
विवेक शुक्ला-
अगर मेरी याददाशत मेरे साथ धोखा नहीं कर रही है तो कह सकता हूं कि 10 दरियागंज के टाइम्स हाउस को पहली बार 1975 या 1976 में देखा था। उसके पास ही पापा जी के मित्र जयदेव त्रिवेदी अंकल जी की बड़ी सी हवेली थी। उसी में शशि कपूर की पहली फिल्म ‘हाउस होल्डर’ की सारी शूटिंग हुई थी। ये दोनों दरियागंज के खास लैंडमार्क हैं। इनके दोनों के ही करीब एक और लैंडमार्क है, जिसका आगे जिक्र करूंगा।
आज नवभारत टाइम्स के साथी प्रणव प्रियदर्शी की बिलकुल हाल में प्रकाशित किताब ‘चौराहों पर चौराहे’ को पढ़ने लगा तो ‘दरियागंज का वह दरिया’ और ‘लौट के बुद्ध घर को आए’, ‘महामारी की कैद’ चैप्टर सबसे पहले पढ़ गया। प्रणव प्रियदर्शी ने 10 दरियागंज के टाइम्स हाउस में ही पत्रकारिता की ट्रेनिंग ली थी। समय था 1990-91 का। दिग्गज पत्रकार बाल मुकुंद की सरपरस्ती में अपनी गहन ट्रेनिंग के साथ-साथ उस दौर की सबसे बड़ी खबर मंडल कमीशन की सिफारिशों से पैदा हुए हालत पर प्रणव प्रियदर्शी लगातार लिख-पढ़ रहे थे। देश के करोड़ों लोगों की तरह यह मुद्धा उन्हें भी बहुत-कुछ सोचने समझने के लिए मजबूर कर रहा था।
तब नवभारत टाइम्स के एडिट पेज पर मंडल की सिफारिशों के पक्ष और विपक्ष में लगातार लेख छप रहे थे। मुझे याद है तब मेरिट के हक में बहुत बातें हो रही थीं। हालांकि मेरिट के हक में बोलने वाले भूल रहे थे कि दिल्ली के सेंट कोलम्बस स्कूल और झारखंड के किसी सुदूर क्षेत्र में चलने वाले स्कूल के स्टुडेंट की मेरिट एक जैसी कैसे हो सकती है। तब मंडल की सिफारिशों पर छपे एक लेख में मेरिट की चर्चा हुई थी। प्रणव प्रियदर्शी को उस लेख को पढ़ने के बाद लगा- … आरक्षण के औचित्य लेकर मुझे अपने विचारों पर और अधिक सोचने की जरूरत है।
प्रणव प्रियदर्शी टाइम्स हाउस से ट्रेनिंग के बाद मई, 1991 में अपने शहर पटना लौट गए। वहां नवभारत टाइम्स में इंटर्नशिप शुरू कर दी। तब तक लोकसभा चुनाव की घोषणा शुरू हो चुकी थी। नवभारत टाइम्स में आलोक मेहता संपादक थे। संयोग से मुझे अपने मीडिया के करियर के दौरान पहली प्रमोशन उन्होंने ही दी थी। नवभारत टाइम्स किस तरह से लोकसभा चुनाव को कवर कर रहा था। वहां के माहौल को बखूबी बयां किया है प्रणव जी ने। तब उर्मिलेश, किरण शाहीन, नीलाभ जैसे बेहतरीन पत्रकार नवभारत टाइम्स में काम कर रहे थे। प्रणव प्रियदर्शी भी चुनाव पेजों के लिए दिन-रात काम कर रहे थे। उनके काम को पसंद किया जा रहा था। पर फिर अचानक से एक दिन एक घटना ने उनका दिल तोड़ दिया।
क्या थी वह घटना? इसे जानने के लिए आप भी इस शानदार किताब को पढ़िए। ये बीते तीन-साढ़े तीन दशकों की भारतीय पत्रकारिता और बदलते भारत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसे New World Publication ने छापा है। प्रणव प्रियदर्शी नवभारत टाइम्स में सीनियर एडिटर हैं और पूरी दुनिया उनकी मुट्ठी में रहती है। खूब पढ़ने लिखने वाले पत्रकार हैं। उनकी किताब को पढ़ा जाना चाहिए।
