संजय कुमार सिंह-
आरटीआई कानून देने वाले ‘भ्रष्ट’ थे अब ‘ईमानदारी’ जारी है…
लंदन में प्रधानमंत्री से मिलकर भावुक हुई इस महिला के हाथ में पासपोर्ट बताता है कि ये लंदन की आम निवासी नहीं हैं। फिर भी मिलने आई होंगी – कोई खास बात नहीं है। पर इस वीडियो और तस्वीर का पार्टी ने जितना उपयोग किया है उससे सवाल उठता है कि उनकी यात्रा का खर्च कौन उठा रहा है – भारतीय जनता पार्टी, भारत सरकार या स्वयं वे या उनका परिवार।
प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी ने पत्रकारों को साथ ले जाना बंद कर दिया है। भक्तों ने यह प्रचार किया कि उन्हें पत्रकारों की जरूरत नहीं है। पर मामला उनकी जरूरत का था ही नहीं, मामला तो खबरों का था और बाद में खबर आई कि उनके साथ विदेश यात्रा पर उनके मित्र जाते रहे हैं। पत्रकारों को नहीं ले जाने का कारण कोई माने या न माने – स्पष्ट था बाद में सार्वजनिक भी हो गया।
नरेन्द्र मोदी ने एक और नामुमकिन को मुमकिन किया है – विदेशों में अपनी लोकप्रियता प्रचारित करने का। इसमें कुछ गलत नहीं है। किसी ने एतराज भी नहीं किया और रोक तो नहीं ही लगी। बाद में खबर आई कि ये लोग बुलाये जाते हैं और उस पर भारत सरकार का अच्छा-खासा खर्च होता है। प्रधानमंत्री के लिए वह भी सही हो सकता है। उससे भी कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन इस फोटो से यह सवाल उठता है कि भारत से भी लोगों को बुलाया जाता है क्या?
ऑपरेशन सिन्दूर के पक्ष प्रचार के लिए जिस ढंग से सासंदों को विदेश घूमने भेजा गया वह भी गौरतलब है। प्रधानसेवक के नेतृत्व वाली यह सरकार जवाब तो नहीं ही देती है मन की बात ही करती है और अपने प्रचार में देश का पैसा लुटाती है। विरोध कोई क्या करे जब शशि थरूर जैसे लोग मौका लपकने से नहीं चूकते। मौके पर गुलदस्ता (या पासपोर्ट) लेकर पहुंचना नहीं भूलते। कुल मिलाकर जो हो रहा है वह आम नागरिकों के कारण ही हो पा रहा है।
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि आम नागरिक (या बहुमत) यही चाहता है कि उसका (कहने के लिए हिन्दुत्व का) भला होता रहे, प्रचार मिलता रहे, प्रधानमंत्री को छू लेने का सपना पूरा हो जाये। खास बात यह भी है कि ऐसा प्रधानमंत्री के समर्थन में नहीं कांग्रेस के विरोध के कारण है और कांग्रेस का विरोध भी इमरजेंसी जैसे मुद्दे से किया जा रहा है और आप चाहें तो हिसाब लगा लीजिये कि 2014 के बाद पद्म पुरस्कार पाने वाले कितने लोगों ने इमरजेंसी पर किताबें लिखी है।


