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आज के अखबार : प्रधानमंत्री का पक्ष रखने में इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स ने बाजी मार ली

तो क्या भाजपा का ‘पूरा इको सिस्टम’ सीजेआई को बदनाम करने में लग गया है?

संजय कुमार सिंह

आज द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे सभी सभी अखबारों में आतिशी को दिल्ली का मुख्यमंत्री चुने जाने की खबर लीड है। सेकेंड लीड कोलकाता के आरजी कर अस्पताल के मामले में सीबीआई की जांच पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस ने इसे सिंगल कॉलम में छापा है और मुख्य न्यायाधीश के साथ गणेश पूजा पर प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण या उनका पक्ष पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। नवोदय टाइम्स में बुलडोजर न्याय पर सुप्रीम कोर्ट की रोक सेकेंड लीड है जबकि आरजी कर मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी द टेलीग्राफ की लीड है। सबसे पहले, मैं प्रधानमंत्री के बचाव में उनकी अपनी दलीलों को पहले पन्ने पर जगह दिये जाने की चर्चा करूंगा।

प्रधानमंत्री ने जो किया, उसके बचाव में जो कहें, वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने एक्स पर लिखा है, “बचपन में खेलते हुये कपड़े गंदे हो जाते थे तो दोस्तों से लिपट कर किसी को साफ़ नहीं रहने देता था। मोदी ने चंद्रचूड़ के साथ यही कर दिया। चंद्रचूड़ एक महीन इमेज बिल्डिंग गेम खेल रहे थे। सैटरडे सेमीनार में क्रांतिकारी जज और बेंच में बैठ कर समझौतावादी। मोदी ने 10 मिनट में ये खेल खत्म कर दिया। रिटायर होने से पहले गोगोई बना दिया। चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ 10 नवंबर 2024 को आधिकारिक रूप से रिटायर होंगे लेकिन नैतिक रूप से 11 सितंबर 2024 को एक जज के तौर पर उनका आखिरी दिन था। संवैधानिक मर्यादा वो खो चुके हैं। कैमरों के साथ चंद्रचूड़ के घर जाकर मोदी ने संदेश दिया है कि देखो कानून मेरी जेब में है।

मोदी अपने राजनीतिक करियर के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं – इस दौर में वो ऐसी तमाम घटनाओं को अंजाम देंगे। इंडिया गठबंधन और राहुल गांधी को इसके लिये तैयार रहना चाहिये। किसी के लिये भी अस्तित्व की लड़ाई उसका अंतिम संघर्ष होता है। इस दौर में वो सारे नियम तोड़ता है, ज़्यादा हमलावर होता है।” आप इससे असहमत हो सकते हैं पर नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसमें जो कहा गया है वह निराधार नहीं है और ना ही इतना गैर जरूरी कि जो पिछले साल नहीं किया गया वह इस साल किया गया तो उसे सामान्य मान लेने के लिए मजबूर करने की कोशिश। मेरा मानना है कि यह इतना ही सामान्य और जरूरी होता तो पहले भी हुआ होता। पहले नहीं हुआ है मतलब नरेन्द्र मोदी की राजनीति है और आरोप यही है कि नरेन्द्र मोदी मुख्य न्यायाधीश के साथ भी राजनीति कर रहे हैं।

ऐसे में उनका पक्ष ‘एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड’ के बिना अधूरा है। यह अलग बात है कि इसपर लेख छप चुके हैं। अन्य अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स में है तो यह तथ्य रेखांकित करने लायक है। दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, मुख्य न्यायाधीश के साथ गणेश पूजा पर कांग्रेस इकोसिस्टम की नाराजगी पर प्रधानमंत्री ने हमला किया। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री अपना विरोध करने वालों को कांग्रेस इकोसिस्टम का हिस्सा बता रहे हैं जबकि इसका विरोध सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने भी किया है। इसे बताना उनकी राजनीति और इसे समझने की जरूरत है। अखबारों ने जनता को यह सब नहीं बताया और अभी भी छिपा रहे हैं। इस बयान को प्रचार दे रहे हैं या नजरअंदाज कर रहे हैं, दोनों महत्वपूर्ण है।