अंत में एक बात और। मैंने ऊपर दरियागंज के तीसरे लैंडमार्क का जिक्र किया था। तीसरा लैंडमार्क है क्रिसेंट स्कूल। इसे दिल्ली की पंजाबी मुसलमान बिरादरी चलाती है। मुझे फख्र है कि मैं हिन्दू होते हुए भी इस स्कूल की मैनेजमेंट में कई सालों तक रहा।
प्रणव प्रियदर्शी-
विवेक शुक्ला जब कुछ कहते या लिखते हैं तो उसके गहरे मायने होते हैं। दिल्ली की नब्ज पर तो उनका हाथ रहता ही है, चाहे विभाजन से जुड़ा मसला हो या पाकिस्तान में जड़ें रखने वाले हिंदुस्तानियों का या फिर हिंदुस्तान में पुरखों के गांवों की स्मृति मन में बसाए बैठे पाकिस्तानियों का, विवेक भाई की लेखनी जिस खूबसूरती से इसके अलग-अलग पहलुओं को बयां करती है, कोई और नहीं कर सकता। ऐसे में विवेक शुक्ला की कलम से अपनी पुस्तक का इन शब्दों में वर्णन देखकर मन प्रफुल्लित हो गया। बहुत शुक्रिया विवेक भाई।
जो मित्र पुस्तक खरीदना चाहते हैं उनकी सहूलियत के लिए… पुस्तक अमेजन पर आ गई है और वहां से मंगवाई जा सकती है। अमेजन का लिंक कमेंट बॉक्स में है।
दोस्तों, एक अच्छी खबर है। मेरी पुस्तक ‘चौराहों पर चौराहे, एक पत्रकार की विचार यात्रा’ new world publication से छपकर आ गई है। जैसा कि नाम से जाहिर है, यह मूलत: मेरी विचार यात्रा है। किन हालात में मेरे विचार बने और कब किन परिस्थितियों और कैसी मन:स्थिति में किन तर्कों से उनमें किस तरह के बदलाव आए, यही इसका मूल कथ्य है।
इस क्रम में यह पटना में मेरे पारिवारिक माहौल का संक्षिप्त ब्यौरा देती है, फिर 90-91 की दिल्ली में पत्रकारिता के प्रशिक्षण के दौरान मिले अनुभव, मंडल कमिशन के संदर्भ में चली बहसों के प्रभावों को दर्ज करते हुए मुंबई पहुंचती है जहां तब की शिवसेना के क्रिया-कलापों और बाबरी विध्वंस के नतीजों का असर भी दिखाती है। इन सबसे मेरे विचार कैसे बदलते गए और फिर नागपुर ने उन पर कैसा प्रभाव डाला, यह भी बताती है। इस क्रम में पुस्तक दक्षिण से वाम तक की मेरी पूरी परिक्रमा को दर्ज करते हुए जहां मैं आज खड़ा हूं, उसके तर्कों से भी पाठकों को दो-चार कराती है।
हालांकि किताब लिखने का अपना तर्क होता है और पढ़ने का बिल्कुल अलग। सिर्फ इसलिए कि मैंने कोई किताब लिख दी, आपको उसे पढ़ना भी चाहिए यह दलील अगर चलती तो मैं भी अब तक पता नहीं कितनी किताबें पढ़ चुका होता लिहाजा, आपको ही तय करना होगा कि यह किताब आपके पढ़ने की शर्तों या कसौटियों को पूरा करती है या नहीं।
इतना जरूर है कि अगर आपको विगत तीन-चार दशकों में देश में चली वैचारिक उठा-पटक में थोड़ी भी दिलचस्पी है तो मुझे लगता है यह किताब आपको निराश नहीं करेगी।
बहरहाल, पढ़ने के बाद की आपकी टिप्पणी का मुझे बेसब्री से इंतजार रहेगा। किताब अमेजन पर आने वाली है, पर फिलहाल न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन से 918750688053 (मुकेश चंद जी) पर वाट्सऐप पर अपना पता भेजकर मंगवाई जा सकती है।



