जीएसटी कानून और किसानों के मामले में सरकार का प्रचार तो है लेकिन वास्तविकता की चर्चा नहीं है। पुराने मामले नहीं के बराबर ही याद किये गये हैं। नये आत्मनिर्भर भारत का मामला तो और दिलचस्प है। पढ़िये और जानिये पूरी कहानी।
संजय कुमार सिंह
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री का भाषण हमेशा की तरह चुनावी ही था और आज ज्यादातर अखबारों में वही छपा है। मेरे नौ अखबारों में आज अमर उजाला और देशबन्धु नहीं आये हैं। बाकी छह में चुनावी भाषण की मीठी-मीठी बातें ही हैं। इनमें जीएसटी में सुधार या दरों की कमी किये जाने की घोषणा को दैनिक भास्कर ने दीवाली पर जीसएटी रेट कट का गिफ्ट कहा है। कल सोशल मीडिया पर राहुल गांधी का 18 अक्तूबर 2016 का एक ट्वीट घूम रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि जीएसटी दर पर 18 प्रतिशत की सीमा सबके हित में है। कल ‘खबर’ थी कि केंद्र सरकार ने प्रस्ताव किया है कि जीएसटी की 12 और 18 प्रतिशत की दो दरें खत्म कर दी जायें और ज्यादातर वस्तुओं व सेवाओं पर दो ही दर लागू हों, पांच या दस प्रतिशत की। भारत की जनता पर नरेन्द्र मोदी की सरकार ने ही जीएसटी थोपा है जो अपने प्रारंभिक स्वरूप में बहुत ही मनमाना और महंगाई बढ़ाने वाला था। पर मंदिर के लालची मतदाताओं और विज्ञापनों के लालची मीडिया ने इसका विरोध नहीं किया। गुजरात विधानसभा चुनाव के समय पहली बार इसमें कुछ ढील दी गई थी और मनमानी का आलम यह है कि मेडीक्लेम प्रीमियम पर भी भारी सर्विस टैक्स लगता है और राहुल गांधी के विरोध के बावजूद इसमें कमी नहीं की गई है। आप जानते हैं कि मेडीक्लेम मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के लोग देते हैं। बाकी के लिए आयुष्मान योजना का प्रचार है। बदले में देश के कई राज्यों में सरकारी अस्पतालों का बुरा हाल है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के मोहल्ला क्लिनिक बंद कर दिये गये हैं। सुप्रीम कोर्ट में ईवीएम से दोबारा गिनती हुई तो 51 वोटों से जीता हारा हुआ प्रत्याशी हार गया। तीन साल बाद दिलाई गई शपथ। इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर बाकी में खबर वैसे नहीं छपी है जैसी छपनी चाहिये थी।
प्रधानमंत्री जब जीएसटी स्लैब कम किये जाने को दीवाली गिफ्ट बता रहे हैं तो यह बताया जाना चाहिये कि जीएसटी के नाम पर कितनी जबरदस्त वसूली हुई है और विरोध पर ध्यान नहीं दिया गया है। अब राहुल गांधी मतदाता सूची में फर्जी वोट के जरिये वोट चोरी का आरोप लगा रहे हैं तो न सिर्फ जीएसटी दरों में कमी की गई है बल्कि द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, भारत की डेमोग्राफी बदलने की ‘साजिश‘ तथा उससे निपटने के लिए उच्चाधिकार प्राप्त मिशन शुरू करने की घोषणा भी की गई है। यहां ‘साजिश’ सिंगल कोट में है क्योंकि 11 साल से नरेन्द्र मोदी खुद प्रधानमंत्री हैं और इस साजिश का पता उन्हें अब चला है। यही नहीं, नरेन्द्र मोदी की सरकार जिस ढंग से काम करती रही है उसमें कहा जा सकता है कि डेमोग्राफी बदलने की ‘साजिश’ और उससे निपटने के उनके मिशन का मकसद घुसपैठियों से निपटना हो सकता है और आगे की चुनावी रणनीति या योजनाओं के लिए यह कालेधन की तरह है जिसकी आड़ में नोटबंदी की गई थी। न तो काले धन का पता चला