Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

टीवी

मुखौटा अनुपम खेर, पुण्य प्रसून पर भड़का बाबा और नवीन कुमार की दहाड़ती स्क्रिप्ट

संजय सिन्हा-

पत्रकारिता की दुनिया से यादों की कहानी निकली है, तो यह भी सुन लीजिए। बदले समय की कहानी।

किसी फिल्म प्रमोशन के लिए अक्षय कुमार, अनुपम खेर और भूषण कुमार स्टुडियो आए थे। मैं शो का प्रोड्यूसर था। प्राइम टाइम एंकर पुण्य प्रसून वाजपेयी मुझे यूं ही ऑफिस में दिख गए थे तो मैंने उनसे अनुरोध किया कि आप इंटरव्यू ले लीजिएगा।

प्रसून फिल्मी इंटरव्यू में दिलचस्पी नहीं लेते थे, लेकिन कभी-कभी यूं ही कहने पर मना भी नहीं करते थे। क्योंकि वो गंभीर सवाल करते थे तो मुझे उनका लिया इंटरव्यू सामान्य फिल्मी प्रमोशनल इंटरव्यू से बेहतर लगता था।

इंटरव्यू से पहले अक्षय कुमार वॉशरूम चले गए और हम लोग अक्षय कुमार के वाश रूम से आने के इंतज़ार में स्टुडियो के बाहर खड़े थे। मैंने ही सभी से कहा, “आप लोग स्टूडियो में चलिए, वहां बैठिए।” इतने पर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा, “मेन चेहरे को आने दीजिए, जल्दी क्या है? ये तो मुखौटे हैं।”

अनुपम खेर ने यह बात सुन ली। मुझे नहीं पता भूषण कुमार ने सुना या नहीं, हालांकि वो भी वहीं खड़े थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। अनुपम खेर भड़क गए थे, “तो क्या हम लोग मुखौटा हैं?”

इतनी देर में अक्षय कुमार भी वॉशरूम से आ गए। अब अनुपम खेर स्टूडियो के भीतर जाने को तैयार नहीं थे। बात बिगड़ चुकी थी। अक्षय कुमार हैरान थे कि हुआ क्या? उनका व्यवहार सदैव बहुत विनम्र रहा, लेकिन वहां बात बिगड़ चुकी थी।

मैंने प्रसून की तरफ़ से माफ़ी मांगी, कहा कि उनकी मंशा वैसी नहीं थी, जैसी आप समझ रहे हैं। लेकिन अनुपम खेर नहीं माने और भूषण कुमार व अक्षय कुमार (उनके साथ पूरी पीआर टीम थी) को लेकर बिना इंटरव्यू दिए लौट गए।

बात चैनल के सेल्स हेड तक पहुंची। जाहिर है, पीआर वालों उन्हें बता दिया था कि ये तो भूषण कुमार जी का अपमान किया गया है, उन्हें “मुखौटा” कहा गया है।

भूषण कुमार की कंपनी चैनल को करोड़ों का विज्ञापन देती थी। उनकी नाराज़गी के मायने थे। हालांकि उन्होंने भी कुछ नहीं कहा था लेकिन सेल्स हेड ने मैनेजमेंट को भड़काने की बहुत कोशिश की। दबाव डालने की कोशिश की कि हम इतनी कोशिशों से विज्ञापन लाते हैं, और यहां…

यहां तक कहा गया कि पुण्य प्रसून वाजपेयी को माफ़ी मांगनी चाहिए। लेकिन पुण्य प्रसून ने साफ कहा,” मैंने ऐसा कुछ कहा ही नहीं, जिसके लिए माफ़ी मांगनी पड़े। हां, ‘मुखौटा’ कहा था, लेकिन उसका वह मतलब नहीं था। अक्षय फिल्म के हीरो थे, शो की टीआरपी उन्हीं के नाम पर थी। मैंने जो कहा, कह दिया। उसमें भड़कने जैसी कोई बात नहीं थी। वो सभी उस दिन बिना इंटरव्यू दिए चले गए, बात बराबर हो गई। कोई माफ़ी-वाफी नहीं होगी।”

