यूपी के नए डीजीपी सुलखान सिंह पर लिखी गई यह पोस्ट एफबी पर हुई वायरल

Dhirendra Pundir : सुलखान सिंह नए डीजीपी। लगता नहीं था कि कोई इतने ईमानदार अफसर को कभी कमान देगा। लईया-चना हमेशा याद रहेगा। लखनऊ में खबर करने गया था। सोचा चलो एक दो अफसर से तो मिलता चलू। फिर याद आया कि चलो एडीजी जेल से मिलते है। फोन किया और उधर से वही अपनेपन से भरी हुई आवाज शहर में आएँ हो क्या। चलो आएँ हो तो आ जाओं। मिलने पहुंच गए खाने का समय हो चुका था तो पूछा कि आपने लंच तो नहीं लिया होगा तो हमारे साथ लोंगे।

मैंने जवाब दिया कि सर मैं तो दोपहर में खाना नहीं खाता हूं। उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं जो हम खाते है वही खा लेना। और उन्होंने कहा कि ले आओं भाई। लेकिन अर्दली आया और बोला सर आज तो आया नहीं है। उन्होंने पूछा कि क्यों क्या हुआ वो तो कभी छुट्टी करता नहीं है। मेरी नजर में ये खाने को लेकर बातचीत लग रही थी। लेकिन अर्दली ने कहा कि सर छुट्टी तो नहीं थी लेकिन बाहर नगरनिगम की गाड़ी उठाकर ले गई। इस बात पर एडीजी साहब अचानक हैरान हो गए कि वो तो लाईन से खड़ा होता है और आसपास सफाई भी रखता है। हां सर लेकिन वो माने नहीं। एडीजी साहब ने कहा कि कमिश्नर को फोन लगाईँये।

मेरी दिलचस्पी बढ़ गई कि बात लंच की हो रही है कहानी म्यूनिसपल कमिश्नर तक जा रही है। एक दम से पूछना अच्छा नहीं लगा तो चुपचाप देखता रहा और फोन मिल गया। एडीजी साहब ने कहा कि आज क्या अतिक्रमण हटाओं अभियान था क्या कमिश्मनर साहब। उधर से कुछ ऐसा ही जवाब आया जो फोन के दूर होने से पता नहीं चला। लेकिन तभी एडीजी साहब ने कहा कि अभी मैं बाहर निकल कर आपको आपके ऑफिस तक पहुंचता और रास्तें में अधिकारियों के घर के बाहर कब्जां कर बनाएं गए हुए गार्डन और रास्तों को पार्किंग बना खडे हुए रईसों की गाडियों के फोटो सहित आ जाता हूं ताकि आपको साथ ही लेकर हटाओ।

उधर से फिर कुछ आवाज थी लेकिन समझ में नहीं आई। एडीजी साहब ने कहा कि कमिश्नर साहब एक लईयाचने वाले को उठा कर काफी कानून का पालन कर लिया। काफी कापी भर गई होगी एसीआर की। एक लईया चना वाला जो सरकारी कर्मचारियों को कुछ पैसे में दोपहर में पेट भर देता है उसका कब्जा काफी बड़ा गुनाह लगा होगा। मुझे लगता है कि आपको पहुंचने वाली राशि कुछ कम हो गई होगी। लेकिन आप को उस कुएं में बदल रहे है जो पानी को खुद ही पा रहा है। और आधे घंटे बाद लईया-चना वाला वापस अपनी जगह पर लोगों के पेट भर रहा था और वही से एक गर्मागर्म लईया चने का लिफाफा हमारी टेबिल पर भी आ गया। तब पूछने पर पता चला कि यही लईया चना दोपहर में एडीजी साहब खाते है। ये मेरी सुलखान सिंह साहब के साथ हुई एक मुलाकात थी। फिर तो कई मुलाकात हुई और अपने मन में ये तस्वीर साफ थी कि अपनी साफगोई और ईमानदारी से बदनाम हो चुके सुलखान सिंह को कौन डीजीपी बनाएंगा।

इनवेस्टीगेशन की रिपोर्टिंग करने के चलते अक्सर पुलिसअधिकारियों से साबका पड़ता ही रहा है। ऐसे में जिस भी अधिकारी से बात हमेशा एक ही बात सुलखान सिंह का परिचय रही कि बहुत ईमानदार अफसर है और कड़क भी। हालांकि कड़क पन उनके काम करने के तरीकों में होगा व्यवहार में तो हमेशा नर्म। और बातचीत में काफी बार इस बात पर भी बात होती थी कि सरकार को आखिर कैसे अधिकारी चाहिएं जो मंत्रियों की झोली भऱ दे और काले को सफेद और सफेद को काला कह दे सरकार के ईशारे पर। जाविद अहमद साहब दिल्ली में सीबीआई में थे तो कई मुलाकात हुई अच्छे अफसर है लेकिन बुलंदशहर रेप केस में जिस तरह से आरोपियों के नामों का खेल किया लगा कि पद की लालसा किस तरह से रीढ़ को तोड़ कर फेंक देती है। जवाहर बाग जैसा कांड जिसमें दुनिया के किसी भी तख्तें पर पुलिस की गलतियां सामने आ खड़ी होंगी उस पर भी लीपा-पोती दिखी। इससे पहले इतने सारे सीनियर अफसरों को धता बता कर जिस तरह से जाविद अहमद साहब सामने आएं थे तो लगा था कि प्रदेश में एक ईमानदार अफसर सुलखान सिंह शायद ही कभी उस कुर्सी पर बैठ पाएंगे जिस पर उनका दावा उनके सीनियर होने और काम के प्रति निष्ठा के चलते सबसे आगे था।

अब तो काफी समय से बात नहीं हुई लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कई लोगों से बात हुई लेकिन मुझे नहीं लगा कि सुलखान सिंह को बनाने का जोखिम आज कल की पॉलिटिक्स उठा सकती है क्या। लेकिन आज शाम को इस खबर ने एक यकीन तो दिला ही दिया कि आपको हौंसला बनाएं रखना चाहिए कभी न कभी तो आपको रास्ता मिल ही जाता है। अब उम्मीद करता हूं सुलखान सिंह अपने विश्वास को आधार बना कर इस समय वर्दी और बिना वर्दी के बीच कुछ तो अंतर दिखा पाएंगे। और अक्सर गुंडों से ज्यादा डरावनी बनती जा रही यूपी पुलिस के अंदर कोई बदलाव पैदा करेंगे।

(मैं किसी पुलिस अफसर के लिए कोई लेख लिखता नहीं हूं लेकिन सुलखान सिंह मेरी नजर में उत्तरप्रदेश की पुलिस में एक विश्वास का प्रतीक है इसलिए ये लेख उनके साथ हुए इंटरक्शन पर है। आगे उनका काम जनता को बताएंगा कि मैं सही था या गलत)

न्यूज नेशन चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार धीरेंद्र पुंडीर की एफबी वॉल से.

उपरोक्त पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Rajiv Kashyap भले ही वो आपकी व्यक्तिगत मुलाकात हो, लेकिन जो वाकया आज आपने सुलखान सिंह जी के साथ हुए मुलाकात का बतया है वो केवल आम जन हीं नहीं, भ्रस्टाचार से भरी अफसरशाही और राजनीती के इस दौर में निराशा में डूब चुकी इमानदार अप्सरों के लिए एक उम्मीद की किरण है , अमूमन इमादर अप्सरों को अपने कर्तव्य में ईमानदारी के लिए सम्मानित नहीं बल्कि राजसत्ता के द्वारा अपमानित किया जाता रहा है, और भ्रस्टाचारी अधिकारीयों की फौज को जिस तरह से कई महत्वपूर्ण पदों पर उनके काले कारनामो के वाबजूद बिठाया और बनाये रखा जाता रहा है उस से आम लोग और इमानदार अधिकारीयों का ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते रहना कठिन होता जा रहा है, लेकिन प्रशासनिक फेरबदल किसी भी सरकार का एक रूटीन कार्य होता है लेकिन इस रूटीन कार्य में जो इस बार सुलखान सिंह जी को उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे का कमान सौपने का जो महत्वपूर्ण कार्य हुआ है वो ईमानदारी का हौसला अफजाई करने में बहुत मददगार साबित हो सकता है ….

Atul Sinha धीरेंद्र भाई शायद आपको याद हो कि आप मुरादाबाद आये थे बहुत साल पहले जब एक बड़े एक्सपोर्टर की फैमिली में हादसा हुआ था । बड़ी घटना थी और एसएसपी बी बी बक्शी थे और आप मेरे साथ ही उनके पास गए थे । बात बहुत पुरानी हो गयी लेकिन याददाश्त धुंधली नही हुई । शायद तब भी हमारे बीच ऐसी ही बात हुई थी कि क्या कभी पोस्टिंग्स में सरकार ईमानदार हो पाएगी। इतने साल बाद ही सही लिजिन कुछ अच्छा तो नज़र आया।

Shahid Khan That’s good news Dhirendra Pundir ji. Hope he will have the various criminal cases against the cabinet ministers and MLAs – present and former, investigated and prosecuted fairly and expeditiously.