और न नोटबंदी का। वैसे ही अब जनसांख्यिकीय मिशन से एसआईआर जैसी ‘गैर सरकारी’ योजनाएं चलेंगी और इसके प्रचार से आगे के चुनाव जीतने की रणनीति बनाई जायेगी। आप जानते हैं कि नोटबंदी और जीएसटी का देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा। नई शुरू की गई टैक्स प्रणाली के तहत दर (और स्लैब) ज्यादा थी। अब जब प्रति व्यक्ति आय कम होने की बात होती है तो तीसरी अर्थव्यवस्था होने का प्रचार और टैक्सदर कम होने की घोषणा की गई है। अगर अघोषित इमरजेंसी नहीं होती, मीडिया सरकार के प्रचार में नहीं लगा होता तो अखबारों में ऐसे खुलासों की बाढ़ होती और यह कम से कम इमरजेंसी में इमरजेंसी के विरोध जैसा तो होना ही चाहिये या हो ही सकता था।
यह सब नहीं होता था, विपक्ष कमजोर था इसलिए सरकार को जनता के हितों या उन्हें प्रभावित करके वोट लेने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई और ईवीएम का फायदा नहीं होता हो तो फर्जी मतदाताओं का लाभ भी ईवीएम के जरिये ही उठाया जाता होगा। वैसे यह अलग मुद्दा है लेकिन अनुराग ठाकुर के कथित खुलासों पर पवन खेड़ा ने जो कहा वह साबित करता है कि वोटर लिस्ट में अगर (सारे देश में भी) गड़बड़ी है तो चुनाव आयोग जिम्मेदार है और उससे फायदे की बात है तो कांग्रेस की जीत वाले जो उदाहरण दिये गये उनमें कम से कम दो (वायनाड और रायबरेली) में हर जीत का अंतर इतना ज्यादा था कि कांग्रेस ने फर्जी वोटों का उपयोग किया भी हो तो चुनाव नतीजे नहीं बदलेंगे और राहुल गांधी ने महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का जो उदाहरण दिया है उससे साबित होता है कि एक विधानसभा क्षेत्र के फर्जी वोटों से लोकसभा चुनाव जीते गए हैं और राहुल गांधी ने कहा है कि उन्हें बाकी क्षेत्रों की मशीन से पढ़ने योग्य मतदाता सूची दे दी गई तो वे साबित कर देंगे कि भाजपा को बहुमत (की 25 सीटें) चोरी के वोटों से मिली हैं। राहुल गांधी ने कहा था कि एक विधानसभा क्षेत्र के विवरण को जांचने में उन्हें छह महीने लगे लेकिन अनुराग ठाकुर ने कई लोकसभा क्षेत्रों के आंकड़े बहुत कम समय में पेश कर दिये। इससे साफ है कि उनके पास आवश्यक विवरण है या उन्हें मुहैया कराया गया था। चुनाव आयोग के काम-काज और इसके ताल मेल में प्रधानमंत्री के भाषण के बाद आज इसका खुलासा तो छोड़िये अखबारों ने उनका प्रचार ही किया है। इसमें जीएसटी दरों में कमी और दीवाली पर उपहार का प्रचार शामिल है।
भाजपा सरकार ईद, गुरपरब या क्रिसमस पर उपहार देगी या उसे इसकी जरूरत लगेगी कि नहीं, अभी कहना मुश्किल है। ऐसे में आपको याद दिला दूं कि राहुल गांधी की मांग या विरोध के बावजूद मेडीक्लेम (स्वास्थ्य/मेडिकल इंश्योरेंस) प्रीमियम पर लागू जीएसटी की दर अब भी आज की सूचना के अनुसार अधिकत्तम घोषित 12 प्रतिशत के मुकाबले डेढ़ गुणा 18 प्रतिशत है। जीएसटी लागू होने से पहले यह दर 15 प्रतिशत (14% बेस सेवा कर + 0.5% स्वच्छ भारत सेस + 0.5% कृषि कल्याण सेस) ही थी। राहुल गांधी के इसे प्रकाश में लाने के बाद सरकार परेशान तो लगी थी लेकिन टैक्स दर जैसा पहले था, अभी भी है। खबरों के अनुसार, राहुल गांधी ने अगस्त 2024 में, स्वास्थ्य और जीवन बीमा प्रीमियम पर लगे 18% जीएसटी पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी और इसे