मुझे लगा बात वहीं खत्म हो गई। मेरे रिश्ते सबके साथ अच्छे थे। मैं तीनों को नीचे गाड़ी तक छोड़ने गया। समझाने की भी कोशिश की, लेकिन बात खत्म नहीं हुई थी।

कहानी खत्म… हो जाती, अगर एक और घटना न घटी होती।

‘थर्ड डिग्री’ शो चल रहा था। प्रसून ने ‘बाबा’ को टैक्स बचाने की किसी ‘विद्या’ को लेकर टोक दिया। पुण्य ने इतना ही कहा था कि टैक्स बचाने के लिए आपने ट्रस्ट बना लिया। आप महंगी गाड़ियों में घूमते हैं (ये वीडियो आपको यूट्यूब पर मिल जाएगा)। बाबा भड़क गए।

भड़कना बड़ी बात नहीं थी, लेकिन उन्होंने जिस अंदाज़ में कहा, “आपकी हिम्मत कैसे हुई मुझ पर ये आरोप लगाने की?” वह अंदाज़ उस भय का सूचक था, जिसे हम सभी ने आगे चलकर महसूस किया।

सिर्फ याद दिला रहा हूं कि जिन दिनों (1988) में मैं ‘जनसत्ता’ अखबार में था, अरुण शौरी रोज फ्रंट पेज पर देश के प्रधान मंत्री (राजीव गांधी) को चोर कहते थे। रोज एक नया आरोप छपता था, नाम लेकर कहा जाता था कि राजीव गांधी (देश के प्रधान मंत्री) ने बोफोर्स तोपों की खरीद में 64 करोड़ रुपए की दलाली खाई है (चोरी की है) और एक बार भी प्रधान मंत्री कार्यालय से ऐसी धमकी नहीं आई थी कि मिस्टर शौरी हाऊ डेयर यू… (आपने ऐसा कहने की हिम्मत कैसे की)?

पत्रकार होते हैं सवाल करने के लिए। पूछने के लिए, टोकने के लिए। वो जब सवाल पूछते हैं, आरोप लगाते हैं तो आप बहुत नरमी से कह सकते हैं कि आप जो कह रहे हैं, उसका आधार क्या है?

आखिर आप एक नेशनल टेलीविजन पर हैं, आपके व्यवहार की गरिमा भी एक विषय है। किसी ने आरोप लगाया, प्रश्न पूछा तो आपको हक है यह कहने का कि आपके पास कोई सबूत है? और अगर इतने से आपका दिल नहीं भरा तो भी आप अपने पद, कद का मान रखते हुए अवमानना के लिए अदालत तक जा सकते हैं। लेकिन उखड़ कर सरेआम टीवी चैनल पर ही उसे डराने कैसे लगेंगे?

ये डर एक दिन में पैदा नहीं किया जाता है। इसे गढ़ा जाता है। इसमें समय लगता है, ताकत लगती है, सत्ता का समर्थन चाहिए होता है। और वो सब हो रहा था। अब मैं और कुछ नहीं कहूंगा।

दूसरी कहानी-

आपको याद होगी एक आवाज़, जो सरकार की खामियों को चीख-चीख कर उधेड़ती थी। आपने उसे देखा नहीं, सिर्फ़ सुना था। उसकी स्क्रिप्ट और आवाज़-दोनों आग उगलती थीं। सुनने वाला तिलमिला जाता था। वो लिखी स्क्रिप्ट, गूंजता हुआ सत्य।

किसे उसकी आवाज़ चुभी, नहीं पता। किसने कहा,” शब्दों में बारूद कम करो, कुछ चीनी घोलो”, नहीं मालूम। वो एक ज़रूरतमंद प्रोड्यूसर था, नौकरी प्यारी होनी चाहिए थी। लेकिन नहीं। वो नहीं माना। कैसे मानता?