Yatendra Jain I was looking for the day on which this country moves in the direction which ensures happy future for our coming generations. I personally have no interaction with you and Mr Singh but believing your story I hope that we are now moving in right direction. May honesty is strengthened and blessed. Thanks for this info.

Vinod Babloo Singh धीरेन्द्र जी आपने सुलखान सिंह जी के व्यक्तित्व से परिचय करवाया अच्छी बात है लेकिन उनके पद भार ग्रहण करने से उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था में कोई सुधार आ जाये और किसी निर्दोष व्यक्ति को क़ानून के डंडे से परेशान ना होना पड़े तो समझूँगा की उनका DGP होना सार्थक हो गया नहीं तो आजकल योगी जी के शासन मेन उनके आदेशों की धज्जियाँ उनके पार्टी के लोग ही उड़ा रहे हैं ताजतरिन उदाहरण सहारन पुर के SSP की पत्नी के साथ भाजपा के सांसद द्वारा की गई गुंडा गर्दी है । अब देखना है की वो कितना निष्पक्ष हो कर काम कर पाते हैं इस बारे में भी कुछ लिखिएगा?

Arunendra Kumar Srivastava किसी ईमानदार की कहानी स्वतः रोचक हो जाती है। किसी लैया चना वाले के प्रति सहानुभूति रखना और उसके दर्द को स्वतः महसूस करना निःसंदेह किसी पुलिस अधिकारी की ईमानदारी बयां करता है।

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अमर उजाला पर विज्ञापन न मिलने से डीजीपी के खिलाफ खबर छापने का आरोप

अमर उजाला को विज्ञापन न देने पर डीजीपी के खिलाफ 31 जनवरी और 1 फरवरी को प्रकाशित खबरों के मामले ने तूल पकड लिया है। पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला न पढ़ने की चेतावनी जारी कर दी है। साथ ही अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ नगर कोतवाली देहरादून में मुकदमा दर्ज कर लिया है। सूत्रों की मानें तो अब अमर उजाला के पदाधिकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत से मिलकर मामले में समझौता कराने के प्रयास में लगे हैं।

पुलिस विभाग की तरफ से जारी यह पत्र चर्चा में है…

महिला दरोगा भर्ती से सम्बंधित विज्ञापन न मिलने से बौखलाए अमर उजाला अखबार ने डीजीपी उत्तराखंड महोदय के सम्बन्ध में पहले 31.1.16 को देहरादून में तथा 1.2.16 को हरिद्वार में, फिर उसका फॉलोअप छापा जो काफी भद्दा गैरजिम्मेदाराना तरीके से छापा है. इतने बड़े अखबार को ऐसी ओछी हरकत शोभा नहीं देती. एक ही खबर को ज्यों का त्यों दो दिन प्रदेश में अलग स्थानों में छापा गया। प्रदेश पुलिस के मुखिया के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी करना पूरे पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता और मनन का विषय है जो कि सीधे तौर पर उत्तराखण्ड पुलिस के मान सम्मान को ललकारते हुऐ पीत पत्रकारिता का जीता-जागता उदाहरण है।

पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर द्वारा किये गए विभागीय अच्छे कार्यों को तो कभी भी अमर उजाला ने तार्किक जगह नहीं दी। यदि कभी-कभार ऐसी ख़बरें छापी भी हैं, तो बाद के पन्नों में वो भी बेमन से, और बहुत कम शब्दों में। परंतु विज्ञापन न मिलने की खबर को अमर उजाला ने फ्रंट पेज की खबर बनाया है। सही में देखा जाये तो अमर उजाला का कुछ सालों में पैटर्न पूरी तरह से पुलिस विभाग के एंटी अखबार का है, और मात्र एक ही बदनाम पुलिस अधिकारी का व्यक्तिगत अखबार तक सीमित होकर रह गया है।

पुलिस विरोधी नकारात्मक खबरें इसमें बड़ी बड़ी और पुलिस विभाग के गुड वर्क की ख़बरें बहुत छोटी छोटी छापी जाती हैं। वर्तमान खबर तो मात्र सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन न मिलने के कारण छापी गयी है जबकि खबर में जमीन से जुड़े जिस केस को उछालकर जिक्र किया गया है, उस केस के करंट अपडेट को तो जानने की कोशिश तक नहीं की गयी और केस से जुड़े अधिकारीयों को सजा दिए जाने के बारे में लिखा है।

हकीकत में इस केस में धोखाधड़ी तो हमारे डीजीपी सर के साथ हुई है। अपने हक़ के लिये जमकर लड़ना कोई गलत बात नहीं। लेकिन अमर उजाला डीजीपी सर के विरोध में ख़बरें छाप कर उनकी छवि ख़राब कर पूरे पुलिस विभाग को छोटा करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर ने पुलिस परिवार का मुखिया होने की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और अपने अधीनस्थों के भलाई के लिए स्वयं व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासन में लंबे समय से लटकी पड़ी तमाम फाइलों की पैरवी की गयी तथा सिपाहियों की वेतन विसंगति, प्रमोशन, स्थायीकरण, नये पदों और पुलिस विभाग के आधुनिकीकरण आदि मामलों का बहुत तेजी से निस्तारण करवाया।

वर्ष 2015 में वेतन विसंगति एवं एरियर को लेकर काली पट्टी बांधने एवं सोशल मीडिया पर मेसेज फॉरवर्ड करने के मामले में जब सिपाहियों पर कार्यवाही की बात कई पुलिस अधिकारी कर रहे थे, अकेले डीजीपी सर ही थे, जिन्होंने किसी भी निर्दोष सिपाही पर कार्यवाही नहीं होने दी। उन्होंने किसी निर्दोष के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी, जबकि उस मामले में सैकड़ों सिपाहियों पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई थी। यहाँ तक कि डीजीपी सर ने सिपाहियों के हक़ के लिए वेतन विसंगति समय से ठीक न होने की स्थिति में अपना इस्तीफा तक देने की बात कही थी। यह डीजीपी सर के व्यक्तिगत प्रयासों का ही नतीजा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने एरियर के भुगतान के लिए अलग से बजट स्वीकृत किये जाने की बात कही है और जल्द ही सभी सिपाहियों को एरियर मिल भी जायेगा।  

साथियों, हम अपने पैसों के लिए तो एकजुट होकर लड़ते हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं परंतु हमारी हक़ और इज़्ज़त की लड़ाई में हमारे साथ खड़े होने वाले डीजीपी सर जब दो महीने में रिटायर होने वाले हैं, तो ऐसे समय में एक अखबार की मनमानी के कारण क्या हम उनकी, अपने विभाग और वर्दी की छवि को धूमिल होते हुए हाथ पर हाथ रखकर यूँ ही देखते रहें? क्या हमें उनके साथ, उनके समर्थन में एकजुट होकर खड़े नहीं होना चाहिए?

यह समय एकजुट होकर पुलिस विभाग को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय डीजीपी सर के साथ उनके समर्थन में खड़े होने का समय है। ऐसा लगता है कि अमर उजाला के पत्रकार अपनी मर्जी के मालिक हैं, जो मन में आया छाप दिया। जब प्रदेश पुलिस के मुखिया को ही यह अखबार कुछ नहीं समझ रहा है, तो आने वाले दिनों में छोटे अधिकारियों और सिपाहियों का क्या हाल होगा, जरा सोचो। विचार करो। एकजुट होकर इस अखबार के विरोध में खड़े हो जाओ। दिखा दो इन्हें उत्तराखंड पुलिस की एकता और हमारी ताकत। इसलिए इस अखबार को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी है कि इस अखबार का विरोध हर स्तर पर किया जाये।  

साथियों, आज से इस अखबार का विरोध शुरू कर दो और यह विरोध तब तक करते रहो, जब तक यह अखबार हमारे डीजीपी सर से इस खबर के बारे में माफ़ी न मांग ले। जिसके भी घर में, परिवार में, रिश्तेदारी में अमर उजाला अख़बार आता है, आज ही उसे बदलवाकर दूसरा अखबार लगवाओ और अपने हॉकर को तथा पत्रकारिता से जुड़े जिस भी शख्स को जानते हो, उसे भी बताओ कि तुमने यह अखबार क्यों बंद किया है? 