हटाने की मांग की गई थी। उन्होंने कहा था, “जीवन में आने वाले ‘स्वास्थ्य संकट’ में किसी के आगे झुकना ना पड़े… मोदी सरकार ने ₹24 हज़ार करोड़ जीएसटी वसूले।” केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने तब वित्त मंत्री को पत्र लिखकर (मेडीक्लेम से) जीएसटी हटाने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि यह “जीवन की अनिश्चितताओं पर टैक्स लगाने” जैसा है। दिसंबर 2024 में जीएसटी कौंसिल की 55वीं बैठक में इस मुद्दे पर निर्णय टाल दिया गया था और मंत्रियों के एक समूह को रिपोर्ट तैयार करनी थी। इस समूह का सुझाव था कि पांच लाख लाख तक के कवर वाले नॉन-सीनियर सिटिजन पॉलिसी पर जीएसटी में छूट दी जाये और सीनियर सिटीज़न तथा टर्म लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों के लिए जीएसटी में कमी या छूट दी जाये। अब स्लैब कम करने की घोषणा से यह वैसे भी 18 से 12 प्रतिशत हो ही जायेगा पर साफ है कि निर्णय ज्यादा बड़े वर्ग को प्रभावित करने वाला है और इसीलिये अभी लिया गया है।
इसके बावजूद आज के अखबारों के शीर्षक में सिर्फ द टेलीग्राफ का शीर्षक आलोचनात्मक या प्रचारकों की लीक से थोड़ा अलग है। आज लीड का फ्लैग शीर्षक है, मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में डेमोग्राफी, रक्षा, देसी सामान और जीएसटी सुधार। आगे हम देखेंगे कि इस मामूली सूचना को अखबारों ने कैसे भाजपा के प्रचार के रूप में पेश किया है। टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, लाल किले की प्राचीर से आरएसएस की प्रशंसा गूंजी। आरएसएस जो है जो है उसके बारे में कुछ बताने की जरूरत नहीं है लेकिन मार्गदर्शक मंडल में जाने की उम्र होन पर इसकी प्रशंसा अपने आप में मुद्दा तो है। इसलिये इसकी चर्चा भी है। आगे बताउंगा कि किस अखबार ने यह चर्चा कैसे की है। प्रधानमंत्री के भाषण से संबंधित लाल किले से द टेलीग्राफ की दूसरी खबर का शीर्षक है, प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले आयोजन से अलग रही कांग्रेस की जोड़ी। खबर के अनुसार, संसद के दोनों सदनों के विपक्ष के नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह से अलग रहे। इससे भाजपा राहुल गांधी को पाकिस्तान प्रेमी कहने के लिए प्रेरित हुई। हालांकि, सोशल मीडिया पर यह चर्चा रही कि गये साल राहुल गांधी को इस समारोह में बैठने के लिए पीछे की सीट दी गई थी। टेलीग्राफ के अनुसार भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने एक्स पर लिखा था, यह एक राष्ट्रीय आयोजन था पर दुख की बात है कि पाकिस्तान प्रेमी राहुल गांधी ने मोदी विरोध में देश और सेना का विरोध किया।
नवोदय टाइम्स ने भाषण के कई अंशों को शीर्षक बनाया है। जीएसटी की दो ही दर होगी, सबसे ऊपर है। इसमें बताया गया है कि विलासिता वाली सेवा व वस्तुओं पर 40 प्रतिशत की विशेष दर लागू होगी। खबर के अनुसार नुकसानदेह वस्तुओं जैसे सिगरेट, पान मसाला आदि पर भी यही दर रखी जायेगी। तंबाकू उत्पादों का विरोध करने वाले तमाम गैर सरकारी संगठन इसकी मांग कर रहे थे और उनका कहना था कि जीएसटी से इन उत्पादों पर कर घट गया है जबकि ऐसे उत्पादों पर टैक्स ज्यादा होनी चाहिये। टैक्स बढ़ाने की यह मांग भी अब सुनी गई है। खबर के अनुसार, ऑनलाइन गेमिंग को भी नुकसानदेह माना गया है। खबर के साथ छपी फोटो में नरेन्द्र मोदी को, किसानों पशुपालकों, मछुआरों के हितों की रक्षा के लिए दीवार की तरह खड़ा बताया गया है। मुझे किसानों को दिल्ली पहुंचने से रोकने के लिए की गई ज्यादती, मनमानी और सरकारी पैसों की बर्बादी की याद आई। यह भी कि किसान आंदोलन खत्म करने के लिए नरेन्द्र मोदी ने बिना मांग और बिना सलाह बनाये गये अपने किसान कानून वापस ले लिये थे। 