुर ने अपने पत्र संख्या- AT/Security/01 दिनांक-17/10/2014 द्वारा एसएसपी को और मैंने थानाध्यक्ष गोमतीनगर को इसे एसआर केस में तरमीम करते हुए समस्त आवश्यक प्रक्रिया अपनाने हेतु निवेदन किया था. हमने इस प्रकरण में हमारे सामाजिक कार्यों से परेशान या नाराज किन्ही ताकतवर व्यक्तियों द्वारा किसी प्रकार की साजिश की सम्भावना के बारे में भी सम्बंधित अधिकारियों को अवगत कराया था.

उस दिन से अब तक किसी पुलिस वाले ने मौके का निरीक्षण नहीं किया था और ना ही हमसे इस बारे में कोई पूछताछ की थी. कल जब मैं इस घटना की प्रगति जानने थाना गोमतीनगर गयी थी तो पहले तो किसी पुलिसवाले ने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया और जब मैंने बहुत जोर दिया तो मुझे यह बताया गया कि इस मामले में विवेचक श्री श्रीराम घटना से पहले ही छुट्टी पर रवाना हो गए थे. इस प्रकार इस मामले की विवेचना एक ऐसे दरोगा को दी गयी थी जो अवकाश पर थे. हम सभी जानते हैं कि चोरी के मामले में घटना के ठीक बाद का समय बहुत ही महत्वपूर्ण होता है पर इस मामले में घटना के बाद कोई कार्यवाही ही नहीं हुई क्योंकि विवेचक छुट्टी पर थे.

दूसरी बात यह कि जैसा मैंने ऊपर बताया है, मेरे घर की चोरी लगभग पांच-छः लाख रुपये की है और दो लाख से ऊपर की चोरी एसआर केस होती है पर इस मामले में अब तक एसआर केस नहीं लगाया गया है. साथ ही सीओ से ऊपर किसी भी पुलिस अफसर द्वारा मौका मुआयना तक नहीं किया गया है जब कि मेरी जानकारी के अनुसार एसआर केस में थानाध्यक्ष से ले कर जनपद के एसएसपी तक को मौका मुआयना करना होता है और इन मामलों का पर्यवेक्षण डीआईजी और आईजी द्वारा की जाती है. हमारे घर की चोरी एसआर केस होने के बाद भी इसे एसआर केस नहीं बनाया जाना भी पुलिस की लापरवाही को स्पष्ट बताता है.

इस प्रकरण का एक तीसरा दुखद पहलू यह है कि आज जब सुबह मेरे पति सब्जी लेने गए तो वहां दूकान पर सब्जीवाले और अन्य लोगों ने बताया कि परसों (18/10/2014) की रात करीब नौ बजे गोमतीनगर थाने के पुलिसवालों ने विराम खंड पांच के जीवन प्लाजा से ले कर हुसडिया चौराहे तक सड़क के किनारे खोमचा, ठेलिया आदि लगाने वाले कई गरीब दुकानदारों को हमारे घर में हुई चोरी के नाम पर यह कहते हुए बुरी तरह पीटा कि वे लोग ही चोरी करते हैं. इनमे से कई लोगों को शारीर पर काफी चोटें भी आयीं. इनमे ज्ञान (मोबाइल नंबर 080819-66943), शोभित पान वाला, हुसडिया मंडी आदि सब्जीवाले की दुकान पर मिले. यह निश्चित रूप से अनुचित और अमानवीय आचरण है और इन गरीब लोगों का स्पष्टतया मानवाधिकार हनन भी. उन लोगों ने मेरे पति से कहा कि आप इतने दयालु आदमी हैं और आपके नाम पर हमारे ऊपर यह अत्याचार हो रहा है. मैं निवेदन करना चाहूंगी कि भले हमारे घर की चोरी नहीं खुले पर इसने नाम पर इस प्रकार के अत्याचार नहीं किये जाएँ.

इस मामले में सबसे दुखद पहलू यह है कि जब मैंने आज विरोध प्रदर्शन की घोषणा की तो सुबह से ही पुलिस के अफसर हमारे घर आना शुरू कर दिए. पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर हमारे घर आये जिन्होंने बताया कि हमारे मामले में विवेचक बदल दिए गए हैं और एसएसआई गोमतीनगर नए विवेचक हैं. यह भी बताया कि इस मामले में एसआर रिपोर्ट भेजी जा चुकी है. इसके बाद एसपी ट्रांसगोमती श्री दिनेश यादव और सीओ गोमतीनगर हमारे आये. उन्होंने भी हमें तमाम बाते कहीं. अंत में एसएसपी लखनऊ श्री प्रवीण कुमार का मेरे पति के पास फोन आया जिन्होंने कहा कि वे इस मामले को क्राइम ब्रांच को दे रहे हैं और एसपी क्राइम स्वयं इसका पर्यवेक्षण करेंगे. उन्होंने मेरे पति से मुझे धरना नहीं करने का निवेदन किया और आश्वासन दिया कि तीन दिनों में यह केस खुल जाएगा.

जाहिर सी बात है कि धरने की बात जानने के बाद इस तरह की सक्रियता पुलिस की कार्यप्रणाली के बारे में सब कुछ कह देती है. यदि पहले ही यह सब किया गया होता तो यह स्थिति ही नहीं आई होती. फिर भी मैं एसएसपी लखनऊ के आश्वासन पर तीन दिन की जगह दस दिनों के लिए अपना यह विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम स्थगित कर रही हूँ.