इस क्रम में कांग्रेस से भाजपा में गये, प्रोफेसर गौरव बल्लभ भी प्रधानमंत्री के बचाव में कूद पड़े है। ट्वीटर पर आज उन्होंने पायनियर में छपा अपना लेख साझा किया है। इसके साथ उन्होंने लिखा है, यह संविधान की सुरक्षा और देश के कल्याण की साझी प्रतिबद्धता है। कहने के लिए कहा जा सकता है कि चार पायों को मिलाकर एक कर दिया जाये तो मजबूत हो जायेंगे। इसलिये इस पर बहस की गुंजाइश भी नहीं है। लेकिन आप इसमें यह नहीं बता रहे हैं कि चार पायों का अलग महत्व है। प्रोफेसर साहब का यह ज्ञान है और अपने ज्ञान का ऐसा उपयोग करना कमाने का साधन हो या नहीं हो, राजनीतिक शांति तो देता ही होगा। दूसरी ओर, एनडीटीवी की एक खबर के अनुसार, राज्यसभा सांसद और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता संजय राउत ने कहा कि, “ऐसी मुलाकातें संदेह पैदा करती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि मुख्य न्यायाधीश को शिवसेना यूबीटी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के बीच झगड़े से जुड़े मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए। आरजेडी नेता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा कि हर संस्था की स्वतंत्रता सिर्फ़ सैद्धांतिक नहीं होती, बल्कि उसे देखा जाना चाहिए। “गणपति पूजा एक निजी मामला है, लेकिन आप कैमरा लेकर जा रहे हैं। इससे जो संदेश जाता है, वह असहज करने वाला है….।”

वैसे, एनडीटीवी की इसी खबर के अनुसार, कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व ने प्रधानमंत्री के दौरे पर सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री का यह बयान प्रचारकों द्वारा इस मुद्दे को लीपने-पोतने की तमाम कोशिशों के बाद आया है और प्रधानमंत्री को खुद अपना बचाव करना पड़ रहा है तो आप इसका महत्व या जरूरत समझ सकते हैं। हालांकि, मेरी चिन्ता मीडिया खासकर अखबारों की भूमिका को लेकर ही है। इस मामले में यह भी कहा गया है कि सीजेआई से प्रधानमंत्री के संबंध या घर में पूजा का मामला निजी होता है उसे सार्वजनिक नहीं किया जाता तो कोई भी उसमें राजनीति नहीं तलाशता।

यू ट्यूब चैनल, लोकहित इंडिया के अम्बुज कुमार ने अपने एक वीडियो में इंडियन एक्सप्रेस में छपे अधिवक्ता और एक्टिविस्ट इंदिरा जय सिंह के एक लेख के हवाले से कहा है कि, प्रधानमंत्री ने जो वीडियो ट्वीट किया है उससे स्पष्ट है कि वे मुख्य न्यायाधीश के यहां आमंत्रित अतिथि थे। इससे सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि मुख्य न्यायाधीश जो शपथ लेते हैं क्या उसका पालन हुआ है? उन्होंने लिखा है, धर्मनिरपेक्षता संविधान की एक बुनियादी विशेषता है। इसका अर्थ है, राज्य स्वयं किसी धर्म को नहीं अपनायेगा, स्थापित नहीं करेगा या उसका पालन नहीं करेगा। इसके साथ यह भी सही है कि निजी तौर पर सीजेआई और पीएम के विवेक और धर्म की स्वतंत्रता का आनंद लेने के अधिकार पर सवाल नहीं उठा सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि इस विश्वास का सार्वजनिक प्रदर्शन उनके पद की शपथ का उल्लंघन करता है? …वैसे भी, संविधान धर्म और राज्य की शक्ति को मिलाने की अनुमति नहीं देता है। … यह मानते हुए कि यह पूजा संवैधानिक रूप से स्वीकार्य थी, केवल प्रधानमंत्री को क्यों आमंत्रित किया गया? मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों, विपक्ष के नेता को क्यों नहीं आमंत्रित किया?

मुझे लगता है कि इन सवालों के बाद प्रधानमंत्री के बचाव का कोई मतलब नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने मुख्य न्यायाधीश के घर जाने पर कहा : कांग्रेस, इसका इकोसिस्टम नाराज है कि मैं गणेश पूजा में शामिल हुआ। यहां दिलचस्प यह भी है कि ऐसी सोच वाले प्रधानमंत्री और उनके समर्थक खुलकर संविधान बदलने की बात करते रहे पर जब कांग्रेस या राहुल गांधी ने इसे मुद्दा बनाया तो प्रधानमंत्री संविधान के रक्षक होने का दावा करने लगे। मीडिया का काम था कि वह आम आदमी को इसकी सत्यता बताता पर मीडिया का एक बड़ा वर्ग उनकी चापलूसी में लगा हुआ है। जो सच बताता है उसे परेशान करने और खरीदने के विकल्प तो हैं ही।