19 नवम्बर 2021 को जब तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की गई थी, तब उन्होंने कहा था:”शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रही होगी, जिस वजह से दीये के प्रकाश जैसा सत्य कुछ किसान भाइयों को हम समझा नहीं पाए।“ अब जब वे किसानों की रक्षा के लिए दीवार की तरह खड़े होने का दावा कर रहे हैं तो इसका प्रचार करने की जगह मीडिया (रिपोर्टर और संपादक) का काम था कि उन्हें और पाठकों को यह याद दिलाया जाता कि तब उन्होंने यह आश्वासन भी दिया था कि सरकार किसानों के कल्याण के लिए अपने प्रयास जारी रखेगी।
नवंबर 2021 में नरेन्द्र मोदी ने किसानों से कहा था, “मैं आज देशवासियों से क्षमा मांगते हुए, सच्चे मन से और पवित्र हृदय से कहना चाहता हूं कि हम तीनों कृषि कानूनों को वापस ले रहे हैं।“ उन्होंने यह भी कहा कि सरकार किसानों की भलाई के लिए आगे भी काम करती रहेगी तथा एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) को और अधिक प्रभावी एवं पारदर्शी बनाने के लिए समिति बनाई जायेगी। इसमें किसानों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, और अर्थशास्त्री आदि शामिल किये जाने थे। बाद में सरकार ने एक एमएसपी समिति बनाई लेकिन कई प्रमुख किसान संगठनों ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि समिति पक्षपातपूर्ण है। आंदोलन खत्म कराने के लिए आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों को वापस लिया जाना था। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों पर मुकदमे दर्ज हुए थे। इस दिशा में कुछ राज्यों में मामूली प्रगति हुई, लेकिन अभी भी बहुत से मामलों की वापसी बाकी है। किसानों की मुख्य मांग एमएसपी को कानूनी गारंटी देना यानी कानूनन अनिवार्य बनाना। अभी तक इस पर कोई ठोस क़ानून नहीं आया है। मोदी सरकार ने इस पर फिर से चर्चा करने की कोई गंभीर सार्वजनिक पहल नहीं की है। किसानों का आंदोलन खत्म होने के बाद एमएसपी या किसानों की समस्याओं पर नरेन्द्र मोदी ने कोई बड़ा सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। न के बराबर चर्चा की है। सरकार ने आंदोलन के मुद्दों को धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से हटाने की रणनीति अपनाई है। केंद्र सरकार की ओर से शहीद किसानों के लिए कोई विशेष योजना या मुआवज़ा भी घोषित नहीं किया गया है।
