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सुख-दुख

राहुल गांधी पर किताब और खर्चे निकालने के लिए अपना दुख-दर्द बेचता स्वतंत्र मीडिया

संजय कुमार सिंह-

वर, नाम, प्रस्तुति और अभी तक हुई चर्चा से यह किताब राहुल गांधी पर एक विस्तृत दस्तावेज होने का आभास देती है। हाथ में आई तो लगा कि इसका नाम, “भारत 2013-2023” होता तो मैंने पहले खरीदी होती। संभव है जब पता चलता तभी ऑर्डर कर देता या प्रति प्राप्त करने की कोशिश में लग जाता। इस किताब का नाम है, “राहुल गांधी – सांप्रदायिकता, दुष्प्रचार तानाशाही से ऐतिहासिक संघर्ष”। ऊपर लिखा है, 21वीं सदी में भारत के पहले पुनर्जागरण की गाथा। ऐसा नहीं है कि किताब में इससे अलग कुछ है।

मुझे लगता है कि इस पुस्तक में राहुल गांधी, उनके संघर्ष और भारत के पुनर्जागरण की गाथा तो है ही 2013 से 2023 तक के भारत में स्वार्थी और तानाशाही ताकतों के कब्जे और उसके प्रभाव की कहानी भी क्रम से लिखी गई है।

उदाहरण के लिये, पुस्तक का पहला अध्याय है, अन्ना आंदोलन : झूठ और प्रोपेगेंडा की आंधी है। इससे शुरू होकर भीड़ की हिन्सा और नागरिक हत्या से होते हुए सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस के बाद एक अध्याय है, आलू डालो, सोना निकालो : यह नरेन्द्र मोदी ने कहा था। एक अध्याय है, सूट बूट की सरकार, फिर आरएसएस की विचारधारा देश को बांट रही है और अंत में जातीय जनगणना के लिए राहुल गांधी की पक्षधरता।

बेशक राहुल गांधी पर और भी अध्याय हैं लेकिन मैं बताना चाहता हूं कि राहुल गांधी के अलावा भी सामग्री है। भले ही लेखक को वह राहुल गांधी से संबंधित लगता हो या हो भी। ऐसी हालत में मेरा मानना है कि यह किताब सिर्फ राहुल गांधी के बारे में नहीं, देश भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में भी है।

पुस्तक की भूमिका में लिखा है, … देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने हमें बहुत पहले सजग करते हुए कहा था, अगर RSS वाले कहें कि वह पूर्व दिशा में जा रहे हैं तो उन्हें पूर्व के अलावा बाकी तीन दिशाओं में भी खोजना चाहिये। इसके बावजूद पुस्तक के पिछले कवर पर लिखा है, यह किताब भारतीय लोकतंत्र को घृणा, सांप्रदायिकता और तानाशाही से बचाने के राहुल गांधी के प्रयासों का दस्तावेज है। बेशक इससे लगता है कि पुस्तक राहुल गांधी के बारे में है जबकि इसी पैरे में लिखा है, इसमें विभाजनकारी मीडिया की विस्तार से पड़ताल के साथ पिछले 10 साल के मनमाने फैसलों, संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे, हिंसा और सांप्रदायिक गतिविधियों का तथ्यात्मक विश्लेषण भी है। मुझे लगता है कि यह इस पुस्तक की कई विशेषताओं में एक है लेकिन नाम ऐसा है कि कोई इसकी उम्मीद नहीं करेगा।

पुस्तक में जिनका आभार जताया गया है उनमें ऑल्ट न्यूज, न्यूजलांड्री, द वायर, आर्टिकल 14, मीडिया विजिल, न्यूजक्लिक का भी नाम है। लेकिन किताब से संबंधित विवाद के बारे में जानने के लिए जब मैंने न्यूजलांड्री का एक वीडियो देखना चाहा तो पता चला कि वह मुफ्त में देखने के लिए नहीं है। मुझे लगा, स्वतंत्र मीडिया अपने खर्चे निकालने के लिये मीडिया के दुख-दर्द को भी बेच रहा है या उससे कमा रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक मुश्किल स्थिति है और इसमें सही-गलत तय करना भी आसान नहीं है। जो भी हो, अघोषित इमरजेंसी की इस हालत में सही और शुद्ध सूचना प्राप्त करना बेहद मुश्किल है। प्रकाशक नहीं मिलने के कारण लेखक ने इस पुस्तक का प्रकाशन स्वयं किया है और बेचने की मुश्किलें झेल रहे हैं।

इससे पहले, रफाल सौदे पर परंजय गुहा ठकुराता भी अपनी किताब स्वयं प्रकाशित कर चुके हैं और कम से कम दो सेना प्रमुखों की किताबें प्रकाशकों की कोशिशों के बावजूद फंसी हुई हैं। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबरों के अनुसार पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकन्द नरवणे की किताब, फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी और एक अन्य सेना प्रमुख, जनरल एनसी विज की किताब, अलोन इन द रिंग रक्षा मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के इंतजार में फंसी हुई हैं।

‘अलोन इन द रिंग’ में 2002 से 2005 तक सेना प्रमुख रहे लेखक एन सी विज ने लिखा है कि भारतीय खुफिया एजेंसियां कारगिल युद्ध से पहले पाकिस्तान द्वारा सैन्य खरीद का पता लगाने में “गंभीर रूप से विफल” रहीं। 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहे जनरल एम एम नरवणे की पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ छह महीने से अधिक समय से मंजूरी का इंतजार कर रही है। इसमें चीन के साथ भरतीय सेना की 2020 की झड़पों के बारे में अब तक अज्ञात विवरण के साथ अग्निवीर योजना की आलोचनात्मक समीक्षा शामिल है।

“राहुल गांधी – सांप्रदायिकता, दुष्प्रचार तानाशाही से ऐतिहासिक संघर्ष” 750 पन्ने की किताब है और इसक कीमत 749 रुपये है। अमेजन पर 699 रुपये में है। इसमें 10 साल के भारतीय इतिहास या अमृत काल का सिलसिलेवार वर्णन है। लेखक भारी छूट दे रहे हैं और 500 रुपये में भी मिल सकती है। लेकिन किताब खरीदने के लिए पैसे भेजने में मुझे भी दिक्कत आई और यह अघोषित सेंसर का भी परिणाम हो सकता है। अगर आपको पुस्तक आराम से मिल जाये तो मान लीजिये कि अघोषित इमरजेंसी घोषित से कम बुरी है पर 10 साल से चल रही है तो कुल नुकसान कम है या ज्यादा इसका पता पुस्तक पढ़ने से ही चलेगा। जय श्रीराम।

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