साथियों, यह पुलिस की एकजुटता दिखाने का समय है। मीडिया की दलाली को जवाब देने का समय है। हमारे सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले डीजीपी के स्वाभिमान की लड़ाई में साथ खड़े होने का समय है। ये दिखाने का समय है कि हम एक हैं और कोई भी हमें हल्के में नहीं ले सकता। देखना है, कौन जीतता है। हमारी एकता या बिकाऊ मीडिया।

जय हिन्द
जय उत्तराखंड पुलिस।

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पुलिस ने निकालनी शुरू की खुन्नस

अब पुलिस ने खुन्नस में अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि विज्ञापन वाला पीएचक्यू में घुसा। विज्ञानकर्मी पर 384, 385, 120 बी, 185, 186 की धारा लगायी गई है। देहरादून यूनिट में कार्यरत विज्ञापन के अभिषेक शर्मा के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा।

देहरादून से एक मीडियकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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जगमोहन को डीजीपी बनाना साम्प्रदायिक साजिश का हिस्सा – रिहाई मंच

लखनऊ : रिहाई मंच ने फैजाबाद सांप्रदायिक हिंसा के दौरान अपनी जिम्मेदारी न निभाने के चलते पद से हटा दिए गए आईपीएस अधिकारी जगमोहन यादव को डीजीपी बनाए जाने को सूबे में सांप्रदायिक व जातीय हिंसा को बढ़ावा देने और आगामी पंचायत चुनावों में सपा के लंपट तत्वों की जीत सुनिश्चित करने की योजना का हिस्सा बताया है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि जब पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक और जातीय हिंसा में अप्रत्याशित इजाफा हो रहा हो और हर मामले में सत्ता पक्ष के तत्वों पुलिस और संघ परिवार से जुड़े लोगों का गठजोड़े सामने आ रहा हो ऐसे में जगमोहन यादव जैसे लोगों को डीजीपी बनाया जाना साफ करता है कि आने वाले दिनों में ऐसी घटनाओं में और इजाफा होने जा रहा है, जो सपा सरकार बहुत ठंडे दिमाग से आगामी जिला पंचायत चुनावों और 2017 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कर रही है। उन्होंने कानून व्यवस्था के पूरी तरह फेल हो जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार इन मसलों पर सिर्फ दिखावा कर रही है जबकि उसका छिपा हुआ ऐजेण्डा ऐसे अराजक तत्वों को खुली छूट देना है। जिसका उदाहरण उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए सांप्रदायिकता फैलाने वालों तत्वों के खिलाफ कार्रवाई का झूठा आश्वासन देना है। जबकि ऐसे तत्व न सिर्फ लगातार सक्रिय हैं बल्कि उनके खिलाफ शिकायतें आने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। मंच के अध्यक्ष ने बताया कि भाजपा विधायक संगीत सोम और सुरेश राणा पर से 2013 में जब राज्य सरकार ने रासुका हटवाने का काम किया उसी दौरान रिहाई मंच ने अमीनाबाद लखनऊ में इन दोनों के खिलाफ जेल में बंद होने के दौरान सोशल साइट्स पर सांप्रदायिकता भड़काने वाले पोस्टों के खिलाफ तहरीर दी जिस पर सरकार ने आज तक कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं पिछले दिनों लखनऊ में सांप्रदायिक तनाव के दौरान फेसबुक और वाट्सएप पर न सिर्फ खुले रूप में सांप्रदायिकता भड़काई जा रही थी बल्कि मुस्लिमों के खिलाफ हिंन्दुओं को एकजुट करने और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की अपीलें की जा रही थीं, जिसकी शिकायत रिहाई मंच ने लखनऊ के एसएसपी से की पर आज तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि पिछले दिनों आईबी ने यूपी में सांप्रदायिक तनाव को लेकर जो एलर्ट जारी किया है वह सिर्फ खाना पूर्ती भर है। पिछले दिनों मथुरा में मोदी ने रैली कर यह एलर्ट पहले ही जारी कर दिया था कि बिहार में होने वाले चुनावों और यूपी के चुनावों को लेकर भाजपा व अन्य हिन्दुत्ववादी गिरोह सक्रियता से अपनी कार्रवाई आरंभ कर दें। यह संयोग नहीं है कि उसी दौरान गृहमंत्री राजनाथ सिंह, तोगडि़या व अन्य हिन्दुत्वादी नेता राम मंदिर का अलाप जपकर सूबे में सांप्रदायिक माहौल को हवा देने लगे। अगर आईबी को सचमुच सूबे में सांप्रदायिक हिंसा रोकनी है तो वह सांप्रदायिक तत्वों का चिन्हीकरण करे। उन्होंने आईबी समेत देश की खुफिया एजेसियों पर आरोप लगाते हुए कहा कि ठीक इसी तरह 2013 में मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा जब भड़काई जा रही थी जब संगीत सोम जैसे लोग फर्जी वीडियो इंटरनेट पर अपलोड कर, सीडियां बटावा रहे थे उस दौरान यह खुफिया एजेंसियां कहा थीं। वहीं शामली में पिछलीे दिनों जब एक विछिप्त मुस्लिम युवक को पूर्वनियोजित तैयारी के तहत बजरंगदल के लोग पूरे शहर में घुमा-घुमाकर पीट कर पूरे शहर में सांप्रदायिक हिंसा का माहौल बना रहे थे और एसपी और सीओ निशांत शर्मा जैसे लोग बजरंगदल की कार्रवाही को जायज ठहरा रहे थे तब यह खुफिया एजेंसियां कहां थी। उन्होंने बताया कि जब शामली, सहारनपुर, गाजियाबाद और फैजाबाद में एक साथ सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश हुई उसके बाद रिहाई मंच ने जब 28 जून को राजधानी लखनऊ में धरना देकर इस बात को कहा कि सूबे में 2013 जैसे सांप्रदायिक तनाव भड़काने का माहौल बनाया जा रहा है उसके बाद खुफिया एजेसियों जागी, लेकिन यह सिर्फ खाना पूर्ती तक ही सीमित हैं।

रिहाई मंच नेता तारिक शफीक और विनोद यादव ने आजमगढ़ के रानी सराय के मोमारिजपुर के मीरपुर के मुस्लिम युवक जाकिर जो पिछले 13 जून से ही लखनऊ एयरपोर्ट से लापता है के अब तक न मिलने पर प्रदेश की पुलिस की कार्यशैली को संदिग्ध बताया है। लापता युवक के घर का दौरा करने के बाद जारी बयान में नेताओं ने कहा कि जिस तरीके से 13 जून को लखनऊ राजधानी से गायब होने के बाद 17 जून को परिजन बहुत मुश्किल से रिपोर्ट लिखावा पाए और अब तक पुलिस इस पर कुछ बता नहीं रही है वह कार्यप्रणाली पुलिस को संदेह के घेरे में लाती है। मंच ने कहा कि अगर जल्द से जल्द जाकिर नहीं आया तो इसके खिलाफ आंदोलन किया जाएगा।

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जगेंद्र हत्याकांड पर डीजीपी के खिलाफ कोर्ट जाएंगे कुमार सौवीर

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है – ”यूपी के डीजीपी अरविन्‍द जैन की पुलिस का कमाल यहां शाहजहांपुर में देखें तो आप दांतों तले उंगलियां कुचल डालेंगे, जहां मंत्री का इशारा था, अपराधी मोहरा बना था और अपराधी बना डाला गया हत्‍या का जरिया। सिर्फ दो दिन तक पुलिस ने एक सीधी-सच्‍ची एफआईआर को टाल दिया और उसकी जगह में एक नयी रिपोर्ट दर्ज लिख डालीा ताना-बाना इतना जबर्दस्‍त बुना गया कि उसके बल पर मंत्री-अपराधी-पत्रकार और पुलिस की साजिशों से जगेन्‍द्र सिंह के खिलाफ डेथ-वारण्‍ट तामील करा दिया। अब मैं इस प्रकरण पर सीधे अदालत में ही पुलिस के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने जा रहा हूं, जिसमें डीजीपी अरविन्‍द जैन भी शामिल होंगे, जिन्‍होंने जान-बूझ कर भी एक असल मामले की तहरीर को मनचाहे तरीके से बदलवा दिया।

”मेरे पास है वह सुबूत, जिसमें शाहजहांपुर की पुलिस के कोतवाल और बाकी पुलिसवालों ने मंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर कोतवाल को कुछ इस तरह जकड़ दिया कि वह चूहेदानी में फंसे चूहे की तहर छटपटाने लगा। जगेन्‍द्र की रची-बची सांसों को इन्‍हीं हत्‍यारे गिरोहबाजों ने उस पर तेल डाल कर फूंक डाला।

”अब तो मैं दावे के साथ ऐलान करता हूं कि जगेन्‍द्र हत्‍याकाण्‍ड सीधे-सीधे पुलिस की मिली-भगत से हुआ था और इसमें मंत्री राममूर्ति वर्मा, अमित भदौरिया, गुफरान आदि अनेक खतरनाक षडयंत्रकारी शामिल थे।