कुत्ते भौंकते हैं। बिल्ली म्याऊं करती है। घोड़ा हिनहिनाता है। मुर्गा कुकड़ु-कूं बोलता है। मुर्गी पकपक करती है। और शेर? शेर दहाड़ता है। आप किसी की आदत नहीं बदल सकते। वो प्रोड्यूसर मना करने के बावजूद फिर वही स्क्रिप्ट फिर लिख बैठा, उसी दहाड़ के साथ।

किसे उसकी आवाज़ चुभ गई, नहीं मालूम। लेकिन फिर क्या हुआ? उधर एक को बाबा ने धमकाया था। इधर दूसरे से उसकी ‘मर्जी से’ इस्तीफ़ा ले लिया गया। इस्तीफा देकर वो बेरोज़गार हो गया। हम सब मौन थे।

चैनल के न्यूज़ रूम से दहाड़ खत्म हो चुकी थी। अब म्याऊं-म्याऊं शुरू हो गई थी। समय बदल चुका था। अब आप बेचैन होंगे उस नाम को जानने के लिए। आज वो एक यूट्यूबर है। ‘आर्टिकल 19’ के नाम से अपना चैनल चलाता है।

अगर आपने वो चैनल देखा है, तो यकीनन आप उस दहाड़ को पहचानते होंगे, वो दहाड़ है नवीन कुमार की। और अब पुण्य प्रसून वाजपेयी भी वही करते हैं, अपने ही नाम से।

पुण्य प्रसून ‘एबीपी न्यूज़’ अपनी मर्ज़ी से गए थे, फिर उन्होंने उसे भी अपनी मर्ज़ी से छोड़ दिया। फिर एक छोटे चैनल में भी गए, फिर उसे भी छोड़ दिया। ओह! बेबसी मर्ज़ी की। सोचने वाली बात बस इतनी है, जब कोई व्यक्ति जीवन जीने के अन्य उपायों को छोड़कर पत्रकारिता करने आता है, तो तय करके आता है कि उसका काम दहाड़ना होगा।

लेकिन जब आप उसे बार-बार रोकेंगे, डराएंगे, धमकाएंगे, तो वो क्या करेगा? मर्ज़ी से इस्तीफ़ा दे देगा। घर चला जाएगा। फिर जीने के लिए जो बन पड़ेगा, करेगा।

लेकिन क्या आप इतना पढ़ कर भी ये नहीं कहेंगे, “वो झुका नहीं साला।” जो झुकते नहीं हैं, वही ‘फायर’ होते हैं। बाकी सब ‘फूल’ (FOOL) हैं।

नोट –

  1. ये मौसम फूलों का है, लेकिन संजय सिन्हा की बात मानिए- सेव टाइगर्स।
  2. सारे पत्रकार अगर ‘फूल’ बन गए, तो एक दिन आपके लिए ख़तरा बनेंगे। उनका फायर होना ही आपके हित में है।
  3. शायद आप आज न समझें, लेकिन ऐसा न हो कि जब समझें, तब देर हो चुकी हो।
  4. पुण्य प्रसून वाजपेयी फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू में खास दिलचस्पी नहीं रखते थे, ये मेरा ही आग्रह था कि वो इंटरव्यू लें।
  5. मैंने यूं ही दो उदाहरण यादों से उकेरा है। आप तह में जाएंगे तो मीडिया के हर संस्थान में ‘मर्जी से इस्तीफा’ देने वालों, पत्रकारों की लिस्ट मिल जाएगी और नहीं मानने वाले को षडयंत्र से भी निकालने की कहानियां मिल जाएंगी।
  6. फर्क इतना होता है कि प्रबंधन ये धमकी देता है कि आपने खुद छोड़ दिया तो इज्जत बची रहती है। निकाल दिए गए तो आगे के रास्ते बंद हो जाएंगे।
  7. कभी मौका मिला तो (जो मिलेगा ही), उनकी कहानियां भी सुनाऊंगा ही, जो निकाल ही दिए गए, लेकिन झुके नहीं साला…।
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
1 Comment

1 Comment

  1. पंकज झा

    July 24, 2025 at 11:27 am

    सच में पढ़कर पूरा आर्टिकल मजा आ गया लेकिन उस शेर को मैं आज भी देखता हूं सुनता हूं आज भी उसकी यूट्यूब पर दहाड़ कम नहीं हुई है पुण्यप्रसून वाजपेई जी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन