विष्णु नागर-
चार दशक से भी पुराने मित्र प्रदीप कुमार का आज पचहत्तरवां जन्मदिन है। उन्हें बहुत- बहुत बधाई और शुभकामनाएं। बहुत से पाठक उनके नाम से परिचित होंगे मगर जिन्हें याद नहीं आ रहा है, उन्हें याद दिला दूं कि जो मित्र मेरे फेसबुक पेज नियमित रूप से आते रहे हैं,
उन्होंने एक-डेढ़ साल पहले तक उनके बेहद आत्मीय संस्मरण पढ़े होंगे। बहुत से पाठक उनकी लेखनी के मुरीद हुए। उम्मीद है कि प्रदीप संस्मरणों का यह सिलसिला इस नये साल में पुनः आरंभ करेंगे। उनका एक और परिचय यह है कि वह ‘दैनिक जागरण’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘अमर उजाला’ आदि के स्थानीय संस्करणों के संपादक रहे हैं। नवभारत टाइम्स में भी वह वरिष्ठ पद पर रहे हैं। दिल्ली के सोवियत संघ सूचना केंद्र में कुछ वर्ष तक संपादकीय दायित्व उन्होंने संभाला था।
उनका एक परिचय यह है कि 2011 से 2014 के आरंभिक महीनों तक, जब मैं ‘शुक्रवार ‘ समाचार साप्ताहिक का संपादक था, उन्होंने मेरे आग्रह पर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर नियमित स्तंभ लिखना स्वीकार किया।मेरी दृष्टि में उनसे अच्छा अंतरराष्ट्रीय विषयों पर लिखनेवाला दूसरा हिंदी पत्रकार नहीं है और उन्होंने उस दौर में इसे साबित किया।दूसरे हिंदी पत्रकार अमूमन अखबारों की कतरनें पढ़कर लिखते थे, प्रदीप कुमार अपने वर्षों के अध्ययन के आधार पर किसी घटना की तमाम परतें खोलते रहे। उनका एक और परिचय यह है कि वह लखनऊ विश्वविद्यालय के जब छात्र थे, तब उनके निकट दोस्तों में हिंदी के सुपरिचित आलोचक वीरेंद्र यादव भी थे और यह मित्रता आज तक कायम है। ये दोनों मित्र शुरू से ही बहुत पढ़ाकू रहे हैं।
एक और परिचय प्रदीप कुमार का यह है कि जब मैं नवभारत टाइम्स, मुंबई से स्थानांतरित होकर दिल्ली आया था तो प्रदीप भी लखनऊ उसी समय इसमें काम करने आए थे और इस तरह मित्रता कायम हुई। इस निकटता के बीच रूठने- मनाने के दो-तीन दौर चले। जिन बहुत कम मित्रों से मेरी पारिवारिक स्तर पर मित्रता है, उनमें वह हैं। ऐसी मित्रताओं में दोनों परिवारों के लोगों की भी बराबरी की भूमिका होती है। खासकर दोनों मित्रों की पत्नियों के बीच मैत्री संवाद बना रहे तो ऐसी दोस्तियां आजीवन चलती हैं।

मैत्री के शुरुआती दिनों में हमारा साथ खूब रहा, एक दूसरे के यहां आना- जाना रहा। बाहर मिलना, खाना पीना रहा। वह दौर आज से अलग था। आज तो मित्र भी स्वयं में एक द्वीप बन चुके हैं। तब ऐसा नहीं था। कड़की थी मगर उस कड़की में मजा था। मिलना- जुलना का आनंद था। मेरे लाजपत नगर वाले किराये के मकान में न जाने कितने दोस्त बस में धक्के खाकर आते रहे और हम भी उनके यहां आते- जाते रहे। तब मिलने पर तोहफा लेने – देने का चलन नहीं था। तब प्रदीप भी मेरे घर पर आए, कभी हम उनके यहां गए। कभी इब्बार रब्बी उनके साथ रहे, कभी नवभारत टाइम्स के दिनों के साथी पंकज शर्मा। फिर हम मयूर विहार फेज -1 में आमने-सामने के फ्लैट में भी कुछ समय तक साथ रहे तो दोनों परिवारों की नजदीकियां बढ़ीं।
उनके दोनों बच्चे, हमारे दोनों बच्चों के निकट आए। तब प्रदीप की मां भी उनके साथ रहती थीं और उनका साया दोनों परिवारों पर रहा। फिर पता नहीं क्या हुआ कि प्रदीप किसी बात से नाराज़ हो गए। नतीजा कि दोनों परिवारों में भी बोलचाल बंद हो गई। कुछ समय बाद फिर हमारे मकान मालिक ने कहा कि उसे अपने इस फ्लैट में आना है तो फिर आमने-सामने वाला यह तनावपूर्ण संबंध खत्म हुआ। फिर दो -तीन बरसों बाद ये सज्जन अपनी श्रीमती जी के साथ अचानक हमारे यहां नमूदार हुए। फिर रिश्ते उसी तरह सामान्य हो गए। फिर एक बार रूठ गए।
हुआ यह था कि एक युवक ने तेजी से स्कूटर मोड़ते हुए मुझे टक्कर मार दी। स्थानीय अस्पताल में टांके लगवाए। दवा खाई। निश्चिंत थे। अचानक आधी रात को तबियत बिगड़ने लगी तो पटपड़गंज के मैक्स अस्पताल में भर्ती हुए। वहां अगली सुबह खबर पाकर प्रदीप आए। प्रेम से मिले। हालचाल लिया। दो- तीन दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली। अब ये खिंचे- खिंचे से रहने लगे। कुछ समझ में न आए कि हुआ क्या है। उस समय मैं इस दुर्घटना के बारे में अपने दोनों बेटों को भी बताने के पक्ष में नहीं था, जो दिल्ली से बाहर रह रहे थे। दिवंगत मित्र पंकज सिंह ने फेसबुक पोस्ट से दुर्घटना की यह ख़बर मित्रों तक पहुंच गई थी।
इन साहब की अज्ञात नाराजगी दूर करने के लिए हम पति- पत्नी दो बार इन्हें बिना बताए इनके घर गए। प्रेम दिखाया मगर खिंचाव खत्म नहीं होने दिया। बाद में छह महीने – एक साल बाद एक दिन पत्नी सहित अचानक हमारे यहां आए और फिर सब सामान्य हो गया। पता चला कि इस दुर्घटना की खबर इन्हें क्यों नहीं दी गई, इससे ये ख़फ़ा थे! क्यों मेरा अस्पताल में भर्ती होना इन्हें दूसरों से पता चला, शिकायत यह थी! अब हम इस मामले में इन सज्जन से बहुत डरने लगे हैं। अब तो हम एक-दूसरे को कब और कितना ज़ुकाम है, इसकी खबर भी देते रहते हैं। अब ये फिर से नाराज़ नहीं होंगे, इसका पुख्ता भरोसा ये दे चुके हैं!
ये शुरू से ही थोड़े गर्म मिज़ाज आदमी रहे हैं। उत्तर प्रदेश के सीतापुर का होने का इन्हें गर्व- सा है, जहां इनके अनुसार बात -बात में झगड़े टंटे होते रहते हैं। ये पुराने किस्से सुनाते हैं तो उसमें कई बार किसी की खाल खिंचने की धमकी की बात जरूर आती है। इधर हम ठहरे ठेठ मालवी ठंडे आदमी। खैर, अब ये काफी ठंडे मिज़ाज के हो गए हैं। जितने ये गर्म मिज़ाज हैं, उतनी ही इनकी श्रीमती जी शांत स्वभाव की हैं, अति सहनशीला हैं। उनकी इस बात के लिए यह तारीफ़ भी करते हैं और बीच- बीच में उनके इस स्वभाव से उखड़ते भी रहते हैं। दिलचस्प यह है कि जब स्नेहलता जी से शादी की बात होने लगी तो उन्हें देखने- पसंद करने ये सज्जन खुद नहीं गए, अपने तीन दोस्तों शोएब, नदीम और वीरेंद्र (यादव) को भेज दिया और उन्होंने संयुक्त रूप से कहा कि लड़की अच्छी है, शादी कर लो तो कर ली और सब बातें साफ बता दीं कि उस समय उनकी आर्थिक स्थिति कितनी दयनीय है।
ठंडे -गर्म मिज़ाज इंसानों की यह जोड़ी खूब जमी है क्योंकि स्नेहलता जी ने अपने नाम के अनुरूप पति ही नहीं इनके पूरे परिवार को स्नेह दिया। हर मुश्किल में हर तरह से साथ खड़ी रहीं। कोरोना के दौरान स्नेहलता जी को कोरोना हो गया और स्थिति जीवन- मरण जैसी विकट लगने लगी। तब ऊपर से अनेक बार उग्र मगर बेहद भावुक यह इंसान कितना परेशान था, इसका उस समय दिल्ली से दूर होने के बावजूद मुझे अनुमान है। उस समय जिन्होंने इनकी मदद की, उनके प्रति वह बेहद शुक्रगुजार हैं तो उन्हें यह माफ भी नहीं कर सकता, जिन्होंने कभी पलटकर भी पूछा नहीं!