आरजी कर अस्पताल मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी द टेलीग्राफ में दो कॉलम की लीड है। मुख्य शीर्षक है, सीबीआई के निष्कर्षों से सुप्रीम कोर्ट परेशान। फ्लैग शीर्षक है, एजेंसी सबूतों से छेड़छाड़ की संभावना का पता लगा रही है इसलिए रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जायेगी। मुझे लगता है कि देश भर में पुलिस की जांच अदालत में नहीं टिकने के ढेरों मामले हैं और यह विधिवत किया जाता है। इसलिये हत्या हो जाती है, अपराधी नहीं पकड़े जाते हैं। यह सत्ता की शह पर भी होता है और सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र रूप से काम करे तो उसकी चिन्ता यह भी होनी चाहिये कि बाबरी मस्जिद विध्वंस में किसी को सजा क्यों नहीं हुई। जाहिर है, मामला जांच और सबूत इकट्ठा करने और उसके नष्ट करने का भी हो सकता है। ऐसे कई मामले हैं। पर अभी मेरा मुद्दा वह नहीं है।

आज सुप्रीम कोर्ट की खबर के शीर्षक में सबसे अलग शीर्षक द हिन्दू का है। यहां भी यह सिंगल कॉलम में है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों में निजी गार्ड तैनात करने की बंगाल सरकार की योजना पर हमला बोला। इसमें कहा गया है, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि मुख्य आरोपी संजय राय एक वालंटीयर था। क्या आप फिर से ठेके पर काम करने वाले वाले लोगों का एक समूह तैयार कर रहे हैं जिसे पुलिस ने सिर्फ सात दिन के लिए प्रशिक्षण दिया है? मुझे याद आता है कि हाल में एक खबर थी, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि आरजी कर अस्पताल में तैनात सीआईएसएफ कर्मियों को ममता सरकार सहयोग नहीं कर रही है। आप जानते हैं कि केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा पर आरोप है कि बलात्कार और हत्या के इस मामले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। अब इस अपील और सुप्रीम कोर्ट से संबंधित आज की खबर के आलोक में यह बताना जरूरी है कि आज तक की एक खबर के अनुसार, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करने के लिए पश्चिम बंगाल राज्य के खिलाफ कंटेम्प्ट केस फाइल किया है। आरजी कर अस्पताल में सीआईएसएफ के 92 कर्मी तैनात हैं, जिनमें से 54 महिला कर्मी हैं। केंद्र का आरोप है कि अस्पताल की सुरक्षा के लिए तैनात सीआईएसएफ कर्मियों को आवास की भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सवाल है कि इस मामले का क्या हुआ और इस मामले के रहते बंगाल सरकार अन्य सुरक्षा गार्ड क्यों तैनात कर रही है।

जो भी हो, तथ्य यह है कि दिल्ली के एम्स में भी सीआईएसएफ नहीं है और यहां निजी सुरक्षा गार्ड से काम चलाया जा रहा है। यह कोई नई खबर भी नहीं है। इंटरनेट पर 15 जनवरी 2023 की दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, दिल्ली एम्स से तीन हजार सिक्योरिटी गार्ड हटाये जाने वाले थे और उनकी जगह रिटायर जवान तैनात किये जाने थे। इसके बाद क्या हुआ पता नहीं, लेकिन यह तो तय है कि एम्स में निजी सुरक्षा गार्ड तैनात थे। जानने वाले जानते हैं कि बहुत पहले एम्स के गार्ड होते थे। बाद में उनकी जगह निजी गार्ड लगाये गये। यह सब क्यों और कैसे हुआ उसकी अलग कहानी है। पर कोलकाता की घटना के बाद जब देश भर में डॉक्टर्स की हड़ताल हुई तो एम्स के सुरक्षा उपायों की समीक्षा के लिए दो समितियां बनाई गई थीं। इस खबर से गार्डों के बारे में तो पता नहीं चला पर यह जरूर पता चलता है कि तब एआई एनैबल्ड सीसीटीवी लगाने का फैसला हुआ था। वैसे भी, सरकारी अस्पतालों के लिए अगर सीआईएसएफ को लगाया जाना है कि यह केंद्र सरकार का फैसला होगा और सभी अस्पतालों में  समान रूप से लागू होना चाहिये। जरूरत हो तो नई नियुक्तियां होनी चाहिये न कि आधी सुरक्षा सीआईएसएफ करे और सुरक्षा कर्मियों की आधी संख्या निजी सुरक्षा गार्डों की हो। संभव है, यह सब बाद में समझ में आये लेकिन अभी तो यही खबर है। 