”मेरे पास प्रमाण है। पुख्‍ता प्रमाण कि हल्‍की-फुल्‍की हाथापाई को पुलिस ने दो दिनों तक अपनी कोतवाली में नये सिरे से फर्जी लिखवा दिया और हालात इतना खतरनाक बना डाला कि आखिरकार जगेन्‍द्र सिंह जिन्‍दा फूंक डाला गया। ऐसे में आप यूपी सरकार के मंत्री राममूर्ति वर्मा की साजिश साफ-तौर पर देख सकते हैं। इस फर्जी एफआईआर को बढ़ा-चढ़ा कर जिस तरह जगेन्‍द्र सिंह के खिलाफ पुलिस ने मामला तैयार किया, और आखिरकार उसे मौत के चंगुल में दबोच लिया गया, वह यूपी के मानव-समाज के लिए सबसे बड़ा कलंक कहा जा सकता है।

जी हां, यह पुलिस की कपोल-कल्‍पना नहीं है, जो वह अदालतों में बिलकुल फर्जी तौर पर पेश किया करती है। अरे मेरे पास है इस बात के प्रमाण। पुख्‍ता प्रमाण, जिसे कोई भी अदालत संज्ञान ले लेगी।

”दस अप्रैल-2015 को सात बजे शाम एक हल्‍का-फुल्‍का झगड़ा हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण पत्रकार संघ के अध्‍यक्ष राजीव शर्मा के घर अमित भदौरिया से बीतचीत चल रही थी कि अचानक जगेन्‍द्र सिंह, रंजना हत्‍याकांड का गवाह आदित्‍य दीक्षित ऊर्फ मोनू और जीतेंद्र मोटरसायकिल से आये। इसके बाद एक कार से अनुराग मिश्र, विनोद, वकील और विजय राघव तथा ड्राइवर पहुंचे। अमित से झगड़ा शुरू हो गया। इनमें अनुराग और विनोद के हाथ में तमंचा था। इन लोगों ने पहले तो उन्‍हें साथ ले जाने की कोशिश की, लेकिन बाद में धमकियां देते हुए घटना स्‍थल से चले गये। 

”इसकी तहरीर अमित सिंह भदौरिया ने यहां के अजीजगंज बरेली मोड़ पुलिस चौकी को रात नौ बजे सौंपी थी। इस तहरीर को चौकी प्रभारी दारोगा शाहिद अली ने बाकायदा रिसीव किया और मुकदमा दर्ज करने के लिए कोतवाली-थाना को भेज दिया। कोतवाली में कोतवाली इंस्‍पेक्‍टर श्रीप्रकाश राय मौजूद थे, जो मंत्री राममूर्ति वर्मा के पालित श्‍वान माने जाते हैं।

”अब इसके बाद शुरू हो गयी जगेन्‍द्र को तबाह-बर्बाद करने की साजिशें। अगले दिन तो पूरी तरह साजिश को बुनने में लग गया और आखिरकार जब मंत्री समेत सभी लोग संतुष्‍ट हुए तो श्रीप्रकाश राय के मोहर्रिर ने अमित की नयी तैयार तहरीर दर्ज करा दी। 

”अब यह नयी रिपोर्ट नयी साजिशों का पुलिंदा बन गयी, जिसमें जगेन्‍द्र, आदित्‍य, अनुराग, विनोद आदि कई लोग आये, तमंचा लहराते हुए। जगेन्‍द्र ने अमित को जमकर लात-घूसों से पीटा। इस बीच अमित को जान से मार डालने के लिए जगेन्‍द्र ने बुरी तरह लात-घूंसों से पीटा, उसे घसीटा और बाद में धमकी देते हुए चले गये। पुलिस ने जगेंद्र और अनुराग समेत कई लोगों पर मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने इस रिपोर्ट को मुकदमा संख्‍या:- 937-15 के तहत,आईपीसी की धारा 363, 307, 323, 504, 506 के तहत दर्ज किया था। हैरत की बात है कि यह रिपोर्ट भले ही दो दिन बाद दर्ज हुई गयी, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट को लिखाने में हुए विलम्‍ब के लिए सीधे वादी को ही जिम्‍मेदारी ठहरा दिया। ”

कुमार सौवीर के एफबी वाल से 

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डीजीपी ए एल बनर्जी और ए सी शर्मा ने मांगे एसएमएस से घूस : आईपीएस अमिताभ ठाकुर

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने दावा किया है कि आगरा के जालसाज सपा नेता शैलेंद्र अग्रवाल का जिन दो पूर्व डीजीपी के साथ पैसे के लेन देन के संपर्क का खुलासा हुआ है वे ए एल बनर्जी और ए सी शर्मा हैं. 

उन्होंने कहा कि दरोगा की पोस्टिंग का रेट सात लाख रुपया फिक्स करने सम्बंधित एक एसएमएस और उस पर डीजीपी के एसएमएस द्वारा सहमति देने की बात आई है. इसी प्रकार डीपीसी के लिए एक दरोगा का रेट 20 लाख रुपया तय करने के शैलेन्द्र अग्रवाल के एसएमएस का एसएमएस के माध्यम से सहमति भेजने वाले एक अन्य डीजीपी की बात भी सामने आई है.

श्री ठाकुर का कहना है कि उन्होंने इनके सम्बन्ध में व्यक्तिगत स्तर पर जानकारी हासिल की है और उन्हें ज्ञात हुआ है कि सात लाख रुपया फिक्स करने वाले डीजीपी ए एल बनर्जी हैं जबकि  डीपीसी का 20 लाख रेट तय करने वाले डीजीपी ए सी शर्मा हैं. 

 श्री ठाकुर ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और वर्तमान डीजीपी ए के जैन को पत्र लिख कर इन दोनों पूर्व डीजीपी के खिलाफ भ्रष्टाचार के इतने गंभीर मामले के ठोस साक्ष्य मिलने के बाद कठोर कार्यवाही की मांग की है.

समाचार अंग्रेजी में पढ़े – 

IPS officer Amitabh Thakur has claimed that the two ex-DGPs whose name have come for having taken money through fraud SP leader Shailendra Agrawal of Agra are A L Banerjee and A C Sharma.

 He said an SMS by Shailendra fixing 7 lakh rupees rate for posting of SI and its acceptance by an ex-DGP through SMS has come. Other SMSes where rate of 20 lakh rupees for Departmental Promotion of Sub Inspectors have been agreed upon between Shailendra and another DGP have also come up.

 Sri Thakur said that he made deep personal investigation in the matter and came to know that A L Banerjee is the DGP who fixed 7 lakh posting rate while A C Sharma is the ex-DGP who fixed 20 lakh DPC rate.

 Sri Thakur has written to CM Akhilesh Yadav and DGP A K Jain seeking strong action against these two DGPs after emergence of such definite proof of corruption.  

 डॉ नूतन ठाकुर से संपर्क : 94155-34525

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पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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शासनादेश पर अमल की मांग : मुख्य सचिव, डीजीपी, डीएम, एसएसपी से सुरक्षा वापस लो

लखनऊ : आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने प्रमुख सचिव गृह से प्रदेश के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह, डीजीपी सहित तमाम वरिष्ठ अफसरों के साथ कमिश्नर, आईजी ज़ोन, डीआईजी रेंज, जिलों के डीएम, एसएसपी आदि अफसरों के सुरक्षाकर्मियों को वापस लेने की मांग की है. साथ ही अन्य लोगों को बिना आकलन सुरक्षा दिए जाने के बारे में जांच कराने की मांग की है.

संलग्न- सुरक्षा सम्बन्धी शासनादेश दिनांक 09 मई 2014

 

उन्होंने कहा कि डॉ, नूतन ठाकुर की याचिका संख्या 6509/2013 में हाई कोर्ट के आदेश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 6 पृष्ठों का एक विस्तृत शासनादेश दिनांक 09 मई 2014 को निर्गत किया था, जिसमे कुल 20 श्रेणी के लोगों के लिए सुरक्षा के सम्बन्ध में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे.

इनमें कहीं भी मुख्य सचिव, डीजीपी, कमिश्नर, डीएम जैसे अफसरों का उल्लेख नहीं है पर बड़ी संख्या में प्रशासनिक और पुलिस अफसर बिना किसी आकलन के मनमर्जी सुरक्षा लिए चलते हैं. इतना ही नहीं, लखनऊ में लगभग 500 लोगों को मौखिक आदेशों पर पुलिस लाइन्स से सुरक्षा दी गयी है. उन्होंने इस प्रकार शासनादेश के विपरीत दिए गए सभी सुरक्षाकर्मी तत्काल हटाने की मांग की है.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें – 

Take back security from Chief Secy, DGP, Comm, DMs

IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have asked the Principal Secretary Home to take back the security cover of State Chief Secretary, Home Secretary, DGP etc along with Commissioners, Zonal IG Zones, Range DIGs, DMs, SSPs etc. They also sought enquiry into providing state security to many others without threat perception.

They said that after High Court’s order in Dr Thakur’s Writ Petition No 6509 of 2019, the State government passed a 6 page detailed Government order dated 09 May 2014 where procedure of providing security and different categories of protectee have been enumerated in great details.