इस आदमी ने स्नेहलता जी को भी अपनी तरह मार्क्सवादी और नास्तिक बनाने की कोशिश की पर वह भी मेरी श्रीमती जी की तरह मध्यमार्गी ही रहीं। ईश्वर विश्वासी हैं मगर सांप्रदायिकता तथा जातिवाद ने उनके दिमाग पर कभी कब्जा नहीं किया। प्रदीप ने भी अब उनकी इस स्थिति को पूरी तरह कुबूल कर लिया है। हां प्रदीप खुद किसी सांप्रदायिक शख्स को अपने घर में महत्व नहीं दे सकता, चाहे वह रिश्ते में कितना ही निकट हो। इस मामले में उसकी जुझारू और प्यारी बेटी प्रज्ञा भी कोई समझौता कुबूल नहीं करती। इसके विपरीत उसका घर अपने आत्मीय मित्रों के लिए हमेशा खुला है, जिसमें लखनऊ के तीन दोस्तों के अलावा मेरी भी जगह है। जरूरत पड़ने पर यह शख्स इनकी किसी भी मुसीबत में साथ खड़ा मिलता है।
प्रदीप का अपनी मां के प्रति गहरा अनुराग था, जो अभी डेढ़ दशक पहले तक जीवित थीं। उनका घर में सब सम्मान करें, यह उसकी परिवार से अपेक्षा रही और उन्हें उनके घर के एक -एक आदमी ने पूरी इज्ज़त बख्शी। उस दुबली- पतली लंबी औरत ने पति की मृत्यु के बाद बच्चों के जीवन की बागडोर खुद संभाली थी और मां की मदद के लिए प्रदीप ने बहुत जल्दी पत्रकारिता लखनऊ में शुरू की थी। स्नेहलता जी को उनके अपने पिता रानी कहा करते थे- उनके पति भी यही कहते हैं और अब हमें भी उनका असली नाम याद आने में समय लगता है।
आज प्रदीप सक्रिय पत्रकारिता से अवकाश ले चुके हैं। उनकी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी है। पढ़ाई- लिखाई में वह कभी पीछे नहीं रहे। उनका मुख्य विषय राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति है, उसकी देशी- विदेशी पुस्तकों का उनके पास भंडार है और इसमें वे कुछ न कुछ नया जोड़ते रहते हैं। अक्सर वह उन किताबों की बात मुझसे करते हैं। वह देश – विदेश के राजनीतिक इतिहास के अनेक प्रसंगों पर स्मृति के आधार पर काफी कुछ बता सकते हैं। अभी इन्हें मेरी एक कविता इन्हें पसंद आई तो उसका संदर्भ वह करीब चालीस साल पहले हिटलर पर छपी एक किताब से जोड़कर बातें करने लगे। उन्हें छोटे -छोटे व्यक्तिगत प्रसंग भी खूब याद रहते हैं, जबकि मैं इस मामले में शून्य से थोड़ा ही ऊपर हूं।कभी- कभी वह वही बातें दोहराते हैं, जो इस उम्र में अक्सर हम सबके साथ होता है, क्योंकि अनुभव की दुनिया में नया जुड़ना कम हो जाता है।
मैं उन्हें साधिकार टोकता रहता हूं और मित्र के अधिकार से कभी कभी डांट भी देता हूं और वह सुन भी लेते हैं। फिर अनेक बार वह यह कहकर कोई प्रसंग सुनाते हैं कि अच्छा यह मैं पहली बार सुना रहा हूं।
वह साहित्य के भी अच्छे पाठक हैं मगर अंग्रेजी में निष्णात होने के बावजूद वह उपन्यास आदि हिंदी के या हिंदी अनुवाद में ही पढ़ना पसंद करते हैं। उन्होंने हिंदी के अनेक नये -पुराने उपन्यास पढ़ रखे हैं। हिंदी कविता में भी उनकी कुछ – कुछ गति है। वह और रानी अपने स्वास्थ्य का हर संभव खयाल रखते हैं और इस उम्र में सामान्यतः व्यक्ति जितना स्वस्थ रह सकता है, दोनों पति-पत्नी हैं।
बदकिस्मती से आज के उसके पारिवारिक आयोजन का हिस्सा मैं नहीं बन सकूंगा, जबकि वह हमेशा ऐसे किसी आयोजन में साथ रहे हैं। बस दोनों, अपने बेटे -बेटी और पूरे परिवार के साथ स्वस्थ- प्रसन्न रहें, यही कामना है। और अंत में मैंने बार -बार इस आलेख में प्रदीप को ‘उन्हें’ कहकर संबोधित किया है मगर वह मेरे लिए ‘आप’ नहीं ‘तुम’ है।