इस बार नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से घुसपैठियों का मामला भी उठाया है। नवोदय टाइम्स में शीर्षक है – मोदी ने कहा, रोजी रोटी छीन रहे हैं घुसपैठिये। दुनिया जानती है कि मई 2014 से उनकी सरकार है और इस दौरान जो काम उन्होंने किये हैं उसकी प्राथमिकता भी उन्होंने ही तय की है और घुसपैठियों की समस्या पर वे चुनाव दर चुनाव बोलते रहे हैं। जाहिर है, ‘समस्या’ उनकी जानकारी में है। इसे दूर करना उनकी प्राथमिकता नहीं रही और अब अगर यह बड़ी हो गई है तो इसे महत्व देने से भले उन्हें राजनीतिक लाभ मिले पर बच्चा-बच्चा जानता है कि यह समस्या अगर है तो इसके लिए वे और उनकी सरकार ही जिम्मेदार है। जो भी हो, मेरी राय में डेमोग्राफी बदलने की साजिश का प्रचार नरेन्द्र मोदी की रणनीति की बुनियाद है। इसके साथ उन्हें मतदाता सूची में फर्जी नामों के आरोप और साजिश पर भी बोलना चाहिये था। चुप्पी साधने से बात नहीं बनेगी। तथ्य है कि राहुल गांधी के बाद अनुराग ठाकुर ने वही आरोप लगाये हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने उनसे शपथ पत्र नहीं मांगा है और न ही बदनाम करने का आरोप लगाया है। देश के माफी मांगने की जरूरत भी उन्हें नहीं है। इससे यह साफ हो जाता है कि अनुराग ठाकुर (की पार्टी) और चुनाव आयोग में मिलीभगत है। इसलिए, अब यह साफ हो चला है कि घुसपैठिया (या डेमग्राफी बदलने की साजिश, चाहे जिसकी हो) नोटबंदी का काला धन हैं। काला धन खत्म करने के लिए नोटबंदी की गई जनता को कोई फायदा नहीं हुआ। किसे हुआ, सबको पता है। काला धन नहीं मिला। इसी तरह घुसपैठिये नहीं मिलेंगे, एसआईआर होता रहेगा। जिसे फायदा मिलना है, मिल जायेगा।
सरकार ने ना नोटबंदी की जवाबदेही ली ना घुसपैठियों की लेगी। ‘राम को लाये हैं’ के के प्रचार के बाद नॉन बायोलॉजिकल होने का विश्वास (या अहसास) राजा दशरथ बनने की कोशिश थी पर वह नहीं चला, ऑपरेशन सिन्दूर से बात नहीं बनी, एसआईआर उलझ गया तो नया मुद्दा घुसैठियों की समस्या है। मौजूदगी का विस्तार है जिसपर काम नहीं हुआ है। इसीलिये आज यह कई अखबारों में लीड है। द हिन्दू का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भरता की बात की, डेमोग्राफिक साजिश को रेखांकित किया। उपशीर्षक के अनुसार, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान भारत निर्मित हथियारों की सफलता पर रोशनी डाली। दि एशियन एज में सात कॉलम की लीड है। ऑरेशन सिन्दूर लिखे दीवार के आगे प्रधानमंत्री की फोटो है और शीर्षक है, लाल किले से प्रधानमंत्री ने नये भारत का प्रचार किया। वे इंडिया समूह को इंडी गठबंधन कहते हैं और जब समूह ने अपना नाम इंडिया रख लिया तो नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इंडिया को भारत कर दिया था। और यह सब मीडिया के सहयोग या आंखें मूंदे रहने से ही हो पा रहा है। दि एशियन एज ने आरएसएस की प्रशंसा की खबर का तीन कॉलम में छापा है। शीर्षक है, गौरवशाली सौ वर्ष मोदी ने राष्ट्र निर्माण में आरएसएस की भूमिका की प्रशंसा की। यह इस तथ्य के बावजूद है कि आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। यह प्रतिबंध भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आरएसएस पर 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद पहली बार प्रतिबंध लगा था। महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने की थी, जो पहले आरएसएस का सदस्य था (हालाँकि संगठन का कहना है कि हत्या के समय वह सदस्य नहीं था)। आरएसएस पर प्रतिबंध देश के गुजराती गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने लगाया था। दूसरी बार 1975 में आपातकाल के दौरान लगा था। आरएसएस को सरकार विरोधी गतिविधियों और विपक्षी