इन खबरों के बीच आज जो खबरें छपी और नहीं छपी हैं उनकी भी चर्चा कर ली जाये। उदाहरण के लिए बुलडोजर न्याय पर रोक की खबर भी आज कई अखबारों में है। साथी पत्रकार जितेन्द्र कुमार ने लिखा है, सुप्रीम कोर्ट का यह अधूरा फैसला है। जिनका घर तोड़ा गया है उनको मुआवजा में क्या मिला? जिसने तोड़वाया उसे क्या सजा मिली? यह घटना दुहराई नहीं जाएगी इसकी जबावदेही कौन लेगा? अगर कोर्ट अपने इस फैसले में सुधार नहीं लाएगा तो देश में ऐसे लोगों को न्याय नहीं मिलेगा। मुझे लगता है कि न्याय तो दूर भविष्य में ऐसा नहीं होगा इसका आश्वासन भी नहीं है। लेकिन तथ्य यह भी है कि अभी सुनवाई पूरी नहीं हुई है। अंतिम आदेश में इस बारे में जरूर कुछ होना चाहिये। वरना, तोड़ना नहीं है, यह तो सबको पता था, पता होना चाहिये था। नवोदय टाइम्स में इस खबर का उपशीर्षक है, सार्वजनिक स्थानों पर अनधिकृत ढांचों पर यह आदेश लागू नहीं होगा। इसके साथ एक खबर का शीर्षक है, ‘नफरती मुख्यमंत्रियों के मुंह पर तमाचा : कांग्रेस’।

इसमें कहा गया है, प्रियंका गांधी ने एक्स पर पोस्ट किया, भाजपा सरकारों की अन्यायपूर्ण और अमानवीय बुलडोजर नीति का आईना दिखाने वाला माननीय उच्चतम न्यायालय का फैसला स्वागत योग्य है। ऐसी बर्बर कार्रवाइयों के जरिये देश के कानून पर बुलडोजर चलाकर इंसानियत और इंसाफ को रौंदने वाली नीति एवं नीयत पूरे देश के सामने बेपर्दा हो चुकी है।” कहने की जरूरत नहीं है कि विपक्ष की प्रतिक्रिया दूसरे अखबारों में तो नहीं ही है, भाजपा के इकोसिस्टम की प्रतिक्रिया मांगी और ली भी नहीं गई है। अगर उन्हें कुछ नहीं कहना है या वे इसके खिलाफ हैं या बुलडोजर न्याय का समर्थन करते हैं यह तो मीडियो को बताना चाहिये। अगर प्रधानमंत्री कांग्रेस के इकोसिस्टम की रणनीति बता रहे हैं तो मीडिया का काम है कि भाजपा के इको सिस्टम की रणनीत बताये। या प्रधानमंत्री के एकतऱफा आरोपों से बचे। भाजपा के राजनीतिक उलझनों और उसमें मीडिया के सहयोग के कारण खबरें न देने के कई मामले होते हैं।

विनेश फोगाट के चुनाव प्रचार पर इंडियन एक्सप्रेस में आज आठ कॉलम का एंकर है। इसके अलावा एक मामला जातिगत जनगणना का भी है। यह 2021 में होने वाली जनगणना जो अभी तक नहीं हुई है के साथ हो सकता है। जनगणना की घोषणा हो जानी चाहिये पर हो नहीं रही है और शायद इसलिए कि उसके साथ जातिवार जनगणना होगी या नहीं होगी भी स्पष्ट करना होगा। यह भाजपा की राजनीतिक उलझन है और इसलिए इसपर फैसला नहीं हो रहा है। हाल में ऐसी खबरें सूत्रों के हवाले से छपी थीं और मैंने उसपर लिखा भी आज द टेलीग्राफ में ऐसी ही एक और खबर है। इसका शीर्षक है, “इंतजार कीजिये और देखिये : (अमित) शाह ने जातिवार जनगणना पर रुख हल्का किया”। आज के अखबारों में दोनों खबरें हैं और यह भाजपा की राजनीति का तरीका है जिसे मीडिया का सहयोग मिल रहा है। नवोदय टाइम्स में मोदी के कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने पर सूत्रों के हवाले से जो खबरें छपी थीं वो आज अमित शाह के हवाले से छपी हैं। इ्नमें एक नवोदय टाइम्स में पांच कॉलम में बॉटम है, “इसी कार्यकाल में ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव लागू करने की योजना।

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