These categories do not contain Chief Secretary, DGP, Commissioner, DMs etc but very large number of government officials take security cover without any assessment, against the provisions of the GO. In addition, some 500 persons have been provided security by Lucknow police merely on oral orders.

 They have asked taking back all these security personnel provided against the government order.

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रीता बहुगुणा जोशी के घर आगजनी मामले में डीजीपी एके जैन को भी बनाएं मुलजिम : नूतन ठाकुर

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने मुख्य सचिव आलोक रंजन से रीता बहुगुणा जोशी के घर पर आगजनी मामले में डीजीपी ए के जैन को भी मुलजिम बनाने की मांग की है. उन्होंने कहा है कि सीबी-सीआईडी द्वारा 28 जुलाई 2014 को गृह विभाग को भेजे पत्र और 361 पृष्ठ के अंतिम प्रगति आख्या  से श्री जैन की आपराधिक संलिप्तता स्पष्ट हो जाती है. उन्होंने कहा कि जब श्री जैन रात 12.30 बजे किरायेदारी के मामले में ठाकुरगंज जा सकते हैं तो उनके जैसे तेजतर्रार अधिकारी के लिए यह संभव नहीं था कि यह घटना उनके संज्ञान में न आई हो. अतः अधीनस्थ पुलिस अफसरों पर कार्यवाही और मुख्य अभियुक्त को बचाने को गलत मानते हुए उन्होंने श्री जैन को अभियुक्त बनाते हुए तत्काल डीजीपी पद से हटाने की मांग की है.

सेवा में,
श्री आलोक रंजन,
मुख्य सचिव,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- श्री ए के जैन, आईपीएस पर कार्यवाही विषयक
महोदय,

कृपया श्री पंकज कुमार, पुलिस अधीक्षक, अपराध शाखा, अपराध अनुसन्धान विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा श्री अरुण कुमार मिश्रा, विशेष सचिव, गृह (पुलिस) अनुभाग- 4, उत्तर प्रदेश शासन को प्रेषित पत्र संख्या सीबी-223/09 एनजीओ/(लखनऊ) दिनांक 28/07/2014 तथा उसके साथ संलग्न 361 पृष्ठ के अंतिम प्रगति आख्या  का सन्दर्भ ग्रहण करें, जो दिनांक 19/07/2009 को उत्तर प्रदेश शासन द्वारा सीबी-सीआईडी को संदर्भित किये गए मु०अ०स० 384/09 धारा 147/504/506/427/436 आईपीसी थाना हुसैनगांह, जनपद लखनऊ की विवेचना के पूर्ण करने के उपरांत शासनादेश दिनांक 21/03/2003 के अनुपालन में दिनांक 21/07/2014 को एडीजी, सीबी-सीआईडी द्वारा विवेचना की अंतिम प्रगति आख्या के अनुमोदित किये जाने के पश्चात् शासन को प्रेषित किये गए स्थिति विषयक है.

यह विवेचना सुश्री रीता बहुगुणा जोशी के सरोजिनी नायडू मार्ग, लखनऊ स्थित आवास के कतिपय आपराधिक तत्वों द्वारा जलाए जाने विषयक था.

इस आख्या में उस घटना में श्री ए के जैन, वर्तमान डीजीपी, यूपी और तत्कालीन आईजी, लखनऊ ज़ोन की भूमिका का विश्लेषण किया गया है. इसमें कहा गया है कि समस्त तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा और विश्लेषण से पाया गया कि श्री जैन द्वारा वीआईपी क्षेत्र में सुश्री रीता बहुगुणा जोशी के आवास पर आगजनी और तोड़फोड़ की इतनी महत्वपूर्ण घटना को कम महत्व दे कर कनक सिटी, ठाकुरगंज स्थित किरायेदारी के विवाद के एक मामले में रात करीब 12 बजे फोन आते ही इससे पूर्व ही सुश्री जोशी के घर आगजनी की इतनी संवेदनशील घटना की सूचना मिलने के बाद भी स्पष्टतया कम संवेदनशील प्रकरण के सम्बन्ध में खुद रात 12.30 बजे घटनास्थल निरीक्षण करना और वहां जांच का कोई औचित्य नहीं होने पर भी अनायास भ्रमण करते रहना और लगभग सवा घंटे विलम्ब से सुश्री बहुगुणा के आवास पर पहुंचना प्रमाणित है.

रिपोर्ट में यह भी अंकित है कि श्री जैन को सुश्री जोशी के विवादित बयान के बाद उत्पन्न स्थिति का आकलन था, जैसा उन्होंने स्वयं स्वीकार किया. इस रिपोर्ट में श्री जैन के इस कृत्य को स्पष्टतया कटघरे में लाया गया है और कहा गया है कि जिस स्थान पर वे गए वहां आईजी स्तर के अधिकारी के पहुँचने का कोई औचित्य नहीं था. इतना ही नहीं सीबी-सीआईडी ने श्री जैन को घटना के उपरांत घटनास्थल से पकडे गए कथित अभियुक्तों और सुश्री जोशी के मकान में आवासित 8 लोगों को निकाल कर थाना हजरतगंज और महिला थाना में रखने के सम्बन्ध में और उनसे घटना कारित करने वाले व्यक्तियों के सम्बन्ध में न तो स्वयं पूछताछ करने और न ही किसी राजपत्रित अधिकारी से पूछताछ करवाने तथा पूछताछ आख्या तैयार करवाने का भी स्पष्ट रूप से दोषी पाया.

जब श्री जैन रात 12.30 बजे किरायेदारी के मामले में ठाकुरगंज जा सकते हैं तो उनके जैसे तेजतर्रार अधिकारी के लिए यह संभव नहीं था कि यह घटना उनके संज्ञान में न आई हो. अतः अधीनस्थ पुलिस अफसरों पर कार्यवाही और मुख्य अभियुक्त को बचाना पूरी तरह गलत है बल्कि तथ्यों से यही दिखता है कि मुख्य अभियुक्त स्वयं श्री ए के जैन थे. अतः निवेदन करती हूँ कि कल थाना हुसैनगंज में सीबी-सीआईडी द्वारा दर्ज कराये गए मुकदमे में न्याय की दृष्टि से श्री ए के जैन को मुख्य अभियुक्त बनाते हुए उनके खिलाफ भी तथ्यों के आलोक में विवेचना किये जाने के निर्देश देने की कृपा करें.

साथ ही इन तथ्यों की जानकारी के बाद श्री जैन की प्रदेश के डीजीपी जैसे अत्यंत न्यायपूर्ण, महत्वपूर्ण और जिम्मेदार पद, जिसपर पूरे प्रदेश के प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष भाव से न्याय देने की जिम्मेदारी होती है, से भी निष्पक्ष विवेचना के दृष्टिगत तत्काल हटाये जाने की कृपा करें.

पत्र संख्या- NT/Complaint/99/15
दिनांक- 21/03/2015                                     
भवदीय,

डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 094155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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आईपीएस अमिताभ ठाकुर बलात्कारी!

यूपी के भ्रष्ट नेताओं, भ्रष्ट मंत्रियों, भ्रष्ट अफसरों की आंख के किरकिरी बने जनपक्षधर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को फंसाने की साजिशें जाने कब से चल रही हैं लेकिन अब इन साजिशों की गुणवत्ता थोड़ी उच्च होने लगी है. इनके मकान में चोरी कराने से लेकर इनकी पोस्टिंग रोकने, ट्रांसफर करते रहने, छुट्टी के आवेदन पर विचार न करने से लेकर हर कदम पर इनके लिए मुश्किलें व चुनौतियां खड़ी करने वाला उत्तर प्रदेश का भ्रष्ट सत्ता-सिस्टम अब इन्हें रेप के आरोपों में फंसाकर डिमोरलाइज करना चाहता है, नष्ट करना चाहता है. यह सब उन दिनों किया जा रहा है कि जिन दिनों अमिताभ ठाकुर और नूतन ठाकुर ने यूपी सरकार के एक भ्रष्ट मंत्री जो खनन का काम देखता है के अवैध खनन के कारनामों का लंबा चौड़ा कच्चा चिट्ठा मय प्रमाण लोकायुक्त को सौंप रखा है और पूरे प्रदेश में इसे लेकर हलचल मची हुई है.

ऐसा माना जा रहा है कि इस मामले की जांच में फंसने वाले मंत्री को संरक्षण देने के दोष से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी नहीं बच पाएंगे. तो, इन एक्टिविस्ट पति-पत्नी को नाथने के लिए भ्रष्ट मंत्रियों, नेताओं, अफसरों ने अबकी गहरी चाल चली है. किन्हीं महिला महोदया को तैयार कराया गया है. जाहिर है, महिला महोदया गरीब होंगी. इन महिला महोदया को पूरी कहानी बताई सिखाई गई और उसकी लिखाई पढ़ाई की गई. फिर उसे लिखे पढ़े पत्र की बंटवाई हल्ला करवाई शुरू हुई. ये पत्र घूमते घामते अमिताभ ठाकुर और नूतन ठाकुर तक भी पहुंच गया. इन लोगों ने पत्र मिलते ही तुरंत शासन को पत्र लिखकर इन आरोपों की जांच तुरंत कराने और दोषी को कड़ी सजा देने की मांग की.

