हरीश पाठक-
मशहूर फिल्म पत्रकार प्रमिला का निधन। एक दौर में देश की नामचीन फिल्म पत्रकार प्रमिला (मूल नाम:प्रमिला तिवारी) जो बाद में प्रमिला कालरा के नाम से भी जानी गयीं का आज दोपहर ग्वालियर के जयारोग्य चिकित्सालय (जे ए हॉस्पिटल) में निधन हो गया। वे 74 साल की थीं।
पिछले दो दिन पहले उनकी तबीयत बिगड़ने पर “स्वर्ग सदन”(एनजीओ) ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया था। दो महीने से वे “स्वर्ग सदन” में रह रहीं थीं।
ग्वालियर के एमएलबी कॉलेज (विक्टोरिया कॉलेज) से पढ़ी प्रमिला तिवारी बाद में मुंबई आ गईं। अपने तेजतर्रार तेवरों, खोजी पत्रकारिता, दबंग व्यवहार और रुचिकर भाषा, शैली के कारण वे फिल्मी दुनिया में खासी लोकप्रिय थीं। उनकी कई खबरों पर बहस भी हुई, विवाद भी। उनके इसी अंदाज के कारण उन्हें हिदी पत्रकारिता की देवयानी चोवल भी कहा जाता था।
माधुरी, हिंदी फिल्मफेयर, धर्मयुग, जनसत्ता व हिंदी स्क्रीन की वे नियमित और लोकप्रिय लेखिका थीं। कुछ दिनों वे टी सीरीज से भी जुड़ी रहीं।
आज शाम ग्वालियर के लक्ष्मीगंज श्मशान में उनके भाई दिनेश ने उनका अंतिम संस्कार किया। एक बेहतरीन और हर दिल अजीज फिल्म पत्रकार को अरसे तक याद रखेगा हिंदी समाज।
राकेश अचल-
श्रद्धांजलि… गुजरे जमाने की मशहूर फिल्म पत्रकार प्रमिला की गुमनाम मौत
आज से कोई चार पांच दशक पहले देश की नामचीन फिल्म पत्रकार प्रमिला कालरा की मौत बेहद गुमननाम रही. कालरा बनने से पहले वे प्रमिला तिवारी थी. कल दोपहर ग्वालियर के जयारोग्य चिकित्सालय में प्रमिला ने 74 साल की उम्र में जब अंतिम सांस ली तब उनके पास अपना कोई नहीं था. सिवाय स्वयंसेवी संस्था स्वर्ग सदन के कार्यकर्ताओं के.
प्रमिला मुंबई से लौटकर अपने बहन -बहनोई के साथ रहती थीं. दोनों का बारी-बारी से निधन हुआ तो प्रमिला एकदम अकेली रह गई. भाई -भतीजों से प्रमिला के तर्के ताल्लुकात पहले ही हो चुके थे. हारकर प्रमिला जिंदगी के आखरी दिन बिताने स्वर्ग सदन जा पहुंची. दो दिन पहले उनकी तबीयत बिगड़ने पर “स्वर्ग सदन”(एनजीओ) ने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया था.
उन दिनों जब मेरी गजलें और क्षणिकाएं माधुरी, में छपती थीं तब प्रमिला जी के आलेख, साक्षात्कार भी खूब छपते थे. लेकिन ग्वालियर लौटकर वे जैसे अपने अतीत को मुंबई ही छोड़ आई.
प्रमिला जी अपनी बहन शीला और बहनोई एच आर तिवारी के साथ एक गुमनाम जिंदगी जीती रहीं. अफसोस कि हम खबरनवीसों को भी उनके ग्वालियर में होने का पता नहीं चला. बीती शाम ग्वालियर के लक्ष्मीगंज श्मशान में उनके भाई दिनेश ने उनका अंतिम संस्कार किया। एक विशेष शैली के लिए जानी जाने वाली प्रमिला को न मुंबई ने याद रखा न ग्वालियर में. वे अपने सीने पर कितना बोझ लेकर विदा हुई इसकी कल्पना भर की जा सकती है. हमारी अग्रज पीढ़ी की विदुषी फिल्म पत्रकार प्रमिला जी को विनम्र श्रद्धांजलि. हम सब आपके अपराधी हैं. हमें माफ कर देना.