आंदोलन (जिसमें जेपी आंदोलन शामिल था) में भाग लेने के कारण प्रतिबंधित किया गया था। तब संघ को गैर-कानूनी संगठन घोषित किया गया था और हजारों स्वयंसेवकों को गिरफ्तार किया गया था। तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगा था। आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और शिवसेना को इस विध्वंस का ज़िम्मेदार बताया गया था। अब प्रधानमंत्री के अनुसार, आरएसएस भारत के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है, जिसकी हजारों शाखाएं देशभर में हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में यह कहा जाता रहा है और यह सार्वजनिक डोमेन में है कि यह एक “गैर-पंजीकृत सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन” है। यानी यह किसी ट्रस्ट, सोसाइटी या कंपनी एक्ट के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इसलिए इसका कोई स्वतंत्र कानूनी अस्तित्व नहीं है जैसा किसी एनजीओ (गैर सरकारी संगठन – अभी इसे गैर सरकारी भी कैसे कहा जाये) या कंपनियों का होता है। इसका नतीजा है कि आरएसएस के नाम से कोई संपत्ति नहीं हो सकती है। कोई बैंक खाता नहीं खुल सकता है (क्योंकि पैन से लेकर पता और पंजीकरण तक के दस्तावेज चाहिये होंगे)। इसके बावजूद देश में आरएसएस है, उसके 100 साल होने वाले हैं और प्रधानमंत्री उसकी तारीफ कर रहे हैं तो इसलिये कि यह खुद को एक विचारधारा-आधारित आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करता है जो मुख्य रूप से इंदिरा गांधी और कांग्रेस का विरोध करता रहा है। इसीलिये जयप्रकाश नारायण का साथ दिया था। भारत विकास परिषद, सेवा भारती, राष्ट्रीय सेवा भारती, विवेकानंद केंद्र, विद्या भारती, आदि इसकी सहयोगी संस्थाएँ हैं जो पंजीकृत होती हैं। इनका अपना बैंक खाता, ऑडिट, रिटर्न फाइल करना आदि होता है। भाजपा और अन्य राजनीतिक संगठनों से यह औपचारिक दूरी रखने का दावा करता है और कहता है कि वह राजनीतिक नहीं है, लेकिन भाजपा समेत कई संगठनों को वैचारिक मार्गदर्शन देता है। इसकी चर्चा आप पढ़ते रहे हैं। भारत में संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रत्येक व्यक्ति या समूह को संगठन बनाने और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का अधिकार है। इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी की सरकार ने लाखों शेल कंपनियां बंद कराई है और बाद में कह दिया कि शेल कंपनियों की परिभाषा ही तय नहीं है। दूसरी ओर, कुछ शेल कंपनियों को चलने देने की भी शिकायत है। पर वह अलग मामला है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रधानमंत्री का भाषण लीड है। शीर्षक के अनुसार, प्रधानमंत्री ने अगली पीढ़ी के जीएसटी सुधार और दैनिक उपयोग की चीजें सस्ती करने का दावा किया है। सबसे बड़े एनजीओ के रूप में आरएसएस की प्रशंसा की खबर सिंगल कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में जीएसटी सुधार की खबर अलग है और स्वतंत्रता दिवस के भाषण की खबर लीड है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर दृष्टि तैयार की, सिन्दूर से सुदर्शन चक्र तक। यह खबर इस तरह शुरू होती है, आत्मनिर्भरता, विकसित भारत की नींव है और विदेशी शक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता इसकी स्वतंत्रता को धूमिल कर सकती है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को कहा। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा को बढ़ाना, 2047 में स्वतंत्रता की शताब्दी तक एक समृद्ध देश बनाने का एक मुख्य मिशन है। आपको याद होगा कि 70 साल कुछ नहीं हुआ कहने वाले प्रधानमंत्री 50 दिन में सपनों का भारत, 100 दिन में विदेश में रखा काला धन लाने का दावा करते थे। अब 100 साल के भारत की बात करने लगे हैं। उससे पहवले 11 साल सत्ता में रहते हुए घुसपैठ की समस्या पर ध्यान ही नहीं दिया इसकी याद 11 वें साल तब आई जब बैसाखी पार्टी की बैठकें इधर-उधर होने लगीं।
कल के भाषण में इंडिया@2047 का भी जिक्र है। कहानी यह है कि इसी नाम की एक किताब, इंडिया@2047 : कल की आर्थिक महाशक्ति की कल्पना की दो लाख प्रतियाँ खरीदने (और मुफ्त में बांटने) का निर्णय, सरकारी, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने लिया था। इसकी लागत लगभग ₹7.25 करोड़ बताई गई थी। कांग्रेस ने इस खर्च के वित्तीय विवेक और पारदर्शिता को लेकर प्रश्न उठाए थे। पता नहीं किताब खरीदने और बांटने की योजना किसकी थी और किसलिये पर सरकार (नरेन्द्र मोदी) ने अगर इसका (इंडिया @ 2047) का प्रचार अब किया है तो संबंध जुड़ता है। इस पुस्तक के लेखक प्रोफेसर कृष्णमूर्ति वी सुब्रमण्यम (आमतौर पर केवी सुब्रमण्यम या सुब्बू के नाम से संदर्भित) हैं। यह पुस्तक 2047 में भारत को $55 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की संभावनाओं और रणनीतियों पर केंद्रित है। इसमें 8% वार्षिक वृद्धि दर और चार प्रमुख स्तंभों के माध्यम से देश की आर्थिक प्रगति की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। लेखक भारत के 17वें मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे हैं तो नरेन्द्र मोदी की ही तरह सोचते होंगे पर वह मुद्दा नहीं है। मामला चर्चा में ऑपरेशन सिन्दूर के समय आया जब भारत चाहता था कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) पाकिस्तान को आर्थिक सहायता न दे। खबरों से ऐसा लगा कि पाकिस्तान को आर्थिक सहायता मिल गई तो भारत ने आईएमएफ से अपने प्रतिनिधि को हटा दिया। कारण चाहे जो हो हटाये जाने का समय महत्वपूर्ण रहा। खबरों के अनुसार, तीन साल के लिए नियुक्त प्रोफेसर कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम को कार्यकाल समाप्त होने से लगभग छह महीने पहले पद से हटा दिया गया। नियुक्ति की समीक्षा करते हुए, संबंधित समिति ने 30 अप्रैल 2025 से तत्काल प्रभाव से उनकी सेवा समाप्त करने का आदेश दिया था। यह आदेश तीन वर्ष के उनके कार्यकाल की समाप्ति से लगभग छह महीने पहले आया था। तब आईएमएफ ने स्पष्ट किया था कि नियुक्ति या समाप्ति का निर्णय उनके संबंधित सदस्य देशों द्वारा लिया जाता है और इस मामले में निर्णय भारत सरकार का था। दिलचस्प यह भी है कि सरकार या संबंधित विभाग से आधिकारिक तौर पर कोई कारण घोषित नहीं किया गया। असल में प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें “आकादमिक प्रतिभा, आर्थिक और नीति मामलों में अनूठा दृष्टिकोण और सुधारवादी उत्साह” के लिए विशिष्ट मान्यता दी थी।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