यही नहीं, पति पत्नी जाकर डीजीपी से भी मिल आए कि भइया इतने गंभीर आरोपों का संज्ञान तो लो, पीड़िता को न्याय दिलाओ, इस खातिर पूरे मामले की गहरी जांच कराओ. इस पूरे प्रकरण को लेकर नूतन ठाकुर ने भड़ास समेत कई मीडिया माध्यमों के पास कल और आज में जो दो मेल भेजा है, उसे नीचे दिया जा रहा है. इस पूरे मामले में इतना ही कहा जा सकता है कि हाई प्रोफाइल साजिशों की शुरुआत हो चुकी है. निकट भविष्य में अमिताभ ठाकुर को घेरने की नई नई साजिशें कोशिशें और भी हो सकती हैं. ऐसे में धैर्य बनाकर सब कुछ झेलते, अपना पक्ष रखते हुए अपना मूल काम करते रहने से ही विजयश्री मिलेगी. हमेशा से सत्य को लेकर चलने वाले लोगों को तात्कालिक तौर पर परेशान किया जाता रहा है लेकिन अंतत: दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जाता है.

यूपी के जंगलराज का आलम ये है कि भ्रष्टाचारी मगरमच्छ घी पी रहे हैं और सच के लिए लड़ने वाले लोग प्रताड़ित उत्पीड़ित किए जा रहे हैं. यूपी की मीडिया भ्रष्टाचारियों की रखैल बनी हुई है. बड़े से बड़ा पत्रकार भी अखिलेश यादव संरक्षित भ्रष्टाचार के खिलाफ कलम चलाने से परहेज करता है क्योंकि यूपी में रहना है तो सत्ता सत्ता सीएम सीएम करना है और सत्ता की मलाई चाटना चूसना है. ऐसे दौर में जब यूपी में करप्शन को लेकर चहुंओर चुप्पी का माहौल हो और एक पति-पत्नी अपने एक्टिविज्म के जरिए भ्रष्टाचारी मगरमच्छों को सरेआम नंगा कर रहे हों तो इन एक्टिविस्ट पति-पत्नी को परेशान किया जाना, तरह तरह के फर्जी आरोपों का शिकार बनाकर अलग-थलग कर देने की साजिश रच देना कोई चौंकाने वाली खबर नहीं है. एक आईपीएस होकर भी जनता के लिए लड़ना और सत्ता सिस्टम से भिड़ जाना मामूली बात नहीं हैं. अमिताभ ठाकुर हमारे दौर के उन कुछ चुनिंदा लोगों में हैं जिन्हें समाज और देश के लिए आदर्श पुरुष माना जाता है क्योंकि ये पुरुष सच्चा पुरुष है जो रीढ़ रखता है व सच बोलता है. ऐसा हर कोई हो जाए तो ये भ्रष्टाचारी नेता मंत्री अफसर चौराहे पर पीटे जाएं. लेकिन जब तक वो दिन नहीं आता, अल्पमत में पड़े सच्चे लोग परेशान किए जाते रहेंगे. 

यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडया


अब बलात्कार का आरोप, तत्काल जांच हो

आज मुझे एक पत्रकार के जरिये किसी xyz पत्नी श्री abc, ……… , गाज़ियाबाद का अध्यक्ष, राज्य महिला आयोग को प्रेषित एक पत्र की कॉपी मिली जिसमे लिखा था कि वे एक गरीब महिला हैं, गाज़ियाबाद में उन्हें हमसे किसी नेता ने मिलाया था और मैंने उसे नौकरी दिलाने के नाम पर लखनऊ बुलाया जहां हमारे गोमतीनगर आवास पर वह आई. इस पत्र में आरोप लगाया गया है कि मैंने उस महिला से पति अमिताभ ठाकुर को मिलाया जहां उसे कमरे में बुला कर दरवाज़ा बंद कर बलात्कार किया गया. इस पत्र में आरोप है कि इसके बाद हमने उसे धमकी दी कि अगर यह बात कहीं बतायी गयी तो उन्हें जेल भिजवा दिया जाएगा. पत्र में एसएसपी लखनऊ को तत्काल कार्यवाही करने की बात लिखी है.

हम नहीं जानते यह पत्र वास्तव में राज्य महिला आयोग का है अथवा फर्जी. यह भी नहीं जानते कि xyz वास्तव में कोई महिला है अथवा नहीं. पर चूँकि यह पत्र लोगों में प्रसारित किया जा रहा है, अतः मैंने एसएसपी लखनऊ और डीजीपी यूपी से मांग की है कि इस मामले की तत्काल जांच कराई जाए और यदि इस मामले में एक पैसे की भी सच्चाई निकले तो हमारे खिलाफ कठोर से कठोर कानूनी कार्यवाही हो. लेकिन यदि यह बात गलत निकलती है, जो हकीकत है, तो इस पूरे षडयंत्र को बेनकाब किया जाए क्योंकि हमारी नज़र में इससे ओछी कोई भी हरकत नहीं हो सकती है जो किसी ना किसी आदमी ने हमें गंदे आरोप में फंसाने या बदनाम करने के लिए बिलकुल फर्जी तरीके से गढ़ी है.

डीजीपी से रेप आरोपों की साजिश के भंडाफोड़ की मांग

आज मैंने और मेरे पति अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी यूपी अरुण कुमार गुप्ता से मिल कर हम पर गाज़ियाबाद की एक महिला द्वारा लगाए गए पूर्णतः फर्जी बलात्कार के आरोपों की तत्काल उच्चस्तरीय जांच की मांग की. हमें कल मालूम हुआ था कि एक महिला ने राज्य महिला आयोग में आरोप लगाया कि गाज़ियाबाद में उन्हें हमसे किसी नेता ने मिलाया, मैंने उसे नौकरी दिलाने के नाम पर लखनऊ बुलाया जहां हमारे गोमतीनगर आवास पर मैंने उस महिला से अपने पति को मिलाया जिन्होंने देर रात उसे कमरे में बुला कर बेइज्जती और बलात्कार किया. यह भी आरोप लगाया कि हम दोनों ने उसे धमकी दी है कि अगर यह बात कहीं बतायी गयी तो उन्हें जेल भिजवा दिया जाएगा.

यह पूरी तरह फर्जी आरोप हैं जो निश्चित रूप से किसी हाई-प्रोफाइल षडयंत्र का हिस्सा है जो हमारे सामाजिक कामों से कुपित किन्ही रसूखदार लोगों द्वारा किया गया है. साजिश से अत्यंत व्यथित हमने इस साजिश का भंडाफोड़ करने की मांग की है. साथ ही हमने अपने लिये सुरक्षा की भी मांग की, जबकि अमिताभ ठाकुर ने सरकारी आवास माँगा है क्योंकि अब निजी मकान में रहने में हमें साफ़ खतरा दिख रहा है. डीजीपी ने हमें निष्पक्ष कार्यवाही करने का आश्वासन दिया. हम कल इस मामले में महिला आयोग की अध्यक्ष जरीना उस्मानी से भी मिलेंगे.

डॉ नूतन ठाकुर
लखनऊ


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उत्तराखंड डीजीपी की गड़बड़ियों की जांच यूपी के आईपीएस ने कैसे की?

उत्तराखंड के डीजीपी बीएस सिधू द्वारा देहरादून में खरीदे गए एक विवादित वन भूमि की यूपी के आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर द्वारा अपनी पत्नी सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर के साथ वहां जा कर अपनी निजी हैसियत में जांच करना एक आदमी को इतना नागवार लगा कि उन्होंने इसकी वैधानिकता के सम्बन्ध में आरटीआई में कई सूचनाएँ मांग लीं.

रोशनाबाद, हरिद्वार के गोपाल पुत्र आशाराम ने अधिवक्ता अरुण भदोरिया के जरिये यूपी के प्रमुख सचिव गृह से आरटीआई में ना सिर्फ श्री ठाकुर की वर्तमान नियुक्ति और उनके अवकाश की जानकारी मांगी बल्कि यह भी माँगा कि एक प्रदेश का आईपीएस दूसरे प्रदेश के अपने से सीनियर आईपीएस के खिलाफ किस नियमावली में जांच कर सकता है.

साथ ही यह भी पूछा कि यह जांच करने के लिए श्री ठाकुर पर किस नियमावली में कार्यवाही हो सकती है और एक आईपीएस द्वारा अपने से सीनियर अफसर के खिलाफ व्यक्तिगत जांच कर प्रेस कांफ्रेंस करना किस नियमावली का उल्लंघन है.