रईश अहमद लाली-
कभी फिल्म पत्रकारिता की तेज़तम आवाज़ रही प्रमिला कालरा आज इतनी खामोशी से दुनिया छोड़ गईं कि उनकी विदाई की आहट भी किसी ने नहीं सुनी। ग्वालियर के जयारोग्य अस्पताल में 74 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली तो उनके आसपास कोई अपना नहीं था—सिर्फ़ स्वर्ग सदन एनजीओ के कुछ कार्यकर्ता, जिनसे उनका खून का रिश्ता नहीं था, लेकिन वही उनकी आखिरी सांस तक साथ खड़े रहे। यह सोचकर ही सीना भारी हो जाता है कि जिस महिला ने कभी पूरे बॉलीवुड की धड़कनों को अपनी कलम से दिशा दी, वह अंत में ऐसी गहरी तन्हाई में चली गई कि खबरनवीसों की दुनिया को भी पता न चल सका कि वह शहर में थीं।

प्रमिला तिवारी से प्रमिला कालरा बनीं इस महिला ने कभी मुंबई की पत्रकारिता में तूफान मचा रखा था। उनके सवाल चुभते थे, उनके लेख हलचल मचाते थे, उनकी रिपोर्टिंग से सितारे काँपते थे और उनका बेख़ौफ़ तेवर उन्हें हिंदी पत्रकारिता की देवयानी चौबल कहे जाने लायक बना देता था। माधुरी, धर्मयुग, जनसत्ता, फिल्मफेयर, हिंदी स्क्रीन—हर बड़े मंच पर उनकी कलम की चमक साफ़ दिखाई देती थी। वे वो दौर थीं जब उनका हर साक्षात्कार एक इवेंट माना जाता था। टी-सीरीज़ में भी कुछ समय उन्होंने काम किया और जिस मुंबई को उन्होंने अपनी जवानी, अपना टैलेंट और अपनी ज़िंदगी दी, वही मुंबई धीरे-धीरे उनसे दूर होती गई।
बहन और बहनोई के साथ ग्वालियर लौट आईं प्रमिला जी जैसे अपने अतीत की पूरी चकाचौंध मुंबई में ही छोड़ आईं। जब बहन-बहनोई दोनों गुजर गए, तो वे एकदम अकेली रह गईं। भाई-भतीजों से पुराने विवाद पहले ही थे, इसलिए उनके जीवन में कोई ऐसा नहीं बचा जो उनके दरवाज़े पर दस्तक दे। अंततः उन्होंने खुद को स्वर्ग सदन जैसे आश्रय स्थल में पहुँचा दिया—शायद यह उनकी जिंदगी का सबसे सन्नाटा भर दिया फैसला था। दो दिन पहले तबीयत बिगड़ी, एनजीओ उन्हें अस्पताल ले गई, लेकिन वक्त उनका दामन छोड़ चुका था।
बीती शाम ग्वालियर के लक्ष्मीगंज श्मशान में उनके भाई दिनेश ने उनका अंतिम संस्कार किया—चुपचाप, बिना भीड़, बिना शोर, बिना उन लोगों के जो कभी उनके शब्दों के कर्ज़दार रहे। न मुंबई ने उन्हें याद किया, न ग्वालियर ने उन्हें पहचाना। जैसे वे अपने सीने में अपने पूरे जीवन का बोझ समेटे चली गईं और हम सब उन्हें सिर्फ़ तब याद कर पाए जब उन्होंने दुनिया छोड़ दी।
यह कहानी नहीं, एक दर्द है। एक ऐसा दर्द जो हर उस इंसान को झकझोर देता है जिसने कभी पत्रकारिता में ईमानदारी, जज़्बे और जुनून का मतलब समझा हो। प्रमिला जी की यह विदाई एक सवाल छोड़ जाती है—क्या वक़्त के आगे हर चमक मिट ही जाती है? क्या मजबूत और प्रतिभाशाली औरतों की कहानी का अंजाम हमेशा इतनी खामोश तन्हाई में लिखा जाता है?
प्रमिला जी, हम सबके भीतर अपराधबोध छोड़कर आप चली गईं। आपकी कलम, आपका हौसला, आपकी बेबाकी अमर है। आपकी मौत गुमनाम रही, लेकिन आपका जीवन कभी गुमनाम नहीं था। आपकी आत्मा जहाँ भी हो, वहाँ रोशनी हो। और अगर हमसे कोई गलती हुई हो, कोई उपेक्षा, कोई भूल—हमें माफ कर दीजिए। आपके जाने का दुख आज हर उस दिल में उतर रहा है जो पत्रकारिता की सच्ची कीमत जानता है। विनम्र श्रद्धांजलि।