उपरोक्त समस्त तथ्यों के दृष्टिगत मेरा आपसे निम्न अनुरोध हैं-

1. कृपया इस घटना के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश पुलिस को सभी चोरी की घटनाओं में बराबर सक्रियता और संवेदनशीलता बरतने हेतु आदेश देने की कृपा करें ताकि किसी धरना प्रदर्शन आदि अथवा किसी के कथित रूप से बड़े आदमी होने पर ही नहीं बल्कि प्रत्येक आम आदमी के मामले में भी तत्काल गंभीरता पूर्वक कार्यवाही हो

2. कृपया पुलिस को चोरी या अन्य आपराधिक घटनाएँ रोकने के लिए इस प्रकार के अवैधानिक तरीके अपनाने से रोकने के आदेश देने की कृपा करें 

भवदीय,
डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
पत्र संख्या- AT/Security/01                                            
दिनांक-20/10/2014

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आईपीएस अफसर की फुफेरी बहन से अभद्रता करने वाले को नहीं पकड़ रही लखनऊ पुलिस

Amitabh Thakur : मनबढ़ अपराधी… महिलाओं को आगे आना ही होगा… मेरी रिश्तेदारी की बहन जो लखनऊ में इंजीनियरिंग की छात्र है, को पिछले तीन-चार दिनों से एक अनजाने फोन नंबर से कॉल आ रहा था. पहला कॉल 10 या 11 अगस्त को आया था. उसने महिला हेल्पलाइन (1090) पर 11 अगस्त लगभग 9-10 बजे सुबह फोन कर शिकायत दर्ज कराई लेकिन इसके बाद भी रात-दिन कॉल आते रहे जिन्हें वह लड़की उठा नहीं रही थी. कल 13 अगस्त शाम को उस व्यक्ति का एक मैसेज आया जिसमे कुछ इस प्रकार लिखा था कि ”तुम्हे काम्प्लेक्स पर देखा था, तुम मुंह बांधे थी, मुझे अच्छी लग रही थी वगैरह.” लड़की ने एक मैसेज कर पूछा कि आप कौन हैं और आपको किसने नंबर दिया है.

उसके बाद से उस नंबर से लगातार बहुत ही घटिया और गंदे मैसेज आ रहे हैं. अब तक 15-20 ऐसे गंदे मैसेज आ चुके हैं. कुछ मैसेज में धमकी भी दी गयी है (उदाहरण— @## dhk ab tera bap tujhe kaise colg chudwa ta ha/देख अब तेरा बाप तुझे कैसे कॉलेज छुड़वाता है, Tere bap ka no. Mil gya ab dkh tere ijat utar dunga 10 min Me ha ya na reply kr/तेरे बाप का नंबर मिल गया है अब देख तेरे इज्जत उतार दूंगा 10 मिनट में, हाँ या ना रिप्लाई कर, Tera bap ka no. Mujhe ek ghante me mil jayega phr dkhta hu/तेरा बाप का नंबर मुझे एक घंटे में मिल जाएगा फिर देखता हूँ).

मेरी बहन ने कल 13 अगस्त शाम 5 बजे दुबारा महिला हेल्पलाइन को फोन किया लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ और मैसेज और कॉल आते रहे.

अंत में घबरा कर आज उसने मुझे फोन कर पूरी बात बताई. मैंने डांटा कि अब तक क्यों नहीं बताया तो उसने कहा कि मुझे लग रहा था महिला हेल्पलाइन से कार्यवाही हो जायेगी लेकिन जब अब तक कुछ नहीं हुआ तो आपको बताना का सोचा. चूँकि वह एक पारंपरिक परिवार से आती है, अतः हमने उसे बिना डर और हिचक के पुलिस के सामने आने को कहा ताकि इस प्रकार के महिला अपराध करने वालों के खिलाफ ठोस कार्यवाही हो सके और ऐसे शोहदों पर सही सन्देश जाये. मैंने एसएसपी लखनऊ और इन्स्पेक्टर चिनहट से फोन से बात की है और उन्हें पत्र लिख कर कार्यवाही करने को कहा है. दोनों अधिकारियों ने कठोर कार्यवाही का आश्वासन दिया है.

मैंने अपनी बहन को सामने आ कर पूरी बात कहने को कहा है और वह इस बारे में हिम्मत भी दिखा रही है जो मुझे अच्छा लगा है क्योंकि अब समय आ गया है कि लड़कियों को हिचक छोड़ ऐसे अपराधों में सामने आना होगा. तभी इन अपराधों पर लगाम लगेगा

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मैंने हिम्मत बढ़ा कर अपनी फुफेरी बहन को आगे बढ़ गंदे मैसेज भेजने वाले पर एफआईआर दर्ज करने का हौसला दिया. पुलिस प्रार्थनापत्र ले कर शायद सो गयी है. पुलिसवाला होने पर कैसे गर्व करूँ?

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कल मैंने अपनी फुफेरी बहन से अभद्रता पर एसएसपी लखनऊ से बात की तो बड़ा सुकून मिला था. शाम में थाने गया तो उम्मीद आधी हो गयी थी. अब आज दोपहर तक इंतज़ार कर रहा हूँ.

लखनऊ में पदस्थ आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

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