वहीं नूतन ठाकुर का कहना है कि किसी भी आचरण नियमावली में निजी हैसियत में किसी अफसर के व्यक्तिगत कदाचरण की जांच करने और अपनी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की कोई मनाही नहीं है. साथ ही एक अफसर के गलत कामों को सामने लाने की प्रशंसा करने की जगह उस पर ऊँगली उठाने को कष्टप्रद बताया है.

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नूतन ठाकुर के धरने की सूचना मिलते ही लखनऊ पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्यवाही शुरू की

हमारे घर हुई चोरी में भारी पुलिस निष्क्रियता के विरुद्ध मेरे द्वारा डीजीपी कार्यालय के धरने की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग यकायक तेजी में आ गया. 15 अक्टूबर की रात हुई इस चोरी के बाद किसी पुलिस वाले ने मामले की सुध नहीं ली थी. घटना के दिन से ही मामले के विवेचक छुट्टी पर चले गए थे. पांच लाख से ऊपर की चोरी होने के बावजूद मामले में एसआर केस दर्ज नहीं किया गया था और एसएसपी लखनऊ सहित किसी भी वरिष्ठ पुलिस अफसर ने नियमानुसार घटनास्थल का निरीक्षण नहीं किया था.

पुलिस की इस घोर लापरवाही से क्षुब्ध हो कर मैंने कल रात यह घोषणा की थी कि मैं आज डीजीपी कार्यालय पर धरने पर बैठूंगी. यह सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में तेजी आ गयी. सुबह पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर और उसके बाद सीओ गोमतीनगर सत्यव्रत और एसपी ट्रांसगोमती दिनेश यादव घर आये और शीघ्र अनावरण का आश्वासन दिया. फिर एसएसपी लखनऊ प्रवीण का मेरे पति अमिताभ ठाकुर को फोन आया कि उन्होंने एसपी क्राइम को यह मामला सौंप दिया है और तीन दिन में बरामदगी हो जायेगी, अतः मैं धरना स्थगित कर दूँ.

मैं पूर्व सूचना के अनुसार डीजीपी कार्यालय गयी जहां चोरी होने पर कोई कार्यवाही नहीं होने वाले कई और लोग भी आये थे. मैंने एसएसपी के कहने पर दस दिन का समय देते हुए धरना स्थगित किया है पर हमने एसपी लोक शिकायत से मिल कर उन्हें ज्ञापन दिया. हम इस तरह के चोरियों में एफआईआर नहीं लिखने अथवा अन्य निष्क्रियता दिखाने के तमाम मामलों को इकठ्ठा कर रहे हैं और इन सब मामलों को सामूहिक रूप से उठाएंगे.

ज्ञापन—

सेवा में,
श्री ए एल बनर्जी,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- मेरे घर पर हुई चोरी में पुलिस के पूर्णतया उपेक्षात्मक रुख तथा इसके नाम पर मानवाधिकार विषयक  
महोदय,

कृपया निवेदन है कि दिनांक 15/16-10-2014 की रात्री को मेरे निवास 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ में नकबजनी/चोरी की घटना उस समय घटी थी जब हम गाजियाबाद गए थे. इस घटना के सम्बन्ध में मैंने दिनांक 16/10/2014 को थाना गोमतीनगर पर मु०अ०स० 884/2014 अंतर्गत धारा 457/380 आईपीसी पंजीकृत कराया है.

इस घटना में हमारा करीब छ-सात लाख रुपये का नुकसान हुआ है. यह हमारे लिए बड़ी धनराशि है.  दो लाख रुपये से ऊपर की चोरी होने के नाते यह प्रकरण पुलिस की परिभाषा में एसार केस की श्रेणी में आता हैं, अतः मेरे पति श्री अमिताभ ठाकुर ने अपने पत्र संख्या- AT/Security/01 दिनांक-17/10/2014 द्वारा एसएसपी को और मैंने थानाध्यक्ष गोमतीनगर को इसे एसआर केस में तरमीम करते हुए समस्त आवश्यक प्रक्रिया अपनाने हेतु निवेदन किया था. हमने इस प्रकरण में हमारे सामाजिक कार्यों से परेशान या नाराज किन्ही ताकतवर व्यक्तियों द्वारा किसी प्रकार की साजिश की सम्भावना के बारे में भी सम्बंधित अधिकारियों को अवगत कराया था.

उस दिन से अब तक किसी पुलिस वाले ने मौके का निरीक्षण नहीं किया था और ना ही हमसे इस बारे में कोई पूछताछ की थी. कल जब मैं इस घटना की प्रगति जानने थाना गोमतीनगर गयी थी तो पहले तो किसी पुलिसवाले ने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया और जब मैंने बहुत जोर दिया तो मुझे यह बताया गया कि इस मामले में विवेचक श्री श्रीराम घटना से पहले ही छुट्टी पर रवाना हो गए थे. इस प्रकार इस मामले की विवेचना एक ऐसे दरोगा को दी गयी थी जो अवकाश पर थे. हम सभी जानते हैं कि चोरी के मामले में घटना के ठीक बाद का समय बहुत ही महत्वपूर्ण होता है पर इस मामले में घटना के बाद कोई कार्यवाही ही नहीं हुई क्योंकि विवेचक छुट्टी पर थे.

दूसरी बात यह कि जैसा मैंने ऊपर बताया है, मेरे घर की चोरी लगभग पांच-छः लाख रुपये की है और दो लाख से ऊपर की चोरी एसआर केस होती है पर इस मामले में अब तक एसआर केस नहीं लगाया गया है. साथ ही सीओ से ऊपर किसी भी पुलिस अफसर द्वारा मौका मुआयना तक नहीं किया गया है जब कि मेरी जानकारी के अनुसार एसआर केस में थानाध्यक्ष से ले कर जनपद के एसएसपी तक को मौका मुआयना करना होता है और इन मामलों का पर्यवेक्षण डीआईजी और आईजी द्वारा की जाती है. हमारे घर की चोरी एसआर केस होने के बाद भी इसे एसआर केस नहीं बनाया जाना भी पुलिस की लापरवाही को स्पष्ट बताता है.

इस प्रकरण का एक तीसरा दुखद पहलू यह है कि आज जब सुबह मेरे पति सब्जी लेने गए तो वहां दूकान पर सब्जीवाले और अन्य लोगों ने बताया कि परसों (18/10/2014) की रात करीब नौ बजे गोमतीनगर थाने के पुलिसवालों ने विराम खंड पांच के जीवन प्लाजा से ले कर हुसडिया चौराहे तक सड़क के किनारे खोमचा, ठेलिया आदि लगाने वाले कई गरीब दुकानदारों को हमारे घर में हुई चोरी के नाम पर यह कहते हुए बुरी तरह पीटा कि वे लोग ही चोरी करते हैं. इनमे से कई लोगों को शारीर पर काफी चोटें भी आयीं. इनमे ज्ञान (मोबाइल नंबर 080819-66943), शोभित पान वाला, हुसडिया मंडी आदि सब्जीवाले की दुकान पर मिले. यह निश्चित रूप से अनुचित और अमानवीय आचरण है और इन गरीब लोगों का स्पष्टतया मानवाधिकार हनन भी. उन लोगों ने मेरे पति से कहा कि आप इतने दयालु आदमी हैं और आपके नाम पर हमारे ऊपर यह अत्याचार हो रहा है. मैं निवेदन करना चाहूंगी कि भले हमारे घर की चोरी नहीं खुले पर इसने नाम पर इस प्रकार के अत्याचार नहीं किये जाएँ.

इस मामले में सबसे दुखद पहलू यह है कि जब मैंने आज विरोध प्रदर्शन की घोषणा की तो सुबह से ही पुलिस के अफसर हमारे घर आना शुरू कर दिए. पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर हमारे घर आये जिन्होंने बताया कि हमारे मामले में विवेचक बदल दिए गए हैं और एसएसआई गोमतीनगर नए विवेचक हैं. यह भी बताया कि इस मामले में एसआर रिपोर्ट भेजी जा चुकी है. इसके बाद एसपी ट्रांसगोमती श्री दिनेश यादव और सीओ गोमतीनगर हमारे आये. उन्होंने भी हमें तमाम बाते कहीं. अंत में एसएसपी लखनऊ श्री प्रवीण कुमार का मेरे पति के पास फोन आया जिन्होंने कहा कि वे इस मामले को क्राइम ब्रांच को दे रहे हैं और एसपी क्राइम स्वयं इसका पर्यवेक्षण करेंगे. उन्होंने मेरे पति से मुझे धरना नहीं करने का निवेदन किया और आश्वासन दिया कि तीन दिनों में यह केस खुल जाएगा.

जाहिर सी बात है कि धरने की बात जानने के बाद इस तरह की सक्रियता पुलिस की कार्यप्रणाली के बारे में सब कुछ कह देती है. यदि पहले ही यह सब किया गया होता तो यह स्थिति ही नहीं आई होती. फिर भी मैं एसएसपी लखनऊ के आश्वासन पर तीन दिन की जगह दस दिनों के लिए अपना यह विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम स्थगित कर रही हूँ.

