राहुल देव-
प्रभाष जी का ८८वाँ जन्मदिन। २००९ में जाने की जगह उन्हें १५-२० साल और मिले होते तो वे क्या लिख रहे होते, किन संघर्षों में जुटे होते? यह विचार ही रोमांचित करता है।
क्या लिख रहे होते इसकी बहुत साफ़ झाँकी उनके उन १५८ लेखों का संग्रह है जो ‘हिंदू होने का धर्म’ नाम से २००३ में राजकमल प्रकाशन से छपा है। इसका पहला लेख ७ दिसंबर १९९२ को जनसत्ता में छपा यानी बाबरी मस्जिद ध्वंस वाले दिन ६ दिसंबर को लिखा गया। उस दिन से २७ अक्तूबर, २००२ को छपे इस संग्रह के अंतिम लेख के बीच यानी पूरे दस साल में प्रभाष जी ने तमाम हिंदूवादी संगठनों द्वारा जुटाए गए लाखों कारसेवकों के हाथों जो उस दिन करवाया उसके पीछे की वैचारिकी, अधर्म और विषाक्त शक्तियों से जो मोर्चा लिया, जो असाधारण बौद्धिक-पत्रकारीय युद्ध किया, उस प्रकरण के बाद की घटनाओं पर जैसी तेजस्विता, साहस और प्रखरता के साथ लगभग जुनूनी लेखन किया वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में शामिल है।
तब तक हो चुके गुजरात नरसंहार पर भी उनके लेख संग्रह में शामिल हैं बिलकुल अंत में। ६५० से अधिक पन्नों की किताब के लगभग हर लेख में ऐसे वाक्य शामिल हैं जिन्हें बार-बार उद्धृत करने का मन करता है। केवल उन लेखों के शीर्षक ही देख लिए जाएँ तो बहुत साफ़ समझ में आ जाता है कि मज़मून क्या होगा। चंद नमूने देखिए –
राम की अग्नि परीक्षा
मंदिर मस्जिद उसके धाम किसको सन्मति दे भगवान
ढहाने का झूठ और सच
खुदा के वास्ते मस्जिद की बात मत कीजिए
संविधान पर त्रिशूल
हिंदू होने का धर्म
ऐ मेरे देश, उदास न हो
इस ढाँचे की बारी न आए
अपनी सीता की रसोई
इन्हीं का धर्म और इन्हीं की राजनीति है
जो धर्म को नहीं जानते
आस्था और जनादेश का अंतर
लोकतांत्रिक हिंदू मानस को समझिए
प्रतिशोध से प्रदूषित जलाभिषेक
संघ परिवार का सत्ता महायज्ञ
क्योंकि अब सत्ता ही साधन और साध्य है
हिंदू राज्य भी क्या हिंदू धर्म है?
वे समझते हैं कि वे कमल हैं
मुख में आम सहमति करतूतें विभाजन की
ये श्रीकृष्ण हिंदू-विरोधी हैं, समझे?
न भारतीय न हिंदू, यह संघी हैं
रामकथा में नया अवतार जोड़ने वाले हैं कौन?
राष्ट्रप्रेम और धार्मिकता संघी बपौती नहीं है
सत्ताधारी संतन के पाँव
राजनेता से अटलजी प्रचारक हो गए
हिंदू समाज क्या ‘हिंदुत्व’ की जागीर है?
एक कायर समाज का प्रवक्ता
हिंदू के भेस में मुसलमान या ईसाई?
क्योंकि संघ सांप्रदायिक राजनीति का मुखौटा है
गांधी को फिर मत मारिए
संघी स्वतंत्रता आंदोलन की बरसी पर
झूठ पर झूठ बोलते हैं
उनके मंदिर मस्जिद और राम
अनिवासी हिंदुओं का स्वप्न राष्ट्र
अब बारी उदार और सहिष्णु हिंदू की है
हिंदुत्व धर्म का जिहादी रूप है, अटलजी
प्रधानमंत्री के स्वयंसेवक होने की सार्थकता
मिलिटेंट हिंदुइज्म ही तो हिंदुत्व है स्वयंसेवक जी!
मेरी हिंदू भस्मिता
मीडिया पर मेहरबान है मोदी सरकार (गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी)
गांधी जयंती पर संघ का उद्बोधन
कालिख तो हम पर पुत रही है….
क्षमा कीजिएगा, सूची ही लंबी हो गई है लेकिन उनके विचारों और लेखन की बानगी के लिए ज़रूरी थी।
अब २०१४ से देश में जो सांप्रदायिक-धार्मिक घटनाएँ, दुर्घटनाएँ, लिंचिग और ध्रुवीकरण के नित नए प्रयोगों की जो श्रंखला बनी है उस पर प्रभाष जी किस सात्विक आवेग, अंतर्दृष्टि और मार्मिकता के साथ आक्रमण तथा विमर्श कर रहे होते यह कल्पना ही एक बौद्धिक सनसनी पैदा करती है।
हिंदी पत्रकारिता में प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के माध्यम से जो योगदान किया, उसे बढ़ाया, नए तेवर और भाषा दी, हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में एक समूचा जनसत्ता अध्याय जोड़ दिया इस पर चर्चाएँ पहले भी हुई हैं, किताबें लिखी-छापी गई हैं, आज भी इन पक्षों को याद किया गया है, संस्मरण प्रसारित किए गए हैं। लेकिन ‘अपन’ को लगा आज ज़्यादा ज़रूरी है प्रभाष जोशी नाम के व्यक्ति-पत्रकार-संपादक-चिंतक के भीतर जो सच्ची, आध्यात्मिक धार्मिकता की, सच्चाई और निडरता की मशाल निरंतर जलती रहती थी, वह आग जिसने उन्हें इतने सारे लोगों का सितारा बनाया, आदर्श बनाया, प्रेरणा बनाया उसकी कुछ झलक आज दिखाई जानी चाहिए।
वे आज होते तो वह आग सच्चे पत्रकार धर्म और सच्चे देशप्रेम के यज्ञ की गगनचुंबी ज्वालाओं की तरह धधक रही होती।
प्रभाष जी मेरे तीसरे पिता की जगह रहे हैं। दूसरे थे स्व. यादवराव देशमुख जिन्होंने मुझे पत्रकार बनाया। पहले पिता उसी अगस्त २००९ में गए जिसके नवंबर में प्रभाषजी।
उनके एक छोटे से सहयोगी, पुत्रवत स्नेह पाने वाले और आज भी उनके परिवार के सदस्य के रूप में संस्मरण कुछ अपने पास भी हैं। उनको और अपने को लेकर कई लोगों के मन में जो शंकाएँ, अफ़वाहें, दुष्प्रचार और झूठ अब भी बचे हुए हैं उन्हें भी एक दिन साफ़ करना है। वह सब कुछ समय बाद।



Shailesh Srivastava
July 18, 2025 at 11:10 am
केवल हिंदुओं के खिलाफ लिख पाते, सर तन से जुदा, 26/11, कश्मीर में इस्लामिक उत्पात , पहलगाम में धर्म पूछकर गोली मारकर हत्या लिखने में उनकी कलम की निभ टूट जाती और कलम की स्याही सूख जाती। अगर ऐसा था तो उनका चले जाना हो बेहतर