उपरोक्त समस्त तथ्यों के दृष्टिगत मेरा आपसे निम्न अनुरोध हैं-

1. कृपया इस घटना के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश पुलिस को सभी चोरी की घटनाओं में बराबर सक्रियता और संवेदनशीलता बरतने हेतु आदेश देने की कृपा करें ताकि किसी धरना प्रदर्शन आदि अथवा किसी के कथित रूप से बड़े आदमी होने पर ही नहीं बल्कि प्रत्येक आम आदमी के मामले में भी तत्काल गंभीरता पूर्वक कार्यवाही हो

2. कृपया पुलिस को चोरी या अन्य आपराधिक घटनाएँ रोकने के लिए इस प्रकार के अवैधानिक तरीके अपनाने से रोकने के आदेश देने की कृपा करें 

भवदीय,
डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
पत्र संख्या- AT/Security/01                                            
दिनांक-20/10/2014

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अपने पीआरओ पर इतना क्यों मेहरबान हैं डीजीपी सिद्धू

उत्तराखंड के भूमाफिया डीजीपी बीएस सिद्धू का एक और कारनामा सामने आया है। डीजीपी साहब के एक पीआरओ हैं उनको साल भर में पुलिस विभाग ने दो बार विशिष्ट सेवा सम्मान दे दिया। 26 जनवरी 2014 को पहली बार सराहनीय सेवा सम्मान चिन्ह दिया गया था, 15 अगस्त 2014 को उत्कृष्ट सेवा सम्मान भी दे दिया गया। नियम यह है कि एक बार पुरस्कार मिलने के बाद 6 साल बाद ही अगला पुरस्कार दिया जा सकता है। और उस पर तुर्रा यह कि सम्मान देने वाली कमेटी के अध्यक्ष डीजीपी खुद ही हैं। लेकिन डीजीपी कहते हैं कि सब कमेटी करती है मुझे तो याद ही नहीं कि किसको कितनी बार पुरस्कार मिला है।

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हालांकि इन बड़े घाघों का जल्दी कुछ होता नहीं, चाहे ये सबको मारकर खा जाएं लेकिन अवैध जमीन कब्जाने वाले डीजीपी के बुरे दिन शुरू हो गए लगते हैं। वन्य भूमि कब्जाने को लेकर डीजीपी की अपील ग्रीन ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दी है। डीजीपी का कहना था कि जब कोर्ट में सुनवाई चल रही है तो ट्रिब्यूनल में सुनवाई नहीं होनी चाहिए। पर ट्रिब्यूनल ने डीजीपी को झटका देते हुए आदेश दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोर्ट में सुनवाई चल रही है या नहीं। ट्रिब्यूनल को कोर्ट के साथ सुनवाई करने का अधिकार है और दोनों जगह सुनवाई चलती रहेगी। वैसे यह देखना दिलचस्प होगा कि डीजीपी साहब के एक के बाद एक कारनामें आने के बाद सीएम हरीश रावत क्या करते हैं।

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भ्रष्टाचारी के यार हजार, सदाचारी अकेले खाए मार… (संदर्भ- डीजीपी सिद्धू, आईपीएस अमिताभ और देहरादून पत्रकार प्रकरण)

Yashwant Singh : पत्रकार अगर भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की पैरवी न करें तो भला कैसे जूठन पाएंगे… मार्केट इकानामी ने मोरल वैल्यूज को धो-पोंछ-चाट कर रुपय्या को ही बप्पा मय्या बना डाला तो हर कोई नीति-नियम-नैतिकता छोड़कर दोनों हाथ से इसे उलीचने में जुटा है.. नेता, अफसर, कर्मचारी से लेकर अब तो जज तक रुपये की बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं.. पैसे ले देकर पोस्टिंग होती है, पैसे ले देकर गलत सही काम किए कराए जाते हैं और पैसे ले देकर मुकदमें और फैसले लिखे किए जाते हैं, पैसे ले देकर गड़बड़झाले-घोटाले दबा दिए जाते हैं… इस ‘अखिल भारतीय पैसा परिघटना’ से पत्रकार दूर कैसे रह सकता है.. और, जब मीडिया मालिक लगभग सारी मलाई चाट जा रहे हों तो बेचारे पत्रकार तो जूठन पर ही जीवन चलाएंगे न…

ऐसे ही जूठनबाज पत्रकारों के एक दल ने उत्तराखंड के भ्रष्ट डीजीपी सिद्धू की पैराकोरी का अघोषित अभियान चला रखा है… वो कहते भी हैं न कि भ्रष्टाचारी के यार हजार, सदाचारी अकेले खाए मार… इन यार पत्रकार ने सिद्धू के गड़बड़झाले को निजी हैसियत से जांचने गए आईपीएस अधिकारी Amitabh Thakur को ही निशाना बना डाला… इन पत्रकारों ने अगर इतना ही साहस उत्तराखंड की भ्रष्ट सरकार और भ्रष्ट अफसरों की पोल खोलने में दिखाया होता तो जनता जनार्दन की जाने कितनी भलाई हो गई होती.. पर अब जनता की कौन सोचता है… जनता बस मोहरा है… मोहरे की आड़ में सब माल पीट रहे हैं.. डीजीपी सिद्धू कांड तो सच में आंख खोलने वाला है… पता चला है कि दलाली के पैसे से गाल लाल कर मीडिया उद्यमी बने कुछ नए किस्म के अंतरदेशीय दल्ले भी सिद्धू की गुपचुप पैरोकारी में देहरादून के अखबारों के संपादकों को पटाते घूम रहे हैं… देखना, एक न एक दिन ये साले सब नंगे होंगे… रुपये-सत्ता के जोर से और भ्रष्टों के मेल से ये मीडिया के छोटे बड़े दल्ले भले ही आज खुद को पावरफुल महसूस कर रहे हैं लेकिन जब अचानक इनके पिछवाड़े कोई अदृश्य लात पड़ेगी तो इन्हें समझ में नहीं आएगा कि धूल चाटने गिरे कहां, दाएं बाएं या बीच में… क्योंकि तब भू-लुंठित होना कंपल्सरी होगा, आप्शन होगा केवल जगह चुनने की…

फिलहाल तो अमिताभ ठाकुर को सलाम
जो अपने कबीराना-फकीराना अंदाज में
नित नए नए कर रहे हैं जोरदार काम…

आगे पढ़ें मीडिया के दल्लों का सच, Amitabh Thakur की जुबानी…

भ्रष्ट डीजीपी सिद्धू के पैरोल पर हैं देहरादून के कई बड़े पत्रकार!
http://goo.gl/pYIMkR

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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भ्रष्ट डीजीपी बीएस सिद्धू का साथ दे रही है उत्तराखंड सरकार

उत्तराखंड में एक जांबाज दरोगा ने डीजीपी के भ्रष्टाचार को न सिर्फ उजागर किया बल्कि डीजीपी बीएस सिद्धू के उत्पीड़न को झेलते हुए अनवरत आवाज उठा रहा है. इस जांबाज दरोगा का नाम निर्विकार सिंह है. इस दरोगा ने आरोप लगाया है कि उत्तराखंड सरकार भ्रष्ट डीजीपी का साथ दे रही है और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले का उत्पीड़न करा रही है. पूरी खबर अमर उजाला में प्रकाशित हुई है.

दरोगा ने कहा है कि वह अपना मेडल वापस करना चाहता है क्योंकि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के कारण उसको लगातार परेशान किया जा रहा है. डीजीपी बीएस सिद्धू पर दर्जनों बीघा जमीन फर्जी तरीके से अपने नाम कराने का आरोप है.

मूल खबर पढ़ें….

उत्तराखंड में डीजीपी के पद पर एक भूमाफिया बैठा है!

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उत्तराखंड में डीजीपी के पद पर एक भूमाफिया बैठा है!

उत्तराखंड में पुलिस विभाग इन दिनों एक बड़े संकट से गुजर रहा है. भ्रष्ट सत्ताधारियों की शह पर पुलिस विभाग में डीजीपी पद पर एक भूमाफिया को बिठा दिया गया है. बीएस सिद्धू नामक इस शख्स पर पुलिस विभाग के लोगों ने ही खुलकर आरोप लगाना शुरू कर दिया है. दरोगा निर्विकार सिंह ने कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है कि उनकी लड़ाई किसी डीजीपी से नहीं बल्कि इस पद पर बैठे एक भूमाफिया से है. डीजीपी पद की आड़ में यह बीएस सिद्धू नामक प्राणी खुलकर कानून विरोधी काम कर रहा है.

पूरे प्रकरण को देहरादून से प्रकाशित अमर उजाला अखबार ने विस्तार से प्रकाशित किया है. पढ़िए इस भ्रष्ट डीजीपी से संबंधित कुछ खबरें….

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भ्रष्ट डीजीपी बीएस सिद्धू का साथ दे रही है उत्तराखंड सरकार

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